समकालीन जनमत
देसवा

पूरब ही देसवा में फूटली किरनिया, होला सुहावन बिहान रे……..

(आज से समकालीन जनमत में  ‘ देसवा ‘ नाम से पत्रकार मनोज कुमार का साप्ताहिक कॉलम शुरू हो रहा है. प्रस्तुत है इसकी पहली क़िस्त .  )

बात दो वर्ष पहले की है. तारीख छह फरवरी 2018. प्राथमिक विद्यालयों पर एक रिपोर्ट लिखनी थी. इसी सिलसिले में कुशीनगर के दुदही ब्लाक के मिश्रौली गांव की दलित बस्ती में जाना हुआ. मुझे वहां बाल मंच के सदस्यों से मिलना था जो बच्चों को स्कूल से जोड़ने में मदद कर रहे थे. मुझे उनसे मिलने का खासा उत्साह था.

जब गांव पहुंचा तो बाल मंच के ये बच्चे बंसवारी में खेलने में मशगूल थे. गांव पहुंचने पर एक नाम सर्वाधिक बार सुनने को मिला वह था कमलेश. लोगों ने कहा कि यदि कमलेश से मुलाकात हो जाए तो वह सभी बच्चों को बातचीत के लिए इकट्ठा कर देगा. कमलेश बंसवारी में मिला लेकिन खेल छोड़ बातचीत करने के लिए एकदम अनिच्छुक. काफी मनुहार करने पर मान गया और उसका इशारा होते ही उसके साथियों अमरनाथ, राजन, इंदल, नितेश दौड़ते हुए अपने घरों की तरफ गए और दरी लेकर लौटे. उन्होंने बसवारी के पास बैठने के लिए दरी बिछा दी.

कमलेश, अमरनाथ, राजन, नितेश उस वक्त कक्षा छह में पढ़ रहे थे जबकि इंदल पांच में था. यह सभी बच्चे अपने गांव से लगभग तीन किलोमीटर दूर दुदही पढ़ने जाते थे. कमलेश और इंदल प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे थे जबकि अमरनाथ, राजन, नितेश सरकारी स्कूल में थे. ये सभी बच्चे साइकिल से पढने जाते थे.

बच्चे बातचीत में पहले झिझके लेकिन जल्द ही सहज हो गए. कमलेश ने बताया कि वे बाल मंच की बैठकों में गीत गाते हैं, कविता सुनाते हैं और नाटक तैयार करते हैं. उन्होंने अपने-अपने खेत, घर-दुआर के पास खाली जगहों में 200 पौधे भी रोपे हैं.

इन बच्चों की जिंदगी आसान नहीं थी. गरीब दलित परिवार के ये बच्चे आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे थे. रोजगार के अभाव में आजीविका की खोज में उनके पिता दिल्ली, मुम्बई, लखनऊ चले गए थे. कमलेश के पिता हिमाचल प्रदेश में मजदूरी कर रहे थे. उसका एक बड़ा भाई दुबई में काम कर रहा था. यही कहानी दूसरे बच्चों की भी थी. अभावों में पल रहे बच्चे काफी खुशदिल थे. वे जितने मासूम थे उनकी इच्छाएं भी उतनी ही मासूम थीं.

बच्चों से मिलने पर अक्सर बड़े यही सवाल पूछ बैठते हैं कि बड़े होकर क्या बनोगे. काफी सावधानी के बावजूद मैंने भी यही हिमाकत कर डाली लेकिन कमलेश के जवाब ने यह सवाल पूछे जाने से हो रही मेरी ग्लानि को खत्म कर दिया. कमलेश का संक्षिप्त और सहज जवाब था-भला आदमी.

बातचीत में  कमलेश के दोस्तों ने कुछ ही देर बाद उसकी चुगली कर दी कि वह बहुत अच्छा गायक है. साथ ही जोर-शोर से बोलने भी लगे कि बातचीत बहुत हो गयी. अब कमलेश से गाना सुना जाय.

थोड़ा-बहुत ना नुकुर करने के बाद कमलेश ने गाना शुरू किया. वाकई वह अच्छा गायक है.  उसने पहला गीत सुनाया-

खूनवा में फरक बता दे केहू
हिन्दू और मुसलमाने के
हम बाजी लगा देब जान के
कसम बाटे हिन्दुस्तान के
हम बाजी लगा देब जान के
एगो बाड़ी माई हमनी के
चार बानी भाई
हिन्दू, मुस्लिम और सिख ईसाई
चलेके बाटे हमनी के हरदम सीना आपन तान के
कसम बाटे हिन्दुस्तान के …….
पाप बढिया त तब धरती हिलत ता
चापलूसी कई के चाचा बोल का मिल ता
शान झुके न दिहल जाई
भारत देश महान के
कसम बाटे हिन्दुस्तान के …….

कमलेश जिस वक्त अपने गांव में सुबह-सुबह यह गीत गा रहा था, वही वक्त था जब देश माब लिंचिंग में झुलस रहा था और देश के अधिकतर टीवी चैनल हिन्दू-मुसलमान की डिबेट से इसे और आग दे रहे थे. लेकिन कमलेश का  ‘ देसवा ‘  इस आग से बहुत दूर कुछ और था.

पूरब ही देसवा में फूटली किरनिया

होला सुहावन बिहान रे
वो ही देशवा में बाड़े मोर घरवा
नउवा पड़ल हिन्दुस्तान रे

माई के पियार मिले
बाबूजी के दुलरवा
स्कूलवा में मिलले ज्ञान रे
वो ही देसवा में बाड़े मोर ….

वनवा मे बोलेली चुचही चिरइया
मोरवा लगावेला तान रे
वो ही देसवा में ……

हरवा कुदरवा ले के विहरत किसनवा,
खेतवा में लहरत धान रे

खेतवा में फूलेला सरसो के फूलवा
गेहूं में लटक जाला बाल रे
वो ही देसवा में बाटे मोर घरवा
नउवा पड़ल हिन्दुस्तान रे

कमलेश ने बताया कि वह अपने चाचा के लिखे गीत गाता है. उसने दावा किया कि वह कुछ समय बाद खुद गीत लिखने लगेगा.

आज जब कोरोना लाॅकडाउन में मजदूर शहरों से अपने गांव लौट रहे हैं तो कमलेश के साथ-साथ उसके गानों की याद आयी. कमलेश के पिता भी जरूर लौट आएं होंगे. हो सकता है वे पैदल चलकर आए हों या सैकड़ों मजदूरों की तरह कर्ज लेकर उन्होंने कोई नई या पुरानी साइकिल खरीदी हो और उससे चल कर घर आए हों. अब वह क्या कर रहे होंगे ? क्या वह फिर हिमाचल प्रदेश जाने की तैयारी कर रहे होंगे या गांव में ही रूकेंगें ? सोचता हूं कि अगली बार जब कमलेश से मुलाकात होगी तो कौन सा गीत सुनाएगा ? लगता है कि इस बार वह खुद का लिखा गीत सुनाएगा जिसके बारे में उसने दो वर्ष पहले कहा था.

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