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लाल किले से आरएसएस को वैधता या लोकतंत्र विरोधी प्रतिक्रांति की घोषणा

जयप्रकाश नारायण 

 

आजाद लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष भारत स्वतंत्रता का 78 वां वर्ष पूरा करते-करते अपने प्रतिलोम में बदल गया है। 15 अगस्त को लाल किले से स्वतंत्रता आंदोलन की सभी तरह की सकारात्मक उपलब्धियों का निषेध करते हुए आरएसएस के प्रचारक  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हाथ में  143 करोड़ भारतीयों के भविष्य की बागडोर सौंपने की घोषणा की।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  अपने को सांस्कृतिक संगठन कहता है, जो एक धूर्ततापूर्ण घोषणा है। सच तो है, कि यह एक ऐसी संस्था है, जो लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, आधुनिक मूल्यों वाले समाज के पूर्णतया निषेध की परियोजना पर खड़ी है। जिसके ऊपर स्वतंत्र भारत में तीन बार प्रतिबंध लग चुका है।

इसका किसी भी  कानून के तहत  पंजीकरण नहीं है। इसलिए इसके हिसाब-किताब, लेखा-जोखा और सदस्यता की जांच तथा संगठन के कार्यों की कोई संवैधानिक और सामाजिक जबावदेही तय नहीं की जा सकती है। मोदी ने आरएसएस या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  को दुनिया का  सबसे बड़ा  एनजीओ घोषित कर उसे संकट में डाल दिया है। क्योंकि किसी गैर सरकारी स्वयंसेवी संस्था का रजिस्टर्ड होना, उसके लेखा-जोखा का आडिट होना तथा उसकी फंडिंग और क्रियाकलाप पूरी तरह से कानून के दायरे में ही होता है।

यह आश्चर्यजनक है कि पिछले 100 वर्षों से भारतीय समाज और राजनीति में सबसे ज्यादा विवादित संगठन होने के बावजूद किसी भी सकार ने आरएसएस को कानून के दायरे में लाने की  कोशिश नहीं की।हजारों  संस्थाओं, ट्रस्टों, विद्यालयों, मजदूर, किसान, युवा, महिला संगठनों व राजनीतिक पार्टी सहित अनेक विघटनकारी विध्वंसक नफरती समूहों (जो कुकुरमुत्ता की तरह से अलग-अलग मौसमों में उग जाते हैं ),रिसर्च सेंटर, सैनिक स्कूल और सैकड़ों कार्यालयों वाले संगठन के क्रियाकलाप के ऊपर किसी सरकार की निगाह क्यों नहीं गई? यह एक ऐसा रहस्य है जिसके भेदन के बाद ही भारतीय राष्ट्र -राज्य के वर्ग चरित्र को समझा सकता है।

अब तो यह स्पष्ट हो गया है, कि यह संगठन ब्रिटिश राज के साथ-साथ देशी राजाओं, महाराजाओं, उच्च वर्णीय सामाजिक समूहों, नौकरशाहों, पूंजीपतियों, व्यापारियों का क्यों कृपा पात्र और दुलारा है!

संघ की विकास यात्रा 1925 में उस समय शुरू हुई, जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन वैचारिक, सांगठनिक और जन विस्तार के स्तर पर  ठोस शक्ल ले रहा था। यह वह दौर था जब दुनिया सोवियत क्रांति के महान आदर्शों से प्रेरणा लेकर नए वर्ग नेतृत्व में संगठित होने लगी थी। सोवियत क्रांति के महान आदर्शों ने औपनिवेशिक देशों के जनगण को नई ऊर्जा से भर दिया था । जिससे उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष वैचारिक और कार्यनीतिक रूप से ठोस दिशा देने लगे थे। जिसका भारत के स्वतंत्रता संघर्ष पर भी गहरा प्रभाव पड़ा । सोवियत क्रांति से प्रेरित हो कर हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी ने  अपना नाम और उद्देश्य संशोधित कर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर लिया। चन्द्र शेखर आजाद और भगत सिंह के नेतृत्व में एचएसआरए ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध की घोषणा करते हुए भारत को शोषण मुक्त समाजवादी गणतंत्र  बनाने की घोषणा की थी।

1930  आते -आते स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य पूर्ण स्वराज के साथ समाज के वर्णवादी, जातिवादी संरचना के मुकम्मल उन्मूलन यानी जाति विनाश और शोषण मुक्त समाज  बन गया। इसलिए 1925 में बने   किसी संगठन के समक्ष उस दौर में क्या कार्यभार हो सकता था?अगर इस पैमाने से देखें तो निर्माण के साथ ही संघ ने जो कार्यभार और लक्ष्य तय किए थे, वे क्या थे?

शुरुआत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  का लक्ष्य था मराठा पदपादशाही की वापसी। बाद में इसे बदलते हुए हिंदू राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य से जोड़ दिया गया। इसके संस्थापक  हेडगेवार के गुरु बीएस मुंजे इटली गये थे। वहां से  मुसोलिनी के फासीवाद से प्रभावित होकर लौटे। इसी के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई।

सांस्कृतिक शुद्धिकरण, व्यक्ति निर्माण के द्वारा हिंदू समाज का सैन्यीकरण करने की नीति सावरकर से ली गई । सावरकर से ही  दो राष्ट्र का सिद्धांत भी संघ ने लिया। हालांकि, सावरकर जितना स्पष्ट रूप से नहीं।

यही कारण है, कि 1925 से 1947 तक चले  स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान संघ के पास ब्रिटिश  हुकूमत  का विरोध करने के लिए कोई कार्यक्रम नहीं था। वह स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं के खिलाफ ही दुष्प्रचार चलाता रहा। उसके निशाने पर गांधी, नेहरू के साथ वे सभी लोग थे, जो आधुनिक भारत का स्वप्न पाले हुए थे। सावरकर द्वारा माफीनामे में लिखा गया शपथ, कि ‘वह जब तक जिंदा रहेंगे अंग्रेजी राज की सेवा में अपना सब कुछ लगा देंगे’,  पर अमल करते हुए संघ अंग्रेज सरकार  की सेवा में अपने संगठन,  शक्ति, सामर्थ्य और अनुशासित, संस्कारित स्वयंसेवकों की फौज को समर्पित कर दिया।  संघ अपने स्वाभाविक सहयोगी हिंदू महासभा के साथ समझदारी विकसित करते हुए  ब्रिटिश हुकूमत के कठिन समय में (जैसे 1942 से 45 में) ईमानदारी के साथ सरकार की सेवा करता रहा।

हिंदू राष्ट्र का स्वाभाविक  सामाजिक आधार राजे-रजवाड़े, जमींदार, धर्म ध्वजाधारी साधु-संत, महंत और सवर्ण जातियां हैं। इसके साथ गोरी सरकार के संरक्षण में पला बढ़ा  चरित्र और चेतना से दलाल व्यवसायी वर्ग(जो किसी सामाजिक या तकनीकी क्रांति से नहीं पैदा हुआ था)आरएसएस का जनाधार व आर्थिक स्रोत बना।

स्वतंत्रता आंदोलन के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राजे-रजवाड़ों और जमींदारों के खिलाफ उठने वाले प्रजा के सभी आंदोलनों के विरोध में  सशस्त्र रूप से सक्रिय था, जिसे ब्रिटिश हुकूमत का संरक्षण हासिल था। यही कारण है कि रियासतों के विलय का संघ ने विरोध किया। इंदिरा गांधी द्वारा राजाओं के प्रीवीपर्स खत्म करने के बाद जनसंघ और आरएसएस के अनुषांगिक संगठनों द्वारा मचाया गया हाय-तौबा इतिहास में दर्ज है।

1947 से 1970 तक संघ संविधान और लोकतंत्र का सक्रिय विरोधी रहा। यह संगठन आजाद भारत में  हिंदू समाज के लोकतांत्रीकरण और सामाजिक सुधार के कानूनी और सामाजिक प्रयासों का कट्टर विरोधी था। जैसे, हिंदू कोड बिल का विरोध।

लोकतांत्रिक भारत के अग्रगति के सभी मोड़ों पर संघ नकारात्मक एजेंडे के साथ अपने संगठनों को सड़क पर उतार देता रहा है। जैसे 1967 में जब कांग्रेस संकट में थी, तो साधु-संतों को आगे करके गोरक्षा आंदोलन को हिंसक स्तर पर उन्नत करने में कामयाब रहा। जो आजाद भारत में समाज के विभाजन और सांप्रदायिक  उन्माद पैदा करने का  पहला सफल  प्रयास  था।

67-68 में  सोशलिस्टों के साथ मिलकर संघ ने भाषा के आधार पर भारत को विभाजित करने वाले  आंदोलन में भी शामिल हुआ। राजनीतिक संकट से  बच निकलने के लिए जब इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण और राजाओं का प्रीवीपर्स वापस लेने का फैसला किया, तो संघ राजाओं-महाराजाओं और निजी बैंकरों के साथ खड़ा दिखाई दिया।

इंदिरा गांधी के कार्यकाल में संघ विपक्ष के साथ अपने रिश्ते दुरुस्त करने में लगा रहा। इस दौरान उसने कई बार अपने कलेवर बदले। जैसे जनता पार्टी में शामिल हुआ। जब भी सरकारों में जाने का संघ की राजनीतिक शाखा को मौका मिला उसके स्वयंसेवक नफरती एजेंडे  को आगे बढ़ाने का ईमानदारी पूर्वक प्रयास किये।

भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद गांधीवादी समाजवाद का बाना धारण करना संघ के लिए सांस लेने का मौका तलाशना था। गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन और बिहार के छात्र-युवा आंदोलन में संघ के अनुषांगिक संगठन सक्रिय  थे।

लेकिन संघ की धूर्तता और अवसरवादी चरित्र को समझने केलिए संघ के सर संघचालक देवरस द्वारा आपातकाल में इंदिरा गांधी को लिखे  पत्रों को अवश्य देखा जाना चाहिए। जब उन्होंने आपातकाल का समर्थन करते हुए राष्ट्र सेवा के लिए इंदिरा गांधी को सहयोग देने  का आश्वासन दिया था और संघ पर से प्रतिबंध हटाने की गुजारिश की थी।

यहां हम बाबरी मस्जिद विध्वंस, गुजरात नरसंहार, तर्कवादी नेताओं, समाज सुधारकों की हत्या, दंगा, बम विस्फोट आदि की घटनाओं की चर्चा नहीं कर रहे हैं। भारत में अकेला ऐसा गैर राजनीतिक संगठन और उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा है, जिसके कार्यकर्ता कार्यालयों में बम बनाते हुए मारे गए हैं। या सुतली बम बनाने की सामग्री तथा नकली दाढ़ी-मूंछ और मुस्लिम पोशाक इनके  कार्यालयों  से बरामद होते रहे हैं। समय-समय के अंतराल पर देश में हुए बम विस्फोटों की जांच करने वाली  जांच एजेंसियों की सुई बार-बार इनके नेताओं और कार्यकर्ताओं की तरफ घूमती रही है। जब भी जांच एजेंसियां संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं तक पहुंचती थीं, तो देश में कोई-न-कोई बड़ी विध्वंसक घटनाएं हो जाती  हैं। इसके  दो उदाहरण काफी है।

एक-मालेगांव और नांदेड़ बम विस्फोट की जांच करते हुए  हेमंत करकरे की टीम जब संघ के लोगों को पकड़ना शुरू की तो एक आतंकी हमले के दौरान उनकी हत्या कर दी गई।

दूसरा- वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह पर सोहराबुद्दीन शेख के एनकाउंटर का केस  सुनने वाले जज बीएस लोया की नागपुर में संदिग्ध मौत।

इसके अलावा जब-जब संघ के कार्यकर्ता और नेता ऐसे संकट में फंसते हैं, जिससे संघ की गढ़ी गई छवि दरकने लगती है, तो कोई न कोई घटना हो जाती  है। (जैसे  सुनील दोसी या हरेंद्र पांड्या की हत्या)। आश्चर्य की बात यह है कि विपक्ष की सरकारों के होते हुए भी ऐसी घटनाएं सही जांच के अभाव में  दब जाती रही हैं।

लोकतांत्रिक भारत का दुर्भाग्य है कि सभी तरह की‌ सरकारें संघ से संबंधित गंभीर घटनाओं की जांच करने के लिए प्रतिबद्धता और साहस नहीं दिखा सकीं। वह कौन सा अदृश्य भय और रहस्यमय आतंक है, जिसके कारण मजबूत से मजबूत कांग्रेसी सरकारें  भी संघ पर ठोस कार्यवाही कर पाने में असफल रहीं। इसके लिए हमें गांधी जी की हत्या के बाद संघ पर लगे हुए प्रतिबंध और गृहमंत्री सरदार पटेल द्वारा सिर्फ कोरे आश्वासन पर प्रतिबंध को हटा लेने की घटना  को अवश्य याद रखना चाहिए। जिसका परिणाम हुआ कि 12 महीने बाद ही बाबरी मस्जिद में  रात के अंधेरे में मूर्ति रखकर ऐसा नासूर खड़ा कर दिया गया, जिससे भारतीय लोकतंत्र और समाज के लोकतांत्रीकरण की प्रक्रिया को ही छिन्न-भिन्न कर दिया।

इसी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 79वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में लाल किले से प्रधानमंत्री  मोदी ने प्रतिष्ठित करने की कोशिश की। मोदी  की इस घोषणा ने भारतीय राज्य के द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन की समस्त सकारात्मक उपलब्धियों से संबंध विच्छेद की घोषणा कर दी  है। करोड़ों भारतीयों की कुर्बानी, त्याग, बलिदान से हासिल स्वतंत्रता आंदोलन की समस्त उपलब्धियों को मटियामेट करते हुए भारतीय लोकतंत्र  की दिशा को पलट दिया गया है। यानी 2025 के 15 अगस्त तक आते-आते हमारे देश में लोकतंत्र विरोधी प्रतिक्रांति विजयी हो गई है।

1914 में मोदी की विजय के समय लोकतंत्र की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हुई थी। संघात्मक लोकतांत्रिक गणराज्य से  सैन्यवादी हिंदू राष्ट्र की उलटी दिशा में चलते हुए  हमारा देश मोदी राज के‌11 वर्षों के दौरान घटी हाहाकारी हिंसक षड्यंत्रकारी घटनाक्रमों के बीच से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सांस्कृतिक संगठन का छिपा मुखौटा फेंककर  लोकतांत्रिक भारत की  सत्ता पर आ बैठा है। शिक्षा से लेकर व्यापार, उद्योग, संस्कृति, समाज, इतिहास तथा जीवन के सभी क्षेत्रों में पिछले 11 वर्षों में संघ की नीतियों को उदंडता पूर्वक लागू किया जाता रहा है। अब उसे सिर्फ संविधान को ही बदलना है। हो सकता है वह पूर्ण रूप से वर्तमान संविधान को खारिज न करें। लेकिन वह उसमें ऐसे संशोधन और परिवर्तन कर सकता है, जिससे संविधान की संघात्मक लोकतांत्रिक गणराज्य की आत्मा को मार कर व्यवहारिक धरातल पर धर्म राज्य की स्थापना की जा सके।

इस सत्य तक पहुंचने के लिए हमें ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। मानसून सत्र के समापन के एक दिन पहले गृहमंत्री अमित शाह ने 130वां संविधान संशोधन बिल पेश कर भावी संवैधानिक भारत का स्वरूप कैसा होगा, उसका संकेत दे दिया है। जहां, विपक्ष मुक्त भारत की परिकल्पना साकार होगी। किसी भी व्यक्ति या संगठन  को सरकारी एजेसियों के रहमोकरम पर जिंदा रहना होगा। वस्तुत: संसद में पेश किया गया संविधान संशोधन बिल लाल किले से मोदी की संघ की प्रशंसा के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है और इसे इस संदर्भ में देखना चाहिए। यह संविधान संशोधन लोकतंत्र विरोधी हरबा हथियारों से लैस पुलिस-राज्य की परियोजना का अंग है। भाजपा शासित सरकारों ने भी इसी तरह के ड्रैकोनियन कानून बनाए हैं। सोची समझी योजना के तहत शांतिपूर्ण ढंग से ऐसे कई कानून बनाए गए हैं,  जिससे भारतीय संविधान की मूल अवधारणा पर  मरणांतक चोट की गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि के अनुसार भारतीय राज्य को गढ़ने के ठोस प्रयास चल रहे हैं। नागरिकता निर्धारण की कोशिश इस प्रयास का सबसे खतरनाक फैसला है। इसलिए सार्वभौम संघात्मक गणराज्य भारत के ऊपर हो रहे हमले को टुकड़ों में न देखकर समग्रता में देखना  होगा।

आज इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि भारत में प्रतिक्रांति के सफल होने में 78 वर्ष क्यों लग गए। 1946- 47 के दौर का भारत का इतिहास हजारों वर्ष की हमारी सभ्यता का सबसे ज्यादा रक्त रंजित काला  इतिहास है।जिस समय नकारात्मक‌ और सकारात्मक प्रवृत्तियों के बीच इतिहास का कठिनतम संघर्ष  लड़ा गया था। भारत के विभाजन  की संभावना के ठोस शक्ल लेने के समय  नौसेना के विद्रोही सैनिकों और आजाद हिंद फौज के सेनानियों  पर चल रहे राजद्रोह के मुकदमे के दौरान उठी  भारत की विराट एकता ने विभाजनकारी शक्तियों को शिकस्त दे दी थी। और हम संविधान सभा बनाने में कामयाब हो गए थे।

हमारी संविधान सभा में काम शुरू ही किया था कि देश को तोड़ने वाली ताकतों ने गांधी की हत्या कर दी।  बाद में बाबरी मस्जिद के अंदर मूर्ति रख कर नवजात भारत पर एक और गंभीर चोट की गई, लेकिन विभाजित भारत में साझी विरासत और साझी शहादत की लंबी परंपरा के मूल्य और जोड़ने वाले सेतु समाज में शेष थे। जिस कारण इस संकट से हमारा देश बाहर निकल आया था और भारत विरोधी ताकतें कामयाब नहीं हो सकीं।  लेकिन 78 वर्ष बाद परिस्थितियां  पलट गई हैं और संघ-भाजपा के नेतृत्व में लोकतंत्र विरोधी प्रतिक्रांति विजयी हो  चुकी है।

हम जानते हैं कि 1789 में पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व में फ्रांस में प्रथम पूंजीवादी क्रांति संपन्न हुई थी। जिससे  स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व के  मूल्य निकले थे।  यही मूल्य आज लोकतांत्रिक  समाज  के नेतृत्वकारी तत्व हैं। इस क्रांति के संदेश को सैकड़ो हमलों  के बावजूद  मानव समाज के चेतना से मिटाया नहीं जा सका है।  1789 की क्रांति के गर्भ से जो लोकतांत्रिक मूल्य निकले थे, वहीआज भी लोकतांत्रिक विश्व की संचालक शक्ति बने हुए हैं। फ्रांस में लोकतंत्र की विजय ने यूरोप में लोकतांत्रिक क्रांतियों के दरवाजे खोल दिए।

दूसरी बात 1871 में फ्रांस में ही मजदूर वर्ग  ने क्रांति द्वारा ‘पेरिस कम्यून’ की रचना की, जो सिर्फ 71 दिन तक जिंदा रही। पेरिस कम्यून के क्रांतिकारी  मजदूरों ने कुछ ऐतिहासिक अनुभव दुनिया के ज्ञानकोश  में जोड़ दिए। एक था मजदूर वर्ग के नेतृत्व में पूंजीवादी‌ राज्य को उखाड़ फेंका जा सकता है। दूसरा, कोई भी परिवर्तन स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व के साथ-साथ न्यायपूर्ण समाज बनाए बिना  अधूरा होगा। तीसरा, बनी बनाई  पूंजीवादी राज्य मशीनरी को खत्म किए बिना दुनिया में शोषण मुक्त समाज नहीं बनाया जा सकता। यानी शोषण मुक्त समाज की रचना की जा सकती है और उसको संपन्न करने वाली ताकतें पूंजीवादी समाज के गर्भ में ही मौजूद हैं।

पेरिस कम्यून को यूरोप के सभी पूंजीवादी शासको ने मिलकर निर्ममता से कुचल दिया। लेकिन कम्यून ने मानव समाज के सामने एक नया लक्ष्य रख दिया था, जिसे 1917 में रूसी बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में  मजदूर वर्ग द्वारा पूरा किया गया। जिसे मजदूर वर्गीय सोवियत क्रांति कहते हैं। इस क्रांति का संदेश था कि मजदूर वर्ग अपनी मुक्ति के साथ-साथ  दुनिया भर के शोषित पीड़ित वर्गों को  मुक्त करेगा।  लेकिन यह महान क्रांति सिर्फ 74 वर्ष तक जीवित रही। 1991 में इस क्रांति का तख्ता‌ पलट दिया गया। इसके बाद भी दुनिया के पूंजीवादी शासक वर्ग समाजवादी क्रांतियों के डर से कांपते रहते हैं। मार्क्स के शब्दों में कहूं तो आज भी कम्युनिज्म का भूत दुनिया के शोषकों  का पीछा कर रहा है।

1991 के बाद शुरू हुआ उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण का दौर लगभग खत्म हो चुका है और यह दुनिया संक्रमण के दौर से गुजर रही है । पूंजीवादी शासक भी मुतमईन नहीं है कि उनकी लूट की सत्ता कब तक टिकी रहेगी। लोकतांत्रिक व्यवस्था के ढाई सौ वर्षों के इतिहास में बार-बार यह देखने को मिल रहा है,  कि यह व्यवस्था अपने  विलोम  यानी राजशाही,  सैन्य‌ तानाशाही व फासीवाद में बदलती रही है। साम्राज्यवादी अमेरिका के नेतृत्व में कई लोकतांत्रिक देशों में सत्ता पलट हुआ। जहां धार्मिक तानाशाही से लेकर मध्यकालीन राजशाही कायम की गई । आज भी यह क्रम जारी  है। लेकिन इस प्रतिक्रान्ति के विरोध में न्यायपूर्ण शोषण मुक्त ‌लोकतांत्रिक समाज के लिए संघर्ष अपने पूरे वेग के साथ आज भी चल रहा है।

15 अगस्त 2025 को लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आरएसएस की  प्रशंसा लोकतांत्रिक भारत के सत्ता पलट के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यह लोकतंत्र और आजादी के मूल्य पर बड़ा हमला है और स्वतंत्रता के लिए लाखों भारतीयों द्वारा दी गई  शहादत का अपमान है।

लोकतांत्रिक भारत पर वर्तमान हमला अतीत में  भारतीय लोकतंत्र पर हुए सभी हमले से ज्यादा संगठित, विभाजनकारी, खतरनाक होने के बावजूद  लोकतांत्रिक आवरण लिए हुए है।इसलिए संविधान और लोकतांत्र की रक्षक ताकतों को ज्यादा सचेत,  ज्यादा एकताबद्ध  और ज्यादा कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए।

संकटग्रस्त कॉरपोरेट-हिन्दुत्व गठजोड़ की‌ ताकतों ने बिहार में एसआईआर करने की घोषणा करके और 67लाख नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर करके निचले पायदान पर रहने वाले दबे-कुचले, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यकों को उद्वेलित कर दिया है। यही कारण है, कि आजादी के बाद पहली बार किसी राज्य में हासिए की ताकतें अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए बड़े पैमाने पर उठ खड़ी हुई हैं। जेपी के नेतृत्व  में चला बिहार का भ्रष्टाचार विरोधी लोकतंत्र बहाली आंदोलन समाज के मध्य वर्ग या ऊपरी हिस्से तक ही सीमित था।लेकिन 2025 में हिंदुत्व के  हमले ने समाज को  सतह से  जागृत कर दिया है। इसलिए घबराये हुए मोदी-शाह की जोड़ी हताशा भरे कदम उठा रही है। जिससे वह और ज्यादा संकट में फंसती जा रही है।

नागरिकता के अधिकार पर हुए हिंदुत्व कॉर्पोरेट के हमले से जनता की लोकतांत्रिक चेतना के और उन्नत होने की संभावना बढ़ गई है। बढ़ती लोकतांत्रिक चेतना और सड़कों पर उतरे हुए जन सैलाब से कॉर्पोरेट खेमे में फूट पड़ने की खबरें आ रही हैं। अभी तक भारत का कॉर्पोरेट समूह मोदी और हिंदुत्व के साथ लामबंद दिखाई दे रहा था। इसलिए संविधान और लोकतंत्र की बहाली के आंदोलन के लिए यह बेहतर अवसर है। लोकतांत्रिक संघर्ष जितना तेज होता जाएगा, हिंदुत्व-कॉर्पोरेट गठजोड़ उतना ही कमजोर होगा और उसकी अंतर्विरोधों को नियंत्रित करने की  क्षमता चुकती  जायेगी।

वर्तमान समय में विश्व साम्राज्यवादी गुट और भारतीय शासक वर्ग के बीच में स्वार्थों के संघर्ष तेज हो गए हैं। जैसे-जैसे अमेरिकी वर्चस्व को ग्लोबल साउथ की तरफ से चुनौती मिलती जा रही है, वैसे-वैसे विश्व साम्राज्यवाद और हिंदुत्व कॉर्पोरेट गठजोड़ के साथ  टकराव भी बढ़ रहे हैं। इसलिए यह  लोकतांत्रिक ताकतों के लिए एक और बेहतर अवसर है। उम्मीद की जानी जानी चाहिए कि वे और संगठित होकर राजनीतिक पहल लेगी और  लोकतंत्र बहाली आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़ी हो जाएगी। एक बार फिर बिहार की धरती  भारत के लोकतांत्रिक संघर्ष में एक नया इतिहास रचने जा रही है। बहुत पहले 1982 में भाकपा माले के तत्कालीन महासचिव कामरेड विनोद मिश्र ने कहा था  कि ‘Bihar Shows The Way’। लगता है उस महान भविष्यद्रष्टा मार्क्सवादी की भविष्यवाणी सच होने जा रही है।

फ़ीचर्ड इमेज गूगल से साभार 

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