रौशन कुमार
कवि जितेंद्र विसारिया जी की कविताएँ समाज और सत्ता के दोहरेपन तथा खोखलेपन को बेनक़ाब करती हैं।
इनकी कविताएँ धर्म, मिथक, इतिहास और राजनीति के सहारे सत्ता, वर्चस्व और पाखंड की निर्मम आलोचना करती हैं तथा दलित-बहुजन, स्त्री समेत तमाम मज़लूमों की मुखर आवाज़ बनती हैं।
इनकी कविताओं ‘अविजीत रॉय’, ‘हुसैन और हुसैन’, और ‘ओरेस्टस’ में अविजित रॉय, हुसैन, प्रोमेथियस और ओरेस्टस जैसे ऐतिहासिक-पौराणिक प्रतीक यहाँ केवल संदर्भ नहीं, बल्कि विचार-स्वातंत्र्य, विद्रोह और नैतिक प्रतिरोध के रूपक हैं।
कवि भारतीय समाज में व्याप्त जाति-व्यवस्था, धार्मिक हिंसा, स्त्री-दमन और फासीवादी प्रवृत्तियों को वैश्विक इतिहास की क्रूरताओं (आउशविट्ज़, कर्बला, नाज़ीवाद) से जोड़कर उन्हें मानव सभ्यता की साझा त्रासदी के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
इनकी कविताओं की भाषा सीधी, आक्रामक और वैचारिक है। इनकी कविताओं में जो काव्य-सौंदर्य है वो दरअसल समाज की कुरूपता को उजागर करती हैं।
‘कागद कारे करने से’ और ‘कविता अगर’ जैसी रचनाएँ कविता की सामाजिक भूमिका पर आत्मालोचनात्मक प्रश्न उठाती हैं।
‘माँ की निगाह में पिता’ इनकी काव्य-कृति का भावनात्मक शिखर है, जहाँ निजी स्मृति, वर्ग-जाति संघर्ष और राजनीतिक चेतना का मानवीय संश्लेषण मिलता है। यह कविता दिखाती है कि प्रतिरोध केवल वैचारिक नहीं, बल्कि जीवन-अनुभव से उपजा हुआ नैतिक आग्रह है।
इनकी कविताएँ शब्द और ब्रह्म की सत्ता को चुनौती देती हुई एक ऐसी कविता रचती हैं जो शोषितों, वंचितों के पक्ष में खड़ी है, और यह विश्वास दिलाती है कि संघर्ष और प्रतिरोध की मशाल यूं ही जलती रहेगी… और हम लड़ेंगे साथी ‘ग़ुलामी की अंतिम हदों तक’…
ऐसे निडर, प्रगतिशील और हृदय को आह्लादित कर देने वाले साहसी कवि जितेंद्र विसारिया जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।
जितेंद्र विसारिया की कविताएँ
1. अविजित रॉय *1
शब्द ब्रह्म है
ब्रह्म शब्द हैं/वेद हैं
वेद और ब्रह्मा की सत्ता
बचाये रखने
बनाये रखने उसका हेतु
घोला गया कभी कानों में
पिघला सीसा
तो कभी छेदीं जाती रहीं
गर्म सूजों से कोमल जिह्वाएँ
शंबूक का कटा सिर
और एकलव्य के
लहूलुहान अँगूठे
भले ही बन गए हों
इतिहास से मिथ
सुदूर यूरोप में घटित होने
और नया पढ़ते
नहीं गई हो तुम्हारी दृष्टि
रोम और स्पार्टा के गुलामों पर
सुकारात की ज़हरखुरानी
सलीब पर टंगे ईसा
हिज़रत करते हजरत मुहम्मद
और फाँसी पर झूलते मंसूर की
दास्तानों पर
किन्तु आधा-पौंन सदी पूर्व
आउसविट्ज के गैस चैम्बरों में
कार्यरूप परिणत होते
नाज़ी फ़रमानों की भनक
ज़रूर रही होगी तुम्हारे कानों में?
बँटवारा उन्नीसौ सैंतालीस
इकहत्तर शेख मुजीबुर्रहमान
और चौरासी का प्रियदर्शनी वध
लज्जास्पद बानवे
और गुज़रात 2002
हमारी साँझी विरासत के
माथे पर खुदे काले अध्याय हैं
ब्लागर होने के नाते
ज़रूर गुज़रते रहे होंगे
तुम्हारी नज़रों के सामने से
लाहौर, कंधार काहिरा
और सीरिया के हौलनाकमंजर
बमों से चिथड़े होती मानवता
बेची जातीं यज़ीदी महिलाएँ
और सामूहिक क़त्ल होते
सीरियनों के वीडियोकिल्प
और तो और
तुम्हारी खूबसूरत मुस्लिम पत्नी फ़रदीना
जो लहूलुहान हुई है तुम्हारे साथ
उसने ज़रूर सुनाई होगी तुम्हें
हसन-हुसैन की गाथा
जो अड़कर अपनी जि़द पर
क़त्ल कर दिए गए थे
अपने बहत्तर साथियों के साथ
क़र्बला में…
अविजित!
कमर पर बँधी झाड़ू
और गले में लटकती हांड़ी के
अदृश्य निशान
मनुष्य रहते
मल में बदल दिए जाने की टीस
बज़बज़ाते नालों से हमारा एका
गाँव बाहर रखे जाने के दंश
विस्थापन और बेइज़्ज़ती
रोज़ कोंचती है हमें
रात की नींद से उठ-उठकर
जगाती है
पलट देने को वह निज़ाम
जो अपनी सृष्टि और दृष्टि में
हमें समझता है
पशु से भी बदतर
मैं यह जानते हुए भी
भर उठता हूँ आग से
कि ब्रह्मा की बेलगाम सत्ता
शब्दों के रथ पर सवार हो
चल पड़ी है जय करने
समस्त जंबूद्वीप
अविजित!
हम देवताओं के घर से
आग चुराने वाले प्रोमोथियस2
जानते हुए भी अपनी नियति
कि क्रूर देवाधिदेवअपोलो
बाँध सकते हैं कभी भी हमें
व्यवस्था के ओलंपियस पर
जहाँ संस्कृति का नरभक्षी गिद्ध
नोंच डालेगा हमारा जि़स्म
खा जाएगा बोटी-बोटी
अविजित!
हम तब भी
चुराते रहते हैं
उन्हीं के घर से
फिर फिर वही आग
जो पड़कर दलित मानवता के
चूल्हे और चिरागों में
करती रहती है प्रतिवाद
शब्द और ब्रह्म की सत्ता का
हमारे ज़ख़्म फिर भरेंगे
हम फिर लड़ेंगे साथी
प्रोमोथियस मरता नहीं है
फीनिक्स भी उठ खड़ा होता है
अपनी राख से
रक्तबीज से हमारा नाता
यों ही नहीं जोङा जाता
हमारा द्वन्द्व
साश्वत है
हम अपराजेय हैं
हम अविजित हैं…।
2. हुसैन और हुसैन
कतर और कर्बला
हुसैन और हुसैन
यह कोई समानता नहीं
ना अनुप्रास का कोई रूप
ना ही शब्दों का नाद सौन्दर्य
पर हुसैन! जाने क्यों
तुम्हें याद करते
मेरे रात के सपनों में
अब कोई पीर या औलिया नहीं-
यज़ीद आता है?
हाथ में नंगी शमशीर
और मुँह से आग उगलता
अपनी बैयत कुबूल करवाने
उसकी आँख क़र्बला ही नहीं
तालिबान, अयोध्या और
गुजरात तक फैली हुई हैं।
उसे न अब हमारा कहा पसंद है
और न लिखा
छपा तो कतईं नहीं…
वह चाहता है कि अब
हमारी क़लम और कूचियाँ
अपना किया धरा छोड़-
उसी की जय-जयकार करें
रचें उसी का विराट रूप
काढ़ें उसी की प्रशंशा में कसीदे
और माने उसे ही अपना नबी और ख़लीफ़ा!
हुसैन! मैं नहीं जानता तुम में
कौन सा कर्बला जीवित था
कि रच सके अपने कैनवास पर
मातृभूमि का यथार्थ चित्र
कर सके कुमारसंभवम्,
अजंता और खजुराहो का पुनर्स्मरण
देख सके दौड़ते अश्वों में
अपनी शक्ति का प्रभाव
जबकि आसान नहीं होता
दौड़ते अश्वमेधी अश्वों की वल्गा थामना
दिग्विजयी उन्माद का अनुसरण करती सेना का सामना
और वह भी उस समय में जब अश्वमेधकार
नरमेध पर उतर आये हों….?
पर हम हारे नहीं हैं हुसैन
ना ही कबूल कर ली है
उनकीं बैयत
आज भी हमारे ओंठों पर
आज़ादी के तराने और
इन्कलाबी नारे हैं
किसी मज़लूम की आँख का आँसू
आज भी हमारे क़लम की स्याही
और किसी बेकस की आह
मेरा रंज और रुसवाई हैं
कतर की कब्र से छूटा
और कर्बला से होता
एक बेलगाम अश्व
अभी-अभी मेरे ख्यालों से निकलकर
जिन्दगी के संग क़दमताल कर उठा है।
3. ओरेस्टस *3
ओह! ओरेस्टस
आरगोज़ की सभा ने
तुम्हारे मातृहंता होने पर
दिया था मृत्युदण्ड
पर तुम बच गए थे
छल से बल से
मित्र पायलेडस की सहायता और
अपोलो महान की मध्यस्थता से
फिर भी तुम्हें मिला निर्वासन
वर्ष भर एक वीरान द्वीप पर रहने का
पाप की तीन देवियों ने चलाया अभियोग
किया ऐरे की पहाड़ी पर देवताओं ने तुम्हारा न्याय
तब कहीं जाकर मुक्त हुए थे तुम
व्यभिचारिणी कम पितृहंता माँ के वध से
ग्रीक में तुम और तुम्हारा जीवन
याद किया जाता है एक त्रासदी के रूप में
लेकिन हमारे देश में
पुत्री के साथ बलात्कार करने वाले ब्रह्मा
पति का रूप धर कर
परस्त्री गमन करने वाले विष्णु और इन्द्र
मातृहंता परशुराम
स्त्री वध उन्हें नासा-श्रवण हीन कराने वाले
अग्नि परीक्षा लेकर भी
गर्भवती पत्नी को निर्वासित करने वाले-श्रीराम
नदी में नहाती लड़कियों के वस्त्र चुराने
उन्हें पनघट पर छेड़ने वाले कृष्ण
वाद-विवाद में जीतती स्त्री को
मृत्यु का भय दिखाने वाले याज्ञवल्क
पिता के ऐवज़ में नदी पार कराती दलित लड़की का
नाव में ही शील भंग करने वाले-पाराशर
नियोग के नाम पर सवर्ण स्त्रियों से व्यभिचार करने वाले व्यास
समस्त स्त्री जाति को विद्या-बुद्धिहीन करने वाले मनु
और स्त्रियों को सदैव पीटते रहने का
फ़तवा जारी करने वाले-तुलसी
हमारे प्रातः स्मरणीय
ऋषि और भगवान हैं
उनके आदर्श हमारे संस्कार
उनका मार्ग हमारा धर्म
ओ! ओरेस्टस
यहाँ नहीं रही कोई आरगोज़ की सभा
ऐरे की पहाड़ी
जहाँ मिलता न्याय एक दलित शोषित स्त्री को
यहां तो अभियोग चलाने वाली
पाप की वे तीन देवियां
स्वयं ही
खंडित
मंडित
और
दण्डित हैं।
4. मुक्तिपथ
कितना आसान होता
सृष्टि पर राज करना
यदि सारे भूखे लोग
मान जाते उपवास का महत्व
कर्मरत, निष्काम भक्ति की सीख
वचनबद्ध बलि सा
छोड़ जाते अपनी भूमि,
नदियाँ, पहाड़ और वन
जा बसते किसी पाताल लोक
और वहाँ भी रहता वर्षभर
किन्हीं छली त्रिदेवों का पहरा
या समूल नष्ट करते
सिर क़लम कर
लुढ़का दिया जाता
पहाड़ों की चोटी से
या झोंक दिया जाता
पूरा का पूरा जिन्दा
यातना शिवरों की
धधकती भट्टियों में
पूरा का पूरा
पर ऐसा होता नहीं
हर बार
कोई न कोई बंदी वासुदेव
निकल ही पड़ता है
लेकर आस्था का शिशु
दमनकारी व्यवस्था को सोता छोड़
भय की कालिंदी पार करता
मुक्ति के पथ पर।
5. कागद कारे करने से
कोरा कागद कारे करने से
भलें ही उतर आये उस पर
शब्दों में लिपटी समस्याएँ
समस्याओं से उपजा
नपुंसक आक्रोश
स्वानुभूत दुःख की
आड़ी-टेड़ीं रेखाएँ
सफलता के कुछ
कोकशास्त्री नुस्खे
और असफलता पर
गलद्अश्रु विलाप…
लेकिन कोरा कागद कारे करने से-
यदि नहीं उतरता तो
स्वानुभूत दुःख का ज्वार
सदियों से सताये जाने की पीड़ा
पीठ पर पड़ते कोड़ों की मार
घर ही में लुटते रहने की नियति
और बलात्कृत होने का अभिशाप
कागदकारे करने से
नहीं रुक जाते नाजियों के गैस चेम्बर
फासिस्टों की उन्मादी सेनाएँ
भागलपुर, बेलछी की हत्याएँ
अयोध्या और बमियान के ध्वंस
गोहदरा और गुजरात के दंगे
गोहाना और मिर्चपुर की ज्वालाएँ
कागदकारे करने से
समाप्त नहीं हो जाते
संघर्ष के दिन
पेट की आग
और सिर कटाने के अवसर
कागदकारे करने से
तो-हर-बार जन्म लेते हैं
नए-नए वेद स्मृति
पुरान-कुरान
न्यू-ओल्डटेस्टामेट
और गुरु गाथाएँ
जो जन्म देती हैं
हजारों-हजार नए क्रूसेड
जेहादी और बजरंगियों को
जो बचाते-बचाते इन काले हर्फों को
करते रहते हैं वर्तमान का रक्तपृष्ठ।
6. कविता अगर
नीम को नीम कहना मेरी मज़बूरी है,
मैं आम नहीं कह सकता
सृजन अगर शब्दों की जुगाली
कविता अगर भांडों का गीत
किसी व्याकराणचार्य की रीति
तब वह मुझे नहीं है स्वीकार्य
करता हूँ उसका बहिष्कार
कविता अगर…
फूल को उसकी की महक
हवा को उसकी व्यापकता
पानी को उसकी समरसता
आग को उसकी दग्धता-का
नहीं करा सकती ज्ञान
तब भी वह नहीं है मुझे वह स्वीकार्य
कविता अगर….
एक बच्चे की हँसी
माँ के वात्सल्य
पिता के प्यार
प्रेमी के आलिंगन
प्रेमिका के चुम्बन
और पत्नी के साहचर्य
तक ही सीमित है
तब भी वह नहीं आती
हमारे विश्वास की परिधि में
कविता अगर….
नही घुल सकती एक विधवा के आँसुओं में
भूख से तड़पते बच्चे की रूलाई में
हल जोतते किसान के पसीने में
मिल-मज़दूर के जीने में
तब तुम्हीं बताओ,
ऐसी बेस्वाद कविता मुझे भायेगी
कविता अगर….
सीमा पर खड़े सिपाही की संगीन को
बनाती है और लहूलुहान
मारती है देश के कर्णधारों के मन में
शेष जीवित शांति कपोतों को,
बदलती है प्रत्यक्ष शत्रु को
अज्ञात दुश्मन में
तब भी में असहमत हूँ
ऐसी कविता से
मुझे नीम को नीम कहने दो
मैं आम नहीं कहसकता
आप कविता करिये।
7. माँ की निग़ाह में पिता
1.
अम्मा कहती हैं
बड़े पानीदार रहे हैं
तुम्हारे दद्दा…
चम्बल में पानीदार होने के
क्या मायने हैं
मुझसे अच्छी तरह
कौन जानता होगा
यहाँ बनाय रखने
अपनी नाक-मूँछ का पानी
तुरंत हो जाते हैं कत्ल,
बहू-बेटियों की हत्याएँ
और भाई-बंधुओं से बैरादायी
पर मैं उस दिन चकित रह गया
जब अम्मा ने बताया
कि तुम्हारे दद्दा हमें लेकर
इसलिए हो गए थे न्यारे
क्योंकि साँझे में
तुम्हारे बाबा
हमें पहनाकर रखना चाहते थे
मारकीन की धोती
और तुम्हारे दद्दा
गाँव की ठाकुर-ब्राह्मनियों की तरह
सिलकीन और बाइल की साड़ियाँ
गाँव में ढेड़ बनकर रहना
न उन्हें तब पसंद था
और न अब।
2.
अम्मा कहती हैं
उनका कसी देह
गुना मूँछ
काँधे पर
तेल पिवीलुहाँगी धर
हार-खेत जाना
और तनकर चलना
गाँव की बड़ौआ जाति में
सदैव ईर्ष्या का कारण रहा है
तुम्हारी अइया4
इटाए-मैनपुरी की थीं
देखा था उन्होंने
स्वामी अछूतानंद जी को
और उनके पिता ने
स्वामी जी की
पढ़ी-लिखी बिटीनाओं को,
जिसके चलते
तुम्हारी अइया भी
पढ़ गई थीं
मदरसे की
चार किताबें
वे कैसे इस बीहड़ में
ब्याहकर आईं
वह अलग किस्सा है
और चाहकर भी
तुम्हारे दद्दा को
पढ़ा न सकीं
वह दूसरा
पर उनकी आग
तुम्हारे द्ददा में
हमेशा रही
बे पढ़े नहीं
पर लड़े बहुत
फिर चाहें बात तुम्हारे
बाबा की हरवाही छुटवाने
की रही हो
या थोक के
सरकारी कुँआ पर
सबके साथ पानी भरने को लेकर
गाँव के ठाकुर-ब्राह्मनों से
हुई सामूहिक लठियायी की
वे उस सबमें ही आगे रहे
गाँव के गुँधारी ठाकुर
की मनमानियों के विरुद्ध
सातों जात में सबसे पहले
थाने जाकर
रपोट लिखाने वाले
तुम्हारे दद्दा ही हैं…।
3.
अम्मा कहती हैं
तुम पढ़-लिख गए हो
ईएचडी-पीएचडी कर ली है
और वे कुपढ़
पर कभी भूलकर उन्हें
चूतिया मत समझ लेना
वे खुद न पढ़ सके तो क्या?
सयाने हुए तो तुम्हारे
लोहरेसूबेदारचच्चा को लेकर
एक दिन जा धमके थे स्कूल
और मास्टर को थाने में
रपट लिखवाने की धौंस दे
भर्ती करा कर ही दम लिया था
…जहाँ से कभी बचपन में उन्हें
स्कूल के उसी चौहान मास्टर ने
बाहर कर दिया था-
‘चमट्टा’ कहकर
जवानी में कई-एक
गोरी-ग्वालिनों सी ज़रदार
कुपढ़मोड़ियों के नाते
लौटाए थे उनने
क्योंकि वे खुद नहीं
जानती थीं चार आखर
और ना ही कर सकती थीं
अपनी अगली पीढ़ी को साक्षर
इसीलिए तब की कुछ पढ़ी-लिखी
मुझ गरीबिन को
ले आए थे
तीन नदियों के पार से ब्याहकर
कि जहाँ से थीं तुम्हारी आजी!
4.
अम्मा कहती हैं
वे अनपढ़ हैं
और आज भले ही न लगे
तुम्हें उनकी कोई बात उचित
और न वे मानने को तैयार हैं
तुम्हार पूरा सच
पर यह सच है कि
उन्हें जँचता नहीं है
तुम्हारा दलित-दलित का राग
एक दिन तुमसे अर्थ जानकर
अकेले में कह रहे थे मुझसे
कि यह तो वही हुआ
जैसे घसीटा की अम्मा ने
बदलकर रख लिया हो
कढ़ेरा नाम
उन्होंने गाँधी को नहीं देखा
पर विनोबाजी को देखा है
तुम्हारी अइया बताती थीं
कि जब बहुत छोटे थे
सन् साठ में
तुम्हारे बाबा के साथ
चलकर पाँच कोस पैदल
गए थे बागियों के समपर्ण में
देखने -संत विनोबाजी को
घर लौटकर आए
तो बहुत गुस्से में थे
और चिंतित भी
कि बिनोवाजी ने करवा दिया
बीहड़ के बागि़यों का सरेण्डर
पर गाँव के डकैतों को
कौन करवायेगा समर्पित?
जो लूटते रहते हमें
और करते रहते हैं
तार-तार
हमारी बहन-बेटियों की इज़्ज़त!
5.
अम्मा कहती हैं
बीज से ही बिरवा बनता है
शहर और कॉलेज पढ़कर
अब भले ही करते हो
मार्क्स और अंबेदकर की बात
बघारते हो
कला संस्कृति का ज्ञान
पर अपने बाप को कम मत आँकना
कि गाँव में सबसे पहले
लक्ष्मी-गणेश की तस्वीरों के साथ
दिवारी पर भिण्ड से
तुम्हारे पिता ही लाए थे
हँसती आँखों वाली
मधुबाला के साथ
अपने घर वह तस्वीर-
जिसमें सबके ऊपर
जलती लुकाठी के बीच
आमने-सामने होते थे
अपनी पेनीबर्छियाँ ताने
वीर शिवजी और महाराणा प्रताप
बीच में कुँवर को पीठ से बाँधे
दाँत से लगाम दबाए
हाथ में नंगी तलवार थामे
सफेद घोड़े पर सवार
झाँसी की रानी
रानी के दाएँ तस्वीर में होते थे
हाथ में पिस्तौल लिए
उघारे बदन
जनेऊ पहने
मूँछ उँमेठते
चंदशेखर आज़ाद
और उन्हीं के बाएँ
हाथ में कंठी लिए
ध्यानमग्न
नेत्र बंद किए
सबको सम्मति का वरदान देते
महात्मा गाँधी
और जिसके अंत में
फाँसी की टिकठी
पर लटकती रहतीं
तीन लाशें
राजगुरू
सुखदेव
और
भगतसिंह
तुम्हारे द्ददा का सुराजी मन
रचा-बसा है इन्हीं तस्वीरों में
बाबा साहेब की धमक तो
बहुत दिनों बाद
सुनी इस बीहड़ ने
कांग्रेसियों के बराबर
खाट पर बैठने
और साथ खाने को
मानते रहे वे बड़ा उपकार
शहर के शुरूआती विधायक
और स्वतंत्रता संग्राम सैनानी
भूताजी का
बड़ा हाथ था इनपर
6.
चुनाव में टिकिट पाना
और बात है
और चुनाव प्रचार करते
दारू-मुर्गा मिलना
और बात
वे बात के धनी
और दिए वचन
जान पर खेलने वाले मनुज
और तुम्हें
वफादारी से ही नफ़रत
कि गुलामी और वफा़दारी
एक ही सिक्के के दो पहलू
कि छेरी5 और भिड़ाह6 की
मिताई फ़रेब
द्ददा से तुम्हारी नहीं बनी
तुम्हें जिन वचन
और नामों से घृणा
और वे उन्हीं से
मान बैठे थे
अपने को धन्य
“हरिजन” और “रैदास”
सम्बोधनों से उन्हें
इसी बात का
बड़ा संतोष था
कि जिन्हें घृणा थी
उनकी छाया से
ऐतराज़ था खाने-पीने
और अच्छे रहन-सहन से
आज वे ही कर रहे हैं
उनके हक़ की बात
कि नरसिंहराव दीक्षित ने
बनावा दिए हैं
कितने ही हरिजन
मास्टर और बाबू
दिलाए हैं कितनों को ही
खेत-पट्टे
कि जलकर उनसे
कहते है गाँव के ठाकुर-ब्राह्मन-
कांग्रेस के राज में गधा पंजीरी खायें
पर तुम अपनी जगह ठीक हो लला
यह अब तुम्हारे दद्दा ही कहते हैं
उनका यह भ्रम तब टूटा
जब बाबू जगजीवन राम की जगह
प्रधानमंत्री बनाया गया था
मोरारजीदेसाई को
और कहीं
कोई यह कहकर
मुस्कराया था-
चमचा युग का अंत
7.
जब तुम चार-पाँच साल के रहे होंगे
कुछ साइकिलें आईं थीं
पहली-पहल अपने बीहड़ में
लीले परचम और
हाथी निशान के साथ
एक तस्वीर थी उनके पास…
जिसमें नीला ही कोट-पेंट पहने
एक तिरंगा लगे मंदिर की ओर
अपनी तर्जनी उठाये चश्माधारी बाबू की
जिसे वे सब ‘बाबा साहेब’ कह रहे थे
जिन गाँवों में पहला परिचय ही
-‘कौन ठाकुर हो?’ से शुरू होता हो
वहाँ बाबा साहेब की पहचान भी हम
पा सके थे-अपनी बिरादरी के
महान मसीहा के रूप में
अपनी बातों में बार-बार ‘मिशन, ‘कारवाँ’
‘बहुजन’ ‘अपना राज’ ‘बुद्ध’ ‘कबीर’
‘रैदास’ ‘फूले-सावित्री’
‘शाहू’ और ‘अम्बेडकर’ जैसे बहुत कुछ
अनसुने संज्ञा और सर्वनाम दोहराते थे-वे साइकिलिए
जो तुम्हारे पिता को बहुत नहीं भाए थे-
कारण
सुराजी और कांग्रेसियो के साथ
उठक-बैठक जो थी उनकी
पंजा वाले बाद में
भले ही पेट कसाई निकले
पर सबसे पहले अपने बराबर
हरिजनों को बैठाना और खाना
शुरू किया था उन्होंने ही
भरा था भ्रम सबमें
एक आम-धारा में शामिल होने का
सो केवल अपना मसीहा
अपनी पार्टी
और अपने सुराज का
शंखनाद करने वाले-वे साइकिलिए
तुम्हारे पिताजी को
कुछ-कुछ स्वार्थी लगे थे
पर पहली बार कोई
उठ खड़ा हुआ था
अपनी बिरादरी से
हामी भरता था
सोई कोमजागाने और
उनके खोये अधिकार दिलाने का
तब विश्वास में आकर तुम्हारे पिता भी
और बिरादरी वालों की नाईं
वोट हाथी को ही देने लगे थे
जब देश पर एक छत्र शासन करने वाली
पार्टियों का सिंहासन डोला उठा
हमसे छुआछूत करने वालों के
वोट और कम हुए
तो समाज में हमारी
राजनैतिक पहचान और पक्की हो गई
अब उन्हें वोट दो या न दो
अन्य पार्टियाँ ने हम पर ठप्पा
‘हाथी वाले’ का ही लगा दिया था
उधर जिन्हें चिन्हित किया गया था
हमारे सनातन बैरी के रूप में
कुछ दिनों बाद ही बड़ी बेशर्मी के साथ
उनसे राजनैतिकगलबैयाँ और गठजोड़ शुरू हुआ
गठबंधन का यह घिनौना खेल
शुरू तो साइकिल वाले साहब के
समय मे ही हो गया था
पर इसकी इंतिहाँ तो
हाथी वाली बाई के समय में हुई
हत्यारों से एक बार हाथ मिलाने के बाद
उन्होंने बात तो सबकी की
पर जो सबका होता है
वो फिर किसी का नहीं होता
उन्होंने तथागत के जन्म के प्रतीक
अपने पार्टी के ‘हाथी निशान’ को
जब गणेश् व ब्रह्मा, विष्णु, महेश
कहना शुरू किया
तो तुम्हारे पिता का राजनीति से
रहा-सहा भरोसा भी उठ गया।
8.
मैया धरती होती है
और पिता आकाश
धरती का आँचल
और उसके बच्चे
हरे-भरे रहते हैं-
धीर-गंभीर पिता
की ही छत्रछाया में
जब धरती का आँचल
कठोर हो जाए
सूख जाएँ
उसके आद्र किनारे
तो सघन घन
आकाश सा पिता ही
सींचता है औलाद के
शुष्क मन का तीर
अपने ही पानी में घुलना
बर्फ़ की नियति है
और नवनीत का
अपने ताप मैं पिघलना
उसका औदार्य
हिमालय से कठोर और निर्विकार
पिता के मन में प्रवाहित हैं
कई अज्ञात गंगोत्रियाँ
तुम्हारे प्रति
बाहरी कठोर आवरण
सदैव सच नहीं होते
कच्चे दूध और मिसरी सा
नारियल मधुर
और माखन से मुलायम
अपने बाप के
हिरनाकुश् मन को
धीरज के साथ तुमने
टटोला होता कभी
तो ज़रूर पाते
उनकी अंतड़ियों में
अपने ही जैसा कोई
एक धौरा भगत।
1. अविजित रॉय (Avijit Roy) : बंग्लादेशी-अमेरिकी इंजीनियर, लेखक और ब्लागर थे, जो अपने ब्लॉग मुक्तो-मोना (Mukto-Mona) के लिये जाने जाते थे। जो स्वतंत्र विचारों, तर्कवादियों और नास्तिकों के लिए एक ऑनलाइन मंच था। उन्हें 2015 में ढाका में कट्टरपंथियों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई थी, क्योंकि वे अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के प्रबल समर्थक थे।
2. प्रोमोथियस : मनुष्यों के लिए देवताओं के घर से आग चुराने वाला यूनानी योद्धा। जिसके बारे में प्रसिद्ध है कि उसके इस कृत्य से नाराज होकर अपोलो महान ने उसे ओलंपियस पहाड़ पर बाँध दिया था। पहाड़ पर एक गिद्ध है जो झपट्टा मारकर दिनभरप्रोमोथियस की जाँघ का माँस नोंच-नोंच कर खाता है। शापित प्रोमोथियस का ज़ख़्म रात में फिर भर जाता है और सुबह वह गिद्ध उसकी जाँघ का माँस खाने को फिर तत्पर है।
3. ओरेस्ट (Orestes) : ग्रीक पौराणिक कथाओं और त्रासदियों खासकर एशेकिलस के नाटक ‘ओरेस्टिया’ कािक कथाओं और त्रासदियों का नायक । होमर के अनुसार उसने अपने पिता आर्गोस के राजा अगामेम्नन की हत्या का बदला लेने के लिए, अपनी माँ क्लाइटेमेनेस्टृा और उसके प्रेमी एजिथिसस की हत्या कर दी थी। यद्धपि उसके पिता की हत्या में उसकी माँ की भूमिका थी, फिर भी मातृहत्या का अपराध यूनानी नैतिकता का अपमान था। इसके बाद न्याय और प्रतिशोध की देवी फ़यूरीज़ ने उसका पीछा किया और उसे पागलपन और भ्रम की स्थ्िाति में ले गई। एथेंस की एक कोर्ट एरियोपैगस में उस पर एक लम्बा अभियोग चला। मुकदमें में उसके पक्ष और विपक्ष में बराबर वोट पड़े, तब न्याय की देवी एथना ने उसके पक्ष् में फैसला सुनाया था।
4. अइया : दादी
5. छेरी : बकरी
6. भिड़ाह : भेड़िया
7. धौरा भगत : लोक मान्यता है कि जब राक्षसराजहिरण्यकश्यपु का वध करने के बाद नरसिंह अवतार विष्णु बहुत देर तक उसकी अंतड़ियाँ टटोलते दिखे, तो उनके पास ही खड़े पिताद्रोही प्रहलाद ने द्रवित होकर पूछ ही लिया-‘प्रभु आप हमारे पिता का वध करने के बाद, अब उनकी अंतड़ियों में क्या टटोल रहे हो?’ तब नरसिंह ने जवाब दिया कि देख रहा हूँ कि कहीं इसके भीतर भी तेरे जैसा, मेरा कोई और भक्त तो नहीं छुपा बैठा…!’ कहते हैं कि नरसिंह को हिरण्यकश्यपु की अंतड़ियों में एक धौरा (धौले रंग का कबूतर/पंडुक) मिला था, जिसे पृथ्वी पर प्रहलाद से भी बड़ा विष्णु भक्त होने का वरदान प्राप्त है।
कवि जितेंद्र विसारिया
विभागाध्यक्ष – हिंदी विभाग
शासकीय एम.जे.एस. स्नातकोत्तर महाविद्यालय भिण्ड-477001 (म.प्र.)
मोबाईल : 9893375309
टिप्पणीकार रौशन कुमार, जन्म: 10/3/2001, अंगार घाट, समस्तीपुर, बिहार. शिक्षा: परास्नातक, राजनीति विज्ञान, जेएनयू
सम्पर्क: ईमेल: raushangope@gmail.com मोबाइल: 7481887348

