पटना। यूजीसी रेगुलेशन समता आंदोलन, बिहार द्वारा 25 फरवरी को पटना के आइएमए हॉल में यूजीसी रेगुलेशन को लागू करने के सवाल पर राज्यस्तरीय कन्वेंशन का आयोजन किया गया। इसमें बिहार के भिविन्न कैंपसों और जिलों में आंदोलित छात्र-युवाओं के प्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। यूजीसी गाइडलाइन पर 19 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है, इसके मद्देनजर 18 मार्च को संपूर्ण क्रांति दिवस के अवसर पर पटना में समता अधिकार न्याय रैली आयोजित करने का निर्णय किया गया।
कार्यक्रम में प्रखर वक्ता लक्ष्मण यादव, डीयू में यूजीसी आंदोलन की चर्चित नेत्री अंजली, पूर्व विधायक अमरजीत कुशवाहा, पूर्व विधायक व आरवाइए के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजीत कुशवाहा, आरवाइए के राज्य सचिव शिवप्रकाश रंजन, जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष धनंजय, मंजीत साहू, सुबोध यादव, विकास आजाद, एसएफआई की राज्य अध्यक्ष कांति कुमारी, निशांत यादव, कुमुद पटेल, आजाद शत्रु, कांति यादव, विश्वा यादव, विजय पासवान, पृथ्वीराज, मुख्तार, विकास आजाद, सोनम राव, सूरज यादव आदि कई महत्वपूर्ण नेताओं ने संबोधित किया. संचालन सामाजिक न्याय आंदोलन के रिंकू यादव ने किया। आइसा के महासचिव प्रसेनजीत कुमार, राज्य सचिव सबीर कुमार, प्रीति कुमारी, एआइपीएफ के संतोष आर्या, शाह शाद भी कन्वेन्शन में उपस्थित रहे।
यूजीसी गाइडलाइन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक को लेकर आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने केंद्र सरकार पर सामाजिक न्याय को कमजोर करने का आरोप लगाया और व्यापक आंदोलन का आह्वान किया।
मुख्य वक्ता डॉ. लक्ष्मण यादव ने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी न्याय की लड़ाई जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के दबाव में ही गाइडलाइन लेकर आई थी, लेकिन बेहद कमजोर गाइडलाइन लेकर आई, गाइडलाइन जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए लाया जाना था, लेकिन उसमें अस्पष्ट प्रावधान रखे गए, जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई। हमारी लड़ाई किसी जाति के खिलाफ नहीं बल्कि जातिगत विशेषाधिकार के खिलाफ समता की लड़ाई है।
दिल्ली विश्विद्यालय की छात्रा अंजली ने कहा कि सामाजिक न्याय के सवाल पर एक वर्ग की छटपटाहट को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में समझना होगा. उन्होंने कहा कि सदियों से श्रम और शोषण का बोझ एक समुदाय पर डाला गया, जबकि लाभ दूसरे उठाते रहे. उन्होंने कहा कि भूमिहीन, दलित और वंचित तबकों की स्थिति आज भी गंभीर है। जेएनयू की घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दबे-कुचले समुदायों को ही उल्टा कटघरे में खड़ा किया जाता है।
उन्होंने कहा कि आंदोलन को और तेज कीजिए ताकि कोई और रोहित, कोई और पायल इस व्यवस्था का शिकार न बने।
मनजीत साहू ने कहा कि बिहार में समता आंदोलन परवान चढ़ रहा है और 18 मार्च के कार्यक्रम को ऐतिहासिक बनाने की जिम्मेदारी हम सबके कंधो पर है.
पूर्व विधायक अजीत कुशवाहा ने निजी क्षेत्र और न्यायपालिका में आरक्षण लागू करने, 65 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने और ईडब्ल्यूएस प्रावधान खत्म करने की मांग की।
इसके पूर्व जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष धनंजय ने कन्वेंशन में प्रस्ताव को प्रस्तुत किया और बिहार में यूजीसी के समर्थन में चले आंदोलनों की एक रिपोर्ट रखी।
सर्वसम्मति से 18 मार्च को समता अधिकार न्याय रैली को ऐतिहासिक बनाने का प्रस्ताव उन्होंने पेश किया जिसे सर्वसम्मति से पारित किया गया।
सभा का संचालन करते हुए रिंकू यादव ने कहा कि लड़ाई सदियों पुराने विशेषाधिकार को तोड़ने की है. जीवन के हर क्षेत्र में बराबरी जरूरी है और बिहार को सामाजिक न्याय की अग्रिम चौकी के रूप में फिर खड़ा होना होगा।
राज्यस्तरीय समता कन्वेंशन में सात सूत्री प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव में कहा गया है कि शिक्षा संस्थानों में बढ़ते जातीय भेदभाव, उत्पीड़न और असमानता बेहद गंभीर है। हाल में जेएनयू की वाइस चांसलर द्वारा एक पॉडकास्ट में दलित उत्पीड़न का मजाक उड़ाने और यूजीसी गाइडलाइन को अनावश्यक व अतार्किक बताने जैसी टिप्पणियां निंदनीय है.।इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय में गाइडलाइन के समर्थन में आंदोलनरत छात्रों पर हमले और प्रशासन की मौजूदगी में अपमान की घटनाएँ लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात हैं और यह भी बेहद निंदनीय है।
प्रस्ताव में मांग की गई है कि यूजीसी 2026 नोटिफिकेशन को संसद द्वारा कानून बनाया जाए, संस्थागत जातिवाद को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए, राष्ट्रीय समता आयोग का गठन कर उसे संवैधानिक दर्जा दिया जाय। उसकी स्वतंत्र जांच शक्तियाँ हों और वह अपनी वार्षिक रिपोर्ट संसद को पेश करें। बिहार में जातीय सर्वेक्षण के बाद 65 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को नौवीं अनुसूची में शामिल किया जाए, जजों की नियुक्ति में कॉलेजियम सिस्टम खघ्त्म करके बेहतर लोकतांत्रिक व्यवस्था न्यायालय में सुनिश्चित किया जाए, निजी क्षेत्रों में भी रिजर्वेशन को लागू किया जाए, जाति गणना करवाई जाए, नई शिक्षा नीति 2020, राष्ट्रीय शिक्षा नीति वापस लिया जाए।

