समकालीन जनमत
Ram Kishore,
स्मृति

राम किशोर सेकुलर और जनतांत्रिक मूल्यों की लड़ाई की जरूरत थे – जन संस्कृति मंच

लखनऊ। राही मासूम राजा अकादमी के संस्थापक महामंत्री, सोशलिस्ट फाऊंडेशन के अध्यक्ष तथा सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन के सक्रियतावादी राम किशोर नहीं रहे। चार  अप्रैल को शाम करीब 8:30 बजे उन्होंने अलीगंज (लखनऊ) स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली।

बीते 14 मार्च को उनकी हालत खराब हुई थी। फेफड़ा में संक्रमण था। उस वक्त वे अपने बेटे के पास बेंगलुरु में थे। वहीं भर्ती किया गया। बाद में लखनऊ के ग्लोब अस्पताल में इलाज हुआ। हालत में सुधार होने के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। कल शाम अचानक ब्लड शुगर काफी गिर गया। हालत खराब हो गई। उन्हें बचाया नहीं जा सका। उस वक्त उनके परिवार के साथ नागरिक परिषद के क्रांति कुमार शुक्ला तथा वीरेंद्र त्रिपाठी एडवोकेट भी मौजूद थे।

रामकिशोर जी 80 पार के थे। उनके 80 वें जन्मदिन पर इंडियन कॉफी हाउस में एक संक्षिप्त कार्यक्रम भी हुआ था। उन्होंने कहा था कि मैं 80 साल का नौजवान हूं और अपने कर्म से इसे उन्होंने यथार्थ में भी बदल दिया था। इस वक्त 83 वें साल में थे। उम्र को अपनी जमीनी सक्रियता पर कभी हावी नहीं होने दिया। बीमारी ने जब तक उन्हें बिस्तर पर नहीं पहुंचा दिया, तब तक उनका सामाजिक सांस्कृतिक संघर्ष जारी था। ग्लोब अस्पताल से घर आने के बाद भी साथियों के बारे में बार-बार पूछते रहते थे। लखनऊ में रहें या बेंगलुरु में आफ लाइन संभव नहीं हुआ तो आन लाइन कार्यक्रम आयोजित करते। यह सब करना उनके लिए जीवनचर्या का हिस्सा था। उनका मन लखनऊ में ही बसता था। इसीलिए बीमारी की हालत में ही उन्होंने बेंगलुरु छोड़ दिया और लखनऊ आ गए थे।

रामकिशोर का छात्र जीवन में ही सामाजिक आंदोलन और समाजवादी विचारकों जैसे आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, लोहिया, मधु लिमए, सुरेंद्र मोहन आदि से संपर्क बन गया था। स्वाधीनता आंदोलन की क्रांतिकारी धारा से प्रभावित थे । बिस्मिल, अशफाक, भगत सिंह, आजाद आदि के संघर्ष से उन्हें प्रेरणा मिली। नेताजी के चिंतन और कर्म का प्रभाव था कि वे फॉरवर्ड ब्लॉक पार्टी ज्वाइन कर लिया। लंबे समय तक लखनऊ में इस पार्टी की पहचान बन गए। उनके सीने पर नेताजी का स्टीकर चमकता था तो दिमाग में उनके विचार ने स्थाई घर बना लिया था।

रामकिशोर राही मासूम रज़ा के विचारों से काफी प्रभावित थे तथा रज़ा के मूल्यों को आगे बढ़ाने की उनकी प्रतिबद्धता थी। उनकी समझ थी कि आज के चुनौती भरे दौर में विशेष तौर से सांप्रदायिक फासीवाद के उभार के इस दौर में रज़ा के साहित्य और विचार से सेकुलर और जनतांत्रिक मूल्यों और विचारों के संघर्ष को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है। इसीलिए इस सदी के पहले दशक में उन्होंने राही मासूम रज़ा एकेडमी की स्थापना की। इस एकेडमी के द्वारा वैचारिक पहल ली गई और सम्मान कार्यक्रम शुरू किया गया। इसमें हिंदी और उर्दू के विशिष्ट रचनाकारों यथा डॉ नमिता सिंह, डॉ काजी अब्दुल सत्तार, शेखर जोशी, अब्दुल बिस्मिल्लाह, नासिरा शर्मा, असद ज़ैदी, मेहरुन्निसा परवेज, विष्णु नागर, गिरिराज किशोर, प्रोफेसर अली अहमद फातमी, पंकज बिष्ट, शंभूनाथ, विभूति नारायण राय, नरेश सक्सेना, गौहर रज़ा और कुमार प्रशांत को सम्मानित किया गया।

राम किशोर ने अनेक किताबें लिखीं जैसे- ‘पोटा-एक काला कानून’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’, ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’, ‘सोशलिस्ट चिंतक विचारक श्री मधु लिमये’, ‘धर्म निरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता’, ‘जब्तशुदा कहानियां’, ‘फांसी के तख्ते से’, ‘प्रेरक प्रसंग’, ‘डॉ राही मासूम राजा की कहानियां’। विभिन्न समाचार-पत्रों व पत्र-पत्रिका में बड़ी संख्या में लेख लिखे। सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन के साथ मानवाधिकार आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रहती थी। पीयूसीएल से भी जुड़ाव था। अनेक आंदोलन के स्वयं केंद्रक थे जैसे शराबबंदी आंदोलन। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता तथा सामाजिक सक्रियता के कारण वे लखनऊ शहर की अनेक प्रगतिशील और जनवादी संस्थाओं के अनिवार्य हिस्से थे। उनके न होने से जो गैप पैदा हुआ है, उसे भर पाना आसान नहीं होगा।

यह फासीवादी दौर है। अंध आस्था, नफरत और उन्माद भरे इस दौर में राम किशोर जी सेकुलर और जनतांत्रिक मूल्यों की लड़ाई की जरूरत थे। उनके जाने से हमने इस संघर्ष का एक योद्धा खो दिया है। जन संस्कृति मंच अपने प्रिय साथी के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त करता है, अपना श्रद्धा सुमन अर्पित करता है। उनकी जीवन संगिनी मधु जी, बेटे अमित और परिजनों के शोक में हम सभी शामिल हैं। सभी को इस शोक से उबरने की शक्ति मिले।

रामकिशोर जी को सलाम!

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