समकालीन जनमत
कविता

पूर्णिमा साहू की कविताएँ दृष्टि संपन्नता की पूंजी लेकर आई हैं

अणु शक्ति सिंह


पूर्णिमा साहू की कविताओं पर पहली दृष्टि पड़ते ही उनकी राजनीतिक समझ की झलक आ जाती है। ऐसे समय में जब स्त्री रचनाकारों पर लगातार आरोप लग रहे हों कि वे अमूमन राजनीति से सुनियोजित दूरी बरतती हैं, इन कविताओं का सामने आना एक सुखद आश्वस्ति है।

पूर्णिमा में महज एक प्रखर राजनीतिक चेतना ही नहीं नज़र आती है, सहजीविता और सहजीवियों के प्रति संवेदना की सुंदर अनुभूति भी है।

हसदेव के जंगलों और हसदेव के आदिवासियों पर उनकी कविता पढ़ते हुए सहज ही प्रिय कवि पूनम वासम याद आती हैं। बस्तर की दिक्कतों को जिस कुशलता से पूनम वासम ने उकेरा है, उसी सौन्दर्य से पूर्णिमा साहू ने सामने रखा है। हालांकि इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कवित्त के सौंदर्य में बिम्ब छत्तीसगढ़ की उस भयावह सच्चाई के हैं, जिन्हें हम नजरअंदाज़ नहीं कर सकते हैं।

उनके चिताओं के राख़ से फैक्ट्रियों की नींव रखी गई हैं
उनकी हड्डयां दीवारों में दफ़न है
उनके निचोड़े ख़ून से लपाई की गई है
हम उनके दांतो की ताबीज बनाएँ,
गले में लटका कर भटक रहे हैं

ये पंक्तियां जंगलों की चिताओं पर पैसे बनाने की कोशिश करने वाले उद्योगपतियों और सरकार के बढ़ते नुकीले पंजों के दबाव में दम तोड़ रहे जंगल के रहवासियों की व्यथा की पुरज़ोर बयानगी है।
एक बनती हुई कवि ने इसे ख़ूब रखा है।

पूर्णिमा अपनी कविता में हर उस पक्ष के उजागर करती हैं जिसे देखने की आम सलाहियत बड़ी अजीब अथवा पितृसत्तात्मक होती है। बतौर उदाहरण उनकी कविता ‘गांव’ ही देखिए, यह आम पितृसत्तात्मक कल्पना के गाँव पर बढ़िया प्रहार करती हुई उन सच्चाइयों को सामने लाती हैं जिससे लोग रूबरू नहीं होना चाहते हैं। गांव भले ही पुरुषों के लिए पुरातन सुख में लौटने का आनंद हो, स्त्रियों के लिए अनवरत् संघर्ष की आवृत्ति हैं।

पूर्णिमा की कविताओं को पढ़ते हुए यह अनुभव भी होता है कि वे अपना क्षितिज बहुत विस्तृत रखना चाहती हैं। उनके पास राजनीतिक चेतना है तो प्रेम के कोमल भाव भी जो चिरैया के फूलों की उतनी ही सुकोमल कल्पना करते हैं। वहीं रेशमी लिबास कविता पूँजीवाद पर सुगठित आघात है।

इतने सारे विषयों की संभावना एक नवागत कवि के अगले मज़बूत क़दम की तस्दीक हैं। पूर्णिमा अपनी चेतना और कल्पना के मुक़म्मल इस्तेमाल वाली बेहद संभावनाशील कवि हैं, जिनकी कविताओं की धार समय और तेज कर देगा। शुभकामनाएँ!

 

पूर्णिमा साहू की कविताएँ

 

1. हसदेव के आदिवासी

उनके चिताओं के राख़ से फैक्ट्रीयों की नींव रखी गई हैं
उनकी हड्डियां दीवारों में दफ़न है
उनके निचोड़े ख़ून से लिपाई की गई है
हम उनके दांतो की ताबीज बनाए
गले में लटका कर भटक रहे हैं
उनकी लाश  के ऊपर चूल्हा जलाकर
उनके चमड़ी की रोटी खा रहे हैं
हम आदमखोर हैं
हम उनकी भूख भी छीन लेना चाहते हैं
और रोटी भी
हम उनकी अंतड़ियों से सजावट करेंगे
और जो बच जाएंगे उन्हें बताएंगे कि वे असभ्य हैं
उन्हें सिखाएंगे कपड़े पहनने के सलीका
उनकी ज़मीने खोद कर लोहा निकालेंगे
वो शहर आएंगे
हमारी नालियाँ साफ करेंगे
उनके बच्चे कचरों के ढेर में पैदा होंगे
ऐसे हमारा देश स्वच्छ,सभ्य और समृद्ध बना रहेगा।

2. गांव

पुरुष लौटना चाहता है अपनी उदगम की तरफ़
वह पेड़ की चोटी पर चढ़ कर आसमान छूना चाहता है
वो लौटना चाहता है अपने गांव, खेत, गलियों की ओर

कोई शोर नहीं,
उसे आंगन में लगी चारपाई याद आती है
जिसे वह पूरी दोपहर पेड़ से बनने वाले प्रतिबिम्ब के अनुसार खिसकाता रहता है
शाम को तालाब और सुबह नदी में नहाता है
घी चुपड़ी चूल्हे की रोटी मिलती है जिसपर सिलबट्टे में पीसी आम नमक मिर्च की चटनी

ऐसे कई चित्र पुरुष के मन को गुदगुदा देते हैं
सैकड़ों ऐसे ही मनमोहक कविताएं गढ़ी जाती है
ग्रामीण साधारण जीवन पर

लेकिन किसी औरत ने कही
ग्रामीण साधारण जीवन में  लौटने की बात
क्योंकि जिस साधारण जीवन में
आदमी सुस्ताता है,
नदी में नहाता है
चूल्हे में पकी रोटी खाता है

वहाँ चूल्हा सुलगाती है औरत
सुलगाने से पहले उसे लिपती है
लिपने से पहले बुहारती है
बुहारती है आंगन जिसपर खाट लगता है

सरकारी नल कभी भी बंद हो जाए  तो
‘तिरबेनी’ तो कभी ‘मुरही’ के कुएँ से पानी लाती है
वो चूल्हा लिपती है जिसपे बनती है रोटियां

आदमी नहीं जानता की उसके खाट के नीचे रखी चाय की कप कब धूल गई
बिखरी हुई माचिस और बीड़ी की ठूठ कब साफ कर दी गई
नहा कर आते ही खाना कैसे बन जाता है

ये सारी क्रियाएं कोई स्वचालित यँत्र करता होगा होगा
क्योंकि पुरुष अपने बचपन के गांव में औरत को नहीं लिखता
क्योंकि औरत जाना ही नहीं चाहती पुरुष के गांव

3. साइकिल

_(विनोद कुमार शुक्ल जी के उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती है’ से प्रभावित कविता)_

रघुवर प्रसाद एक बार स्कूल में छुटी किसी की साइकिल घर ले आए थे
उनका कुछ नहीं होता था
वे हमेशा छोड़ी छुटी चीजों का जिम्मा उठा लिया करते थे,

हाँ, सोनसी उनकी है
उसे वे साइकिल पर बिठा कर आसमान की सैर पर ले जाना चाहते हैं
सामने की डंडी पर सोनसी बैठी है
रघुवर प्रसाद साइकिल चला रहे हैं
बार बार उनका घुटना उसकी जांघो से टकराता है
“ठीक से बैठी तो हो?” रघुवर प्रसाद ने पूछा
“कहाँ जाना चाहती हो?” सोनसी ने सुना
उस पीपल के पेड़ के ऊपर चलते हैं
तालाब की सतह पर साइकिल चला सकते हैं

सोनसी का गाल रघुवर प्रसाद की छाती से चिपक सा गया है
साइकिल चलाने से उनकी धड़कन तेज़ चलने लगी है

सोनसी धड़कन सुनती है
वह छाती से और सट जाती है
साइकिल पर बैठ उड़ते हुए उन्हें बुढ़िया की दुकान दिखती है,
बुढ़िया हाथ हिलती है
सोनसी खुश हो जाती है

हम कभी ऐसी साइकिल लेंगे “रघुवर प्रसाद ने कहा”
सोनसी अब भी छाती से लिपटी है
वो ज़मीन पर उतर आते हैं
सोनसी साइकिल की पाहियों सी गोल रोटियां बना रही है,
अगली बार साइकिल से चाँद का गोल चक्कर लगा आएंगे वह सोचने लगती है।

4. चिरैया के फूल

जब हम पहली बार हाथ पकड़ेंगे
तब हमारी हथेलियों की लकीरें आपस में मिल जाएंगी
और अलग सी गर्माहट के बाद उसमें दोनों के पसीने की नमी होने लगेगी
जैसे लकीरों की बिजलियां चमकी हो
और दोनों हथेलियों के बदल के टकराने से बारिश हो जाए
ऐसे मौसम में जानते हो क्या होता है?
चिरैया के फूल खिलते हैं

5. लिबास

मुझे शौक हुआ मैं लाल रेशमी लिबास पहनूँ
मैंने खरीदा वो चमचमाता लाल रेशमी लिबास
मैं उसे पहन यूँ इतरा रही थी मानो उस लिबास के साथ मुझे उजला सा निखरा रूप मिला हो,
उस लिबास की तारीफ़ और चर्चे होने लगे
मैं और इठलाई
वो लिबास इतना भारी और कसा हुआ था कि मेरे बदन में छाले होने लगे,
अब मैं उस  लिबास को उतार फेंकना चाहती थी,
पर वो मेरे बदन के छाले से इस कदर चिपका हुआ कि निकाले नहीं निकलता था।
उस लिबास से इतनी तड़पन होने लगी कि मन किया अपने शरीर के सारे मांस छीलने भी पड़े तो भी वो लिबास उतार कर फेंक दूं
पर हिम्मत न हुई।
धीरे-धीरे वो लिबास सिकुड़ने लगा
उसके अंदर मेरा दम घुटता था,
वो लिबास इतना ख़ूबसूरत था कि किसी से कह भी नहीं पा रही थी कि घुटन होती है मुझे
अब आलम ये है कि वो लिबास
ख़ूबसूरत रहने की शर्तें रख रहा है
वो मेरे ख़ून का एक-एक क़तरा चूस रहा है
और मैं मर रही हूँ।

6. मकड़ी

इस कमरे में मकड़ियों ढेर सारे के जाले हैं
ताना बाना बुन कर उन्होंने अपना जाला बनाया है
सभ्यता की ओर अग्रसर होते हुए
इन जालों को समय समय पर साफ करने की परंपरा बनी हुई है
क्या  मेहनतकश मकड़ियों को ये पता होगा
कि इनका कमरों में होना दरिद्रता का प्रतीक है
इनके रैन बसरों से लक्ष्मी रूठ जाती हैं
अब लक्ष्मी  के रूठ जाने में कितनी सच्चाई है
पता नहीं
लेकिन नास्तिक इंसान भी लक्ष्मी के रूठ जाने से डरता है
तो उन जालों की सफाई हुई
सारा ताना बाना  कचरा हो गया
सारी मकड़ियां तीतर बितर हो गईं
परिवार बिछड़ गया
समचार में लोगों के घरों में बुलडोज़र चलने की खबरें हैं
लोग अपनी संपत्ति अपने सामान मलबों में टटोल रहे हैं
एक लड़की अपनी किताबें
औरत घर के बर्तन, बच्चों के कपड़े
आदमी कुछ जरुरी कागजात खोज रहा है
और सर पीट पीट कर रो रहा है
सरकार की नज़रों में हम भी मकड़ियाँ हैं
हमारा घर उझाड़ कर वे भी देश को सभ्य और समृद्ध बनाने की ओर अग्रसर  हो रहे हैं।

7. हम जीतेंगे

हम देख सकते थे
पर देख नहीं पाए
हम सुन सकते थे
पर सुन नहीं पाए
जिसके जिम्मे देश सौंपा
जिसे तख़्त पर बिठाया
उसी नें हमें कुचल दिया
हम इंसान नहीं रहे
हम कीड़े रह गए हैं
उनपर सवाल उठाएंगे
गला घोंट दिया जाएगा
मुँह पर थूका जाएगा
वे हमें नोच नोच कर खाएंगे
अब हम नहीं बचेंगे
हम बट गए हैं
टुकड़ों में
धर्म के टुकड़ों में
जात के टुकड़ों में
राज्य के टुकड़ों
लिंग भेद के टुकड़ों में
हमें तोडना आसान है
वो जीत जाएंगे
लेकिन हम भी कुकुरमुत्ता की जड़ें हैं
पनपेंगे
हम भी उनके ऊँची कुर्सी के दीमक हैं
काट खाएंगे
एक दिन उनका तमगा गिरेगा
हम जीतेंगे सोनम वंगचूक
हम देखेंगे
वो दिन जिसका वादा है
हम देखेंगे

8. निर्धारित मूल्य

सरकार अनाज ख़रीदी का मूल्य तय करती है
लेकिन बुधारू और बड़े गौटिया के फ़सल के
निर्धारित मूल्यों में बड़ा अंतर है
बुधारु अनाज बेचकर पुराना कर्ज चूका देता है
लेकिन बेटी की शादी नहीं कर पाता
गौटिया अनाज बेच कर बुधारु का ज़मीन ख़रीद लेता है
उस खेत में ट्यूबेल लगाता है
अब बुधारु उसी ज़मीन पर मजदूरी करता है
जिसका अनाज गौटिया बेच देता है

9. सफ़ेद कुर्ता

उस दिन तेज़ बारिश हो रही थी
मैं पूरी भीगी हुई घर पहुंची

मेरे सफ़ेद कुर्ते में कीचड़ के कुछ छींटे भी पड़े थे
दहलीज पर रखे पायदान पंजो को रगड़ते हुए अंदर आई
ताकि मुझ पर लगे कीचड़ घर गन्दा ना कर दें

अपने कमरे में गई तो मुझे कपड़े बदलने की इच्छा नहीं हुई

भीगी हुई मैं, कुर्ते पर लगे कीचड़,
माथे पर बिखरे हुए बाल
ऐसे ही आईने में खुद को लगातार देखती रही

शरीर की गर्मी से मेरा बदन सूख गया
लेकिन कुर्ते के किनारों से अब भी पानी टपक रहा था
भीगने की मदहोशी को फिर से महसूस करने के लिए
मैं गुसलखाने में लगे फव्वारे के नीचे जा कर खड़ी हो गई

लेकिन इस भीगने में वो बात नहीं थी
इसने तो बारिश का पानी भी धो डाला था
खीज कर मैंने वो कुर्ता उतार दिया
काफ़ी दिनों तक वह कुर्ता वहीं पड़ा रहा
मैंने उसे धोया नहीं
एक दिन उसे सुखा कर कीचड़ का दाग़ पक्का कर लिया,
उस कुर्ते में उस बेवक़्त बारिश की गंध बैठ गई थी.
मैंने वो कुर्ता सहेज कर अपनी आलमारी के निचले खांचे पर रख दिया
उस बरसात को सालों बीत चुके हैं,
दिखाने के लिए मैंने वैसा ही चमचमाता सफ़ेद कुर्ता खरीद लिया है
हाँ, मैंने अक्सर देखा है कि हर औरत के पास एकदम चमचमाता सफ़ेद कुर्ता है
कहीं उनकी भी आलमारी के निचले खांचे में कोई………
खैर कोई बात नहीं

10. भूख की कविता

पिघलती सलाखों को अपनी हथेली पर लेकर
किसी की भूख की कहानी लिखना
देखना लाखों लोगों के पेट की जलन
एक साथ तुम्हारे मुट्ठी में कैसे महसूस होगी

भर पेट केवल शब्दों के जाल बुने जाते हैं
कविता नहीं की जाती

 


कवयित्री पूर्णिमा साहू, जन्म-20/12/1997,जन्म स्थान – ग्राम ‘सांकारा’, जिला ‘बालोद’ छत्तीसगढ़। शिक्षा – M. A. हिंदी ‘हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग छत्तीसगढ़। हेमचंद यादव विश्वाविद्यालय दुर्ग छत्तीसगढ़ से पीएचडी की पढ़ाई जारी है।
Email- poornima.itsme20@gmail.com
Mobile no. -7999802890

 

टिप्पणीकार अणु शक्ति सिंह विद्यापति पुरस्कार 2019 से पुरस्कृत हैं। 19 अगस्त 1985, सहरसा (बिहार), शिक्षाः माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता स्नातक. प्रकाशन – दो उपन्यास शर्मिष्ठा और कित-कित , भिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। सम्पर्क: singh.shaktianu19@gmail.com

 

 

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