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कविता

‘कुमार कृष्ण की कविताएँ वर्तमान दौर के पोएटिक दस्तावेज़ हैं।’

वीरेंद्र सिंह


 

कोरोना काल वर्तमान समय में मानव जाति के लिए सबसे मुश्किल दौर बनकर मनुष्य के अस्तित्व को ही चुनौती देता प्रतीत होता है । जबकि सारी कायनात ही ख़तरे में है, इस चुनौतीपूर्ण समय में मानव और मानव समाज में घटित हो रहे परिवर्तनों का प्रभाव दूरगामी होने वाला है।

कवि कुमार कृष्ण ने हमेशा अपनी कविताओं में अपने मौजूदा समय और उसकी हलचलों को अपना काव्य विषय बनाया है, इस रूप में वे एक प्रासंगिक हिंदी कवि के रूप में जाने जाते हैं। हिमाचल प्रदेश का यह कवि बड़े प्रभावी ढंग से उपस्थित खतरों और उसके पीछे गतिशील राजनीतिक आर्थिक परिस्थितियों को भी अपना काव्य विषय बनाता है।

उनकी कुछ महत्वपूर्ण प्रकाशित-अप्रकाशित कविताओं ‘लेटर-बॉक्स’, ‘गर्म कोट’, ‘शब्द का निर्णय’, ‘सत्यमेव जयते’, ‘दादू की सीख’, ‘घासलेट’, ‘चींटियाँ’, ‘राजा की किताब’, ‘फरवरी’ और ‘दिसम्बर’ कविताओं को आधारस्वरुप लिया जा सकता है।

कुमार कृष्ण पूछते हैं
‘सत्यमेव जयते तीन शेरों के पंजों में जकड़ा
सतयुग का मुहावरा है
पता नहीं क्यों लटका है
इस सदी की दीवार पर’ ।

संकेत स्पष्ट है कि
‘यह भयानक सर्द समय है
जहाँ सच का मुँह टेढ़ा हो गया है’

इसलिए कवि कहता है कि ‘अलाव जलाने का कोई बेहतर इंतज़ाम करना होगा’ ।

आदमी की आदमियत को हमारे दौर की सत्ता संरचना ने कैसे विरूपित किया है उसे इन कविताओं में महसूस किया जा सकता है। धर्म और राजनीति के घालमेल ने मनुष्य की बुनियादी समस्याओं से हमारा ध्यान भटकाया है। वहीं सामाजिक स्तर पर व्यक्ति और समाज का रिश्ता बेइंतिहा कमज़ोर हुआ है। बच्चियों के साथ होने वाली यौन हिंसा की घटनाओं से कवि उद्वेलित है इसलिए कवि इस वहशी समाज से सावधान करते हुए एक अबोध बालिका से कहता है
‘यह लकड़ी के नहीं
लोहे के खिलौनों से खेलने का समय है
यह नाचने का नहीं
घुड़सवारी करते हुए घोड़े की लगाम खींचने का समय है’ ।

अपने समय की सत्ता संरचना और उसके चरित्र पर इतनी बारीक़ी से उंगली रखी गयी है कि आप बेचैन हुए बिना नहीं रह सकते।कवि भलीभाँति जानता है कि –
‘राजा किताब से नहीं
किताब के सपने से डरता है
तभी तो सपनों को प्रतिबंधित करता है’

वह ये भी जानता है कि बहुत से शब्द और उनके जादूगर शब्दों की लड़ियाँ लिए राजा के स्वागत हेतु कतारबद्ध हैं परंतु कवि तय करता है कि वह भीड़ का हिस्सा नहीं बनेगा और उस बहरूपिये को अपनी कविता की किताब में नहीं आने देगा ।

‘शब्द और निर्णय’ कविता में कवि विचार करता है कि शब्द जंगल का रूदन, शहरातियों के सुखी जीवन का स्वप्न और किसी दुराचारी राजा के विरूद्ध गाँव के लोगों के अनवरत संघर्ष की आवाज़, सभी कुछ है । यह आपको तय करना है कि आपको शब्द के किस स्वरुप का हमराह होना है, कवि स्वयं को गाँव की आवाज़ में शामिल कर लेता है और यही उनका मूल संस्कार भी है ।

अपने समय के समाज में कमज़ोर पड़ते व्यक्ति, स्मृति, राग, और सामाजिकता के रिश्तों से कवि बाखबर हो कहता है –

‘खाली हो चुका है पूरी तरह रिश्तों का गोदाम
लेटर-बॉक्स झेल रहा है अकेलापन
जैसे झेलते हैं तमाम लोग अपने अंतिम सौपान पर’।

यहाँ वृद्ध जीवन उसके एकाकीपन की सहज चिंताएँ भी साफ़ उभरकर आती हैं ।

कुमार कृष्ण की चिंता अपने वर्तमान को लेकर ही नहीं अपने भावी समाज और उसके बाशिंदों को लेकर भी बेहद गहरी है ‘दिसम्बर’ में भी कवि ने कहा है-

‘सोचता हूँ
जब जनवरी चुराकर ले जाएगी मेरी पूरी आग
तब कैसे बचाऊंगा मैं
2019 के मनुष्य को
2020 के लिए’

इसलिए कवि बार-बार यही कामना करता है कि यदि फिर से जन्म हो तो चींटी से ही उसे शिक्षा मिले क्योंकि वही

‘जानती है मिठास छुपाने की कला,
धरती के अंदर का तापमान परिवार पालने का मंत्र’

‘चींटी’ कवि का प्रिय प्रतीक भी है जिससे उनकी कविता की मूल संवेदना का सहज अनुमान लगाया जा सकता है । कवि बड़ी-बड़ी चीज़ों पर नहीं, घासलेट पर बात करता जो किसी गरीब के घर रातभर जगकर वर्णमाला सिखाता है तथा सूरज उगाने के लिए ‘अँधेरे के खिलाफ लड़ता है’ इसलिए कवि भी घासलेट और दियासलाई के साथ हो लेता है ताकि चाँद का टेढ़ा मुँह सीधा किया जा सके । वह उस ‘गर्म कोट’ पर भी बात करता है, जो खूँटी पर टंगा, मौसम के बदलते तेवर को देख, अपने और मानव समाज के भविष्य को लेकर चिंतित है ।

आज जैसी विश्वव्यापी भयावह परिस्थितियाँ बनी हैं,जीवन-मूल्यों पर नए सिरे से बहस होने लगी है और कवि कुमार कृष्ण उन सारी बहसों को अपनी कविताओं में प्रमुखता से उठाते हैं, इसलिए इनकी कविताएँ वर्तमान दौर के पोएटिक दस्तावेज़ हैं।

 

कुमार कृष्ण की कविताएँ 

 

1. लेटर –बॉक्स

मैं हूँ चिट्ठी- घर रिश्तों का घोंसला
कोई तो आओ मेरे पास
ले आओ मेरी चिट्ठियाँ मेरी सदियों पुरानी दोस्त
मेरे पास
ले आओ मेरी बिन बुलाई मेहमान खूबसूरत जादूगरनियाँ
मैं भूलता जा रहा हूँ प्यार की परिवार की परिभाषा
मत बनने दो मुझे कूड़ाघर मैं हूँ लालघर
हर मौसम की मार झेलता लोहे का घर
चिट्ठियों का रखवाला एक गरीब चौकीदार
जो बचा कर रखता है रात की आग अगली सुबह के लिए
जाओ मेरे दोस्तो कोई तो जाओ उन घरों के पास
जहाँ आज भी बचे हैं कुछ रिश्तों के बीज
जहाँ खूंटियों पर लटके हैं कुछ अंतर्देशीय कपड़े
जहाँ छुपाना चाहते हैं काग़ज़ में छोटे-छोटे सुख
मैंने अभी भी सम्भाल कर रखें हैं चिट्ठियों के पंख
सम्भाल कर रखें हैं चिट्ठियों के फटे हुए जुते
उनका हँसना-रोना, उनकी शरारतें
सम्भाल कर रखें हैं तरह-तरह के मौसम
जाओ मेरे दोस्तो मुझे पहुँचानी हैं चिट्ठियाँ वहाँ तक
जहाँ घड़ों से आ रही है नदी के रोने की आवाज़
सौंपनी है बची हुई आग उन चूल्हों तक
जहाँ नहीं भूले लोग अंधेरे के ख़िलाफ़ मशाल जलाना
नहीं भूले चिट्ठियों को छुप-छुप कर पढ़ना
जाओ मेरे दोस्तो अभी चिट्ठियों को खटखटानी हैं बेशुमार सांकलें
देनी है दस्तक उन दरवाजों पर
जहाँ कई दिनों से नहीं सो रहे हैं लोग
चेहरे की किताब पढ़ने वाले लोगों से कहना-
खाली हो चुका है पूरी तरह रिश्तों का गोदाम
लेटर-बाक्स झेल रहा है अकेलापन
जैसे झेलते हैं तमाम लोग अपने अन्तिम सोपान पर
मैं कहीं धरती के अंदर हूँ कहीं धरती के बाहर
कहीं दीवार पर हूँ तो कहीं किसी पेड़ पर
पर सच तो यह है मैं हर जगह होकर भी कहीं नहीं हूँ
जहाँ कहीं सो रही हैं चिट्ठियां मैं उनके सपनों में हूँ ।

 

2. दिसम्बर

मैं आता हूँ तब जब
तमाम त्योहार चले जाते हैं छुट्टी पर साल भर के लिए
मैं आता हूँ तब जब
पेड़ उतार रहे होते हैं धोने के लिए अपने तमाम कपड़े
मैं आता हूँ तब जब
सर्दी ओढ़ लेती है अपनी पुरानी शाल
मैं आता हूँ तब जब
हरकत में आने लगती हैं खूंटियाँ
मेरे बस्ते में भरी होती है बेशुमार चीख-पुकार
लाठियों का संवाद
उम्मीद के, विश्वास के छोटे-बड़े खिलौने
भरे होते हैं तरह-तरह के डर
मैं आता हूँ छोटे हौसलों की पीठ थपथपाने
आता हूँ छोटे दिनों को बड़ा करने
भुने हुए मक्की के दानों की खुशबू
मूंगफली के खेतों के सपनें।
मैं लाता हूँ कम्बल की गरमाहट
मैं आता हूँ आग के पाँव लेकर
तुम जल्दी से निकाल देना चाहते हो मुझे
दरवाजे से बाहर
जला सको जनवरी के स्वागत में फुलझड़ियाँ
तुम भूल जाते हो-
मेरी बारह महीनों की दोस्ती
भूल जाते हो मेरा राग मेरी आग
तुम्हारे लिए मैं कैलेण्डर का अन्तिम पृष्ठ हूँ
जिसकी जगह दीवार नहीं कूड़ादान है
पर मत भूलो वही पृष्ठ
तीन सौ पैंसठ दिनों की दुःख भरी दास्तान है
मैं जनवरी की उम्मीद हूँ उनका विश्वास हूँ
ठंढ में ठिठुरती जीवन की प्यास हूँ
सोचता हूँ-
जब जनवरी चुरा कर ले जाएगी
मेरी पूरी आग
तब कैसे बचाऊँगा मैं-
2019 के मनुष्य को 2020 के लिए
सच कहूँ तो-
सोचना इस समय सबसे बड़ा अपराध है
तुम मुम्बई में सोचोगे तो
मुजफ्फरपुर में पकड़े जाओगे
चंडीगढ़ में सोचोगे तो
रामगढ़ नहीं पहुँच पाओगे
यह भयानक सर्द समय है
जहाँ सच का मुँह टेढ़ा हो गया
हो सके तो तुम
अलाव जलाने का कोई बेहतर इन्तजाम करो ।

 

3. गर्म कोट

वह है भूरे पंख वाली चिड़िया
साल भर करती है इन्तजार
आए सफेद कपड़ों वाली सर्दी
वह सौंप दे अपनी चोंच में छुपाई हुई-
बची हुई आग
रामपुरी भेड़ की उम्मीद है सर्दी का कोट
वह है किसान का बचा हुआ विश्वास
बुनकर की बाँहें

गर्म कोट छुपा कर रखता है अपनी जेबों में-
थोड़ी सी सर्दी, थोड़ी सी गर्मी
थोड़े से सुख, थोड़े से दुःख
थोड़ा सा डर, छोटा सा घर
उसी में छुपे रहते हैं कहीं-
ठंढ से लड़ने के तमाम औजार

वह लड़ता है मौसम के खिलाफ
वह लड़ता है इस उम्मीद के साथ-
एक दिन आएगा बसन्त उसके पास
सौंप देगा वह एक जीवित मनुष्य
बेशुमार सपनों के साथ उसके पास

खूंटी पर लटकते हुए गर्म कोट
अपनी ही परछाई से डरने लगा है
मौसम के बदलते रंगों को देखकर
हिम्मत और हौसला खोने लगा है
गर्म कोट बटनों का व्याकरण
एक बार फिर से पढ़ने लगा है ।

 

4. दादू की सीख

रंगों खिलौनों से खेलती हुई बच्ची
दुनिया के बारे में नहीं जानती
वह नहीं जानती-
खिलौनों की दुनिया में नहीं आते कभी सपने
नहीं जानती-
कैसे काला रंग कर देता है समाप्त
पलक झपकते ही खूबसूरत रंगों का वजूद
जब-जब आता है उसका जन्म-दिन
तब-तब बड़े हो जाते हैं पिता के डर
मैं उसे कैसे समझाऊँ-
यह लकड़ी के नहीं
लौहे के खिलौनों से खेलने का समय है
यह नाचने का नहीं घुड़सवारी करते हुए
घोड़े की लगाम खींचने का समय है
तुम पिता की तरह
अभी से दौड़ना शुरू कर दो ।

 

5. शब्द का निर्णय

शब्द ने सपना देखा-
उसे किसी जादूगर ने कविता में बदल दिया है
उसे लगा दिए हैं बड़े-बड़े पंख
शब्द उड़ता हुआ जंगल की ओर गया।
उसने देखा जोर-जोर से रो रहे हैं तमाम पेड़
शब्द देर तक सुनता रहा रोने की आवाज
पेड़ उस नदी के लिए रो रहे थे
जिसे देख -देख कर वे जीते रहे आज तक
शब्द उड़ता हुआ एक शहर की ओर गया
उसने देखा परेशान हैं बहुत सारे लोग
वे रौंद देना चाहते हैं तमाम दुःख विदेशी जूतों के साथ
शब्द उड़ता हुआ पहुँचा एक गाँव में उसने देखा-
उस की शक्ल के अनेक शब्द लड़ रहे हैं किसी राजा के साथ
शब्द देखता रहा बहुत देर तक उस लड़ाई को
लगातार हारते जा रहे थे शब्द
वह खुद भी शामिल हो गया उन शब्दों के साथ
एक लम्बी लड़ाई में ।

 

6. घासलेट

मेरे दोस्त मिट्टी के तेल
मैं जानता हूँ-
तुमने ही किया था पहली बार
गरीब लालटेन का नामकरण
तुमने ही बदला था तम्बुओं, झोंपड़ियों, कच्चे घरों में
अनाज का स्वाद
नहीं हो पाती कभी भी तबे और रोटी की दोस्ती
अगर तुम न होते
पहचान लिया था तुम्हारी ताकत को सबसे पहले
माचिस की नाजुक तीली ने
तुम पानी से आग बने हमारे लिए
सुलगते रहे सुबह-शाम
दिन-रात हर मौसम में
पढ़ाते रहे भूख की बारहखड़ी

तुमने बदले कई-कई रूप-
कभी उड़े आकाश में पंख लगाकर

कभी जले छोटे से दीपक में
कांचघर में बदल डाला तुमने लालटेन
चावल को भात बनाने में
खत्म कर दिया तुमने अपने आपको
कोई नहीं समझ पाया तुम्हारा बलिदान
तुम नहीं थे कोई महादेव
नहीं थे स्वर्ग के देवता
नहीं थे कोई राजाश्रय बाबा
किसी ने नहीं बनवाया तुम्हारा बिरला मंदिर
तुम थे कथरी के करुणा निधि ग़रीब नवाज़
रात-रात भर जागकर समझाई तुमने
मुझे वर्णमाला
तुम चाँद को सूरज में बदलने के लिए
लड़ते रहे लगातार अंधेरे के खिलाफ़
फिर भी आता रहा काली दाढ़ी में अंधेरा बार-बार
चलो चलते हैं दीयासलाई के घर
उससे माँगते हैं आग के पाँव
मिलकर लड़ते हैं तीनों
शायद हो जाए चाँद का मुंह सीधा
उठो मेरे दोस्त घासलेट उठो-
पृथ्वीराज हमारी नींद में पहुँच गया है ।

 

7. फरवरी

बहुत बार सोचती हूँ एक दिन पूछूँगी-
क्यों चुरा लिए तुमने मेरे दिन
क्यों नहीं जीने दिया कुछ दिन और
मैं भी घूम लेती बादलों की पीठ पर
गर्म कपड़े पहन कर
तुम उड़ा ले गए मेरे सारे बसन्ती रंग
जिसे लाई थी मैं माँग कर जनवरी से
नहीं देख सके तुम जनवरी की जिंदादिली
तमाम उलझनों के बाद भी वह आई थी बसन्ती कपड़ों में
हम दोनों बहनों को आता है ठंढ से लड़ना
हम दोनों सिखाती हैं दुनिया को आग से प्यार करना
सिखाती हैं ठंढ से लड़ने की कला
जिस समय आया मेरा आठवाँ दिन
ग़जल का राग लेकर आए इस धरती पर उस दिन
जगजीत सिंह
अपने इक्कीसवें दिन मैंने ही पैदा किए थे निराला
दसवें दिन मुझे ही विदा करना पड़ा नम आंखों से धूमिल।

वह कविता के चाकू से लड़ना चाहता था
एक बहुत बड़ी लड़ाई संसद से सड़क तक
अरे मार्च बाबू तुम मेरे चुराये हुए दिनों से
कितने भी बड़े हो जाओ
उड़ने लगो चाहे सूरज के पंख लेकर
नहीं जान पाओगे किस घर से चुरा कर लाते हैं फूल
अपनी पगड़ी के रंग
तमाम पेड़ कहाँ सिलवाते हैं अपने नए-नए कपड़े
तुम नहीं ढूंढ पाओगे कभी सर्दी की सांवली आंखें
कभी बही-खाते से फुर्सत मिले तो सोचना-
किस रुमाल में छुपा कर रखती है फरवरी अपने आँसू
अपने सपने
धरती के किस कोने में छुपाती है-
अपने दिनों को चुराने की पीड़ा ।

 

8. चींटियाँ

धरती पर जहाँ-जहाँ होती है मिठास
वहाँ-वहाँ होती हैं चींटियाँ
चींटियाँ जानती हैं उम्मीद का, भविष्य का व्याकरण
जानती हैं कुनबे की कला
मेहनत-मजदूरी का गणित

काश ! मिली होती चींटियों को भाषा
सुना पाती अपनी पीड़ा
दिन-रात मशक्कत करते पाँवों की तकलीफ़
गा सकती कोई दुःख भरी ग़ज़ल

कितना अच्छा होता-
हम अनपढ़, बेजुबाँ चींटियों से सीख पाते
प्यार की परिवार की सही परिभाषा
सीख पाते बोझ बाँटने की सीख
सीख पाते साथ-साथ रहना

चींटियाँ न हँसना जानती हैं न रोना
वे जानती है पूरी रात प्यार का उत्सव मनाना
वे जानती हैं-
हाथ का हुनर ही मिटा सकता है भूख

रोटी की तलाश में भटकती चींटियाँ
कभी नहीं लड़ती पानी के लिए
शायद चींटियाँ को नहीं लगती कभी प्यास
सिखर दोपहर में-
हम ढूँढ रहे होते हैं छाँव का छप्पर
चींटियाँ भाग रही होती हैं राशन की बोरियों के साथ

चींटियाँ जानती हैं जन्म से ही
धरती में मिठास छुपाने की कला
जानती हैं सुरंग खोदने की तकनीक
जानती हैं धरती के अन्दर का तापमान
जानती हैं परिवार पालने का मन्त्र

उनको आते हैं तरह-तरह के घर बनाने
आते हैं तरह-तरह के घर बसाने
चींटियाँ जानती हैं-
घर के अन्दर घर बनाने का हुनर

चींटियाँ हैं मजदूरों की दुनिया
सबसे बड़ी दुनिया इस धरती पर
कल की चिंता में जीती हैं-
अनगिनत सपनों के साथ
अगली बार आऊँ जब मैं इस धरती पर
मुझे सिखाना सबसे पहले-
मिठास ढूँढ़ने का मन्त्र
सिखाना-
घर को घर बनाने की कला
सिखाना प्यार की परिवार की परिभाषा ।

 

9. सत्यमेव जयते

दीवार पर टंगी खूबसूरत तस्वीर का नाम है-
सत्यमेव जयते
पलट दी हैं तमाम परिभाषाएँ गाँधी के बंदरों ने
कत्ल करना अब शौक
डकैती शामिल है कला की सूची में
शहाबुद्दीन चाकू से नहीं फोन की घण्टी से मारता है
तमाम सबूतों के बाद भी
सच ही हारता है
सत्यमेव जयते तीन शेरों के पंजों में जकड़ा
सतयुग का मुहावरा है
पता नहीं क्यों लटका है इस सदी की दीवार पर ।

 

10. राजा और किताब

दोस्तो ! जिन दिनों सोचते हैं लोग
अपने भविष्य के बारे में
उन दिनों मैंने तय किया-
मैं किताब बनूँगा
गणित, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र की नहीं
कविता की किताब बनूँगा
जो बार-बार बुलाये अपने पास
आज सोचता हूँ-
मैंने क्यों नहीं सोचा राजा बनने के बारे में
सुबह से शाम तक पहनता नए-नए कपड़े
बार-बार डराता नींद में
उड़ता सात समन्दर पार बार-बार
बनाता चाँद पर घर

राजा किताब से नहीं
किताब के सपने से डरता है
तभी तो सपनों को प्रतिबंधित करता है

राजा जानता है सोने की चिड़िया बनाना
जानता है सोने की चिड़िया उड़ाना
उसे आता है वशीकरण का जादू

राजा को प्रेम करने दौड़ती हुई आएंगी किताबें
राजा भी आएगा छुपने बार-बार किताब के पास
सदियों से आ रहा है छुपता भाषा के
रंग-बिरंगे दुपट्टे में
मेरा यकीन मानिये
मैं नहीं आने दूँगा उसे भेस बदल कर
अपनी किताब के अन्दर ।

 

 

(कवि तथा आलोचक के रूप में कुमार कृष्ण का नाम हिन्दी-पाठकों के लिए सुपरिचित है। अब तक इनकी अट्ठाईस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिसमें ग्यारह कविता-संग्रह, सात आलोचनात्मक ग्रन्थ तथा दस सम्पादित पुस्तकें शामिल हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने तीन पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया है। कुमार कृष्ण की कविताओं का अनुवाद अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त बंगला तथा मराठी भाषा में हो चुका है। इनकी कविताएँ शिक्षा-बोर्डों तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं।

कुमार कृष्ण का जन्म हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के गाँव नागड़ी में 30 जून, 1951 को एक किसान-परिवार में हुआ। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में छात्र कल्याण अधिष्ठाता, अधिष्ठाता भाषा संकाय प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, अध्यक्ष बौद्ध विद्या केन्द्र जैसे पदों का दायित्व निभाते हुए आजकल स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं।
आपका स्थायी पता है- ‘स्प्रिंगफील्ड’ नागड़ी, पोस्ट ऑफिस-सलाणा, शिमला-171219 (हिमाचल प्रदेश)

टिप्पणीकार डॉ. वीरेंद्र सिंह,असिस्टेंट प्रोफेसर,
हिंदी विभाग, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय,
क्षेत्रीय केंद्र धर्मशाला, जिला काँगड़ा (हि० प्र०) 176218

‘समकालीन कविता के संदर्भ में उदय प्रकाश का काव्य’ विषय पर पी-एच० डी, समकालीन हिंदी कविता के अध्ययन में निरंतर शोधरत। ‘तकनीकी युग में भाषा और साहित्य’ विषय पर एक पुस्तक सह- संपादन में शीघ्र प्रकाश्य। सम्पर्क: 8580758307
E-Mail- [email protected]

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