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जनभाषा शिक्षा

राजभाषा का उद्देश्य जनता के कल्याण में निहित होना चाहिए

अम्बरीश त्रिपाठी


ऐतिहासिक भूलों को भूल जाने में आम भारतीयों का कोई सानी नहीं है। उपनिवेश बनने की कहानी को कितनी जल्दी और आसानी से हम भूल गए और फिर एक बार नव उपनिवेशीकरण की चक्की में पिसने को हम प्रस्तुत होते जा रहे हैं।

भारत को प्राचीनतम गणतंत्र-जनतंत्र होने का गौरव प्राप्त है लेकिन दो- ढाई हजार सालों तक के इतिहास में जनता या जनगण की भाषा राजभाषा नहीं रही। जब जनता पाली, प्राकृत ,अपभ्रंश और बोलियों के समूह के रूप में हिंदी का प्रयोग कर रही थी तो शासन क्रमशः संस्कृत, पाली, अरबी, फ़ारसी ,अंग्रेजी को राजभाषा के रूप में व्यवहृत कर रहे थे। इस बड़ी सांस्कृतिक और भाषिक विरोधाभास की पृष्ठभूमि में 14 सितंबर 1949 में स्वतंत्र भारत की संविधान ने जनभाषा हिंदी को इतिहास में पहली बार राजभाषा का दर्जा दिया।

राजभाषा का मतलब है राज-काज की भाषा,अर्थात शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा अर्थात सरकार और जनता के बीच होने वाली संवाद की भाषा। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में भी गणतंत्र का मतलब जनता का, जनता द्वारा जनता के लिए ही शासन होता है। यहाँ पर राजभाषा का उद्देश्य भी जनता के कल्याण में ही निहित होना चाहिए। पर ऐसी बात है नहीं। क्योंकि हम शीघ्र ही भूल गए कि अरबी ,फारसी और अंग्रेजी आदि भाषाओं को ही राजभाषा बनाकर भारतीय जनता के बहुविधि शोषण का मार्गप्रशस्त किया जाता रहा।और आज आज़ादी के70 से अधिक सालों बाद भी राजभाषा हिंदी जनभाषा हिंदी से कोसों दूर है,अलग है।

हिंदी की अनेक बोलियों और उनके समृद्ध साहित्य ने हिंदी को राजभाषा बनने का आत्मविश्वास दिया। विद्यापति, कबीर, सूर, तुलसी, जायसी और मीरा सरीखे रचनाकारों ने देश के कोने कोने तक हिंदी की मधुर तान पहुंचाई।

निज भाषा उन्नति अहै ,सब उन्नत को मूल ।
बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को शूल।।

आजादी के नारों का मूल स्वर बन गया था। आज़ादी का सूरज उगने की लालिमा के साथ ही भारत के बहुसंख्यक समुदाय द्वारा समझी बोली जाने वाली जनभाषा हिंदी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की मांग प्रखर होती चली गई। अंततः राजभाषा के रूप में हिंदी को संवैधानिक दर्जा दे दी गई। और इस तरह जनभाषा हिंदी को राजभाषा बनाने का संघर्ष सफल हुआ। तो क्या अब हम कह सकते हैं कि राजभाषा हिंदी ही भारत की जनभाषा है? नहीं।

राजभाषा के लिए पारिभाषिक शब्दों का निर्माण मुख्य रूप से- सृजन, ग्रहण,संचयन एवं अनुकूलन जैसी चार प्रक्रियाओं द्वारा हुआ।अँग्रेजियत से प्रभावित कुछ विद्वानों ने अंग्रेजी रूप या उसके निर्जीव अनुवाद /पर्याय के रूप में अधिकाधिक पारिभाषिक शब्दों का गठन किया।इस प्रक्रिया पर गुरुदेव टैगोर ने कड़ी टिप्पणी की थी” हमने अपनी आँखें खोकर चश्मे लगा लिए हैं “। दरअसल हिंदी राजभाषा तो बनी पर अकबर इलाहाबादी के शब्दों में कहूँ तो –

“उन्हीं के मतलब की कह रहा हूँ ,

ज़बान मेरी है बात उनकी।”

दरअसल हिंदी को राजभाषा के रूप में गढ़ने वाले लोग अधिकांशतः उच्च शिक्षित अभिजात्य वर्ग के लोग थे।जिनके खुद की उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी ही रहा।उस समय की बड़ी जरूरत भी थी अंग्रेजी की प्रचलित परंपरा के बरक्स हिंदी को खड़ी करने की। संविधान में इसके लिए 15 वर्ष का समय भी निर्धारित किया गया। 15 वर्षों बाद भी अंग्रेजी तो हटी नहीं और खुद राजभाषा भी अंग्रेजीदां हो गई। विडंबना यह भी हुई कि जो राजभाषा तैयार हुई वो न जनता की भाषा थी, न ही महाविद्यालयों या विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली भाषा। सात दशकों बाद भी आज संघ लोक सेवा और राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं सहित लगभग सभी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में विवाद की स्थिति में प्रश्नपत्र का अंग्रेजी रूप ही क्यों मान्य है। हम आज तक राजभाषा हिंदी में कोई मौलिक प्रश्नपत्र क्यों नहीं तैयार कर सके। समानता के नाम पर अंग्रेजी के स्टील प्लांट को इस्पाती पौधा अनूदित करना कौन सा न्याय है , इंडिविजुअल की हिंदी व्यष्टिक करना और मॉडिफिकेशन को आपरिवर्तन कर कौन सा उद्देश्य पूरा किया जा रहा है वह भी संघ लोक सेवा जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में। क्या ये हिंदी माध्यम को हतोत्साहित करने का उपक्रम नहीं है। क्या अंग्रेजी की तरह ही राजभाषा हिंदी भी आम जनता को डराने वाली भाषा के रूप में आज भी नहीं व्यवहृत हो रही है।एक आम आदमी से अपेक्षा की जाती है कि वो जीएसटी जाने , इंटरप्रेनुरेशिप बोले ,प्रोटोकॉल फॉलो करे पर वही अधिकारी लोक में बहुप्रचलित शब्दों नरवा,गरवा, घुरवा और बाड़ी को बोलना ,जानना नहीं सीख पाता या सीखने से कतराता है।

हमारे देश के सफल लोकतंत्र में जब एक चायवाला व्यक्ति प्रधानमंत्री बन सकता है तो चाय के दुकानों पर बोली जाने वाली समझी जाने वाली भाषा के शब्द राजभाषा में क्यों नहीं शामिल हो सकते। जिस गरीब वंचित तबके के लिए उज्ज्वला गैस योजना लागू किया गया क्या वो लोग उज्ज्वला बोल लिख और समझ पाते हैं। अनुपम मिश्र ने राजभाषा हिंदी पर चुटकी लेते हुए एक बार कहा था कि ‘सामाजिक वानिकी’ पद रचने वाले जरा ये समझायेंगे कि असामाजिक वानिकी भी कोई शै होती है क्या ? वानिकी अपने आप में सामाजिक नहीं है क्या?

हमें इस बात का सदैव स्मरण रखना चाहिए कि जिस हिंदी को राजभाषा बनाने के लिए बहुत लड़ाइयां लड़ी गई वही राजभाषा हिंदी अब आम जन से बहुत दूर हो गई है। राजभाषा में राज शब्द राजा या विशेष वर्ग के लिए नहीं अपितु शासन को सुचारू रूप से चलाए जाने के लिए प्रयुक्त हुआ है। और शासन भी जनता के कल्याण के लिए। इसलिए राज को जनता के करीब लाने के लिए, राजभाषा हिंदी को जनभाषा बनाने के लिए आज पुनः एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ी करने की जरूरत है। एक ऐसी राजभाषा जो जड़ या निर्जीव न रहे अपितु ऐसी भाषा जो समय और परिवेश के अनुरूप जनता के सुख-दुःख, आवश्यकताओं को स्वर दे सके।सरकार और जनता के बीच संवाद सेतु के रूप में सदैव गतिशील रहे।

(अम्बरीश त्रिपाठी शासकीय महाविद्यालय ,मचांदुर
दुर्ग में हिंदी के सहायक प्राध्यापक हैं।)  

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