लोक गायिका नेहा सिंह राठौर के संबंध में एबीपी चैनल द्वारा चरित्र-हनन और उनकी सार्वजनिक छवि को धूमिल करने वाली झूठी एवं मानहानिपरक खबर के प्रसारण की जन संस्कृति मंच कड़ी भर्त्सना करता है और माँग करता है कि चैनल के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई की जाए, जिसमें उसे कुछ समय के लिए ऑफ एयर किया जाना भी शामिल है। जन संस्कृति मंच देश के लोगों से अपील करता है कि वे इस गंभीर प्रकरण के विरोध में एबीपी चैनल का बहिष्कार करें और उसके खिलाफ आवश्यक कानूनी कार्रवाई की माँग करें।
हालाँकि चैनल द्वारा उक्त खबर के प्रसारण के लिए सार्वजनिक रूप से माफी माँग ली गई है, लेकिन जन संस्कृति मंच के विचार में मात्र माफी इस गंभीर प्रकरण की जिम्मेदारी से मुक्त होने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती। यदि किसी मीडिया संस्थान द्वारा किसी नागरिक की सार्वजनिक छवि और प्रतिष्ठा को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाली असत्य एवं मानहानिपरक सामग्री प्रसारित की जाती है, तो उसकी जवाबदेही केवल माफी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इस मामले में यह भी जाँचा जाना आवश्यक है कि ऐसी खबर किन परिस्थितियों में प्रसारित हुई, उसकी तथ्य-जाँच किस स्तर पर हुई और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है।
यह घटना महज़ एक तकनीकी चूक या पत्रकारीय लापरवाही मानकर टाल दिए जाने योग्य नहीं है। जन संस्कृति मंच के विचार में यह उस व्यापक राजनीतिक-सामाजिक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसके तहत सत्ता के खिलाफ सवाल उठाने वाली स्वतंत्र और जनपक्षीय आवाज़ों को बदनाम करने, उनकी विश्वसनीयता को चोट पहुँचाने और उन्हें सार्वजनिक जीवन में हाशिये पर धकेलने की कोशिशें लगातार सामने आती रही हैं। मुख्यधारा के गोदी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इस प्रवृत्ति का सक्रिय वाहक बन चुका है।
यह प्रकरण एक बार फिर इस गंभीर प्रश्न को सामने लाता है कि सत्ता और कॉरपोरेट मीडिया के गठजोड़ के परिणामस्वरूप पत्रकारिता की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जन-जवाबदेही किस हद तक प्रभावित हो सकती है। जब-जब कोई कलाकार या नागरिक सत्ता से असहमति व्यक्त करते हुए जनहित के सवाल उठाता है, तब-तब इस मीडिया तंत्र के एक हिस्से द्वारा उसकी गरिमा और सार्वजनिक विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाने के लिए चरित्र-हनन और दुष्प्रचार के औजारों का इस्तेमाल किए जाने के उदाहरण सामने आते रहे हैं।
जन संस्कृति मंच का मानना है कि एबीपी न्यूज़ चैनल सहित तथाकथित मुख्यधारा के अनेक चैनल और अखबार लंबे समय से पत्रकारिता की स्वतंत्र भूमिका निभाने के बजाय भाजपा की सरकारों और आरएसएस की राजनीतिक विचारधारा के पक्ष में खड़े दिखाई देते रहे हैं। सत्ता द्वारा जनता के खिलाफ तथा संविधान और लोकतंत्र के विरुद्ध किए जा रहे कदमों पर सवाल उठाने के बजाय वे कई बार उन्हें उचित ठहराने और उनके खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को दबाने का काम करते दिखाई देते हैं। यह प्रवृत्ति हम पिछले एक दशक से अधिक समय से देखते आ रहे हैं।
गोदी मीडिया को मॉब लिंचिंग के आरोपियों से लेकर कठुआ बलात्कार मामले के आरोपियों के पक्ष में खुलेआम खड़े होते हमने देखा है। दिल्ली की एक शिक्षिका के खिलाफ फर्जी स्टिंग ऑपरेशन के जरिए उनकी छवि को नुकसान पहुँचाने और उनके खिलाफ हिंसक माहौल बनाने की कोशिश का मामला भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रहा है।
गोदी मीडिया एक दशक से अधिक समय से केंद्र और राज्य सरकारों की जन-विरोधी, संविधान-विरोधी और लोकतंत्र-विरोधी कार्रवाइयों के खिलाफ उठ खड़े हुए जनता के आंदोलनों—सीएए-एनआरसी आंदोलन, किसान आंदोलन, मजदूर आंदोलन, पेपर लीक, शैक्षिक भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ युवा आंदोलनों तथा अब वोट चोरी के खिलाफ जन प्रतिरोध—को बदनाम करने का काम करता आया है। सत्ता के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की छवि धूमिल करने के लिए गोदी मीडिया के एक हिस्से द्वारा लगातार ऐसी खबरें और आख्यान प्रसारित किए जाते रहे हैं, जो उनके खिलाफ जनमत और कभी-कभी हिंसक वातावरण तक तैयार करने में सहायक होते हैं।
वोट चोरी के खिलाफ चल रहे जन प्रतिरोध के संदर्भ में भी गोदी मीडिया का एक हिस्सा इसी भूमिका में दिखाई दे रहा है। जनता की आवाज़ को जगह देने वाले स्वतंत्र पत्रकारों, यूट्यूब चैनलों और वेब पोर्टलों को रेगुलेट करने के नाम पर रोकने और उन्हें प्रतिबंधित करने की सत्ता-प्रतिष्ठानों से उठ रही आवाज़ों में भी वह सुर मिलाता दिखाई देता है। वोट चोरी के खिलाफ चल रहे आंदोलन को कवर कर रहे पत्रकारों पर पुलिस की दमनात्मक कार्रवाई, जिसमें उन्हें हिरासत में लिया जाना भी शामिल है, पर गोदी मीडिया की ओर से अपेक्षित सवाल और प्रतिरोध दिखाई नहीं देता।
जन संस्कृति मंच के विचार में नेहा सिंह राठौर के खिलाफ प्रसारित की गई झूठी, दुर्भावनापूर्ण और मानहानिपरक खबर को इसी व्यापक मीडिया-राजनीतिक प्रवृत्ति के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। गोदी मीडिया केवल सच की आवाज़ को पर्याप्त जगह देने में विफल नहीं है और न ही वह केवल सत्ता का कीर्तिगान कर रहा है, बल्कि उसका एक हिस्सा जनता, संविधान, लोकतंत्र और न्याय के पक्ष में उठने वाली आवाज़ों को कमजोर करने वाली राजनीतिक प्रक्रिया में सहभागी की भूमिका निभाता दिखाई देता है। इसलिए इसे केवल एक माफी के साथ समाप्त हो जाने वाला मामला नहीं माना जा सकता। इसकी निंदा और भर्त्सना से आगे बढ़कर ऐसे मीडिया तंत्र को लोकतांत्रिक और जनपक्षीय मूल्यों के आधार पर खारिज करने के अभियान और आंदोलन का हमें हिस्सा बनना चाहिए।
जन संस्कृति मंच माँग करता है कि इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना और चरित्र-हनन करने वाली पत्रकारिता करने वाले मीडिया घरानों और इसके लिए जिम्मेदार लोगों की भूमिका की निष्पक्ष जाँच की जाए तथा दोषी पाए जाने पर उनके खिलाफ कठोर दंडात्मक और कानूनी कार्रवाई की जाए। सत्ता के दबाव में काम करने वाले और पत्रकारिता की बुनियादी मर्यादाओं से समझौता करने वाले मीडिया तंत्र के खिलाफ समाज के हर हिस्से में व्यापक जन-बहिष्कार और लोकतांत्रिक प्रतिरोध खड़ा किया जाए।
जसम लोक गायिका नेहा सिंह राठौर का पुरजोर समर्थन करता है और उनकी गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा न्याय की लड़ाई में उनके साथ खड़ा है।

