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जन मुद्दों पर फिल्म निर्माण और प्रदर्शन का तंत्र बनाने का संदेश दे गया 11वां पटना फिल्मोत्सव

अंतिम दिन बच्चों की फिल्में दिखाई गईं और नाटक ‘नया सत्य’ का मंचन हुआ
पटना. हिरावल-जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय प्रतिरोध का सिनेमा: पटना फिल्मोत्सव का आखिरी दिन बच्चों के नाम रहा और अंत में विश्वप्रसिद्ध कथाकार और नाटककार अंटोन चेखव की बहुचर्चित कहानी ‘वार्ड नंबर-6’ पर आधारित ‘नया सत्य’ नामक नाटक की प्रस्तुति हिरावल द्वारा की गई।
बाढ़ के अनुभवों और उसके कारणों को दर्शाया पटना के नई पी़ढ़ी के फिल्मकारों ने
दी अननोन सिटी: माय ओन सिटी फ्लेडेड’ के प्रदर्शन से हुई आखिरी दिन की शुरुआत
आज फिल्मों के प्रदर्शन की शुरुआत ‘दी अननोन सिटी: माय ओन सिटी फ्लेडेड’ के प्रदर्शन से हुई, जो पिछले बरसात में पटना की त्रासदी पर प्रियास्वरा भारती, प्रियांतरा भारती व अभिनंदन गोपाल के निर्देशन में बनाई गई थी। खास बात यह थी कि तीनों निर्देशक स्कूल या कालेज के छात्र हैं। फिल्म के आरंभ में रोजमर्रे के जीवन के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जोड़ने के तर्क के साथ बाढ़ के कारणों के बारे में विचार किया गया है। फिल्म बताती है कि बाढ़ के लिए प्रकृृति को दोष देने की हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए। फिल्म यह भी बताती है कि दो दशक पहले तक देश की ज्यादातर नदियाँ अविरल थीं। बहती नदी में खुद को साफ करने और गहराई बनाए रखने की क्षमता होती थी। लेकिन अब यह क्षमता धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई है। अब बारिश एकाएक तेजी से होती है और बन्द हो जाती है जिसके कारण पानी सड़कों पर बहता नजर आता है। जमीन के कांक्रिटाइजेशन बढ़ने से पानी जमीन के अन्दर नहीं जा पा रहा और बाढ़ को विकराल रूप दे रहा है।
इस फिल्म में बाढ़ में घिरे हुए बच्चों के अनुभवों का जो रोजनामचा-सा है, वह बेहद प्रभावशाली लगा है। दूसरी रात के अनुभव इस तरह आते हैं- हम फर्श पर बिछे गद्दे पर आंखें मूंदे नींद को बुलाने की कोशिश कर रहे थे टिकटिकी  दीवार पर टंगी थी। 6:30 बज रहे थे। चारों तरफ अंधेरा था और रात जल्दी आ गई थी। हमारा एक कमरा जिसका एक कोना कीचेन था। वहां माचिस के डब्बे को छोड़कर सब कुछ खाली था दूसरा कोना पूजा घर था। वहां पर प्रसाद खत्म हो गया था। सब चुपचाप थे। खिड़की के शीशे पर बूंदे सर पीट रही थी। मुझे नाक में लिट्टी और चोखे की महक आ रही थी। मैं नाकाम कोशिश करता रहा, नींद नहीं आ रही थी। नीचे घर के बरामदे तीन कुत्ते थे। वे कुछ देर रह रह कर रोते थे। माँ कहती है- भूखे है इसलिए।
ये अनुभव बेहद काव्यात्मक और मर्मस्पर्शी लगे। घरेलू चीजों का अभाव, महामारी का यथार्थ और बचाव के तरीकों को यह फिल्म बखूबी पेश करती है। बाढ़ को लेकर लोगों को सचेत करने और बाढ़ के अपने अनुभवों को प्रभावशाली तरीके से दर्शकों तक पहुंचाने में यह फिल्म सफल रही। निर्देशकों ने भविष्य की संभावनाओं का परिचय दिया।
सिकंदर: कुत्ते के बच्चे और मनुष्य के बच्चों के बीच के प्यार को दर्शाती फिल्म
प्रसिद्ध निर्देशिका सईं परांजपे की फिल्म ‘सिकंदर’ आज की दूसरी फिल्म थी। इस फिल्म में चार बच्चों को कुत्ते का एक बच्चा मिलता है, जिससे उन्हें प्यार हो जाता है। वे उसे अपने घर ले जाते हैं, लेकिन माता-पिता को पालतू जानवर रखने की बात नहीं पसंद आती। वे उससे दूर नहीं जाना चाहते हैं और चोरी-छिपे उसका खयाल रखते हैं। इससे उन्हें बहुत सारी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है, जिससे कई मजेदार वाकये सामने आते हैं। अंततः, उन्हें अहसास होता है कि वह खुद से इस बच्चे का खयाल नहीं रख सकते और यह सोच वे उसे अपने किसी दोस्त को दे देते हैं।
एक कुम्हार ने सुनाई अपने गदहे को राम कहानी
सामने आई समाज के मुंह पर तमाचा मारने वाली फिल्म
अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में आए फैसले के बीच डाॅक्यू-फिक्शन फिल्म ‘मेरा राम खो गया’ चर्चा का विषय बन गया। इसमें एक गरीब कुम्हार अपने गदहे को राम कहानी सुनाता है। दरअसल यह कहानी नहीं, उसके जीवन की पीड़ा है। इस फिल्म में अपने-अपने भगवान के लिए सामाजिक कुप्रथाओं और ऊंच नीच के भेदभाव का दंश झेल रहे गरीब और पिछड़े वर्ग की पीड़ा को मार्मिक अंदाज़ में उठाया गया है। कैसे लोगों को जात-पांत अमीरी-गरीबी और सवर्ण-दलित के आधार पर भगवान से दूर रखा जाता है। उन्हेें मंदिर में आने की मनाही होती है। मंदिरों में छप्पन भोग चढ़ाए जाते हैं लेकिन भूखों को खाने को रोटी तक नसीब नहीं होती है। सारी ज़िन्दगी फटेहाल गुजर जाती है। इस फिल्म में ऐसे ही विषयों पर गहरा कटाक्ष किया गया है। इस फिल्म को निदेर्शित किया था प्रभाष चंद्रा ने। प्रभाष ने बातचीत में बताया कि यह फिल्म कलाकारों की एक चर्चित संस्था प्रतिरोध का सिनेमा देश भर में दिखा रही है। पिछले दिनों इसे नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के अलावा तमाम स्कूल-काॅलेजों में दिखाया गया। फिल्म को एशियन फिल्म फेस्टिवल, लिफ्ट ऑफ़ फिल्म फेस्टिवल यूके के अलावा कई अन्य फेस्टिवल में सराहा जा चुका है। इस फिल्म को अब लाॅस एंजलिस फिल्म फेस्टिवल में दिखाया जाएगा।
प्रभाष चंद्रा बताते हैं कि दुनिया भर में वाल्मीकि और रामचरित के अलावा 300 से ज्यादा रामायण प्रचलित हैं। सरल भाषा में कह सकते हैं कि राम के 300 स्वरूप प्रचलित हैं। यह फिल्म राम की असली आइडियोलाॅजी को समझने की कोशिश है। राम कौन हैं, कैसे हैं और क्या हैं, यह फिल्म इसी विषय को उठाती है। राम के जरिए हमने लोगों की पीड़ाओं को भी उठाने की कोशिश की है। यानी लोग राम को मानते हैं, लेकिन उनके भक्तों को उनकी हैसियत जात-पांच, ऊंच-नीच और अमीरी-गरीबी के हिसाब से तवज्जो देते हैं। कहानी तीन मुख्य किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। तीनों दोस्त हैं – इन्दू (सुकीर्ति खुराना) सोशल वर्कर हैं। एक मुसिलम युवक साहिर (अनंत विजय जोषी) जर्नलिस्ट हैं, जबकि दलित सवी (राजेशा) पेन्टर और रिसर्च स्काॅलर है। तीनों अपने-अपने कामकाज के दौरान लोगों की जो परेशानियां देखते हैं, रोटी कपड़ा और मकान के लिए मायूस लोगों को भटकते देखते हैं, वो उन्हें द्रवित कर देता है। ये सभी भगवान राम को मानते हैं। लेकिन हर व्यक्ति के राम के अपने-अपने मायने हैं। इसमें एक कुम्हार (दिवाकर पी सोनकरिया) भी अपने गदहे को राम की कहानी सुनाता है। कह सकते हैं कि इंसानियत से बड़ा धर्म हो गया है। ये जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है।
फिल्म में दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर अपूर्वानन्द, बधाई हो फेम अभिनेता अरुण कालरा, सामाजिक कार्यकर्ता पद्मश्री डाॅ. सैयद हमीद, शिक्षाविद और रंगमंच की जानीमानी कलाकार जया अय्यर, सीनियर थियेटर आर्टिस्ट लोकेश जैन और सामाजिक कार्यकर्ता इंदु प्रकाश ने भी अभिनय किया है। उल्लेखनीय है कि प्रभाष चंद्रा की यह पहली फिल्म है। मूलतः पटना के रहनेवाले प्रभाष रिसर्चर हैं। वे भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में रहकर रिसर्च कर चुके हैं। चूंकि थियटर में गहरा लगाव था, इसलिए फिल्म लाइन में आ गए।

प्रेस कान्फ्रेन्स में फिल्म निर्देशकों ने  कहा : मुद्दा आधारित फिल्मों के लिए प्रतिरोध का सिनेमा जैसे आयोजन महत्वपूर्ण हैं

आज निर्देशक मैक्सिन विलियम्सन, बलाका घोष और प्रभाष ने प्रेस कान्फे्रन्स के दौरान पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए यह कहा कि किसान आत्महत्या, बेरोजगारी, सामाजिक-आर्थिक समस्याओं आदि पर अच्छी फिल्में बनाई जा रही हैं, पर अभी भी फिल्मों के वितरण का जो तंत्र है मुंबई और बालीवुड केंद्रित है। मुद्दा आधारित फिल्मों को यह व्यावसायिक तंत्र को महत्व नहीं देता, इसके बावजूद ऐसी फिल्में बन रही है। यूट्यूब के जमाने में दर्शकों की कमी से संबंधित सवाल का जवाब देते हुए निर्देशकों ने कहा कि यूट्यूब या नेटफ्लिक्स आदि पर दिखाई जाने वाली फिल्में भी एक तरह से व्यवसाय को ध्यान में रखकर  बनाई जाती हैं। वे भी व्यवसाय को महत्व देते हैं, मुद्दे को नहीं। ऐसी स्थिति में मुद्दा आधारित फिल्मों को दिखाए जाने और जनता तक पहुंचाने का जरिया प्रतिरोध का सिनेमा जैसे फिल्मोत्सव ही हो सकते हैं। ऐसे आयोजन बेहद महत्वपूर्ण हैं।

प्रभास ने अपनी फिल्म ‘मेरा राम खो गया’ के आइडिया के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए कहा कि इसका आइडिया रामनामी समाज को देख कर आया। छत्तीसगढ़ के दलित को जब सवर्णों ने मंदिरों में घुसने नहीं दिया, उन्हें प्रताड़ित किया तो उन्होंने रामनामी समाज की स्थापना की। इस समाज में पिछले 100 सालों से एक परंपरा चली आ रही है। यह लोग अपने पूरे शरीर पर राम नाम का टैटू गुदवाते हैं। यह सिर्फ उनकी भक्ति नहीं दिखाता बल्कि एक विरोध का प्रतीक भी है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे राम जाति और धर्म को प्रभावित करते हैं।
बिहार से जुड़ाव के बारे में पूूछे गए सवाल का जवाब देते हुए मैक्सिन ने कहा कि वे बलाका घोष के साथ भोजपुरी में एक फिक्शन फिल्म बना रही हैं। उन्होंने भोजपुरी की हर तरह की फिल्मों, पुराने नए गानों को देखा-सुना है। यहां की संस्कृति को समझ रही हैं।
नाटक ‘नया सत्य’ ने न्यू इंडिया में बढ़ रही नृशंसता और संवेदनहीनता के यथार्थ को प्रस्तुत किया
तीन दिवसीय पटना फिल्मोत्सव का समापन हिरावल द्वारा महान रूसी कथाकार और नाटककार अंटोन चेखव की विश्वप्रसिद्ध कहानी ‘वार्ड नं. 6’ पर आधारित नाटक ‘नया सत्य’ के मंचन से हुआ। चेखव की कहानी में वार्ड नं 6 में जो कुव्यवस्था, अराजकता और निर्ममता है, वह उस समय के रूस की व्यवस्था का प्रतीक बन जाती है। लेनिन ने उसे पढ़ते हुए कहा था कि पूरा रूस वार्ड न. 6 में तब्दील हो गया है। ‘नया सत्य’ उसी तर्ज पर आज के न्यू इंडिया की तस्वीर पेश करता है।
नाटक में रविभूषण, अंकित कुमार पांडेय, राजदीप कुमार, गौरव, सौरभ सागर, सुधांशु शांडिल्य, रूबी खातुन, शांति इस्सर, मृत्युंजय प्रसाद, सम्राट शुभम, सौरभ, राजभूमि, सुमन कुमार और राम कुमार ने भूमिकाएं निभाई थीं। प्रकाश-रौशन कुमार, ध्वनि सहयोग- राजीव राय, रूपसज्जा-जितेंद्र कुमार जितु और वस्त्र विन्यास- प्रीति प्रभा का था। परिकल्पना और निर्देशन संतोष झा का था।
अंत डीएम दिवाकर ने नाटक के निर्देशक को सम्मानित किया। इसी के साथ ग्यारहवां प्रतिरोध का सिनेमा: पटना फिल्मोत्सव संपन्न हुआ।

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