समकालीन जनमत
ज़ेर-ए-बहस

दिल्ली पुलिस ने बदला ‘आपदा’ को ‘अवसर’ में

संजीव कुमार


हत्यारों के लिए,

हत्यारों के साथ, सदैव!

दिल्ली पुलिस ने जिस तरह आपदा को अवसर में बदला है, वह अभूतपूर्व है. कल ‘पिंजरा तोड़’ की दो संस्थापक सदस्यों, देवांगना कलिता और नताशा नरवाल, को गिरफ्तार कर लिया, इस बिनाह पर कि ज़ाफ़राबाद में 22 फरवरी का धरना आयोजित करने में वे भी शामिल थीं. दोनों जनेवि की शोधार्थी हैं और जनवादी आन्दोलनों में सक्रिय रही हैं. 2015 में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं के रूप में इन्होंने लड़कियों के छात्रावासों की पाबंदियों के ख़िलाफ़ ‘पिंजरा तोड़’ की शुरुआत की थी.

ज़ाफराबाद के धरने के नाम पर कई गिराफ्तारियाँ हो चुकी हैं. जामिया की छात्रा, जामिया को-ऑर्डिनेशन कमेटी की मीडिया संयोजक सफूरा ज़रगर को तो यूएपीए जैसे काले क़ानून के तहत जेल में ठूंस दिया गया है, वह भी तब जबकि वे हामिला हैं.

दिल्ली पुलिस ये सारी गिरफ्तारियां यह बताकर कर रही है कि 22 फरवरी को ज़ाफ़राबाद में सीएए के विरोध में जो सड़क जाम हुआ, उसी की प्रतिक्रिया में कपिल मिश्रा ने 23 को रैली निकाली और खुली धमकी दी, जिसके बाद मारकाट शुरू हुई. तो दोषी कौन हुआ? ज़ाहिर है, कपिल मिश्रा नहीं. दोषी वे हैं जिनकी वजह से कपिल को गुस्सा आया और नतीजे में एक संगठित गुंडावाहिनी को सबक़ सिखाने के लिए शिकारी कुत्तों की तरह हुलका दिया गया.

क्या ग़ज़ब की दलील है ना!

कपिल मिश्रा को तो उच्च-स्तरीय सुरक्षा मुहैया कराई गयी है, और जिनके ख़िलाफ़ दंगा हुआ, उन्हें इस विकट कोरोना-काल में, जब अदालत भी क़ैदियों को रिहा कर जेलों की ठसमठस को कम करने के निर्देश दे रही है, अनाप-शनाप आरोपों के तहत गिरफ्तार किया जा रहा है.

दिल्ली पुलिस को पता है कि इस समय अपने बड़े आक़ा के हुक्म पर बड़ी सहूलियत के साथ अमल किया जा सकता है क्योंकि उनके ख़िलाफ़ कोई ज़मीनी आन्दोलन तो अभी खड़ा होने से रहा! इसे कहते हैं, आपदा को अवसर में बदलना.

दिल्ली पुलिस, शर्म करो!

(लेखक संजीव कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज में प्राध्यापक हैं। कहानी के चर्चित आलोचक और आलोचना पत्रिका के संपादक हैं। )

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