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ज़ेर-ए-बहस

नाम बदलने का राजनीतिक-सांस्कृतिक अर्थ

विलियम शेक्सपीयर (26.04.1564-23.04.1616) के नाटक ‘रोमियो एण्ड जूलियट’ का प्रकाशन सोलहवीं सदी के अन्त में हुआ था – दो अलग पाठान्तर में। पहला प्रकाशन 1597 में हुआ था और दो वर्ष बाद इसका बंहतर पाठान्तर/रूपान्तर 1599 में आया। इस नाटक के अंक 2, दृश्य 1 में रोमियो की प्रेमिका जूलियट का एक कथन केवल शेक्सपीयर के ही सुप्रसिद्ध कथनों में एक नहीं है अपितु वह अब एक प्रकार से उन सबका कथन है जो उसके संदर्भ से अपरिचित हैं। यह कथन है – ‘नाम में क्या रखा है ? ’ (व्हाट इज इन ए नेम) ।

सोलह वर्षीय रोमियो और तेरह वर्षीय जूलियट का प्रेम आज भी एक उदाहरण है। शेक्सपीयर का ध्यान नाम विशेष पर नहीं, व्यक्ति विशेष के गुण और कर्म पर है। जूलियट के लिए इसका कोई अर्थ नहीं है कि उसके और रोमियो के परिवार में शत्रुता है। जूलियट का पिता रोमियो के पिता मौटेग्यू का सबसे बड़ा शत्रु है। जूलियट के लिए रोमियो के पिता और उसके स्थान का कोई अर्थ नहीं है। प्रेम का अर्थ केवल प्रेम है।

पांच सौ वर्ष बाद हम रोमियो और जूलियट को उनके प्रेम के कारण ही याद करते हैं। रोमियो सुन्दर, बुद्धिमान, संवेदनशील होने के साथ ही आवेगी और अपरिपक्व है। अपने आदर्शवाद और भावावेश (पैशन) के कारण वह पसन्दीदा चरित्र है। जूलियट का उससे कथन है कि उसके पिता का नाम उसके लिए कोई अर्थ नहीं रखता है और दोनों को साथ रहना चाहिए – ‘ओ रोमियो, अपने पिता को त्यागो और उनके नाम को अस्वीकार करो….यह उनका नाम है जो मेरा शत्रु है…..क्या है मौंटग्यू ? यह न हाथ है, न पैर, न बांह, न चेहरा, न कोई दूसरा अंग …..नाम में क्या है ? ….गुलाब का हम कोई नाम रखे, कोई फर्क नहीं पड़ता। उसकी मीठी सुगन्ध बनी रहेगी ? ’

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जब ‘एंटी रोमियो स्क्वाड’ का गठन लड़कियों की सुरक्षा के लिये किया, वे शायद ही रोमियो से परिचित रहे होंगे। भाजपा ने उत्तर प्रदेश के चुनावी घोषणा-पत्र में काॅलेजों के पास एंटी रोमियो स्क्वाड बनाने का का वादा किया था। भाजपा को ‘प्रेम’ से क्या लेना-देना ? रोमियो को एक भारतीय राजनीतिक दल ने जिस अर्थ में ग्रहण किया, वह ‘रोमिये एंड जूलियट’ नाटक को न पढ़ने और समझने का प्रमाण है। जूलियट के लिए रोमिये के पिता और परिवार का कोई अर्थ नहीं है। भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का अर्थ और महत्व सुविदित है। यह नाटक शेक्सपीयर के जीवनकाल में ही बेहद लोकप्रिय रहा था। प्रेम में नाम अर्थहीन है पर राजनीति में नाम ही सबकुछ है। वहां नाम में बहुत कुछ मौजूद है। नाम की अपनी एक राजनीति भी होती है। कोई आवश्यक नहीं कि नाम के अनुसार गुण भी हो। नाम भले ‘अटल’ हो, समझौते करने होते हैं।

आर एस एस और भाजपा के लिए काम से अधिक नाम का है। राम का नाम उन्हें याद है, जिससे वे लाभान्वित हुए हैं, पर उनके काम से उन्हें मतलब नहीं है। राम अपने कर्म के कारण ही ‘ मर्यादा पुरुषोत्तम ’ कहलाये। भाजपा और उनसे जुड़े सबके लिए नाम सब कुछ है। वे नाम की संस्कृति का जिस कला-कौशल से राजनीति में उपयोग करते हैं, वह साधारण बात नहीं है। पहले ‘ नामकरण ’ एक संस्कार भी होता था। स्थान-विशेष के नामकरण पर आज अधिक समाजशास्त्रीय अध्ययन-अनुसंधान की आवश्यकता है। बच्चों के नाम उनके मां-पिता रावण, विभीषण, दुःशासन, दुर्योधन क्यों नहीं रखते ? ‘विकलांग’ को अब ‘दिव्यांग’ कहा जाने लगा ?

शब्द के अपने संस्कार अर्थ होते हैं। उनका केवल अभिधेयार्थ और धात्वर्थ महत्वपूर्ण नहीं है। शब्द अपनी काल यात्रा में अपनी चमक खोते भी हैं। नाम में बहुत कुछ है। हम सब पांच सौ वर्ष पहले के शेक्सपीयर से बहुत आगे आ चुके हैं। अब प्रेमी अपनी प्रेमिका के मुंह पर तेजाब फेंकता है, प्रेमिका अपने प्रेमी का गला घोटती है। अब हम कहीं अधिक सभ्य और सुंस्कृत हैं। नामहीन होना स्वमुक्त होना है। हम सब कहीं अधिक स्वबद्ध हैं और हमारे लिए नाम का अधिक महत्व है। गोपालकृष्ण गांधी ने अभी अपने एक लेख ‘मच इन ए नेम’ (द् टेलिग्राफ, 18 नवम्बर 2018) में विस्तार से ‘अशोक’ नाम पर विचार किया है। एक समय था, जब ‘अशोक’ नाम लोकप्रिय था। सिने अभिनेता अशोक कुमार के मां-पिता ने उनका नाम कुमुदलाल रखा था, पर बालीवुड ने उन्हें एक नया नाम दिया – अशोक कुमार। राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन के ‘बाल रूम’ में नया नाम दिया – अशोक कुमार। इसी प्रकार परम वीर चक्र ‘अशोक चक्र’ बना।

निराला की ‘अनामिका’ में संकलित एक कविता है – ‘उक्ति’। ‘जैसे हम हैं, वैसे ही रहें/लिये हाथ एक दूसरे का सुख के सागर में बहें’। शेक्सपीयर के नाटक ‘ट्वेल्थ नाइट’ के अंक दो, दृश्य दो में इसी से मेल खाता कथन है – ‘सच ऐज वी आर मेड आॅफ सच वी बी’। यह कथन व्यक्ति-विशेष के प्रति, प्रिय व्यक्ति से है जिससे प्रेम, संबंध अक्षुण रहे।

प्रेमी व्यक्ति और राजनीतिक व्यक्ति, शासक में कोई मेल नहीं है। जमीन और आसमान का अन्तर है। लोकतांत्रिक देश में निर्वाचित नेताओं की भूमिका प्रबल हो जाती है। उन पर किसी का कोई अंकुश नहीं रहता। मतदाताओं का भी नहीं। ये अपने फायदे के लिए इतिहास की मनमानी व्याख्या करते हैं, जीवन शैली तक को प्रभावित करते हैं। उनके कार्य बहुरूपी होते हैं। ‘सराय’ मात्र एक शब्द नहीं, स्थान है। उनकी अपनी विशेषता थी, संस्कृति थी, जिसे ‘सराय संस्कृति’ भी कह सकते हैं। उसका, सराय का अपना एक इतिहास है। ‘मुगलसराय’ का नाम बदल कर दीनदयाल उपाध्याय करना कितना उचित है ? दीनदयाल उपाध्याय संघ परिवारवालों और भाजपा वालों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, सब के लिए नहीं। उनके लिए मुगल शासकों की तुलना में दीनदयाल उपाध्याय का, संभव है, भारतीय इतिहास पर अधिक प्रभाव हो, पर लम्बे समय से चले आ रहे ‘मुगलसराय जंक्शन’ का नाम बदल कर दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन करना स्थान के स्थान पर एक व्यक्ति-विशेष को महत्व देना है।

स्थान का नाम परिवर्तन ऊपर से जितना सामान्य लगे, पर एक राजनीतिक-सांस्कृतिक एजेण्डे के तहत यह किया जाता है। एक झटके से मुगल-काल और मुगलों की बड़ी भूमिका को नजरअंदाज कर ही नहीं, उसके प्रति हमारे अपरिपक्व मानस में एक जहर बो दिया जाता है और साथ ही सामूहिक-सांस्कृतिक स्मृति को पोछने की साजिश भी की जाती है। जिस कौशल और जिस उद्देश्य से यह किया जाता है, उसे समझने के बाद भी हम निष्क्रिय बने रहते हैं। क्या यह एक साथ हमें अपनी जातीय स्मृति से विलग करना और निष्क्रिय बनाना नहीं है ? इससे हिन्दू मानस निर्मित किया जाता है और सक्रिय भी किया जाता है। बेशक यह धीमी प्रक्रिया है, पर इसका वैसी शक्तियों को ‘सुफल’ दशकों बाद और सामान्य जन को ‘कुफल’ लम्बे समय बाद प्राप्त होता है। इलाहाबाद को ‘प्रयागराज’ कहना ब्राहमणवादी एजेण्डा है।

1947 के बाद स्थान और शहरों के नाम बदले जाने लगे। कानपुर की वर्तनी 1948 में बदली। त्रावणकोर कोचीन का नाम बाद में केरल हुआ। अब प्रस्तावित नाम केरलम है। 1969 में मद्रास स्टेट तमिलनाडु बना। 1973 में मैसूर स्टेट कर्नाटक कहलाया। गुजराती में वडोदरा नाम 1974 में बदला। कोचीन 1996 में कोच्ची कहलाया। मद्रास तमिल में चेन्नई 1996 में बना। कलकत्ता बांग्ला में कोलकाता 2001 में कहलाया। 2011 में ‘ओडिशा’ नया नामकरण हुआ उड़ीसा का। मलयालम में त्रिवेन्द्रम 1991 में तिरुअनन्तपुरम बना। पांडिचेरी 2006 में तमिल में पुड्डुचेरी बना। यह सिलसिला अभी तक चल रहा है जिसमें अपनी भाषा, भाषिक उच्चारण, स्थानीयता और जातीयता को महत्व दिया गया। इस नाम-परिवर्तन का अपना भाषाई और सांस्कृतिक पक्ष है। 2007 में बैंगलोर बैंगलुरु, 2014 में बेलगांव बेलगावी, गुलबर्गा कलबुर्गी, मैंगलोर मैंगलुरु बना। 2015 में राजमुंदरी को राजा महेन्द्रवरम कहा जाने लगा। अल्लेपी अलप्पुझा बना और कालीकट कोझीकोडे। ‘पालघाट’ को पलाक्काड कहा जाने लगा और पंजिम पणजी हुआ। पूना पुणे बना।

अब कई नाम बदले जाने हैं, प्रस्तावित है – नागालैण्ड का नागांची, पश्चिम बंगाल का बांग्ला, औरंगाबाद का सांभाजीनगर, वास्को-द-गामा का भी सांभाजीनगर, भोपाल का भोजपाल, हैदराबाद का भाग्यनगरम, महबूबनगर का पलामुरु, नयी दिल्ली का इन्द्रप्रस्थ, अहमदनगर काा आनन्दनगर, शिमला का श्यामला, अहमदाबाद का कर्णावती, सुलतानपुर का खुशभावनपुर, मुजफ्फरनगर का लक्ष्मीनगर, अकबरपुर का सरयूपुरम, आगरा का अगस्त्यपुरी आदि।

नाम परिवर्तन के कारणों पर ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि ये भिन्न हैं। सस्ती ख्याति के लिए भी स्थानों के नाम बदले जाते हैं, चुनाव में वोटों के धा्रवीकरण को ध्यान में रखकर भी नाम परिवर्तन किया जाता है और एक व्यापक सांस्कृतिक-राजनीतिक एजेण्डे के तहत भी। विभिन्न देशों में भी नाम बदले जाने के कई उदाहरण है। सीलोन लंका बना और बर्मा म्यामार। युरोपीय देशों में यह कम है तथा दक्षिणाई देशों में भारत में सर्वाधिक। इसका मुख्य कारण लम्बे समय तक औपनिवेशिक दासता है। मुम्बई की प्रायः प्रत्येक सड़क किसी-न-किसी स्थानीय नेता के नाम पर है। चेन्नई में सड़क के नाम अंग्रेजी में हैं। कनाट प्लेस को राजीव चैक किया गया, पर वह मेट्रो से सफर करने वालों के बीच ही ज्यादा जाना जाता है। चेन्नई का ग्रीनवेज रोड तमिल में षसुमपोझिल बाझी सलाई है जो बोर्ड में मात्र लिखित रूप में है।

बिहार के राज्यपाल लालजी टंडन ने अपनी पुस्तक ‘अनकहा लखनऊ’ में लखनऊ का असली नाम लखनपुरी माना है। आर एस एस के संघ चालक प्रभुनारायण के अनुसार गुलामी के प्रतीक नामों को ‘राष्ट्रभक्तों’ के नाम बदला जाना चाहिए। वे स्वयं तय करेंगे कि राष्ट्रभक्त कौन हैं ? फैजाबाद का नाम साकेत और अलीगढ़ का नाम हरीगढ़ क्यों किया जाना चाहिए ?

किसी भी स्थान का एक सांस्कृतिक अभिप्राय भी होता है। उसे नष्ट कर अपने सांस्कृतिक अभिप्राय को थोपने की सराहना नहीं की जा सकती । संघ परिवार और भाजपा जिन स्थानों का नाम परिवर्तन कर रही है वह अन्य नाम परिवर्तन से भिन्न है। सभी नाम परिवर्तन के समान काारण नहीं है। 2014 में सत्तासीन होने के बाद भाजपा ने नाम-परिवर्तन का अभियान आरम्भ किया। उसके द्वारा स्थान विशेष का किया गया नाम परिवर्तन हिन्दुत्व की संस्कृति का एक अंग है। दिल्ली में औरंगजेब रोड को बदलकर डाॅ ए पी जे अब्दुल कलाम के नाम पर किया गया। इलाहाबाद, फैजाबाद और मुगलसराय नाम मुस्लिम संबंधी है, इसलिए ये नाम बदले गये।

सुप्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब ने कहा है कि हमें मुंशी, मजुमदार और शाह जैसे नाम भी बदल देने चाहिए क्योंकि इनकी इस्लामिक उत्पति है। इस तर्क से अमित शाह जैसे नाम भी बदल देने चाहिए क्योंकि इनकी इस्लामिक उत्पति है। इस तर्क से अमित शाह को अपने नाम से ‘शाह’ हटा लेना चाहिए क्योंकि ‘शाह’ संस्कृत का नहीं फारसी का शब्द है।

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