कविता

विशाखा मुलमुळे की कविताएँ स्त्री मुक्ति के सवालों को बारीक़ी से रेखांकित करती हैं

सोनी पाण्डेय


स्त्री जीवन का सबसे कठिन सवाल है “मुक्ति”, उसे मुक्ति चाहिए बेमानी वर्जनाओं से, पितृसत्तात्मक समाज के दोहरे मापदंड से, उसके रास्ते में इतनी कीलें हैं कि सदियों से वह उन्हें उखाड़ती लहूलुहान पैरों से सभ्यता के विकास की यात्रा तय कर रही है। विशाखा मुलमुले की कविताएँ मुक्ति के लिए छटपटाहट की मुखरआवाज हैं। यहाँ वह पूरे तर्कों और यात्रा के पड़ावों  के साथ मुखरित होती हैं-
हम भारत माता की जय में अटक गईं
हम सोने की चारदीवारी में देवी
मिट्टी की चारदीवारी में बनी रहीं भोग्या
चारों खानों से चित्त हुईं हम
अचानक ही कच्छपों में बदलने लगी
समेटने लगी ख़ुद को अपनी ही देह में
और स्वतंत्रता दाएँ – बाएँ से गुज़र गई …
उपरोक्त कविता की पंक्तियों में विशाखा के तेवर को देखा, समझा जा सकता है, आजादी की लड़ाई में औरतों ने पुरुषों के बराबर योगदान दिया किन्तु आजादी के बाद देश आजाद हुआ और आधी आबादी को जिन बिन्दुओं पर आजादी मिलनी थी वह धर्म सत्ता के हाथों में जस का तस कैद रहा। स्त्रियों के रूदन पर जब पितृसत्ता उलाहना देती है तो विशाखा कहती हैं-
घनघोर काली घटायें
उमड़ घुमड़कर छा रहीं थी
बस बारिश होने को थी
स्त्रियों ने रोका बारिशों को
स्वजनों के नियत स्थलों में पहुँचने तक
कभी रोका उसे डोरी पर टंगे कपड़ों के ध्यास में
कभी न बरसने की मिन्नत की छतरी की अनुपस्थिति
कभी बस दो सेकेंड ठहरने कहा पतीले में दूध के बसने तक
————-
ठीक इसी तरह रोकतीं है स्त्रियाँ
अपने – अपने हिस्से की बारिशें
आँखों की कोर में
अचानक कभी ये बारिशें
कारण बिनाकारण
बीती किसी बात पर ,
मौसम बेमौसम बिना किसी पूर्वानुमान के
असल , मुद्दल , सूद समेत बरस पड़ती हैं
और तुम कहते हो स्त्रियाँ रोती बहुत हैं !
स्त्री कविता समकाल में जिन सवालों से टकराती आगे बढ़ रही है विशाखा की कविताओं में उसे सहज ही देखा जा सकता है, यह टकराहट उपासना, नताशा, रूपम मिश्र, ज्योति शोभा, ज्योत्सना, सीमा संगसार, आदि से होती उनके पहले की पीढ़ी की कवयित्रियों में भी इसी तेवर और लय में बरकरार है। स्त्री को मनुष्य माने जाने की लड़ाई आज सबसे बड़ों लड़ाई है उसके व्यक्ति माने जाने में सैकड़ों अवरोध हैं, वह केवल और केवल मासपिंड भर है मर्दों की दुनिया में। मनुवादी व्यवस्था में भोग की वस्तु भर स्त्री आज तेजी से मुखर हो रहीं है। विशाखा उस मुखर स्वर में शामिल हो रही हैं, आपकी कविता यात्रा निरन्तर उम्मीद जगाती हैंं-
स्त्रियों को पुरुषों पर राज नहीं करना, उन्हें सत्ता नहीं साथ चाहिए, उन्हें मालिक नहीं मित्र चाहिए। वह औरतों के हिस्से की आजादी माँगते कभी हिंसक नहीं होतीं। वह एक ऐसी दुनिया चाहती हैं जहाँ वह मर्दों के बराबरी की नागरिक हों। यह माँग निरन्तर स्त्री कविता में उठती और फैलती हुई आगे बढ़ रही है, यहीं से एक सोता फूटेगा जहाँ से स्त्री को अपने हिस्से का आकाश मिलेगा।
विशाखा मुलमुले की कविताएँ
1. प्रकृति , बारिश , स्त्री
घनघोर काली घटायें
उमड़ घुमड़कर छा रहीं थी
बस बारिश होने को थी
स्त्रियों ने रोका बारिशों को
स्वजनों के नियत स्थलों में पहुँचने तक
कभी रोका उसे डोरी पर टंगे कपड़ों के ध्यास में
कभी न बरसने की मिन्नत की छतरी की अनुपस्थिति में
कभी बस दो सेकेंड ठहरने कहा पतीले में दूध के बसने तक
इसी तरह ना – ना छोटे बड़े कारणों से उन्होंने रोका बारिशों को
घटायें सुनती भी रही किसी ना किसी का कहना
फिर एक दिन अचानक स्त्रियों के निद्राकाल में
बादल बरसे ,
कुछ , यूँ बरसे
जैसे साहूकार ने वसूला  कर्ज़  – असल , मुद्दल , सूद समेत
जैसे हो बादल का फटना
ख़ोजते है हम इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण
पर होता असल में यह मानवीय कारण , स्त्रैण कारण
क्योंकि हम ही है प्रकृति
हमसे ही है प्रकृति
ठीक इसी तरह रोकतीं है स्त्रियाँ
अपने – अपने हिस्से की बारिशें
आँखों की कोर में
अचानक कभी ये बारिशें
कारण बिनाकारण
बीती किसी बात पर ,
मौसम बेमौसम बिना किसी पूर्वानुमान के
असल , मुद्दल , सूद समेत बरस पड़ती हैं
और तुम कहते हो स्त्रियाँ रोती बहुत हैं !
2. नदी के तीरे
किशोरवय बेटा पूछता है अक्सर !
कैसे देख लेती हो बिन देखे
कैसे सुन लेती हो परिधि के बाहर
कैसे झाँक लेती हो मेरे भीतर
पिता तो देखकर भी अनदेखा
सुनकर भी अनसुना
और पहचान कर भी अनजान बनें रहते हैं
मैं कहती हूँ , पिता है पर्वत समान
जो खाते है बाहरी थपेड़े
रहते हैं मौन गम्भीर
देते हैं तुम्हें धीर
मैं उस पर्वत की बंकिम नदी
टटोलती हूँ तुम्हारे समस्त भूभाग
आजकल की नहीं यह बात
इतिहास में है वर्णित
सभ्यताएं पनपती है नदी के तीरे !
3. और स्वतंत्रता फिर हाथ से निकल गई
तय की हम सखियों ने मिलने की जगह
मुक़र्रर किया दिन
अपने अपने पंथ का चुनाव किया
उत्साहित हुईं
भविष्य के सपने देखे
उम्मीदें भी पाली
बस एक समय , एक साथ स्वतंत्रता का
बिगुल नहीं फूंका
कुछ ने ऐन मौके पर हाथ खड़े कर दिये
कुछ ने सम्पूर्ण स्त्रीजाति को ताक पर रख
केवल अपने क्षेत्र का पालन व संरक्षण किया
अंततः सन 1857 के स्वातंत्र्य आंदोलन की तरह
हम एकजुट न हुईं
और स्वतंत्रता हाथ से निकल गई
जबकि कमल और रोटी के तर्ज पर
हमनें पहुँचाये  व्यापक सन्देश
थे वे इस युग के पर थे रोटी के ही अधीन
संदेशों को बदलना ही था स्त्रियोचित संदेशों में
इस बार भी , हम बस रोटियां बाटती और बनाती रह गईं
मन का कमल तपिश में कुम्हलाता गया
हम मौकापरस्त न हुईं
और स्वतंत्रता फिर हाथ से निकल गई
परतंत्रता हमारे गुणसूत्रों में क्या कुंडली मार पैठ गई
जबकि , जब बापू चल रहे थे लाठी टेक
नमक सत्याग्रह का था वह समय
हम दौड़ रहीं थी पीछे ख़ून का नमक किये
बापू की लाठी न होने पर , बनी हम लाठी , दिया अपना कंधा
एक दिन भाग ही गए विदेशी देश छोड़
बच्चे , बूढे , जवान सबको मिली स्वतंत्रता
मवेशी , हवा , पंछी तो पहले ही थे स्वतंत्र
हम भारत माता की जय में अटक गईं
हम सोने की चारदीवारी में देवी
मिट्टी की चारदीवारी में बनी रहीं भोग्या
चारों खानों से चित्त हुईं हम
अचानक ही कच्छपों में बदलने लगी
समेटने लगी ख़ुद को अपनी ही देह में
और स्वतंत्रता दाएँ – बाएँ से गुज़र गई
4. जीवनसाथी

तुम्हारी चाहना में था एवरेस्ट फ़तह

मैं खुश थी आज मैंने सारी रोटियाँ गोल बनाई
तुम साध रहे थे तन और मन
मैं नन्हों के लिए खेल का मैदान बन आई
तुम जुटा रहे थे उपकरण , रुपये , साजो – सामान
मैं पैदल राह पकड़ घरौंदे के लिए चार पैसे बचा आई
शिखर पर पहुँच कर तुमने पुकारा मुझे
मैं समग्र राष्ट्र बन आई
तुमने कहा !
दम लगने पर मिला फूली रोटी का सहारा मुझे
जब कमज़ोर पड़ रहे थे मेरे क़दम , तब बच्चों के
गिरकर उठकर हँसने का दृश्य याद आया मुझे
जब कम पड़ रही थी प्राणवायु
तब बचत कर खर्च करने की तुम्हारी बात
याद आई मुझे
संगिनी !
मेरी हर फ़तेह का राज़ तुम हो
मेरे हर शिखर पर गूंजती आवाज़ तुम हो !
5. मन का पँछी

कभी हरी भरी दूब पर

चुगती रहूँ दाना – दाना धूप
फिर मनचाहा पेड़ चुनकर
उस तक उड़ान भरूँ
कंठ से पुकार का कोमल राग छेड़ूँ
मूँदकर दो घड़ी आँखें
तेरी आहट को सुनूँ
तिनका – तिनका पंखों में थकान भरूँ
तेरे स्पर्श को अंगीकार करूँ
कभी किरणों के पुल के सहारे
नील गगन में पंख पसार फिरूँ
घर लौटते हुए स्याह बादलों को
सफेद बादलों का सन्देशा सुनाऊँ
विरह में उपजी स्याह बादलों की सिसकी ,धड़क और फफक को
अश्विन के कांधे तक पहुँचाऊँ
बाजरे के खेतों से होकर लौटूं
प्रतीक्षातुर चहचहाहट भरी खुली चोंच में
बाजरे की मिठास उतारूँ
पंखों को समेटूँ
सूर्योदय की प्रतीक्षा में सप्त ऋषियों को खोजूँ
स्वप्नों का जोड़ -घटाव करूँ
 6. हेली – सहेली

पीठ से पीठ टिका

बैठी है हेली – सहेली
सुन रही है
सुना रही है अपना दुःख – दर्द
मालूम है उन्हें ,
मिलायेगी नजरें तो
पिघल जाएगा बचा हुआ हिम खंड
बढ़ जाएगा जलस्तर !
पीठ से पीठ टिका
वे बढ़ा रहीं है हौसला भी
बन रहीं है कमान – सी मेरुदंड का
एक मजबूत आधार
जैसी होती है  , पतंग की कमान को
थामे दूसरी सीधी बांस की डंडी
ताकि ,
उडान भर सके दोनों की जीवन रूपी पतंग
और छू सके आकाश !
पीठ से पीठ टिका
देख रहीं है संग साथ
दो दिशाएँ भी / दशाएं भी
देख रहीं है पूरब और
देख रहीं है पश्चिम भी
सोच रहीं है
काश !
दुनिया भर की तमाम स्त्रियां
यूँ ही टिका लें पीठ से पीठ अपनी !
7. गिरफ्त में

इस शंकालु समय में

मैं उस वृक्ष के समीप जा न सकी
जो बिखेरता था खुशबू
जिसे मैं आँचल में समेटती थी
इस दूरियों के समय में
इक नन्ही सी रुनझुन
इक प्यारी सी मुस्कान
इक मासुमियत का चेहरा है घर के समीप
पर उसको एक बार भी मैं दुलार न सकी
इस कटीले समय में
मैं काटती रहती ना – ना विधि अपना समय
पर कटीली झाड़ियों में फंसा एक लड़की का दुप्पटा हटा न सकी
आँखों ही आँखों से घूमती रही दुनिया
लाल आँखों से उलीचती रही  संताप
पर एक आँख का भी आँसू पोछ न सकी
इस निष्ठुर समय में
अन्नदाता के समर्थन में
बापू के देश में
जीभ की परतंत्रता में
एक रोज़ का भी उपवास साध न सकी
इस हमलावार समय में
बंधु संग बांधव
मानव संग मानवता
धर्म संग धम्म
आत्मा संग परमात्मा
किसी को भी बचा न सकी
8. पुनर्नवा
घास नहीं डालती कभी हथियार
उग ही आती है पाकर रीती जमीन
कुछ घास की तरह ही होते है बुरे दिन
जड़े जमा ही लेते हैं अच्छे दिनों के बीच
काश ! मुस्कान भी होती घास की तरह जीवट
और मन होता काई समान
पाते ही सपाट चेहरा खिल उठती
हरियल मन उगता आद्र सतह में अनायास
प्रेम में होता है हृदय निश्छल , पनीला
उमगते है द्रव बिंदु सुबहों – शाम
वे गुजरने देते हैं अच्छे / बुरे दिनों के कदमों को
बनकर घास का विस्तृत मैदान
मरकर अमर होती है घास
जब चिड़िया करती उस से नीड़ निर्माण
पुनर्नवा हो जाती तब प्रीत
धरती से उठ रचती नव सोपान
9. अनुवाद

जब वह गुनगुनाये नहीं

तब समझना वह किसी सोच में है
जब वह सोच में है
तब तुम उसकी आंखें पढ़ना
तुम चाहो तो पढ़ सकते हो
उसकी धड़कन भी
खुश होगी तो ताल में होगी
कोई रंज – ओ – ग़म होगा
तो सूखे पत्तों की तरह कांप रही होगी
तब तुम उसके माथे पर बोसा देना
उसकी आत्मा को नया जीवन देना
नयनों से झर – झर झरेंगे तब आँसूं
उन बून्दों का तब तुम अनुवाद करना
तुम्हारी गिरह में फिर वह स्वतंत्र होगी
हँसेगी , खिलखिलायेगी , उन्मुक्त होगी
रोम – रोम नवगीत कह उठेगा
उस गीत के तब तुम नायक बनना
देखो ! कितना आसान है न एक स्त्री को समझना
10. निर्भया

उसने समय के परे लौट के देखा

आसमां में किया सुराख़
ज़मीं पर झाँक के देखा
अपने छिन्न – भिन्न वजूद को फिर से आंक के देखा
क्या , लगा है कुछ पैबंद
यह सोच के देखा
पर अफसोस !
शर्मनाक था और भी मंजर
शून्य को ताके बस कई समूह साथ खड़े थे
उसके नाम की तख्तियां हाथ में लिए खड़े थे
मोमबत्तियाँ पिघल पिघलकर दम तोड़ चुकी थी
आग को ज्वाला न बनते देख मिट चुकी थी
अब तो हर उम्र की स्त्रियाँ उसे बेबस दिखीं
कई अबोध उम्र में दुष्कर्म की शिकार हुईं
जो जिंदा बची बस लाश बनकर रह गईं
धर्म , अधर्म , नीति , निगाहों , वस्त्रों का मुद्दा बन गईं थी
कुछ विकृत मानसिकताएँ इंसानियत का बलात्कार करता रही
दरिंदों , पिशाचों की श्रेणी में समाज को ढकेलती रही
यह सब देख ,
वह क्रोधित , झटपटाती हुई सुराख़ पाट चली
पुनर्जन्म का विचार सिरे से पुनः त्याग चली ….
11. इस सदी में भी

चहकती हो मुंडेर पर

लगाती हो आवाज़
दाना लेकर आऊँ तो
उड़ जाती क्यों बिन बात
ओ ! चिरैया
तुम स्त्रियों की भांति कितनी
डरी , सहमी हो
शायद ! तुम भी भूली नहीं हो
पिंजरा और अपना इतिहास
12. कल्पना
न भोर न दोपहर मध्य का पहर
घाम से सराबोर लावण्या के गवाक्ष पर आ बैठा कपोत
स्त्री के अनुरागी मन में आरम्भ हुई
कपोलकल्पना
विचार के तार उलझे – सुलझे
इतने क्षण में
कपोत ले आया चोंच में तिनके
धुँधले काँच पर धुँधला – सा बना अक्स
तिनका याकि सन्देश
धुँधलके में स्त्री का मन
प्यार की तरह कपोत के पंख से भी उठी हवा
नहीं होती स्वस्थ , सुनती आई है वह यह सदा
अस्वस्थ हुआ उसका मन
असमंजस में है स्त्री : काँच का पर्दा हटाये कि नहीं !
(कवयित्री विशाखा मुलमुले, कविताएँ , लेख और लघुकथाएं लिखती हैं। जन्म 23/7 /1979 को उज्जैन में हुआ और कोरबा, छत्तीसगढ़ में शिक्षा हुई । विशाखा मूलतः मराठी भाषी हैं और हिंदी में कविताएँ लिखती हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताओं के अन्य भाषाओं में भी अनुवाद  प्रकाशित हो चुके हैं. तीन साझा काव्य संकलनों में इनकी कविताएँ हैं ।
सुधीर सक्सेना जी की चुनिंदा कविताओं का डॉ सुलभा कोरे जी के मार्गदर्शन में इन्होंने मराठी में अनुवाद किया है । प्रकाशित पुस्तक का नाम है ” अजूनही लाल आहे पूर्व ” (अभी भी लाल है पूर्व)
संपर्क:[email protected]

 

टिप्पणीकार सोनी पाण्डेय। पहली कविता की किताब “मन की खुलती गिरहें”को 2015 का शीला सिद्धांतकर सम्मान, 2016 का अन्तराष्ट्रीय सेतु कविता सम्मान, 2017–का कथा समवेत पत्रिका द्वारा आयोजित ” माँ धनपती देवी कथा सम्मान”, 2018 में संकल्प साहित्य सर्जना सम्मान, आज़मगढ से विवेकानन्द साहित्य सर्जना सम्मान, पूर्वांचल .पी.जी.कालेज का “शिक्षाविद सम्मान”,रामान्द सरस्वती पुस्तकालय का ‘पावर वूमन सम्मान’ आदि से सम्मानित कवयित्री सोनी पाण्डेय का ‘मन की खुलती गिरहें’ (कविता संग्रह) 2014 में और ‘बलमा जी का स्टूडियो’ (कहानी संग्रह)2018 में प्रकाशित इसके अतिरिक्त कुछ किताबों का संपादन. पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन.

ईमेल: [email protected]

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