समकालीन जनमत
कविता

पार्वती तिर्की की कविताएँ आदिवासी समाज और प्रकृति के साहचर्य, सातत्य और सौंदर्य की अभिव्यक्ति हैं

रोज़ी कामेई


आदिवासी समुदायों की एक ख़ास विशेषता यह होती है कि वे इंसानों से पहले धरती, समस्त जीव-जगत, प्रकृति एवं सृष्टि के हर सजीव-निर्जीव को सर्वोच्चता प्रदान करते हैं. पार्वती तिर्की की कविताओं में अनायास ही यह विशेषता चरितार्थ हो उठती है. शहर के कोलाहल से दूर उनकी कविताएँ प्रकृति के संगीत का घोल मनमाने ढंग से पाठकों के मन में घोलती चली जाती है. प्रकृति अपने हर भाव लिए पाठकों को अपनी मौजूदगी का एहसास कराती है. उनकी कविताएँ ‘मैं’ की अवधारणा से बिलकुल विपरीत ‘हम’ की गरिमा को बनाए हुए निर्विवाद रूप से सामुदायिक अस्तित्व की भावना को स्थापित करती है. यही उनकी कविताओं का अनोखा सौंदर्य है कि उनकी कविताओं में प्रकृति एवं आदिवासी समाज अपनी विनयशीलता के साथ आदिवासियत की परिभाषा गढ़ती है.

प्रकृति का अस्तित्व आदिवासी समाज के साथ जुड़ी हुई है इसी सहजता को वह अपनी कविताओं के माध्यम से भी दर्ज करती है. जब वह कहती है कि –
आज रात्रि चाँद अखड़ा पर आने वाला है,
अपने संग सरगुजा मिलने, बतियाने
और कहानी सुनने
अखड़ा पर आने वाला है.

यहाँ प्रकृति उनकी साथी है. पार्वती तिर्की की कविताओं की यही सबसे सुंदर खासियत है कि वे इस बात को स्पष्ट कर देती हैं कि सृष्टि के अनुशासन से कोई भी बाहर नहीं है. कोई छोटा-बड़ा, महत्वपूर्ण या बेकार नहीं होता. सबकी अपनी भूमिकाएं तय होती है. ‘अखड़ा’ इसी का सबसे बड़ा उदाहरण है. अखड़ा यानी प्रत्येक गाँव का वह स्थल जहाँ सभी तरह के सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन होता है. यहाँ कोई दर्शक नहीं होता, बल्कि हर दर्शक पर्फोर्मर होता है और हर पर्फोर्मर दर्शक. इसी तरह जब वह यह कहती हैं कि –
बारिश मेरी धानो नानी के गीत
सुनने आती है,
नानी के गीत उसे बहुत रीझाते

इससे पता चलता है कि प्रकृति आदिवासी जीवन का अभिन्न अंग है. प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की भावना उनकी सम्पूर्ण कविताओं में अंकित होती रही है.
आदिवासी विश्वास इसी में बसती है कि –
आसमान में उड़ते हुए
नकदौना गीत गा रही थी,
उसके गीत की
मधुर ध्वनि सुनाई पड़ रही थी –
पुईं चे चे ..
पुईं चे चे ..
उसके गीत को सुनकर
सभी समझ गए ..
बारिश आने में अभी देरी है !
इसी तरह –
पुरखे कहानी कहते हैं –
समझो और बूझो !

आदिवासी जीवन विश्वास और पुरखा कहावतों को सहेजने और परंपरा को हस्तांतरित करती पार्वती तिर्की की कविताएँ यह स्थापित करती है कि सृष्टि, प्रकृति और जीव-जगत से प्राप्त अनुभव समसामयिक जीवन के लिए भले ही अप्रासंगिक हो चुके हो परंतु आदिवासी समाज की दृष्टि से वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि वे पहले थे. इसीलिए आज भी नगदौना चिड़िया हर बारिश से पहले अपना गीत संदेश भेजती है.
आदिवासी समाज में चाँद की भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

इस दृष्टि से पार्वती तिर्की की यह पंक्तियाँ इस बात का आगाह करती है कि आदिवासी समुदाय प्रकृति के अस्तित्व को सामुदायिक आदिवासी अस्तित्व से अलग नहीं मानतीं. आदिवासी त्यौहार भी चाँद के बढ़ते आकार के आधार पर ही तय किये जाते हैं. आदिवासी समुदाय की प्रकृति के साथ की रिश्ते की खूबसूरती को बयाँ करता यह पंक्तियाँ –
खद्दी का चाँद
आसरा देखता है –
तिलई फूलों का आसरा देखता !

पार्वती तिर्की की कविताएँ आदिवासी समाज के उस विश्वास को बनाए रखती है कि प्रकृति ही सर्वोच्च नियंता मार्गदर्शक हैं एवं आदिवासियत ही समुदाय की रीढ़ है. अतः पार्वती तिर्की की कविताएँ आदिवासियत एवं आदिवासी दर्शन के स्वतंत्र अस्तित्व को लेकर चलता है. जो निरंतर सृष्टि के रचाव-बचाव के प्रयासों में आदिवासी विश्वास एवं आदिवासी दर्शन के साथ हमें व दुनिया की समस्त सभ्यताओं को अपने नैसर्गिक स्वभाव के साथ मज़बूती से खड़े रहने का आह्वान करती है.

 

पार्वती तिर्की की कविताएँ

 

1. करम चंदो

करम के मौसम में खिलने वाले चाँद को ‘करम चंदो’ कहा जाता है। यह सितम्बर का महीना होता है जब छोटानागपुर का आदिवासी समुदाय ‘करम’ का त्यौहार मनाता है। इस त्यौहार में ‘करम चंदो’ की विशेष उपस्थिति दर्ज है ।

i. संगी !

भादो के आसमान में
चाँद फ़ूल खिल रहे हैं,

देखो,
भादो के ड़ाँड़ खेत में
सरगुजा फ़ूल रहे हैं!

 

ii. सहिया !

करम का त्यौहार आ रहा है
करम चाँद अखड़ा पर आएगा!

अपने संग- साथियों से मिलने
करम चाँद अखड़ा आएगा!

 

देखना!
माँदर की ताल सुनकर

करम चाँद अखड़ा पर
नृत्य करने को उतरेगा।

 

iii. सहिया !

आज रात्रि करम चाँद अख़ड़ा पर आने वाला है,
अपने संग सरगुजा से मिलने, बतियाने
और कहानी सुनने
अखड़ा पर आने वाला है।

आज रात्रि करम चाँद और सरगुजा
साथ अखड़ा पर होंगे
नृत्य करेंगे, थिरकेंगे।

सहिया!
देखो माँदर बज रहा है-
धातिंग ताँग ताक ताक
देखो अखड़ा का थिरकना
करम चाँद और सरगुजा के
आगमन की खुशी में!

देखो मेरख़ा राजी का थिरकना,
देखो बिनको का थिरकना,
परता भी थिरक पड़े!

भला कैसे न थिरके सभी!
भादो का ही मौसम होता
जब करम चाँद और सरगुजा साथ होते!
_________________
*करम , छोटानागपुर में मनाया जाने वाला लोकपर्व है, इस पर्व में खिलने वाले चाँद को ‘करम चाँद’ कहते। और, इसी करम के मौसम में सरगुजा के सुनहरे फूल खिलते हैं, जिनसे अखड़ा सजता है।

*ड़ाँड़ खेत – मैदानी क्षेत्र/खेत
*सहिया – मित्र
*अखड़ा – सामूहिक मिलन का केंद्र
*माँदर – वाद्ययंत्र
*मेरख़ा राजी – पूरा आसमान
*बिनको – तारे
*परता – पहाड़

 

 

2. धानो नानी के गीत

(आदिवासी मौसम – ऋतुओं, बादल – मेघों, जंगल- जुगनुओं आदि को रिझाने की कला जानते हैं।)

बारिश मेरी धानो नानी के गीत
सुनने आती है,
नानी के गीत
उसे बहुत रीझाते !

साँझ बेरा नानी
गीत गा रही थी –

मोख़ारो बदाली , पण्डरू बदाली
ऐन्देर गे चेंप मला पुईंयी भला
ऐन्देर चेंप मला पुईंयी…

यह गीत संदेश सुनते ही
बारिश आयी
और
पहाड़ों – नदियों के आँगन
खूब रीझ – रीझ कर नाची।

हर मासा नानी गीत गाती है!

ग्रीष्म बिहान
नानी के गीत सुनकर ही
आया था बीड़ी बेलस –

रिमरिमना बिड़ि:आ लागी
मदगी खतेरा लागी..

बीड़ी बेलस को यह गीत खूब भाते
यह गीत सुनते ही
बीड़ी बेलस आया था
और खूब सारे
महुआ तोड़े थे!

नानी महुआ बिछते हुए
गीत गा रही थी
और बीड़ी बेलस रीझ – रीझकर
महुआ तोड़ रहा था!

नानी इस कला में खूब पारंगत है,
उनके गीत सबको ही ख़ूब रीझाते!

 

_______________________________________
*ओ काले बादल ! सफेद बादल
बारिश क्यों नहीं ला रहे हो
बताओ भला ! बारिश क्यों नहीं ला रहे हो ?
कुड़ुख आदिवासी आषाढ़ के मौसम में इस गीत को गाते हैं। ये बारिश कामना के आदिवासी गीत हैं।
*खूब धूप है और महुआ खूब टपक/गिर रहा है।
दक्षिणी छोटानागपुर में महुआ के मौसम में गाये जाने वाले कुड़ुख आदिवासी गीत हैं।
*बीड़ी बेलस ‘सूर्य’ को कहा जाता है।

 

 

3. नकदौना चिड़िया

आसमान में उड़ते हुए

नकदौना गीत गा रही थी,

उसके गीत की
मधुर ध्वनि सुनाई पड़ रही थी —

पुईं चे चे..
पुईं चे चे..

उसके इस गीत को सुनकर
सभी समझ गए ..
कि
बारिश आने में अभी देरी है !

 

 

________
*आदिवासी कई चिड़ियों की भाषा जानते हैं। नकदौना हरे रंग की लम्बी पूँछ वाली चिड़िया है। नकदौना हर बारिश से पहले अपना गीत संदेश भेजती है।

 

4. जंगल दईत

पुरखे कहानी कहते हैं —

समझो और बूझो !

वे बुझाते हुए कहते हैं —

क्या तुम्हें मालूम है!
मेरख़ा राजी अपना रास्ता क्यों नहीं बेड़ाता?
परता – तोड़ोंग अपनी दिशा से क्यों नहीं भटकता?
ख़ाड़ – ख़ोसरा कैसे संतुलित है?

फिर समझाते हुए कहते हैं —

जंगल दईत।

_____________________
*कुड़ुख आदिवासी कथा है कि जंगल में ‘दईत’ रहते हैं। जिन्होंने समस्त मेरख़ा राजी, परता – तोड़ोंग, ख़ाड़ – ख़ोसरा आदि को संतुलन में बांधे रखा है। इसलिए कोई भी अपना रास्ता नहीं बेड़ाता है। जंगल दईत प्रकृति में अदृश्य रूप में विद्यमान हैं।
*मेरख़ा राजी – आसमान का राज्य
*परता-तोड़ोंग — पहाड़-पर्वत
*ख़ाड़ – ख़ोसरा — नदी-नाला
*बेड़ाना – ख़ो जाना

 

 5. गीतारू साँझो

सरगुजा फ़ूल की तरह
लहलहाता है
गीतारू साँझो का
सँवाला रंग —

जब वह करम राग में
गीत अलापती है

ड़ाँड़ का सरगुजा फ़ूल
साँझो की हँसी
खिलखिलाने लगता

और

उसके ख़द्दी गीत पर
जंगल का सखुआ फ़ूल
साँझो की रीझ
थिरकने लगता

सुनहरे सरगुजा और सखुआ फ़ूल
गीतारू साँझो के गीत पर
इतने रिसया जाते हैं कि
साँझो के साँवल रंग में
रम जाते हैं।

______________
*लहलहाना – चमकना
*गीतारू – ख़ूब गीत गाने वाला/वाली
*करम राग – आदिवासी गीत का एक राग
*ख़द्दी – त्यौहार
*रिसयाना – रम जाना।

 

6. ख़द्दी चाँद

ख़द्दी का चाँद
आसरा देखता है —
तिलई फूलों का आसरा देखता!

फूलों वाले पहाड़ पर
उनके मिलने का स्थान
हमेशा से तय हैं !

ख़द्दी के मौसम में
चाँद पहाड़ों पर होता

और
तारे धरती पर होते
वे सखुआ के जंगलों में
जुगनुओं की तरह खिलते !

ख़द्दी बीतने तक
चाँद और तारे
तिलई और सखुआ फ़ूलों के साथ रहते!

फिर,
अगले ख़द्दी मौसम पर
मिलने का आसरा देकर लौट जाते!

________________

*आदिवासी चाँद देखकर त्यौहारों का समय तय करते हैं। कोई भी त्यौहार बढ़ते चाँद के समय मनाया है। इसलिए ‘चाँद’ विशेष है। चैत्र माह से आदिवासियों का ख़द्दी त्यौहार शुरू होता है। ख़द्दी के इसी मौसम में तिलई और सखुआ के फ़ूल खिलते हैं।

*आसरा – प्रतीक्षा

 

(कवयित्री पार्वती तिर्की, शोध छात्रा, हिंदी विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी – 221005. पता –सोसो मोड़, कार्तिक नगर, गुमला -835207
झारखण्ड. ईमेल – [email protected], दूरभाष – 9262235165

 

टिप्पणीकार रोज़ी के अपने शब्दों में उनका परिचय

(देश का पूर्वोत्तर राज्य इम्फाल मेरा घर है। बचपन से पढ़ने-लिखने का शौक था साथ ही हिंदी भाषा के प्रति अतिरिक्त प्रेम बचपन से ही रहा है। कविताएँ मुझे ज़्यादा आकर्षित करती हैं क्योंकि मुझे लगता है कि कविताओं के माध्यम से हम अपनी संवेदनाओं, भावनाओं को सहज अभिव्यक्ति दे सकते हैं। छोटी-मोटी कविताएँ यूँ ही लिखती हूँ। कविताएँ इसलिए भी लिखती हूँ क्योंकि मैं चाहती हूँ कि मेरी संवेदनाएँ-भावनाएँ उन शब्दों के रूप में इसी दुनिया में मेरे साथी बन मेरे आसपास विचरण करते रहें जिनमें इस स्वार्थ भरे संसार के बीच हरसंभव सच्चाई और ईमानदारी के बचे रहने की संभावनाएं बनी रहेंगी।

‘हिंदी उपन्यासों में पूर्वोत्तर भारत का आदिवासी समाज’ विषय पर पीएचडी कर रही हूँ।

संपर्क: [email protected]

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