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किसान आत्म-हत्याओं के दौर में प्रेमचंद – प्रो. सदानन्द शाही

 प्रो.सदानन्द शाही


किसानों की आत्म हत्यायें हमारे समाज की भयावह सचाई है। भारत जैसे देश में किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं यह शर्मशार कर देने वाला तथ्य है। एक आकड़े के मुताबिक वर्ष 2014 में लगभग 1400 किसानों ने आत्महत्या की है। सम्भव है संख्या को लेकर कोई दूसरा आकड़ा पेश कर दे लेकिन इस मामले में संख्या की बहस बेमानी है। जब भी किसानों की आत्महत्या की खबरें आती हैं बड़ी होशियारी से, उनकी संख्या पर मोड़ दी जाती है। सत्ता की राजनीति इस संख्या को कम करने के लिए अजीबो-गरीब कारण गिनाती है तो विपक्ष की राजनीति उसे अधिक या यथासंभव सही आँकड़े प्रस्तुत करने की कोशिश करती नजर आती है। नतीजा यह होता है कि किसान आत्महत्याओं के वास्तविक प्रकृति कारणों पर बहस होने से रह जाती है। दरअस्ल आत्महत्या करना किसान की मनोवृत्ति के मेल में नहीं है। उसका जीवन प्रकृति पर इस कदर आश्रित है कि वह प्रकृति का ही पर अंग बन जाता है। वह अपनी नियति से लड़ता हुआ तरह-तरह के समझौते करता हुआ जीता है और जीना चाहता है।

प्रेमचन्द ने 19 दिसम्बर 1932 को जागरण के सम्पादकीय में ‘हतभागे किसान’ शीर्षक टिप्पणी लिखी थी। भारत वर्ष में किसानों की स्थिति का बयान करने के लिए ‘हतभागे’ से बेहतर विशेषण कोई हो नहीं सकता। इस टिप्पणी में प्रेमचन्द लिखते हैं- भारत के अस्सी फीसदी आदमी खेती करते हैं। कई फीसदी वह हैं जो अपनी जीविका के लिए किसानों के मुहताज है, जैसे गाँव के बढ़ई, लुहार आदि। राष्ट्र के हाथ में जो कुछ विभूति है, वह इन्हीं किसानों और मजदूरों की मेहनत का सदका है। हमारे स्कूल और विद्यालय, हमारी पुलिस और फौज, हमारी अदालतें और हमारी कचहरियाँ, सब उन्हीं के कमाई के बल पर चलती हैं, लेकिन वही जो राष्ट्र के अन्न वस्त्र दाता हैं, भरपेट अन्न को तरसते हैं, जाड़े पाले में ठिठुरते हैं और मक्ख्यों की तरह मरते हैं।’ इसीलिए किसान हतभागे हैं। सारी मेहनत मशक्कत के बावजूद दो जून की रोटी के लिए तरसने वाले किसान को ‘हतभागे’ न कहा जाय तो किसे कहा जाय।

प्रेमचन्द की कहानियों और उपन्यासों के असंख्य पात्र ऐसे ही हतभागे किसान हैं। गोदान उपन्यास का अमर पात्र होरी किसानों की इस स्थिति का बयान महज एक वाक्य में कर देता है-‘जब दूसरे के पावों तले अपनी गरदन दबी हुई है तो उन पावों को सहलाने में ही कुसल है।’ प्रेमचन्द अपने समय के किसानों और उनकी समस्याओं को भली भाँति जानते थे। वे जानते थे कि किसानों की गरदन कहाँ-कहाँ दबी हुई है। तमाम मेहनत मशक्कत के बावजूद उत्पादन कम था। लगान अधिक देनी पड़ती थी, कर्ज में सरापा डूबे रहते थे और जमीन से बेदखल होकर किसान से मजूदर बन जाने को अभिशप्त थे। गोदान का पात्र होरी ऐसा ही किसान है जो जमीन से बेदखल होकर मजदूर बनता है और सड़क पर पत्थर तोड़ते-तोड़ते मर जाता है।

किसान की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण कर्ज में डूबा होना था। 1905 में जमाना में छपी अपनी एक उर्दू टिप्पणी में प्रेमचन्द भोले-भाले किसानों की कर्ज लेने की आदत की चर्चा करते हुए लिखते हैं- देहाती किसानों की ज्यादातर जरूरतें कर्ज लेकर पूरी हुआ करती हैं। अगर आप आज किसी किसान को पचास रूपये की चीज उधार दे दीजिए तो वह बिना यह सोचे कि मुझमें यह चीज खरीदने की योग्यता है या नहीं फौरन मोल ले लेता है। और किसी न किसी तरह रो- धोकर उसकी कीमत अदा करता है। विलायतियों ने देहातियों के इस स्वभाव को बखूबी समझ लिया है।” हम जानते हैं कि यह समझ लेने के बाद भारतीय किसान को कर्ज के जाल में फँसाकर बेहाल करने में विलायतियों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। उस मामलें में देसी महाजन अपने विदेशी आकाओं से कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे। जमीदार, सेठ, साहूकार, महाजन से लेकर अंग्रेज हाकिम तक जोंक की तरह किसानों को चूस रहे थे। प्रेमचन्द के अनेक किसान पात्र हमें बताते हैं कि इसके बावजूद किसान अपनी क्रूर नियति से लड़ रहा था। वह दया पात्र, बेचारा, होकर भी हारा नहीं था। होरी का पत्थर तोड़ते-तोड़ते मर जाना पराजय नहीं बल्कि नियति के विरूद्ध संघर्ष था। प्रेमचन्द ने होरी की मृत्यु का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है। अपनी सारे संघर्षों, विपरीत स्थितियों और विफलताओं के बावजूद होरी पराजित नहीं होता है। मृत्यु के समय-‘होरी प्रसन्न था। जीवन के सारे संकट सारी निराशाएँ मानों उसके चरणों पर लोट रही थीं। कौन कहता है, जीवन संग्राम में वह हारा है। यह उल्लास, यह गर्व, यह पुकार क्या हार के लक्षण है? इन्हीं हारों में उसकी विजय है।’ किसान की उल्लास और उसकी जिजीविषा हार में भी विजय की अनुभूति कर सकती थी। इसीलिए प्रेमचन्द के साहित्य में नियति से हारकर और विवश होकर आत्महत्या करने वाले एक भी पात्र नहीं मिलते हैं। उस दौर के अखबारों को देखें तो गरीबी और महामारी से किसानों मजदूरों के मौत की खबरें मिलती हैं लेकिन किसानों की आत्महत्या की घटनाएँ नहीं मिलती।

मुझे यह लिखते हुए दुख और ग्लानि दोनों का अनुभव हो रहा है कि आज किसान हार गया है। आज भी किसान की दुर्दशा के मूल में कर्ज ही है। बेशक आजादी के बाद के साठ सत्तर वर्षों में किसान की उपज बढ़ी है पर उसी के साथ उसकी लागत कई गुना बढ़ गयी है। पिछले बीस पच्चीस सालों में खाद पानी बीच की कीमत दस गुना से ज्यादा बढ़ गयी है। पहले किसान पिछली फसल से बीज निकाल लेता था। अब उसे हर बार नया बीज खरीदना पड़ता है। अधिक पैदावर के लिए शंकर (हाइब्रिड) बीज की जरूरत होती है और यह हाइब्रिड की दूसरी पीढ़ी काम की नहीं रह जाती। इसीलिए हमारे मित्र राजेश मल्ल बीजों की इस प्रजाति को निपूता कहते हैं। उन्नत बीजों से पैदा हुई फसल को दो बार बीज के रूप से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। डीजल की कीमत सात रूपये से साठ-सत्तर रूपये लीटर हो जाने से सिंचाई के लिए पानी की कीमत 5-7 रूपये प्रति घण्टा से 150-200 रूपये प्रति घण्टा हो गई। यूरिया की कीमत पचास साठ रुपये से बढ़कर सात सौ रुपये बोरी हो गई है। जब कि गेहूं के समर्थन मूल्य में महज तीन-चार गुना वृद्धि हुई है। आज का किसान ठीक-ठाक उपज के बावजूद अधिक लगान, अनियमित और अनियन्त्रित मूल्य के कारण कर्ज में डूब जाता है। तरह-तरह के कारणों से उसे अपनी जमीन और सम्मान से हाथ धोना पड़ता हैं। ऐसे में सिर्फ फाँसी का फंदा ही उसको एक मात्र मुक्ति मार्ग सूझता है। कपास, गन्ना, गेहूं, धान किसी भी चीज की खेती हो उसकी लागत और बाजार मूल्य में भारी अन्तर है। अगर किसान के इन्तजार करने के समय की कीमत भी इसमें जोड़ दी जाय तो उसकी लगान और बढ़ जाती है। मुक्त बाजार युग में विकास की आंधी के दौरे दौरा का एक सच यह भी है किसान और किसानी हमारी चिन्ता के केन्द्र में नहीं रह गया है। नये भारत की जो भी परिकल्पनाएँ प्रस्तुत की जा रही हैं उसमें खेती और किसानी को लगातार हाशिए पर ढकेला जा रहा है। भारत एक कृषि प्रधान देश है, अब यह बीते और पिछड़े युग की बात हो गयी है। अब हम कृषि प्रधान  देश नहीं रह गए हैं क्योंकि विकास की मुख्यधारा में खेती किसानी और किसान बाहर कर दिए गए हैं।

किसानों के पराजय का सम्बन्ध इस बदली हुई स्थिति से है। सेठों, साहूकारों, जमीदारों और अंग्रेजों से लड़ने और जूझने वाले किसान ने हथियार डाल दिए हैं। किसान की आत्म कथाओं का सम्बन्ध इस हारी हुई मानसिकता से है। मजे की बात यह है कि जमीदार नहीं हैं, साहूकार और महाजन नहीं है, अंग्रेजी हुकूमत नहीं है फिर भी किसान पराजित और हत भागा बना हुआ है। प्रेमचन्द की जयन्ती 31 जुलाई भारतीय किसान की इस हारी हुई लड़ाई पर उसके पराजय पर विचार करने के लिए समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों और साहित्य कर्मियों को आमंत्रित कर रही है।

(भोजपुरी अध्ययन केंद्र के संस्थापक, समन्वयक लेखक-आलोचक सदानंद शाही बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफ़ेसर हैं ।)

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