समकालीन जनमत
स्मृति

अपनी वैचारिक दृढ़ता के लिए याद रखे जायेंगे राजेंद्र कुमार

लखनऊ। हिंदी के जाने-माने कवि व आलोचक राजेंद्र कुमार को याद करते हुए 25 जनवरी को जन संस्कृति मंच की लखनऊ इकाई ने श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया। कैसरबाग के इप्टा परिसर में आयोजित सभा में इप्टा के राकेश वेदा ने राजेंद्र जी से आगरा और बनारस में हुई अपनी मुलाकातों का स्मरण किया।

उन्होंने कहा कि राजेंद्र जी को प्रतिकूल से प्रतिकूल समय में अपनी वैचारिक दृढ़ता के लिए याद रखा जायेगा। जब लेखिका सीमा आजाद पर सरकारी दमन के बाद बहुतों ने उनसे दूरी बना ली, राजेंद्र जी ने उनकी किताब की भूमिका लिखी। अपनी वैचारिक दृढ़ता के लिए उन्होंने कई बार मुसीबतों का भी सामना किया। वह एक बेहतरीन संगठनकर्ता थे और जसम की स्थापना में अहम भूमिका निभायी थी।

इलाहाबाद में राजेंद्र जी का सान्निध्य हासिल करने वाले, आकाशवाणी के सहायक निदेशक रह चुके प्रतुल जोशी ने कहा कि वह वैचारिक रूप से जितने दृढ़ थे, उतने ही सहज व निश्छल भी। वह अक्सर साइकिल से इलाहाबाद में घूमते मिल जाते थे। वह ‘अभिप्राय’ नाम की एक साहित्यिक पत्रिका भी निकालते थे। उन्हें उर्दू भाषा और साहित्य की भी अच्छी जानकारी थी।

जसम की तस्वीर नकवी ने कहा कि राजेंद्र जी का देहदान करना, हम सबके लिए प्रेरणादायी है। यह बताता है कि कैसे एक इन्सान दुनिया से जाने के बाद भी इल्म की तरक्की के काम आ सकता है।

सत्य प्रकाश चौधरी ने कहा कि आज जब दक्षिणपंथी दबाव के आगे विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और विभागाध्यक्षों ने आत्मसमर्पण कर दिया है, राजेंद्र जी की इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष के रूप में भूमिका याद रखने लायक है।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे जसम लखनऊ के सचिव फरजाना महदी ने याद किया कि कैसे उनकी कहानी ‘उल्टा जमाना’के लिए राजेंद्र जी ने हौसला अफजाई की थी। जसम के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका पर भी फरजाना ने रोशनी डाली।

सभा के आरंभ में श्रद्धांजलि देने के लिए दो मिनट का मौन रखा गया। इस दौरान राकेश श्रीवास्तव, रिजवान अली, रोहित यादव, आशीष कुमार, राजा सिंह, सुचित माथुर, शांतम निधि व कई अन्य लोग उपस्थित थे।

राजेंद्र कुमार का निधन बीते 16 जनवरी को इलाहाबाद में हुआ। वे कैंसर जैसी बीमारी से ग्रस्त थे। मृत्यु के समय वे 83 वें वर्ष में थे। उनकी ख्याति एक शिक्षक के साथ जाने-माने कवि और आलोचक के रूप में रही है। उनके अनेक कविता संग्रह हैं। वहीं ‘प्रतिबद्धता के बावजूद’, ‘शब्द-घड़ी में समय’, ‘यथार्थ और कथार्थ’, ‘कविता का समय’, ‘साहित्य में सृजन के आयाम और विज्ञानवादी दृष्टि’ आदि इनकी आलोचनात्मक कृतियां हैं। इलाचंद्र जोशी पर उन्होंने साहित्य अकादमी के लिए मोनोग्राफ लिखा। अनेक पुस्तकों का संपादन भी किया। इसके साथ उन्होंने कहानियां भी लिखी और पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उन्होंने 1981 में ‘अभिप्राय’ पत्रिका निकाली। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की पत्रिका ‘बहुवचन’ का भी संपादन किया। वह कई सम्मानों से भी सम्मानित किए गए जैसे गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान, मीरा स्मृति सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सम्मान आदि।

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion