Wednesday, May 18, 2022
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चंद्रेश्वर की कविताएँ सरलता और संघर्ष को ज़रूरी जीवन मूल्य के रूप में बरतने का आग्रह हैं

कौशल किशोर


चंद्रेश्वर चार दशक से साहित्य सृजन में रत कवि, आलोचक और गद्यकार हैं। उनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘अब भी’ और ‘सामने से मेरे’ के बाद ‘डुमराँव नज़र आएगा’ हाल में आया है।

चंद्रेश्वर जन सरोकार के कवि हैं । इनकी कविताएँ हमारे लोकतंत्र से लोक के बेदखल हो जाने को सामने लाती हैं। ये कविताएँ  अपने समय की सख़्त क्रिटिक हैं। इनमें व्यंग्य गहरा है जो कविताओं को मारक और असरदार बनाता है साथ ही विचारहीनता के प्रति विरोध भी अभिव्यक्त करती हैं। ये समय में डूबी, उससे संवाद करती कविताएँ हैं। समय से टकराना चन्द्रेश्वर की विशेषता है और ये कविताएँ इसी प्रक्रिया में सृजित हुई हैं। देखें:

अब हत्यारे सिर्फ़
किसी निर्दाेष इंसान  की
हत्या ही नहीं करायेंगे
भीड़ से
उन्माद पैदाकर
वे शब्दों को भी मारकर
दफ़नाने के पहले
उन पर कानूनी चादर
ओढ़ा देंगे
सफ़ेद कफन

चंद्रेश्वर बताना चाहते हैं कि ‘लींचिंग’ के दायरे में सिर्फ इंसान ही नहीं तर्क, ज्ञान-विज्ञान, इतिहास, साहित्य, संस्कृति, शिक्षा आदि भी है। मुगलसराय  एक रेलवे स्टेशन का नाम भर नहीं है। उसके साथ सांस्कृतिक विरासत जुड़ा है। वे कहते हैं ‘अब जब सरकार/बदलने जा रही है/इस नाम को/तो इतिहास-संस्कृति का/एक बहुरंगी अध्याय/दफ़न होने जा रहा है’ और ‘यह महज़ एक शब्द की/सुनियोजित हत्या भर नहीं/एक संस्कृति की हत्या भी है’। इस तरह मुगलसराय से लेकर इलाहाबाद, फैजाबाद आदि के नामों में जो परिवर्तन किया गया या किया जा रहा है, उसके पीछे खास राजनीतिक मकसद है। यह इतिहास, संस्कृति व समाज के बहुलतावादी चरित्र को बदलना है। ऐसा करना संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या है। सुदीर्घ मानव संघर्ष से अर्जित मूल्य और संस्कृति निशाने पर है। वे कहते हैं –

यह एक ऐसी शताब्दी है
भीषण रक्तपात  की
जहाँ इंसान से भी ज़्यादा 
लहूलुहान  हो रहे
शब्द
मारी जा रहीं भाषाएँ
जिसे हासिल करने में
गुजर जाती हैं
शताब्दियाँ !

आलोचक आशुतोष कुमार का चंद्रेश्वर की कविताओं के संबंध में कहना है ‘वे प्रतिरोध और प्रेम के समकालीन कवि हैं। पढ़ने में उनकी कविताएँ जितनी सरल है लिखने में उतनी ही कठिन।’ चंद्रेश्वर के यहां सरल होना मानवीय होना है और इसीलिए मनुष्य विरोधी समय में सरल होना कठिन है। यहां सरलता जीवन मूल्य है। कठिन होना आज के समय में ओढ़ी हुई संस्कृति है जिसमें पाखण्ड है, धूर्तता है। चन्द्रेश्वर अपनी बात को  सादगी और सहजता से कहते हैं और यही उनकी काव्यकला है। वे अपने सृजन कर्म के द्वारा यह विश्वास दिलाते हैं कि जिस सामूहिक चेतना और साझा संघर्ष की राह पर हम हैं, उसका माध्यम हमारे शब्द हैं। वे शब्दों के सामर्थ्य में भरोसा जताते हैं। वह सरलता को महानता के समतुल्य प्रतिष्ठित करते हैं। कहते हैं

सरल होना किसी अपराधी, माफिया और डॉन के आगे
बिछ जाना नहीं…..
सरल होना मानवीय होना है
कुछ ज्यादा
सरल होना उतना ही कठिन है
जितना खींचना कोई सरल रेखा
सरलता ओढ़ी नहीं जाती
जैसे महानता!

चंद्रेश्वर की कविता के फलक में स्त्री जीवन की विडम्बना है, बदलाव की चाह है। वे कला को भी जटिलता व उलझाव में नहीं बल्कि सरलता-सहजता में देखते हैं। कला जनचेतना का माध्यम है। कैसा है वक्त और कैसी हो कला? वे कहते हैं ‘बिम्बो-प्रतीकों की श्रृंखलाएँ बनाने/गूढ़़ चिंतन करने/कला की बारीकियों में उतरने का/नहीं है यह वक्त/….अब बहुत कर लिया इंतज़ार हमने/यह वक्त कुछ कर गुजरने का है!’ यह दृष्टि उनकी प्रेम और प्रकृति पर लिखी  कविताओं में भी मिलती है। आज के हिंसक समय में प्रेम की कविता लिखना भी प्रतिरोध है। इनकी कविता में प्यार का रंग बहुत चटक और गाढ़ा है। यह मनुष्यता के रंग से सराबोर है। कहते भी हैं:

क्या प्यार के रंग में शामिल नहीं
सारे रंग दुनिया के
इसमें शामिल रंग गाढ़ा काला
सूफियों के लबादे का
शामिल इसमें बैनीआहपीनाला….!

वहीं, चंद्रेश्वर की कविता में प्रतिरोध का रंग और उसकी धार को देखा जा सकता है। आम आदमी के अन्दर की अदम्य संघर्ष क्षमता और साहस का उन्हें भरोस है, तभी तो कहते हैंः

एक मैना की चित्कार से
दरक सकता है अभेद्य किला
किसी पापी राजा का
एक बुलबुल की आह से
जा सकती है गद्दी
किसी आततायी महंत की।

चंद्रेश्वर की कविताएँ

1.सरल होना कठिन

सरल होना किसी अपराधी ,माफिया और डॉन के आगे
बिछ जाना नहीं

सरल होना अपना आत्म सम्मान
गिरवी रख देना नहीं

सरल होना गंदे नाले या गटर के पानी के साथ
बहना नहीं

सरल होना अगर धूर्त होने की छूट नहीं देता
तो बेवकूफ़ भी नहीं बनने देता

सरल होना मानवीय होना है
कुछ ज़्यादा
सरल होना उतना ही कठिन है
जितना खींचना
कोई सरल रेखा

सरलता ओढ़ी नहीं जाती
जैसे महानता !

2.बाबूजी का वन वे मोबाइल

बाबूजी का मोबाइल वन वे हो गया है
उधर से सिर्फ़ आवाज़ आती है उनकी
जिसमें शामिल है समय की थरथराहट
घबराहट और टूटती-लरजती हुई पुकार
वे कोरोना से बचने के लिए करते हैं जतन
पर जतन की अपनी सीमा होती है
वे मास्क से ऊब चुके हैं
वे ऊब चुके हैं सोशल डिस्टेंसिंग से
वे पहले की तरह चाहते हैं सबकुछ
वे अपने हमउम्र से मिलाना चाहते हैं
देर तलक हाथ
वे किसी शिशु का चूमकर माथा
जताना चाहते हैं अपना प्यार
वे अपनी दालान में चाहते हैं पहले की तरह
बिटोरना पाँच पंचों को
मँगाना चाहते हैं अख़बार फिर से
जिसे दिनभर पलटता रहता है
कोई न कोई
बाबूजी बोलते हैं तो
……बोलते ही चले जाते हैं
सुनना कुछ भी नहीं चाहते
वे खो चुके हैं धीरज
सुनने का
उनका मोबाइल वन वे हो चुका है
इधर कोरोना समय में !

3. पूरब-पश्चिम

पूरब के हैं हम
हर पश्चिम का होता है
एक पूरब
हर पूरब का होता है
एक पश्चिम

हम गहरा ताल्लुक़ रखते हैं
अपने पश्चिम से
हम जाकर बस जाते हैं
पश्चिम में
वहाँ रोज़ी-रोटी है हमारी

हम जीवन भर नहीं बिसरा पाते
तमाम सुखों के बाद भी
अपना पूरब
जिस दिन मरेगा हमारे भीतर का पूरब
मुर्दा हो जायेंगे हम
ज़िंदा ही

कई पीढ़ियों बाद भी
पहचान लिए जाते हैं हम
अपनी बोलचाल
भाव-भंगिमा ,रहन-सहन
खान -पान के चलते
जब पहचान लिए जाते हैं तो
धकिया दिए जाते हैं हम
हम बार -बार गिरकर भी
पोंछ लेते हैं अपनी
पीठ की धूल
हम छुपा नहीं पाते
अपने भीतर का शूल

हम कुछ रेघाकर बोलते हैं
हम कुछ गाकर बोलते हैं
हम बोलते-बोलते रो देते हैं
हम रोते-रोते हँस देते हैं

हम लड़-झगड़ लेते हैं
हम उधार चुका देते हैं
हम मलाल नहीं पालते
हमेशा के लिए

हम भावुक होते हैं ज़्यादा
दूर रहते हैं
महीन दाँव-पेंच से
हमारे चेहरे से ही पढ़ा जा सकता है
हमारा दिल
दिल टँका रहता है हमारा
हमारे चेहरे पर

पूरबिए करते हैं यक़ीन
सपाटबयानी में
वे करते है खोज
सरल मार्ग की

वे पसीना बहाने या
रक्त देने में अपना
नहीं रहते पीछे कभी
वे अपने हुनर से छा जाते हैं
क़स्बों से लेकर राजधानियों तक में

पश्चिम जितनी ही करता है
घृणा उनसे
वे ज़रूरत बनते जाते हैं
उनकी

वे न चाहते हुए भी
दिख जाते हैं अक्खड़
वे न चाहते हुए भी
बने रहते हैं सीधे

निर्गुण नस -नस में बसा है उनके
उसी में समाया हुआ है
उनका पीढ़ियों का दुःख
उसी में समाया है उनका
क़तरा भर सुख
उनकी मस्ती
क़तरा भर  !

4. डुमरॉव नज़र आयेगा

किशोरावस्था में सुना था
पहली बार
मुग़ल सराय  का नाम
एक मुशायरे में
जब भोजपुरी-हिंदी के हास्य रस के
कवि बिसनाथ प्रसाद श्शैदाश् ने सुनायी थी
अपनी एक कविता कि
ष्शैदा नज़र की रौशनी
बढ़ती है चाय से
डुमराँव नज़र आयेगा
मुगलसराय सेष्

अब जब सरकार
बदलने जा रही है
इस नाम को
तो एक इतिहास -संस्कृति  का
बहुरंगी अध्याय
दफ़न होने जा रहा है

यह एक कवि के द्वारा बरता गया
चाय और मुग़ल सराय के
तुक का मामला ही नहीं
यह महज़ एक शब्द की
सुनियोजित हत्या भर नहीं
एक संस्कृति की हत्या भी है
यह स्मृतियों पर गिराना है
कोलतार पिघला हुआ

अब हत्यारे सिर्फ़
किसी निर्दाेष इंसान  की
हत्या ही नहीं करायेंगे
भीड़ से
उन्माद पैदाकर
वे शब्दों को भी मारकर
दफ़नाने के पहले
उन पर कानूनी चादर का
ओढ़ा देंगे
सफ़ेद कफन

यह एक ऐसी शताब्दी है
भीषण रक्तपात  की
जहाँ इंसान से भी ज़्यादा
लहूलुहान  हो रहे
शब्द
मारी जा रहीं भाषाएँ
जिसे हासिल करने में
गुजर जाती हैं
शताब्दियाँ !

5. बैनीआहपीनाला

प्यार का रंग
कैसा होता है
क्या ख़ूब गाढ़ा लाल
ओढ़हुल के फूल की तरह

क्या ख़ूब गाढ़ा पीला
सरसों के फूल की तरह

क्या ख़ूब गाढ़ा नीला
अलसी के फूल की तरह

क्या ख़ूब गाढ़ा हरा
हरी मिर्च  की तरह

क्या ख़ूब गाढ़ा कत्थई
पके सेब की तरह

क्या ख़ूब झक्क सफ़ेद
चाँदनी की तरह

आख़िर कैसा होता है
रंग प्यार का

क्या रंग प्यार का
बैंगनी होता है

आसमानी होता है

नारंगी होता है

क्या प्यार के रंग में
शामिल नहीं
सारे रंग
दुनिया के

इसमें शामिल
रंग गाढ़ा काला
सूफियों के लबादे का

शामिल इसमें
बैनीआहपीनाला ……!

6..मुझे नइहर ले चलो

मेरा मन बसता है
नइहर में
मैं सो नहीं सकी हूँ
कई-कई साल
ससुराल में
मुझे दो-चार दिन के लिए ही सही
मगर ले चलो
ख़ूब गाढ़ी नींद आयेगी
सोऊँगी भर पेट
मुझे धूप नहीं मिली है
पीया नहीं पानी भी
छककर कभी

मैं सबेरे -साँझ घूमूँगी
अपने  बाबा के बगीचे में
एक -एक बिरिछ को सहलाऊँगी
चूमूँगी उन्हें

मुझे नइहर ले चलो
जहाँ बहती है गाँव के पूरब
एक  छोटी -पतली धार वाली नदी
कुम्हरी
नहाऊँगी उसमें
छपक -छपककर

मेरे नइहर की माटी में
उगे अन्न का
स्वाद ही कुछ और है
मुझे  ले चलो कि मैं चूम लूँ
नइहर की माटी
और भर लूँ अँकवार में
अपनी माँ को
कुँवारी बहनों से मिल लूँ
भाइयों की कलाइयों पर
बाँधू राखी
मना लूँ
भइया दूज का पर्व
घूम लूँ गाँव के मेले में
क्या पता हो जाये भेंट
अचानक
सखियों से  !

7. .काश! वह बेटा होती

एम.ए. पास उस औरत की फाइल में
कुछ भी नहीं रखा है
तरतीब से
जैसे उसकी याददाश्त

मूल प्रमाणपत्रों की जर्जर हालत
इस उम्र में भी वह कर रही है भागदौड़
नौकरी के लिए

मर्द घर में डराता -धमकाता है
बाहरी दुनिया का कर रखा है पैदा
आतंक
मानो बाहर दफ़्तरों में लोग नहीं
काम करते हों
बाघ,  भालू,  शेर या रीछ
इकट्ठे हों
चौक -चौराहों पर
गिद्धों के झुंड

अथाह ऊर्जा से भरी औरत चाहती है
मुक्ति सिर्फ़
रोटी-बेलन
चुल्हा -चौकी की सीमित दुनिया से

घर की चहारदीवारी से बाहर निकलकर
नथुनों और फेफड़ों में भरना चाहती है
भरपूर ऑक्सीजन

वह ससुराल में आने के बाद भी मरती है
मायके के लिए
बनना चाहती है
माँ -बाप के बुढ़ापे की लाठी
काश! वह बेटा होती

उसका पति पूरे मन से नहीं करता सहयोग
उसकी फाइल को कर देना चाहता है
गुम
जिसमें बसती है
उसकी जान !

8. बदलाव

कुछ जगहें या चीज़ें बदलती नहीं
जब देखो तब दिखतीं
यकसाँ
जैसे आगरे का ताज़महल

जैसे वह शिलाखंड
केन किनारे

जैसे वो स्मारक
एक राजा का
सुरेमनपुर में

जैसे वृंदावन की गलियाँ

जैसे काशी की मणिकर्णिका

जैसे हवामहल
जैसे जलमहल
जैसे किला आमेर का
जयपुर में

कुछ लोग भी होते ऐसे ही
जगहों या चीज़ों की तरह
जब मिलो उनसे
दिखते नहीं बदले
तनिक भी
वहीं पुरानी मनहूसियत
छाई रहती
काली बदली की तरह
उनके चेहरे पर

दुनिया चाहे जितनी बदल जाये
वे खूँटे की तरह रहते गड़े
अपने दरवाज़े के सामने की
ख़ाली ज़मीन पर

लाख बदलाव हो मौसम में
हेमंत हो या वसंत
वे खोए रहते अपनी ही किसी लंतरानी में

पत्थर भी सराबोर हो सकता
पानी से
हो सकता है रससिक्त
उगाई जा सकती
उसपर नरम-नरम दूब

यमराज भी हो सकते कृपालु
पर कुछ चेहरे बने रहते
भावहीन…
जड़वत…
मूर्तिवत…
जिनका कोई लेना-देना नहीं
आसपास की दुनिया से

ऐसी जगहों
ऐसे लोगों से मिलकर
नाउम्मीद होता मैं

बदलती जगहें
बदलती स्थितियाँ
बदलते लोग
बदलाव को स्वीकार करते लोग
अच्छे लगते मुझे

एक चिराग जल उठता
काँपते लौ वाला मेरे भीतर
उम्मीद का …!

9. बारहमासा

कम से कम जाड़ा जनवरी का
देकर जाता तज़ुर्बा
आग जलाने का

हम ठिठुरकर ही सही
पर याद कर लेते एकबार फिर
संविधान और गणतंत्र को भी

हर साल लौटती फरवरी
पीठ पर लादे गठरी
उदासी की…
सरकारी बजट का महीना भी यही

मार्च की आवारागर्दी
भारी पड़ती हर बार
परीक्षार्थियों के मनोबल पर

अप्रैल तो बनाता
मदहोश
गधों में भी भर देता
जोश
टप-टप टपकता
महुआबारी में
महुए के फूल जैसा

मई करती
सबको बेहाल
सोख लेती पानी
देह का

जून जानलेवा
दूना कर देता
हमारा दुःख
हत्यारा कहीं का

जुलाई ढिलाई करती
बेमतलब

अगस्त करता
पस्त
बाढ़-बारिश से
जबकि मिली थी
आज़ादी इसी माह
बिना खड्ग… बिना ढाल

सितंबर सितमगर रहा
शुरू से

अक्टूबर में मारा जाता
नक़ली दशकंधर
धुरंधर ज़बरदस्त

नवंबर खिल -बतासों -सा आता
खिलखिल करता…
जगमग करता…
अमानिशा को भी

दिसंबर दिल को दे जाता
पुरसुकून
दिन होने लगता
कुछ बड़ा
इसके आख़िर में जब हम
नए साल के स्वागत की तैयारी में
जुट जाते
दुनिया भर में !

10. ज़िंदगी

नींद बची है तो
बची है जवानी

शरारत बची है
तो बचा है बचपन

मस्ती बची है
तो बची है आज़ादी
बची हुई है आज़ादी
तो बचा है प्यार भी
अगर बचा हुआ है प्यार
ज़िंदगी में तो …
तो समझिए
बचा हुआ है सबकुछ
अब भी
आपकी ज़िंदगी में !

11. चंदू सिंह की शोकसभा

सबकुछ था पहले की तरह
इसबार भी

धूप थी खिली-खिली
गुनगुनी

कॉफ़ी की गरमागरम
चुस्कियाँ थीं
नमकीन काजू के साथ

नाच -गाना था
हँसी -ठहाके थे
मौज़- मस्ती थी

फूल-माले थे
बुके थे
ऊनी कोट थे
स्वेटर थे
शर्ट थे
मफलर थे रंग-बिरंगे

अंदर इनर थे
बाहर गनर थे
साथ में

डिनर था
सबसे अंत में
कुछ पहले
मध्य रात्रि के

चाँद था चौदहवीं का
आसमान में बेताब
बनने को पूरा गोल एकदम
मैदे की काग़जी रोटी की तरह

दारू की थीं कई क़िस्में
मचलती बोतलों में

सबकुछ था पहले की तरह
विगत वर्षों की तरह ही
नगर महोत्सव में
बस, नहीं था तो वो अपना
प्यारा फोटोग्राफ़र चंदू सिंह
जो हाल ही में गुज़र गया था
अचानक हृदयाघात से

जिसकी तस्वीरें टँगी रहतीं
राजमहल की ऊँची दीवारों वाले
शयनकक्षों से लेकर
बनिए की दुकानों और
कई स्कूलों-कॉलेजों तक के
प्रधानाचार्यों
प्राचार्यों के कक्षों में भी

फिर भी मेरी निगाहें
तलाश रही थीं
अपने उस प्यारे फोटोग्राफ़र चंदू सिंह को
जिसके गुज़रने की कमी
खल रही थी अब
सिर्फ़ उसके परिवार को
जिसके जाने के बाद
नगर में नहीं हुई थी
कोई शोकसभा !

12. अपना समय

कुछ बातें रंग और दम पैदा कर देती हैं
कल्पना में भी
मसलन, यह सोचकर ही कितना खूबसूरत लगने लगता है
अपना समय कि एक मैना की चीत्कार से
दरक सकता है अभेद्य किला
किसी पापी राजा का
एक बुलबुल की आह से जा सकती है गद्दी
किसी आततायी महंत की
एक गौरैया का फुदकना बाधित कर सकता है शिकार
किसी रक्तपायी शेर का
एक हंस की नीर-क्षीर-विवेक भारी पड़ सकता है
किसी हमलावर की अक्षौहिणी सेना पर भी
एक कबूतर के गुटर-गूँ से दब जा सकता है
क्रूर ठहाका किसी क़ातिल का
एक सताई हुई स्त्री के रोने से आयी
भयानक बाढ़ में
बह जा सकता है राज-पाट समूचा
किसी चौपट राजा का
यहाँ तक कि
अनीति से भरा कोषागार भी खर-पतवार की तरह
जल जा सकता है धू-धू कर!

(कवि चंद्रेश्वर, जन्मतिथिः   30 मार्च, 1960, गाँव – आशा पड़री
ज़िला — बक्सर (बिहार) लेखकीय जीवन के आरंभ से ही कई लेखक संगठनों से जुड़ाव रहा है।

उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग ,प्रयागराज से चयनित होने के बाद 01, जुलाई सन् 1996 से प्राध्यापन का कार्य आरंभ किया।

संप्रतिः वरिष्ठ एसोसिएट प्रोफेसर एवं  हिन्दी विभागाध्यक्ष,
एम.एल.के.पी.जी.कॉलेज,
बलरामपुर, उत्तर प्रदेश

हिन्दी की लगभग सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में सन् 1982-83 से कविताओं और आलोचनात्मक लेखों का लगातार प्रकाशन। अब तक छः पुस्तकें प्रकाशित। तीन कविता संग्रह – अब भी (2010), सामने से मेरे (2017), डुमराँव नज़र आयेगा (2021)।
एक शोधालोचना की पुस्तक ‘भारत में जन नाट्य आंदोलन’ (1994) एवं एक साक्षात्कार की पुस्तिका ‘इप्टा-आंदोलन: कुछ साक्षात्कार’ (1998) का भी प्रकाशन।

एक भोजपुरी गद्य की पुस्तक–‘हमार गाँव’ (स्मृति आख्यान) (2020 ) प्रकाशित।

शीघ्र प्रकाश्य एक भोजपुरी एवं दो हिन्दी की पुस्तकें —
1.आराः ओह घरी ( भोजपुरी में कथेतर गद्य )
2.‘हिन्दी कविता की परंपरा और समकालीनता’ (आलोचना),
3. ‘मेरा बलरामपुर’ (कथेतर गद्य)

पता- 631/58, ज्ञानविहार कॉलोनी,कमता–226028
लखनऊ
मोबाइल नंबर -7355644658

टिप्पणीकार कौशल किशोर, कवि, समीक्षक, संस्कृतिकर्मी व पत्रकार
जन्म: सुरेमनपुर (बलिया, उत्तर प्रदेश), जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में प्रमुख.
 लखनऊ से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘रेवान्त’ के प्रधान संपादक। 
प्रकाशित कृतियां: दो कविता संग्रह ‘वह औरत नहीं महानद थी’ तथा ‘नयी शुरुआत’। कोरोना त्रासदी पर लिखी कविताओं का संकलन ‘दर्द के काफिले’ का संपादन। वैचारिक व सांस्कृतिक लेखों का संग्रह ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ तथा ‘शहीद भगत सिंह और पाश – अंधियारे का उजाला’ प्रकाशित। कविता के अनेक साझा संकलन में शामिल। 16 मई 2014 के बाद की कविताआों का संकलन ‘उम्मीद चिन्गारी की तरह’ और प्रेम, प्रकृति और स्त्री जीवन पर लिखी कविताओं का संकलन ‘दुनिया की सबसे सुन्दर कविता’ प्रकाशनाधीन। समकालीन कविता पर आलोचना पुस्तक की पाण्डुलिपी प्रकाशन के लिए तैयार। कुछ कविताओं का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद।  कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन।
मो – 8400208031)

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