समकालीन जनमत
देसवा

क्या वे सिर्फ समोसा बना रहे थे

( पत्रकार मनोज कुमार के साप्ताहिक कॉलम ‘देसवा’ की सातवीं क़िस्त  )

जुलाई 2016 के पहले हफ़्ते एक दिन एक अख़बार की छोटी सी खबर पर नजर पड़ी। इस ख़बर के मुताबिक सिसवा नगर पंचायत के कुछ युवा गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड के लिए विश्व का सबसे बड़ा समोसा बनाएंगे। यह खबर भी कि जिले के डीएम भी इस मौके पर उपस्थित रहेंगे। अगले कुछ दिनों यह ख़बर कई बार अख़बारों की सुर्खियां बनीं। मेरी उत्सुकता बढ़ती गयी। तमाम सवाल भी उठ रहे थे कि आखिरकार ये युवा विश्व का सबसे बड़ा समोसा बनाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं ? इसके पीछे मकसद और प्रेरणा क्या है ?

अपने इन सवालों के साथ 12 जुलाई 2016 की सुबह गोरखपुर से सिसवा के लिए रवाना हो गया। इस कस्बे में पूर्व में काफी आना-जाना हुआ था। यह मेरे गांव से 25 किलोमीटर की दूरी पर ही है। मेरा गांव सिसवा विधानसभा क्षेत्र में ही आता था। पढ़ाई के दिनों कई बार सिसवा आया-गया, रूका भी।

सिसवा की पहचान कभी एक बड़ी गल्ला मंडी के रूप में थी। रेलवे कनेक्टिविटी के कारण पूरे महराजगंज जिले का यह सबसे बड़ा व्यापारिक केन्द्र था लेकिन दशकों से यह एक ठहरा हुआ कस्बा है। सिसवा आने-जाने वाली सभी सड़कों का बुरा हाल है। बिजली 10-12 घंटे से ज्यादा नहीं रहती। पूर्व राज परिवार का यहां की राजनीति पर दबदबा है। सिसवा इस्टेट के वारिस लगातार विधानसभा चुनावों में जीतते रहे। समय-समय पर वे दल भी बदलते रहे। बीच-बीच में तीन-चार बार दूसरे दलों के प्रत्याशी भी जीते लेकिन वे अपनी बढ़त को कायम नहीं रख सके। विकास की दृष्टि से यह क्षेत्र का काफी पिछड़ गया था और आज भी इन हालात में कोई परिवर्तन नहीं आया है।

नेपाल और बिहार के समीप स्थित महराजगंज जिले का यह कस्बा विश्व का सबसे बड़ा समोसा बनाने की घोषणा के कारण चर्चा में आ गया था। इस कस्बे के में रोज शाम ठेले पर पकौड़े व समोसा बेचने वाले 21 वर्षीय रितेश सोनी ने घोषणा की थी कि वह अपने दोस्तों की मदद से 350 किलो का समोसा बनाएगा और गिनीज बुक में दर्ज अब तक के सबसे बड़े समोसे (110.8 किलो ) का विश्व रिकार्ड तोड़ देगा। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में अभी तक यह रिकार्ड इंग्लैण्ड के ब्राडफोर्ड कॉलेज के छात्रों (22 जून 2012 ) के नाम दर्ज था।

दोपहर होते-होते मैं सिसवा पहुंच गया। गलियों से होते हुए हम एक प्रांगण में पहुंचे जहां समोसा बनाने का एलान हुआ था। जब हम पहुंचे तो टेंट हाउस के दर्जनों मेज के उपर रखे एक बड़े कड़ाहे में समोसा जैसा कुछ बना देखा। उम्मीद के विपरीत वहां ज्यादा लोग नहीं थे। मीडिया का भी जमावड़ा नहीं था। जिस तरह का माहौल बनाया गया था, वैसा वहां कुछ नजर नहीं आ रहा था। कुछ स्थानीय पत्रकार मुझे देख आश्चर्यचकित थे कि मैं यहां पर इस स्टोरी को कवरेज करने कैसे आ गया ? उन्होंने उलाहना भी दिया कि वे खबर तो भेज देते। यहां आने का कष्ट क्यों किया ?

मौके पर पहुंच कर पता चला कि रितेश सोनी और उसके 11 दोस्त 12 घंटे के अथक प्रयास के बाद 12 जुलाई की सुबह समोसा बनाने में कामयाब हुए तो वह आकृति में ठीक-ठीक समोसा जैसा न बन सका। यह चपटा हो गया और उसका वजन भी 432 किलो ( लम्बाई-2 मीटर, चैड़ाई -1.75 मीटर , उंचाई-13 इंच ) का हो गया। अधिक वजन के कारण समोसा एक किनारे से फट भी गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि धन और अनुभव की कमी से ये युवा तकनीकी संसाधनों का इंतजाम नहीं कर सके। समोसा को गर्म तेल में छानने का कोई तरीका उनके पास नहीं था, इसलिए उसे बनाने के बाद गर्म घी डालकर पकाया गया। यही नहीं जब वे समोसे के बेस को ठीक से बेल कर तैयार नहीं कर पाए तो सड़क पर प्लास्टिक बिछाकर उसे बेलना पड़ा।

रितेश और उसके साथियों को सबसे ज्यादा निराशा तब हुई जब ढाई महीने की तैयारी और 40 हजार के बजट वाले उनके इस प्रयास को देखने के लिए 12 जुलाई की शाम तक कोई अफसर नहीं आया।

गिनीज बुक में रितेश और उनके दोस्तों का यह कारनामा दर्ज भी नहीं हो पाया क्योंकि इसके लिए उन्हें जो प्रक्रिया करनी चाहिए था, उसे वे कर नहीं पाए। इसके लिए उन्हें करीब चार लाख रूपए चाहिए था जो उनके लिए जुटाना संभव नहीं था। उनको यही पता था कि वे समोसा बना देंगे और वह अपने आप गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज हो जाएगा। जब उन्होंने विश्व का सबसे बड़ा समोसा बनाने का ऐलान कर दिया तब जाकर उन्हें पता चला कि यह रिकार्ड में दर्ज होने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया होती है और उसके लिए निर्धारित फीस पूर्व में ही जमा करनी होगी है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड वाले इस प्रक्रिया का खुद पर्यवेक्षण भी करते हैं।

रितेश की टीम द्वारा बनाए गए समोसे को देखने वाले छिटपुट लोग आते रहे। दर्शकों में आम लोगों के अलावा विधानसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक एक नेता भी थे जिन्होंने ‘ सिसवां का नाम ऊंचा करने ’ के लिए इन युवाओं की प्रशंसा की।

लेकिन वर्ल्ड रिकार्ड के लिए बने इस समोसे के बारे में सभी टिप्पणियां सकारात्मक नहीं थी। रेलवे स्टेशन के पास एक छोटे से रेस्तरां में समोसा बना रहे वीरेन्द्र की टिप्पणी थी कि रितेश का समोसा कछुआ जैसा हो गया है। रितेश की मां अनीता को कई महिलाओं ने सुनाया कि वे ऐसा समोसा खड़े-खड़े बना देतीं। इसके लिए इतना तमाशा खड़ा करने की क्या जरूरत थी ?

तंज भरी इन टिप्पणियों के बावजूद रितेश के पिता त्रिलोकी काफी खुश थे। वह लखनऊ में टैक्सी चलाते थे। बेटे के इस कारनामे को देखने के लिए चार दिन से सिसवा जमे थे। बोले कि बेटे ने नाम बनाया है। सब उसकी चर्चा कर रहे हैं तो भला अच्छा क्यों नहीं लगेगा। मां ने बेटे के बारे में छपी खबरों की कतरनों को जतन से रखा है।

रितेश ने बताया कि उन्हें विश्व का सबसे बड़ा समोसा बनाने का आइडिया सिसवा से सात किलोमीटर दूर कटहरी में रहने वाले मनीष कुमार प्रजापति द्वारा बनाई गई विश्व की सबसे बड़ी जलेबी से मिला। कटहरी के मनीष गोरखपुर विश्वविद्यालय में कला के शोध छात्र हैं। उन्होंने 17 सितम्बर 2015 में 70 किलो की जलेबी तैयार की थी। इसके बाद उन्होंने 21 जून को विश्व योग दिवस पर सात हजार रंगीन रोटियों से मुजैक पेटिंग प्रदर्शित किया। इस वजह से वह काफी चर्चा में रहे हैं हालंकि विश्व की सबसे बड़ी जलेबी बनाने का उनका रिकार्ड अभी गिनीज बुक में दर्ज नहीं हो पाया।

इसके बारे में उनका कहना था कि गिनीज बुक से उनका पत्राचार हो रहा है और उनसे जो जरूरी दस्तावेज मांगे गए थे वह भेजते रहे हैं। अभी 28 अप्रैल को उन्हें एक पत्र मिला है जिसमें उनके रिकार्ड का जल्द सर्टिफाइड करने की बात कही गई है।

मनीष की तरह रितेश पढ़े-लिखे नहीं हैं। वह तीन भाइयों में सबसे बड़े हैं और आर्थिक तंगी के कारण उनकी पढ़ाई आठ में ही छूट गई। इसके बाद वह एक रेस्तरां में काम करने लगे। काम सीख जाने के बाद वह अपना खुद का ठेला लगाने लगे। इससे होने वाली कमाई से उन्होंने छोटे भाइयों को पढ़ाया और अब वह खुद अपने छोटे भाई किशन सोनी के साथ इंटरमीडिएट में हैं। रितेश को इंटरनेट के इस्तेमाल की भी जानकारी नहीं है।

साइबर कैफे चलाने वाले कुंवर ने इंटरनेट पर सर्च कर बताया कि सबसे बड़े समोसे के विश्व रिकार्ड के बारे में बताया। उनकी टीम में शामिल हुए युवा सामान्य परिवारों के हैं। विवेक मद्देशिया, अभिषेक सोनी और नवीन मद्देशिया छात्र हैं तो भानू गुप्ता की फल की और दुर्गेश की बेकरी की दुकान है। राजेश वर्मा कैटरिंग का कार्य करते हैं तो नवीन की फोटोग्राफी की दुकान है। इस टीम को यह भी जानकारी नहीं कि गिनीज बुक में रिकार्ड दर्ज कराने के लिए क्या करना पड़ता है। इनको लगता है कि यदि मीडिया में ठीक से खबरें आ जाएं और अधिकारी की उपस्थिति में फोटोग्राफी व वीडियोग्राफी हो जाए तो उनका रिकार्ड आधिकारिक रूप से मान्य हो जाएगा। इसलिए वे मीडिया कर्मियों को काफी तवज्जो दे रहे थे।

आखिर एक छोटे से कस्बे के युवा किस जुनून में कभी जलेबी तो कभी समोसा बनाने का विश्व रिकार्ड बनाना चाहते हैं ? एक व्यक्ति ने मजाकिया लहजे में टिप्पणी भी की कि जलेबी और समोसा के बाद अब क्या बनेगा ? सिसवा के गुफरान अहमद कहते हैं कि अभी यह सिलसिला आगे जाएगा। यह यहां की फितरत है। युवाओं को पहले तो कुछ सूझता नहीं लेकिन जब उन्हें कोई रास्ता दिख जाता है तो उनमें होड़ लगती है।

सिसवा से हम मनीष प्रजापति के घर गए। मनीष तो घर पर नहीं थे लेकिन उनके पिता मूर्तिकार रामेश्वर मिले। उन्होंने मनीष द्वारा बनाए गए उस सांचे को दिखाया जिसके जरिए वह दो क्विंटल वजन का समोसा बनाने की तैयारी कर रहा था। उन्होंने कहा कि मनीष का आइडिया लीक हो गया और रितेश और उसकी टीम ने विश्व का सबसे बड़ा समोसा बनाने की घोषणा कर दी। जल्दीबाजी के कारण वे ठीक से इसे बना नहीं सके। मनीष ने यदि बनाया होता तो जरूर अच्छे से समोसा बना होता। उन्होंने बताया कि मनीष अब विश्व का सबसे बड़ा घड़ा बनाने की तैयारी में जुटा है।

जब मैं लौट रहा था तो समोसा बनाने वाली टीम के प्रमुख सदस्य बीकाम के छात्र विवेक मद्देशिया ने कहा कि पहली बार सिसवा का नाम राजनीति के अलावा दूसरे कारणों से लिया जा रहा है। हमने यह कर दिखाया है। रामेश्वर प्रजापति ने भी इसी तरह की बात कही थी। ‘बड़े-बड़े प्रोफेसर जो काम नहीं कर पाए वो मेरे बेटे ने कर दिखाया।’

सिसवा से लौटकर आया तो पता चला कि समोसे को अगले दिन तक अफसरों के इंतजार में रखा गया लेकिन कोई नहीं आया। तब तय हुआ कि समोसे को पूरे मुहल्ले में बांट दिया जाए लेकिन 13 जुलाई को दिन में 2 बजे टीम के कुछ सदस्यों ने समोसे का स्वाद चखा तो उन्हें समोसे के अन्दर आलू के खराब हो जाने की महक आयी तो टीम के सदस्यों ने आपस में राय कर समोसे को तीन बोरो में भरकर सिसवा सबयां रजवाहा नहर में प्रवाहित कर दिया।

तीन महीने बाद नेबुआ कुशीनगर जिले के विशुनपुरा ब्लाक के नाहर छपरा गांव से खबर आयी कि वहां 17 क्विंटल की लिट्टी बनायी गयी। इसे बनाने के लिए तीन महीने तक प्रयास हुआ और इसमें 12 कुंतल आटा, दो कुंतल सूजी, एक कुंतल फार्चून तेल , एक कुंतल चीनी, 50 किलो देशी घी, 50 किलो पंचमेवा तथा 100 लीटर पानी का प्रयोग हुआ। इसे बनाने के लिए एक सप्ताह तक 20 फिट व्यास के लोहे का कड़ाह तैयार किया गया और फिर इसे 24 फुट व्यास का गड्डा खोद कड़ाह को उसमें व्यवस्थित किया गया। करीब 30 लोगों ने आठ क्विंटल उपला व 200 क्विंटल भूसी को जला कर आग बनाई गई और उसमें 12 घंटे तक लिट्टी को पकाया गया।

चार वर्ष बाद आज रितेश सोनी से फिर बातचीत हुई। उनके संगठन में अब सिर्फ पांच लोग रह गए हैं जबकि पहले 35 लोग थे। रितेश सोनी जिस जगह समोसे व पकोड़े का ठेला लगाते थे, वहां से उन्हें अतिक्रमण के नाम पर हटा दिया गया है। अब वह साबुन, अगरबत्ती आदि के एक ब्रांड की मार्केटिंग करते हैं। पिता अभी भी टैक्सी चला रहे हैं। रितेश तीन वर्षों से महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर तिरंगा यात्रा निकालते हैं जिसमें सभी धर्म के लोग शामिल होते हैं। हर वर्ष उनकी तिरंगा यात्रा बड़ी होती जा रही है।
रितेश का मानना है कि वह समाज की सेवा कर रहे हैं, जागरूकता ला रहे हैं।

आप कहेंगे कि ‘देसवा’ में मैं ये कैसी कहानी सुना रहा हूं। लिट्टी, समोसा, जलेबी, घड़ा बनाने की कहानी। दरअसल जलेबी, समोसा, लिट्टी, घड़ा बनाते हुए ये युवा अपनी और अपने इलाके की पहचान बनाने की छटपटाहट से जूझ रहे हैं। उनके पास ख़्वाब हैं, जोश है। काश इस ख़्वाब, जोश, बेचैनी को कल के वास्ते जोड़ा जा सकता।

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वर्ना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान ओ दिल को कुछ ऐसे कि जान ओ दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

साहिर लुधियानवी

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