Monday, October 3, 2022
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भरत प्रसाद की कविताएँ: यह शरीर जो कारागृह है घोंट रहा मेरा पक्षीपन

आशीष त्रिपाठी 


                                                                       

भरत प्रसाद कवि हैं । कवि होने की सभी शर्तों को पूरा करते कवि । उनकी कविताओं की दुनिया घर से बाहर, अंतरंग से बहिरंग तथा भाव से विचार तक फैली है। वे सहज ही इनके बीच आवाजाही कर सकते हैं। उनकी कविताएँ समकालीन कविता की मुख्य धारा के सहजबोध के निकट हैं। एक प्रकार से यह सहजबोध उनकी कविताओं की आधार भूमि है। कहना न होगा कि उनकी कविता का वृत्त समकालीन कविता के महावृत्त के भीतर सहज ही समा जाता है।

भरत जी की कविताओं में न ठोस वृत्तान्त हैं, न चित्र, न कथा। उनकी कविताएँ प्रायः कथन  की कविताएँ हैं। इनका वाचक प्रायः ‘मैं’ है, जिसे कवि से अभिन्न ही मानना चाहिए। ये कथन सामान्यतः दृश्य, परिस्थिति, व्यक्ति या घटना की व्याख्या करते हैं। इनमें कवि की संवेदनशीलता और वैचारिकता अंतर्ग्रथित है। यह भी सहज ही स्पष्ट है कि यह वैचारिकता प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष-लोकतान्त्रिक विचार परंपरा में विकसित हुई है। शांत और धीरज भरे कवि स्वभाव से उपजी इन कविताओं में जागरूकता, समाज-उन्मुखता, वंचित-पक्षधरता और अन्याय विरोध के उदाहरण बहुतायत से उपस्थित हैं, परंतु कहीं कहीं हम कवि को आक्रोशित मुद्रा में भी देखते हैं। यह आक्रोश समाज से भी है और व्यवस्था से भी। आक्रोश सामान्यतः सूक्ष्म रूप से प्रकट होता है, परंतु कभी कभी वह सपाट होकर कोसने में बदल जाता है। वाल्मीकि से होते हुए भरत प्रसाद तक आया यह कोसना अन्ततः कला ही माना जाएगा। ‘अबोध आंसुओं की पटकथा’ एक ऐसी ही कविता है, जिसमें प्रतिदिन हत्या और बलात्कार की शिकार बन रही बच्चियों और बच्चों के हत्यारों को कवि उन्हीं की ओर से एक भावमय श्राप देता है-

‘मेरे नन्हें दिल से उठती हुई हाय /  छेद डालेगी तुम्हारी अंतरात्मा /  भाग लो अपने आपसे भी / मेरी मौत की विकट हूक /  काल बनकर पीछा करेगी / छिप जाओ चाहे कहीं भी / मिट्टी बन चुकी मेरी मासूम हड्डियों से / तुम्हारे पुराने अन्धकार के खिलाफ / अनहद पुकार उठेगी / सदियों तक …सदियों तक …..  |’

आक्रोश के पीछे अन्याय के प्रति प्रतिकार और अन्याय भोगने वाले के प्रति गहरी करुणा है।

 करुणा की मुखर अभिव्यक्तियाँ भरत जी की कविताओं में मौजूद हैं। कभी कभी करुणा के पीछे कोई ठोस वजह होती है – आमतौर पर अन्याय की कोई घटना । परंतु कभी कभी समय और समाज व्यवस्था में पैबस्त अन्याय द्रव रूप में मन पर दबाव डालते हैं। ऐसे में मन भीतर ही भीतर दुख और विषाद से भर जाता है और बिना किसी ठोस वजह के छलक पड़ता है। ऐसी ही परिस्थिति को प्रभावी तरीके से अभिव्यक्त करती है कविता ‘आँसू की बस एक बूंद’। कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ इस प्रकार हैं : ‘क्या  हो गया है आँखों को आजकल ? / सीमायें तोड़ने को बेताब रहती हैं, हर पल / जब देखो तब बरसना ही चाहती हैं धारासार / इन दिनों’ । इस भाव दशा में ‘किसी को नहीं सुनाई देती चीख / पर दसों दिशाएं नाकाफी हैं / हमारी चीत्कार समेटने के लिए |’

इसके पीछे ठोस कारणों के साथ कुछ अमूर्त परिस्थितियाँ हैं  । इन परिस्थितियों को इस काव्यात्मक वर्णन से समझा जा सकता है :

घुल –मिल गयी है उसमें 
मृत्यु के पूर्व गुलाम मुर्गियों की चीख 
गर्दन उतरने से पहले 
उनकी कातर निगाहों की अहक 
सारी पृथ्वी के जानवरों की थरथराहट 
तयशुदा हत्या के भय से नाचती 
एक –एक सुअर की पुकार 
यहाँ तक कि 
टुकड़े –टुकड़े में ऐंठते हुए 
मामूली केंचुए की चुप्पी भी |

कवि का मन स्वाभाविक रूप से सारे संसार को अपनाता है, इसीलिए उसे सिर्फ मानवीय जीवन के ही दुख नहीं व्यापते, बल्कि वनस्पतियों-जीवों-जंतुओं के अनकहे दुख भी उसके मन को करूणा से भर देते हैं । ऐसे में ‘ पोर –पोर से सूखा हुआ / छोटा –बड़ा कोई भी दरख़्त / सूखसाख कर मिट्टी होने को विवश / मिट्टी से बेतरह चिपकी हुई घास / गिरने से पहले / कंकाल पत्तियों का खामोश कम्पन / आँसू उमड़ने के लिए बहुत काफी है |’

संवेदनशीलता और परदुखकातरता का यह रूप समकालीन दुनिया में लगभग असंभव है। पूंजीवाद ने अपनी क्रूरता से मनुष्य को उसे गढ़ने वाली सभी परस्परताओं से विलग कर एक तरह के आत्म-कारागार में डाल दिया है। भरत प्रसाद जैसे कवि-कलाकार-संवेदनशील लोग आत्म संघर्ष से खुद को इस प्रक्रिया से बचाए रख पाते हैं। 

भरत जी की कविताएँ प्रायः कथन  की कविताएँ हैं। इन कथनों में कभी कभी आंतरिक भावनाओं और विचारों का एक प्रकार का आरोपण भी देखा जा सकता है। ये भावनाएँ और विचार जीवन-जगत तथा समय-समाज के अनुभवजन्य अनुमानों से उपजते हैं। वस्तुतः ये अनुमान हमारे दैनंदिन जीवन का अनिवार्य हिस्सा हैं, इसीलिए वे कविता और कला की दुनिया तक सहज ही चले आते हैं। ‘ईंटवाली’, ‘अबोध आंसुओं की पटकथा’ और ‘अवाक हूँ मैं’, ‘मृतक का कबूलनामा’ और  ‘मैं भारत का मुसलमान हूँ’ ऐसी ही कविताएँ हैं।  इन कविताओं के समानांतर निजी अनुभवों से उपजी ऐसी कविताएं भी हैं जिनमें विशिष्ट अनुभव व्यक्त हुए हैं। ‘पिता का न होना’ ऐसी ही कविता है। भारतीय समाज मूलतः पारिवारिक समाज है।  भारतीय व्यक्ति का जीवन परिवार से बंधा होता है। कवि पिता की अनुपस्थिति में उन्हें याद करता है :

पिता यादों में दहकती हुई
तन्हा परिश्रम की पावन आग हैं 
चौबीस घंटे बिना कारण बरसती
अनगढ़ मोह की अनादि धारा
ऐसा रहस्यमय अध्याय
जो चट्टान पर खुदी हुई प्राचीन भाषा की तरह
अमिट है आत्मा में।

पिता की अनुपस्थिति ‘किसी आदमीनुमा आसमान का विलुप्त होना’ और ‘आंखों को दिशा देने वाली / सबसे समतल राह की विदाई है।‘ इन काव्यात्मक अभिव्यक्तिओं को कोरी भावुकता कहकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता । यह समझना भी ज़रूरी है कि ये खालिस निजी अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं । ये निजी वृत्त की पारंपरिक अभिव्यक्तियाँ हैं । ये अभिव्यक्तियां वस्तुतः भारतीयता के मूल आधारों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं । 

इसी कविता में कवि जब कहता है पिता ‘चट्टान पर खुदी हुई प्राचीन भाषा की तरह / अमिट हैं आत्मा में।‘ तो कवि की कविताई की विशिष्टता की और हमारा ध्यान जाता है । हमारा ध्यान सहज ही इस और जाता है कि कविता भाषा की विशिष्ट भंगिमा है । यह ठेठ गद्य के बीच भी हो सकती है और कविता कही जाने वाली विधा के भीतर भी । समकालीन कविता परिदृश्य में ऐसी कविताओं की संख्या बहुत बड़ी है जो सम्पूर्णता में कविता नहीं बन पातीं पर उनके कुछ हिस्सों में कविताई चमक मौजूद होती है । भरत जी की कविताओं में भी ऐसे हिस्से और पंक्तियाँ बहुतायत से मौजूद हैं : 

  • यह शरीर जो कारागृह है/ घोंट रहा मेरा पक्षीपन।

 

  • पृथ्वी के पैरों में कांटे चुभ गये हैं/ लड़खड़ा कर नाचती हो जैसे, / सूर्य की परिक्रमा करते हुए

 

  • क्या संगीत रचती हुई वर्षा/पानीदार पृथ्वी पर/ जीवन रचने का जादू नहीं?

 

  • स्वप्न है उस जनतंत्र का/जिसमें गिरे हुए पत्तों की खामोशी/ हमारी सांसों की नींव के रूप में/ दर्ज हो युगों-युगों तक/ संविधान की धारा की तरह !

 

भरत प्रसाद की कविताओं से गुज़ारना कविता की भारतीय राह से गुज़ारना है ।

 

भरत प्रसाद की कविताएँ

1. अघोषित विश्वयुद्ध

दिशाओं के पोर-पोर  में

अपूर्व  भय का सन्नाटा नियति की तरह,

दिखाई कुछ भी नहीं देता,

सिवाय विदा लेती अपनों की  आंखों के

भरोसा उठता जा रहा कल की सुबह से!

बेखौफ है, केवल पक्षियों की उड़ान

जिन्हें  मृत्यु की कोई खबर नहीं,

सारी हरियाली जैसे सहमी हुई

मानो आहट मिल गयी हो 

किसी अघोषित विश्वयुद्ध की!

पृथ्वी के पैरों में कांटे चुभ गये हैं

लड़खड़ा कर नाचती हो जैसे, 

सूर्य की परिक्रमा करते हुए,

आदमी भविष्य के आगे इतना विवश कभी नहीं रहा,

कभी नहीं हुआ इतना  स्वप्नविहीन

आजकल की रातों  के पहले!

 

2. अनपढ़ चेहरों की पुकार है!

एक कसक जो सुलग उठी है

रह – रहकर चिंगारी जैसी

सोया अंतर मथ जाती है

लघुता के तनाव की पीड़ा।

बहरापन यूं भरा हुआ है

सुनता हूँ कुछ पत्थर जैसा

कायर आंखें कहाँ देखतीं?

पृथ्वी के घावों को अपलक।

चारों ओर बरसती ऋतुएं

बौनेपन की ग्लानि जगातीं

मिटने का आहृवान करतीं

यह शरीर जो कारागृह है

घोंट रहा मेरा पक्षीपन।

बीते चेहरे चमक उठे हैं

सिमटी दुनिया आह जगाती

अकथ कीमती अटपट बानी

अद्भुत था अनगढ़ भदेसपन

राग उन्हीं का,रंग उन्हीं का

सांस -सांस संगीत उन्हीं का।

अंग-अंग जो अहक उठी है

महामोह की अंतर्ज्वाला

बेलगाम हो नाच रही है

अनपढ़ चेहरों की पुकार है

अंसुआ आंखों की गुहार है!

 

3. अवाक् हूँ मैं !

हमने तुम्हारी आँखों से

सिर्फ़ दुलार पाने का सपना बुना था

मेरे लिए तुम्हारी हर पुकार

प्रार्थना में झुक जाने से कम मोहक नहीं थी

हमने जब-जब पुकारा तुम्हारा नाम

खिल गया हृदय किसी दरख्त की छाया पाकर

हमारी मासूम नींदों में,

अपनों जैसे तुम्हारे लिए

आदर बरसता था,यकीन की सुगंध बनकर

हमारी विमल आत्मा ने

तुम्हारे जटिल मौन की मार पर

संदेह करना सीखा ही नहीं

प्यार देने के पीछे घात लगाकर बैठे

तुम्हारे शिकारीपन की पहचान करना

कल्पना से बाहर की कल्पना थी।।

सांस दर सांस अवाक् हूँ मैं

इसलिए नहीं कि

नोंच डाला तुमने,

तुम्हारे सम्मान से भरा हुआ शरीर

इसलिए भी नहीं कि

हवश का खूनी खेल जारी है-बेलगाम

खुद से कोई घृणा नहीं

निर्दोष बचपन लुट जाने के बावजूद।।

अवाक् हूँ सिर्फ़ इसलिए

अपनों की छाया से दाग बरसने लगे हैं

आदमी कहलाना आजकल

मनुष्य होने पर सबसे भयावह प्रश्नचिन्ह है

विश्वास करना जैसे दंड हो-भावुकता का

बचपन को जीना

जैसे यातना के तीखे अंधकार में

भटकती हुई सदियों की चीख हो।।।

 

4. आँसू की बस एक बूँद 

 क्या  हो गया है आँखों को आजकल ?

सीमायें तोड़ने को बेताब रहती हैं ,हर पल 

जब देखो तब 

बरसना ही चाहती हैं धारासार 

इन दिनों –

घुल –मिल गयी है उसमें 

मृत्यु के पूर्व गुलाम मुर्गियों की चीख 

गर्दन उतरने से पहले 

उनकी कातर निगाहों की अहक 

सारी पृथ्वी के जानवरों की थरथराहट 

तयशुदा हत्या के भय से नाचती 

एक –एक सुअर की पुकार 

यहाँ तक कि 

टुकड़े –टुकड़े में ऐंठते हुए 

मामूली केंचुए की चुप्पी भी |

 पोर –पोर से सूखा हुआ 

 छोटा –बड़ा कोई भी दरख़्त 

 सूखसाख कर मिट्टी होने को विवश 

 मिट्टी से बेतरह चिपकी हुई घास 

 गिरने से पहले 

 कंकाल पत्तियों का खामोश कम्पन

 आँसू उमड़ने के लिए बहुत काफी है |

आत्मधिक्कार के मारे धंस जाती हैं आँखें 

अपने ही सीने में 

समय के तराजू पर औरत को तौलते ही 

बच्चियों पर सोचने का 

जैसे हमने अधिकार ही खो दिया हो 

कलेजा मुंह को आता है 

इन पौधों का भविष्य सोचकर |

यूँ तो रोता नहीं 

पर यह दर हकीकत है –दिनरात की 

यूँ तो गिरते नहीं आँसू

पर बंद ही कब रहते हैं ?

किसी को नहीं सुनाई देती चीख 

पर दसों दिशाएं नाकाफी हैं 

हमारी चीत्कार समेटने के लिए |

कहाँ –कहाँ , कब –कब 

कितनी बार गिरे आंसू 

कुछ याद नहीं 

फिर भी अटकी ही रहती है सदा 

दोनों आँखों में 

बस एक –एक बूँद |

 

5. एक-एक बूंद जी लेने दो!

जो बूंदें कायनात से जमीन पर गिरीं

उसे सृष्टि का अमृतरस कहूँ

या शीतल सौंदर्य की सौगात?

जो हरियाली की परिभाषा लिखती हैं

उसे बरसता हुआ आश्चर्य कहूँ

या प्राणों को बुनता हुआ शिल्पकार?

 

कैसे लिख दूं कि वर्षाऋतु

आती-जाती हुई , सृष्टि की घटना है

वह क्या जीवन भर उमड़-घुमड़ कर

सुख-दुख का रूपक नहीं रचती?

आखिर कौन बरसता है यादों के एकांत में

मौन मोह के आँसू बनकर?

क्या संगीत रचती हुई वर्षा

पानीदार पृथ्वी पर

जीवन रचने का जादू नहीं?

 

बूंदों को भर आँख पी तो लूं

जो मिट-मिटकर जड़ों में जान लाती हैं

मिट्टी में मिलकर आदतन

उसे आदर देती हैं माँ होने का!

सांसों के रास्ते फिर-फिर लौटती हैं

हमारे होने का अर्थ बनकर।

 

बारिश की एक – एक बूंद हमें जी लेने दो

किसी का जी जुड़ाने के लिए

चुपचाप मिट जाने का रहस्य

पता तो चले!

 

6. ईंटवाली

पेट भरने का सपना
मृग मरीचिका की तरह नाचता है
अधकचरी हड्डियाँ हार खा-खाकर
असमय ही मजबूत हो चुकी हैं
आँखों में,
न बचपन जीने की ललक
न प्यार-दुलार की प्यास
न ही माई-बाप,
खो देने वाले आँसू-
बची है तो बस
भूख से लड़ने की सनक,
आबरू बचाते फिरने की चिन्ता,
अकेले जीने-मरने की बेवशी
और, मार खा-खाकर भी
अभी न मरने की भूख।
पौधे की तरह शरीर
कठपुतली की तरह नाचती है
पैर हैं कि फिरकी
थक-थककर, थकना जानते ही नहीं
हाथ हैं कि टहनियाँ
जिसने काम के आगे झुकना ही नहीं सीखा ;
जन्मी तो बिटिया ही थी
गरीबी ने उसे बेटा बना दिया
लड़की होकर जी पाना उसे कहाँ नसीब ?
मासूमियत का रंग, अंग-अंग से गायब है,
मजबूरी की मार खा-खाकर
बचपन ने कब का दम तोड़ दिया,
प्रतिबन्धित है उसके लिए
युवती होने के सपने देखना
आकाश-पाताल के बीच
वह किस पर विश्वास करे,
कुछ समझ में नहीं आता
आजाद पंक्षी की तरह उड़ने की चाह
शरीर के किस-किस कोने से उठती होगी,
कौन जाने ?
लोगों की जुबान से उसका असली नाम गायब है,
मजदूर है इस कदर कि
जिन्दा रहने की पहचान ही गायब है
मान-सम्मान, इज्जत-आबरू छिन जाने के बावजूद
बची हैं तो दोनों कलाइयों में
रंग-बिरंगी चूड़ियाँ
जिसे माई ने अपने हाथों पहनाया था।

 

7. सत्य बजता है।

न जाने कितने अनमोल सत्य
बज रहे हैं सृष्टि में
जिन्हें देख नहीं पाता, छू नहीं पाता
जिसकी पदचाप सुनता हूँ निरन्तर
जिसका अर्थ, गूंजता रहता है भीतर
रंगों के दायरे से बाहर है जिसका रंग,
मन ही बूझता है जिसके स्वाद का सुख
निःशब्द कर देता है
जिसकी आभा का जादू ;
दिल के दरवाजे पर देते हैं दस्तक
बुलाते हैं, डाँट-डपट कर उठाते हैं
अंग-प्रत्यंग आन्दोलित करते हुए
आत्मा में बिजली की तरह चमक कर
न जाने कहाँ गायब हो जाते हैं ?
हँसता हूँ आँखों की दृष्टि पर
बुद्धि पर रोने का मन करता है
यंत्रवत् धड़कते मांस के टुकड़े का क्या करूँ ?
खाली और खोखला हूँ
मरा हुआ बेतरह।

ले, छीन लो मेरा सुख
छीन लो चैन-ओ-सुकून
राख कर दो डिग्रियाँ
जला डालो सफलताएँ
जितना चाहे नकार दो मुझे ;
बस छककर पी लेने दो
अनंत अलक्षित मर्म,
जी भरकर जी लेने दो मौन सत्ता का मूल्य
तनिक गुनगुनाने दो न ! सृष्टि का संगीत
मुझे सुनने दो बजते हुए सत्य-
फिर चाहे मिटा दो मेरी पहचान
चाहो तो ले लो……………..।

 

8. कहाँ हैं जीवन की जड़ें?

पुकारता हूँ आज

मेरे जीवन की जड़ें कहाँ हैं?

धरती चुप है,पानी भी मौन

प्रकाश बस चमक रहा है

सारे अन्न सन्नाटा खींच लिए हैं

सवाल माता-पिता के चरणों में

आश्चर्य! यहाँ भी कोई उत्तर नहीं

भागता हूँ, पूछता हूँ, खटखटाता हूँ पृथ्वी फिर-फिर

मेरे जीवन की जड़ें कहाँ हैं?

कौन है मेरे होने का प्रथमतम कारण?

मिट्टी, पानी,रौशनी, पूरी कायनात

सारे के सारे माता-पिता

चुपचाप सिर झुकाए हुए

बुदबुदाते हैं लगातार सूर्य! सूर्य!सूर्य!

 

 

 

कवि भरत प्रसाद, जन्म : 25 जनवरी, 1970 ई. ग्राम हरपुर ,संतकबीरनगर (उ.प्र.)

आलोचना :
 1.कविता की समकालीन संस्कृति
2.बीहड़ चेतना का पथिक:मुक्तिबोध
3.प्रतिबद्धता की नयी जमीन
4. बीच बाजार में साहित्य
5.सृजन की 21वीं सदी
6.देसी पहाड़ परदेसी लोग (पुरस्कृत ) 
7. नयी कलम : इतिहास रचने की चुनौती |
8. चिंतन की कसौटी पर गद्य कविता।

पुस्तिका : भारत एक स्वप्न

(साहित्येतर वैचारिकी)
संवेद – 126
जुलाई-2022ई.

काव्य संग्रह:
1.एक पेड़ की आत्मकथा
(पुरस्कृत )
2.बूंद बूंद रोती नदी
3.पुकारता हूँ कबीर
4. समकाल की आवाज़ : भरत प्रसाद
【 चयनित कविताओं का संकलन】

कहानी संकलन:
1.और फिर एक दिन (पुरस्कृत )

2. चौबीस किलो का भूत ।
 
विचार परक कृति: कहना जरूरी है।

 सम्पादित पुस्तकें :
1. बचपन की धरती: धरती का बचपन-2021 ई. , अमन प्रकाशन-कानपुर।
2. प्रकृति के पहरेदार – 2021 ई.
अनन्य प्रकाशन-नयी दिल्ली।
3. कहानी की नयी सदी-2021 ई.
नेशनल पेपर बैक, नयी दिल्ली।

■पुरस्कार :
१. मलखानसिंह सिसौदिया कविता पुरस्कार  : 2014 ई.
२. युवा शिखर  सम्मान-2011(शिमला)
3.अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कार -२००८ ई. सहित पांच साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित।
 
■हिंदी साहित्य लगभग सभी प्रमुख पत्रिकाओं में कविताओं,लेखों और कथा साहित्य का निरंतर प्रकाशन|
 

 प्रधान संपादक : पूर्वांगन –ई-पत्रिका तथा सम्पादक : देशधारा : वार्षिक साहित्यिक पत्रिका।
 
सम्प्रति :   प्रोफेसर, हिंदी विभाग
पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय ,शिलांग – 793022, (मेघालय)
मेल:deshdhar@gmail.com
मो.न. 09774125265
09383049141

टिप्पणीकार आशीष त्रिपाठी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं। जाने माने कवि और आलोचक हैं। सम्पर्क: 09450711824

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