बालकृष्ण भट्ट के निबन्ध पर आयोजित हुई गोष्ठी

साहित्य-संस्कृति

कवि गौड़ 

महादेवी वर्मा स्मृति महिला पुस्तकालय, इलाहाबाद की ऑनलाइन रविवारी गोष्ठी में बालकृष्ण भट्ट  के निबंध ‘हिन्दू जाति का स्वाभाविक गुण’ का पाठ हुआ। इसके बाद निबंध पर बातचीत भी हुई। इसमें रामजी राय, मीना राय, जनार्दन, मनोज कुमार मौर्य, दुर्गा सिंह, अनीता त्रिपाठी, शोध छात्रा शिवानी व दीप्ति मिश्रा , शोध छात्र सचिन गुप्ता, स्नातक छात्र कवि और मो.  उमर शामिल हुए।
निबंध का पाठ शिवानी ने किया ।
भट्ट जी के इस  निबंध पर विस्तृत परिचर्चा हुई।
परिचर्चा को प्रस्तावित करते हुए दुर्गा सिंह ने कहा कि इस निबन्ध को समझने के लिए औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन द्वारा की गयी स्कूलिंग को जानना होगा। इसके द्वारा जो भारत का अतीत और भारतीयता रची गयी उसी के क्षरण पर बालकृष्ण भट्ट इस निबन्ध में चिंता जाहिर कर रहे हैं। 1770 के दशक में संस्कृत विद्यालयों की स्थापना से शुरू हुआ यह अभियान फोर्ट विलियम काॅलेज, मैकाले की शिक्षा पद्धति से होता हुआ मैक्समूलर के यहाँ पूर्णता पाता है। यह समय 1870 का है। अर्थात सौ साल का समय। इसमें 1857 के स्वाधीनता संघर्ष की प्रतिक्रिया स्वरूप ब्रिटिश शासन की बदली हुई समूची नीति के भी दस-बारह वर्ष बहुत महत्वपूर्ण साबित हुए। यहाँ से भारतेंदु मण्डली का लेखन शुरू होता है। इसी लेखन को आधार बनाकर उस समय को हिन्दी नवजागरण कहा गया। लेकिन इस नवजागरण के भीतर सुधारवादी तत्व के साथ पुनरुत्थानवादी तत्व भी प्रभावी ढंग से मौजूद था।
परिचर्चा में शामिल इलाहाबाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डाॅ. जनार्दन ने कहा कि बालकृष्ण भट्ट के निबन्ध में जो विचार अभिव्यक्त हुए हैं, उसका असर बाद के हिन्दी आलोचना और इतिहास लेखन में भी है। रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास-लेखन में कई पदबंध वही के वही रखे गये हैं। मिश्र बंधुओं की जिस पुस्तक को रामचंद्र शुक्ल ने इतिहास लेखन का मुख्य आधार बनाया है, उसमें भी बालकृष्ण भट्ट के हिन्दू पुनरुत्थानवादी विचारों की गहरी छाप है। उन्होंने यह भी कहा कि बालकृष्ण भट्ट जिस हिन्दू संस्कृति को लेकर चिंतित हैं, उसमें दलित, स्त्री, आदिवासी कहीं नहीं हैं। इसका मतलब है कि ये सब हिन्दू नहीं थे। भारतेंदु मण्डल के लेखकों के निबन्धों में आर्य जाति की बार बार बात की जाती है, आदिवासी और मुसलमान इससे बाहर रखे गये। उन पर कोई बात नहीं की गयी।
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए डाॅ.मनोज कुमार मौर्य ने कहा कि निबंध का शीर्षक हिन्दू जाति का स्वाभाविक गुण की जगह ब्राह्मण जाति का स्वाभाविक गुण रखना चाहिए था क्योंकि निबन्ध में जिस सांस्कृतिक क्षरण पर चिंता जाहिर की गयी है, वह ब्राह्मणवादी संस्कृति है जहाँ वेद ब्रह्म हैं। और उस दौर में एक पत्रिका का तो नाम ही ‘ब्राह्मण’ है। उन्होंने कहा कि हिन्दू क्या है, जब इस सवाल के सामने खुद को रखकर देखता हूँ तो पाता हूँ कि मैं हिन्दू नहीं हूँ या फिर कैसे यह जाना जा सकता है कि मैं हिन्दू हूँ! इस क्रम में उन्होंने कांचा इल्लैया की पुस्तक, ‘मैं हिन्दू क्यों नहीं हूँ’ और ज्योतिबा राव फुले की पुस्तक, ‘गुलामगीरी’ की चर्चा की।

वैसे भट्ट जी के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष भी है ,जिसमें वे आधुनिकता का समर्थन तथा सनातन धर्म की रूढ़ियों पर चोट  करते हुए दिखते हैं। रामजी राय ने इस अंतर्विरोध की ओर ठीक ही इशारा किया कि इन रचनाकारों की रचना में हिंदी ,हिन्दू ,हिंदुस्तान था, लेकिन आज देखिए उसको बदलकर हिन्दी, हिन्दू, हिंदोस्थान कर दिया गया। रामजी राय ने कहा कि 1857 के बाद की बदली हुई ब्रिटिश नीति के तहत ब्रिटिश विदेश मंत्री के निर्देशन में आठ खण्डों में भारत का इतिहास लिखवाया गया और ध्यान देने वाली बात यह कि बाद में मध्यकालीन इतिहास पर जो भी लेखन हुआ, उसमें अधिकतर ने इसे सोर्स बुक के रूप में इश्तेमाल किया। यानी साम्प्रदायिकता और हिन्दू-मुस्लिम को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने का संगठित और सुनियोजित, शातिराना काम ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासन द्वारा किया गया, जिसके शिकार ढेर सारे लेखक हुए। उन्होंने कहा कि लेकिन हमें भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान के सभी नवजागरण को एक साथ रखकर देखना चाहिए और उसकी सामान्य प्रवृत्तियों की शिनाख्त करनी चाहिए, तब शायद कोई मुकम्मल बात निकल कर आये। नये शोधार्थियों को और गोष्ठी में भी इस दिशा में कोई अध्ययन या परिचर्चा हो तो उस दौर को पूरी तरह से समझने में मदद मिलेगी!

गोष्ठी का संचालन मोहम्मद उमर ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन दुर्गा सिंह ने किया ।

(फ़ीचर्ड इमेज गूगल से साभार)

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