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फिल्मोत्सव के दूसरे दिन भारतीय कला-संगीत की सुदीर्घ परंपराओं और उसके साझे स्वरूप का जादू दिखा

‘रसन पिया’: हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विलक्षण व्यक्तित्व से रूबरू हुए दर्शक

पटना. ख्याल गायिकी के लिए मशहूर, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विलक्षण संगीतकार और कवि उस्ताद अब्दुल राशिद खान की जिंदगी पर केंद्रित वृत्तचित्र ‘रसन पिया’ से प्रतिरोेध का सिनेमा: पटना फिल्मोत्सव के दूसरे दिन की शुरुआत हुई। अब्दुल राशिद खान पांच सौ साल पुराने ग्वालियर संगीत घराने की अटूट परंपरा की जीवित कड़ी थे और एक सौ सात साल की उम्र में भी संगीत की रचना करने, संगीत शिक्षा के लिए यात्राएं करने और संगीत-प्रस्तुति देने वाले दुनिया के संभवतः वरिष्ठतम संगीतकार थे, जो अंतिम सांस तक पूरी तरह संगीत के लिए समर्पित रहे।

19 अगस्त 1908 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में जन्में अब्दुल राशिद खान का निधन 18 फरवरी 2016 को कोलकाता में हुआ। अनेक बंदिशों की रचना करने वाले उस्ताद अब्दुल राशिद खान जिन्होंने सैकड़ों शिष्यों को संगीत का ज्ञान दिया, उन्हें 105 साल की उम्र में पद्मभूषण दिया गया था। उन्हें संगीत नाटक अकादमी सम्मान भी मिला था। वे संगीत सम्राट मियां तानसेन की सोलहवीं पीढ़ी के प्रतिनिधि थे।

उस्ताद अब्दुल राशिद खान की जिंदगी और संगीत के जरिए ‘रसन पिया’ के दर्शकों ने कविता और संगीत की रचना-प्रक्रिया को जाना, उनकी प्रेरणाओं को समझा। अमीर खुसरो, सूरदास, कबीर और मिर्जा गालिब आदि की रचनाओं को उस्ताद के संगीत और आवाज में सुनना अद्भुत अहसास था। यह फिल्म एक महान शास्त्रीय संगीतकार के बचपन की स्मृतियों में भी ले जाती है। ख्याल गायिकी की परंपरा से लेकर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और लोकसंगीत की विविध परंपराओं- कव्वाली, टप्पा, ठुमरी, दादरा, चैती, मांड, पूर्वी आदि के जादू में दर्शक उस्ताद को देखते सुनते जबर्दस्त रूप से बंधे रहे।

फिल्म की निर्देशक निहारिका पोपली ने 2007 में पहली बार उस्ताद के गायन को सुना था और कुछ वर्षों बाद उन पर फिल्म बनाने का निश्चय किया। उनके अनुसार फिल्म ‘रसन पिया’ बाबा खान को उनके द्वारा दी गई प्यार भरी श्रद्धांजलि है। वाकई यह फिल्म बीसवीं सदी के एक महान संगीतकार के जीवन, संगीत और गायिकी को दस्तावेजीकृृृत करती है और प्राचीन गुरु शिष्य परंपरा से लेकर आज के समय तक संगीत और गायिकी की दुनिया में आए बदलावों की ओर भी संकेत करती है।

शम्भालिका खरोलिका: भारतीय परपंरा में आधुनिक सिनेमा के तत्वों की मौजूदगी की शिनाख्त

बलाका घोष निर्देशित ‘शम्भालिका खरोलिका’ फिल्मोत्सव के दूसरे दिन की दूसरी फिल्म थी, जो एक कलारूप में सिनेमा को लुमियर बंधुओं की खोज मानने पर सवाल उठाती है और सिनेमा की जड़ों को भारत में मौजूूद गतिशील चित्रों, फ्रेम दर फ्रेम चित्रों के माध्यम से कहानी कहे जाने की कोशिशों, पेपर स्ट्रीप्स, पट्टचित्रों आदि की परंपरा में देखती है। यह एक विचारोत्तेजक फिल्म थी, जो गतिशील दृश्यों के माध्यम से कथा कहे जाने के हमारे देश के पारंपरिक ज्ञान को केंद्र में लाती है। हमारे पुरखे कितने दूरदर्शी और प्रयोगशील थे, इसे भी सिनेमा के परिप्रेक्ष्य में इस फिल्म ने दिखाया। फिल्म बताती है कि दक्षिण भारत के राजा भुवनायकमल्ला सोमेश्वरा ने ग्यारहवीं सदी में ही यह लिखा था कि गतिशील छवियों की कला भविष्य में मनोरंजन की प्रमुख कला बनेगी। भीम बैठका के शैल-चित्रों से लेकर टीपू सुल्तान के एक अधिकारी सुब्बाराव की पेंटिंग कला, पूणे की मैजिक लालटेन स्टोरी आदि से दर्शकों का साक्षात्कार कराते हुए यह फिल्म मजबूती से इस अवधारणा को व्यक्त करती है कि आधुनिक सिनेमा के बीज हमारी परंपरा में पहले से मौजूद थे। यह कहानियों का देश है और यहां गतिशील चित्रों और छवियों के जरिए कहानी कहने की परंपरा थी, जिसका निरंतर विकास हुआ। फिल्म प्रदर्शन के बाद जिज्ञासु दर्शकों के साथ निर्देशक बलाका घोष की विचारोत्तेजक बातचीत हुई।

‘ऐसे ही’: फिल्म में एक बुजुर्ग औरत अपने पंख फैलाती है और होती है एक धीमे विद्रोह की शुरुआत
फिल्मोत्सव के दूसरे दिन की आखिरी फिल्म का शीर्षक था- ऐसे ही। युवा फिल्म निर्देशक किसलय की यह पहली फीचर फिल्म है। यह एक ऐसे किरदार की कहानी है जिसकी पहचान केवल मिसेज शर्मा ही है। यह फिल्म एक कहानी है बुढ़ापे की, विधवा को जीवन के सूत्र देने वाले परिवार के सदस्यों के रवैये की और शहरी मध्य वर्ग की नीचता की, जिसे वह सहानुभूति का नाम देता है। इस फिल्म की पृष्ठभूमि इलाहाबाद की है, जहां किसलय बड़े हुए। इसमें इलाहाबाद के नए नाम ‘प्रयागराज’ की भी आलोचना है। कट्टर दक्षिणपंथी अकड़ कर इस शहर में घूम रहे हैं। ऐसे में मिसेज शर्मा का एक मुसलमान दर्जी से कढ़ाई सीखना और उससे दोस्ती करना शक की निगाहों से देखा जाता है। जबकि 72 की उम्र में अपने दिल के छोटे अरमानों को पूरा करना आसान होना चाहिए, खासकर तब जब हाल ही में किसी ने अपने पति को खोया हो। लेकिन हमारा समाज किस तरह का है, इसे किसलय की फिल्म दिखाती है कि मिसेज शर्मा को हर वक्त अपना बचाव करना पड़ता है और अपने हर काम की सफाई अपने परिवार और पूरी दुनिया के सामने देना पड़ता है।
फिल्म में संवाद है-
आपने गुलाब क्यों खरीदा?
-ऐसे ही.
आप कढ़ाई क्यों सीख रहीं हैं?
-ऐसे ही.

‘ऐसे ही’ बुसान अंतर्राष्ट्रीय फिल्म उत्सव (3-12 अक्टूबर) और मुंबई फिल्म उत्सव (17-24 अक्टूबर) के कम्पटीशन सेक्शन में थी। इस दो घंटे की फिल्म में हरीश खन्ना मिसेज शर्मा के बेटे वीरेंद्र बने हैं, जिनकी आल-इंडिया-रेडियो की नौकरी मुसीबतों से जूझ रही है। उनके किशोर उम्र बेटी और बेटा अलग-अलग दिशाओं में भटक रहे हैं और घर पर गुलामों की तरह चाकरी करने वाली पत्नी सोनिया की कोई कद्र नहीं है। वैसे फिल्म की मुख्य किरदार मिसेज शर्मा हैं।.मिसेज शर्मा का विकास उनकी आदतों और आसपास की चीजों में छोटे-छोटे बदलावों से नजर आता है. वह पहले-पहल भूरे रंग के लिबास में नजर आती हैं, और बाद में अकेले कमरे की आजादी में बसते ही वह नाइटी पहनने लगती हैं। फिल्म निर्देशक किसलय के अनुसार, ‘पति का ना होना उनके लिए एक जगह खोल देता है जिसमे वह सचमुच खुद को आयाम दे सकती हैं।’ फिल्म के छोटे-छोटे पलों में भी कुछ गंभीर अर्थ छिपे हुए थे- पोती का सफेद की जगह लाल ब्रा खरीदना, मिसेज शर्मा का फेसिअल करवाना, और पोते का गुस्सा करना क्योंकि उसकी बहन फोन से चिपकी हुई है। दूसरी ओर घर के बाहर स्मार्ट सिटी की बातचीत और सामूहिक स्थानों के बिखरने की चेतावनी है।  किसलय कहते हैं कि ‘जब सोनिया कहती है कि वह अपनी सास जैसी नहीं बनना चाहती, मैं दिखाना चाहता था कि हम सब अनजाने ही इस स्वभाव का हिस्सा हैं. हमे लोगों में खोट नहीं तलाशना, बल्कि उन्हें उनकी परिस्थितियों के परिणाम के रूप में देखना है। एक बड़े ढांचे का और एक तरह के इतिहास का परिणाम.’

‘इनह्यूमन एनआरसी’ ने दर्शकों के हृृदय को झकझोरा

आज फिल्मोत्सव में ‘इनह्यूमन एनआरसी’ नाम की छोटी सी डाॅक्यूमेंटरी भी दिखाई गई, जो असम के डिटेंशन कैंप की नृशंस स्थितियों पर केंद्रित थी। इस फिल्म ने एनआरसी के नाम पर शासकवर्ग द्वारा किए जा रहे जुल्मो सितम, अमानुषिक और लोकतंत्रविरोधी व्यवहार के विरोध के लिए दर्शकों को प्रेरित किया।

कथाकार स्वयं प्रकाश को ़श्रद्धांजलि दी गई

 आज फिल्मोत्सव के दौरान हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार स्वयं प्रकाश को दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई, जिनका आज ही सुबह निधन हो गया। इस मौके पर जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने कहा कि स्वयं प्रकाश का जन्म 24 जनवरी 1947 को हुआ था। उन्होंने अस्सी के दशक के शुरुआत में ही देश में जारी सांप्रदायिक विभाजन की प्रक्रिया को अपनी कहानी ‘पार्टीशन’ में दिखाया था। वे हिंदी के संभवतः अकेले कहानीकार हैं, जिन्होंने अल्पसंख्यक मन की दशा को बड़े संवेदनशील तरीके से अपनी कहानियों का विषय बनाया है। उनकी कहानियों में मेहनतकश वर्ग की परिवर्तनकारी शक्ति के प्रति आस्था, भारतीय परिस्थितियों में स्त्री अधिकारों के प्रति ज्यादा यथार्थपरक नजरिया नजर आता है। वे सत्ता की नृृशंस, दमनकारी और भ्रष्टाचारी चरित्र के विरोधी थे। अपनी कहानियों द्वारा उन्होंने प्रगतिशील मूल्यों के विकास के लिए कार्य किया। पार्टीशन, नैनसी का धूड़ा, नीलकांत का सफर, अशोक रेनु की कहानी, क्या तुमने सरदार भिखारी देखा है, रशीद का पैजामा, कहां जाओगे बाबा आदि उनकी महत्वपूर्ण कहानियां हैं।


कालिदास रंगालय में बुकस्टाॅल भी लगाया गया है

हर बार की तरह इस बार भी हिरावल-जसम द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय फिल्मोत्सव के दौरान प्रेक्षागृह के बाहर बुुक स्टाॅल लगाया गया है, जहां दर्शक अपने पसंद की पुस्तकें और पत्रिकाएं खरीदते नजर आए। हमेशा की तरह फिल्मोत्सव निःशुल्क है। आखिरी दिन दर्शकों की ज्यादा उपस्थिति की संभावना है।
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