जयप्रकाश नारायण
आरएसएस के उन्मादी हिंदुत्व ने भारतीय राज्य की सभी संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है। राज्य की एकतरफा कार्रवाई और मीडिया के उद्दंड मुस्लिम विरोधी अभियान के साथ मुस्लिम समाज का समग्र भारतीय समाज से अलगाव बढ़ता गया है । मोदी-योगी और हेमंत विश्वशर्मा युग में ईसाइयों, मुसलमानों और आदिवासियों पर सघन हुए हमले के समय भारत की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राजनीति के रक्षात्मक स्थिति में चले जाने के कारण अलगाव की गति और तीव्र हुई। सौ वर्षों से संघ की हरसंभव कोशिश रही है कि भारत के मिले-जुले समाज में हिंदूओं को मुसलमानों, ईसाइयों और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक प्रगतिशील नागरिकों से अलग किया जाए । खासकर अमेरिका पर हुए आतंकी हमले और भारत में अटल बिहारी वाजपेयी काल में हुए श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोटों की घटनाओं की जांच के दौरान जांच एजेंसियों की पूर्वाग्रही दृष्टि के कारण मुसलमानों के पृथक्करण को बल मिला। मुसलमानों की देश भक्ति को संदिग्ध किया गया और शांतिप्रिय समाज की छवि हजारों तरह के लांछनों और विध्वंसक कार्रवाइयों द्वारा विकृत की गई। संघ मार्का हिंदू राष्ट्रवाद ने उन्माद का ऐसा धुआं खड़ा किया कि ‘सर्वधर्म समभाव’ वाली धर्मनिरपेक्षता रक्षात्मक स्थिति में चली गई । जिससे उसकी प्रासंगिकता खत्म हो गई है। भारतीय समाज में सक्रिय धर्मनिरपेक्ष जगहों के सिकुड़ते जाने के कारण मुसलमानों के पृथक्करण को गति मिली।
जिस कारण मुस्लिम पहचान को आक्रामक ढंग से बुलंद करने वाले व्यक्तियों और संगठनों को सामाजिक स्वीकृति मिलने लगी। जैसे-जैसे संघ मार्का आक्रामक हिंदुत्व राज्य के रूप में संगठित हुआ। वैसे-वैसे लोकतांत्रिक और सेकुलर राजनीति कमजोर हुई। लोकतंत्र में सभी तरह के विचार, धर्म, पहचान और जीवन प्रणाली का मिला-जुला स्वायत्त प्रतिरोधक क्षेत्र होता है। जिस पर खड़ा होकर धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों का विस्तार और सुरक्षा की जा सकती है। भारत में वर्ण विभाजित समाज में यह स्वायत्त क्षेत्र पहले से ही अनुपस्थिति था। इसलिए भारतीय समाज के लोकतांत्रीकरण के लिए जाति उन्मूलन और औपनिवेशिक काल के राज्य ढांचे के लोकतांत्रीकरण द्वारा लोकतांत्रिक जगह को निर्मित और विस्तारित किया जाना था। लेकिन बाबरी मस्जिद विरोधी आंदोलन द्वारा खड़े किए गए उन्मादी हिंदू राष्ट्रवाद के उभार और साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी की अगुवाई में उदारीकरण ने भारतीय समाज के लोकतांत्रीकरण की दिशा को पलट दिया।
लोकतंत्र की एकमात्र कसौटी है कि वह धार्मिक अल्पसंख्यकों, जातीय, भाषाई, नस्लीय अल्पसंख्यक समूहों और निर्बल समाज के राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक मूल्यों और अधिकारों के सम्मान और सुरक्षा की गारंटी दे पाता है या नहीं । लोकतंत्र में यह दायित्व बहुसंख्यक समाज का है कि वह इसकी गारंटी करे। अगर बहुसंख्यक समाज इस जिम्मेदारी को उठाने में असमर्थ है तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया पटरी से उतर जाएगी। यदि बहुसंख्यक समाज अपने रीति-रिवाज, परंपरा, धर्म और विचार को बलपूर्वक अल्पसंख्यकों पर आरोपित करने का प्रयास करेगा तो लोकतांत्रिक ढांचा क्षतिग्रस्त होगा। समाज का आन्तरिक ताना-बाना बिखरने को बाध्य है।
भारतीय राज्य में जन्म से ही अधिनायकवादी प्रवृत्ति रही है। औपनिवेशिक दौर में निर्मित हुई नौकरशाही और राज्य ढांचे के अंदर लोकतांत्रिक परिवेश और व्यवहार अनुपस्थित था। जिसे संविधान प्रदत्त अधिकारों, कर्तव्यों व चुनी हुई लोकशाही और लोकतांत्रिक व्यवहार द्वारा गतिशीलता पैदा कर लोकतांत्रिक मूल्यों का सामाजिक विस्तार करना था। जैसे राष्ट्र-राज्य का लोकतांत्रीकरण होगा और समावेशी विकास की गारंटी होगी वैसे ही राष्ट्रीय और सामाजिक एकता का विस्तार होगा । सामंती और औपनिवेशिक संबंध और विचार कमजोर होंगे। इसके लिए जाति विनाश आवश्यक था और साम्राज्यवादी संस्थाओं और विचारों को धीरे-धीरे धो-पोछकर साफ करना था तथा भारत का साम्राज्यवादी दबाव से मुक्त होना अनिवार्य शर्त थी।
स्वतंत्रता आंदोलन की चमक कम होने से भारतीय समाज की अंतर्निहित लोकतंत्र विरोधी प्रवृत्तियां, जिन्हें जमींदारी उन्मूलन, संविधान के निर्माण और नियमित चुनाव के कारण धक्का लगा था। वे ’90 के दशक में राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं में आए निर्णायक मोड़ के कारण पुनर्जीवित हो गई। स्वतंत्रता आंदोलन से विरत रहने और गद्दारी करने वाली ताकतें वैश्विक रथ के पहिया के उल्टी दिशा में घूम जाने के कारण एक बार फिर सामाजिक जीवन में वापस लौट आई, जो आजादी के दौर में समाज से बहिष्कृत कर दी गई थी। आज भारत की राज्य व्यवस्था और समाज पर लोकतंत्र विरोधी पुरोगामी उग्र हिंदू राष्ट्रवादी ताकतों का पूर्ण नियंत्रण है। जिस कारण से एक बार फिर एथेनिक, धार्मिक और भाषाई समूह अलगाव की प्रवृत्ति प्रकट कर रहे हैं।
भारतीय लोकतंत्र अपने शैशवावस्था में पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण और उत्तर भारत तक की विभिन्न धार्मिक भाषाई एथेनिक और क्षेत्रीय समूहों के साथ संबंध बेहतर करते हुए उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने में लगभग कामयाब हो गया था, जिससे पूर्वोत्तर के अनेकों विद्रोही गुट लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल हो गए थे । लेकिन संघ-नीत भाजपा सरकार इन समूहों के भारतीय राज्य में समावेशन की प्रक्रिया को पलटकर हिंदुओं के ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करने की तरफ बढ़ गई है। ठोस अर्थों में कहा जाए तो वह भारत की विविधता के साथ अपराधिक ढंग से खेल रही है।
भारत की आजादी का सबसे दुखदाई और नकारात्मक तत्व है धर्म के आधार पर भारत का विभाजन। यह ऐसा पक्ष है, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के देशों के नागरिकों के चिंतन और मानसिक संरचना पर गहरा असर डाला। जिससे भारतीय उप महाद्वीप लगभग दो शत्रुतापूर्ण विचारों के गिरफ्त में आ गया है और विचार व संवेदना के स्तर पर ऊर्ध्वाधर विभाजित हो गया है। जबकि उपमहाद्वीप में शांति और विकास के लिए विभाजन के घाव को भरने की जरुरत थी। इसके लिए डा.लोहिया और बाद के काल में कामरेड विनोद मिश्रा द्वारा सुझाव दिया गया था कि भारतीय उपमहाद्वीप के सभी देशों का एक महासंघ बनाया जाना चाहिए। एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करते हुए विभाजन को बंधुवत स्वीकार किया जाता और एक दूसरे के सह-अस्तित्व को मान्यता दी जाती। लेकिन पाकिस्तान का अमेरिकी खेमे में चला जाना और भारत में बढ़ते बहुसंख्यकवादी दबाव के कारण उपमहाद्वीप के देश स्थाई शत्रुता में फस गए। जिस कारण भारतीय उपमहाद्वीप लोकतंत्र विरोधी ताकतों के गिरफ्त में आ गया है।
दूसरा जो बड़ा नुकसान भारतीय उपमहाद्वीप को उठाना पड़ा है, वह है भारतीय राष्ट्रवाद के चरित्र में बदलाव। उपनिवेशवाद के गोद में पली-बढ़ी समर्पणवादी ताकतें अमेरिकी साम्राज्यवाद और अंग्रेजों की दलाल राजशाहियों के संरक्षण में समय के साथ मजबूत होती गई। जिस कारण भारतीय समाज की उपनिवेशवाद विरोधी प्रगतिशील राष्ट्रवादी चेतना को भारी धक्का लगा। परिणाम स्वरूप राष्ट्रवाद की धार पड़ोसी देशों के खिलाफ मुड़ गई और देश के अंदर अल्पसंख्यक विरोधी दिशा अख्तियार कर ली । जिससे भारतीय राष्ट्र का उपनिवेशवाद विरोधी मूल अंतर्विरोध बदल गया और साम्राज्यवाद विरोधी चेतना कमजोर होती गई। जिसे आज हम अमेरिका के समक्ष हिंदू राष्ट्रवादियों के सिरमौर मोदी के आत्म-समर्पण में देख रहे हैं। प्रसंगवश मोदी के अमेरिकी इजरायली भक्ति के बदनाम चेहरे को छिपाने के लिए स्वदेशी का शोर हो रहा है। जो और कुछ नहीं है, जिसकी आड़ में अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारतीय बाजार को खोल दिया जाय। खैर
भारत विभाजन का सबसे ज्यादा दुष्परिणाम भारत के मुसलमानों को भुगतना पड़ रहा है। आजादी के बाद से ही हिंदुत्ववादियों और प्रचार तंत्र द्वारा मुसलमानों को विभाजन के लिए मुजरिम ठहराते हुए उन पर खुले और छिपे हमले किए जाने लगे थे।( हिंदुत्ववादियों के पाप छुपाने के लिए) समय-समय पर होने वाले दंगों के लिए एकतरफा मुसलामानों को दोषी ठहराया गया। जबकि जान-माल का सबसे ज्यादा नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ा है। दंगों में राज्य मशीनरी का मुस्लिल विरोधी चरित्र खुलकर दिखाई देता है।
विभाजन का दूसरा पहलू है कि राज्य की समस्त संस्थाओं की जगह हिंदू प्रतीकों और विचारों ने घेर ली। सरकारी प्रतिष्ठानों के उद्घाटनों या शिलान्यासों व शिक्षण संस्थानों तक में जिस तरह से हिंदू रीति रिवाजों का प्रयोग होने लगा उससे एक सामान्य समझ बनाने में मदद मिली। राज्य प्रत्यक्षतः हिंदू समाज के प्रतिनिधि के बतौर काम करते हुए दिखाई देने लगा। जनता पार्टी की सरकार के समय में अहमदाबाद (गुजरात) और जमशेदपुर के दंगे वस्तुतः वे निर्णायक क्षण हैं, जहां से दंगों की अंतर्वस्तु बदल गई। अब यह दो धर्म के मानने वालों के बीच के आपसी झगड़े नहीं थे। हालात दूसरी दिशा में मुड़ चुके थे। ’80 के दशक में मुरादाबाद ( उप्र)और भागलपुर (बिहार) में हुए मुस्लिम विरोधी दंगो में राज्य मशीनरी की भूमिका ने मुसलमानों के मोहभंग को नहीं ऊंचाई दी। जिसके परिणाम स्वरूप कांग्रेस से बहुसंख्यक मुस्लिम समाज अलग होने लगा और उसका विश्वास कांग्रेस के सेकुलर प्रतिबद्धता पर से डगमगाने लगा। यही समय है जब लिबरल डेमोक्रेटिक समाज भी कांग्रेस से निराश हो गया।
’80 के दशक के मध्य और राजीव गांधी के शासनकाल में घटित घटनाओं से भारत के हिंदुत्व दक्षिण पंथ की तरफ मुड़ने की भौतिक परिस्थितियां तैयार की। ’84 का सिख नरसंहार, असम आंदोलन, बाबरी मस्जिद विरोधी प्रायोजित उन्माद, शाहबानो के केस में राजीव गांधी का पीछे हटना और अंतोगत्वा बाबरी मस्जिद का ताल खोलने की घटनाओं ने रही सही कसर निकाल दी। 1989 में वीपी सिंह की जनता दल का सत्ता में आना और दो बैसाखियों पर टिके होना एक ऐसी स्थिति थी, जहां विध्वंसक हिंदुत्व को खुलकर खेलने का मौका मिला। इसी उथल-पुथल में बीपी सिंह द्वारा मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने की घोषणा ने सवर्ण सामंती ताकतों को संघी पाले में ढकेल दिया। बदलते सामाजिक समीकरणों से आडवाणी को विध्वंसक रथ यात्रा निकालने का साहस मिला।
दूसरी तरफ भारत ने 1952 के बाद से विकास की जो रणनीति स्वीकार की थी, वह बदली हुई अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में अपनी गत्यात्मकता खो बैठी। भारत आर्थिक संकट में चला गया। जिसने पहली बार प्रत्यक्ष रूप में भारत में कार्पोरेट वार को जन्म दिया। नस्ली वाडिया के बाम्बे डाइंग और अंबानी के रिलायंस के बीच में चले संघर्ष के कारण अंबानी परिवार कांग्रेस का साथ छोड़कर आडवाणी की रथ यात्रा के पीछे अपने भाग्य की डोर को बांध दिया । यह पहली घटना थी जब खुलकर एक उद्योग घराना एक विभाजन कारी आंदोलन के पीछे खड़ा हुआ।
उसके बाद की परिस्थितियां, जिसमें बीपी सिंह की सरकार का जाना, चंद्रशेखर की सरकार का आना और 1991 के लोकसभा चुनाव के बाद पीबी नरसिम्हा राव की अल्पमत सरकार का बनना, वे ऐतिहासिक घटनाएं हैं, जिसकी पृष्ठभूमि में मस्जिद का विध्वंस हुआ। जबकि उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार ने न्यायालय राष्ट्रीय एकता परिषद को लिखित शपथ पत्र दिया था कि यथास्थिति कायम रखा जाएगा । इसके बावजूद बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ। बाबरी मस्जिद का विध्वंस आजाद भारत के इतिहास में निर्णायक मोड़ है।जिसके भारत के लोकतंत्र राजनीति और समाज में दूरगामी प्रभाव पड़े।
एक – संघ प्रायोजित हिंदुत्व भीड़ के सामने भारतीय राज्य की संस्थाओं का असहाय और पंगु हो जाना ।
दो-भारत में सर्वधर्म समभाव वाली धर्मनिरपेक्षता का कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के उन्मादी दौर में ऐतिहासिक तौर पर अप्रासंगिक हो जाना। उदार जनतंत्रवादी नागरिकों के हिंदुत्व फासीवाद की आक्रामकता के समक्ष किंकर्तव्यविमूढ़ और असहाय हो जाना।
(इस लेखक ने बीपी सिंह सहित (जिसमें सपा शामिल नहीं हुई थी)गैर कांग्रेसी विपक्ष के नेतृत्व में बाबरी मस्जिद बचाने के लिए होने वाले 5 दिसंबर 1992 केअयोध्या मार्च की औपचारिकता को देखने के बाद यह समझ लिया था कि अब भारत में उदारवादी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक ताकतें उन्मादी हिंदुत्व का मुकाबला करने में अक्षम हो चुकी हैं। उनके पास इनका प्रतिरोध करने की न कोई जन नीति है और न ठोस आक्रामक वैचारिकता । इसके बाद कई प्रगतिशील धुरंधरों को मैंने तुलसीदास के रामायण में मौजूद समन्वयवादी हिंदुत्व की वकालत करते देखा और जब वे भक्ति काल के प्रेम और समन्वयवादी परंपरा को हथियार बना रहे थे । अंततः उन्हें निराशा होना पड़ा।)
तीन-बाबरी मस्जिद गिराए जाने के अपराधिक कृत्य के बाद हुए दंगों, बम विस्फोटों और आगे के समय में पूरे देश में हुई आतंकवादी घटनाओं से भारत का मुसलमान अकेला पड़ता गया । उसे मुख्य धारा की भारतीय राजनीति से निराश हो कर नए तरह के नेतृत्व तलाशने के लिए बाध्य होना पड़ा।
हालांकि बिहार में लालू प्रसाद द्वारा आडवाणी का रथ रोककर उन्हें गिरफ्तार करना और एक समय बाबरी मस्जिद बचाने के लिए मुलायम सिंह द्वारा कानून व्यवस्था की रक्षा के लिए उठाए गए कदम ने उन्हें थोड़ा आश्वस्त तो किया था। लेकिन जैसे-जैसे धर्मनिरपेक्ष राजनीति का पहिया पहचानवादी राजनीति के चक्र में उलझता गया। वैसे ही भारत के सामाजिक स्थान को हिंदुत्व के अतीतोन्मुखी गौरव आख्यान ने घेर लिया है। तो मुसलमान फिर अकेला पड़ गया।
वही दूसरी तरफ उसके ऊपर हमले सघन हो गये। अटल बिहारी वाजपेई के सरकार में श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोट, गुजरात नरसंहार, संसद पर आतंकी हमला और यूपीए सरकार में 9/11 की घटना के बाद कांग्रेस को लकवा मार गया। बम विस्फोटों के बाद मुस्लिम नौजवान उलेमा धर्मगुरु सभी राज्य के निशाने पर आ गए । हेमंत करकरे की आतंकवादी घटना के दौरान हत्या और संजीव भट्ट जैसे आईपीएस अधिकारियों को निशाने पर लेने के बाद भारतीय नौकरशाही के अंदर आत्मरक्षात्मक दीवार खड़ी कर दी। इस तरह उदारीकरण के विस्तार और राजनीतिक परिस्थितियों के ऐतिहासिक विकास की एक मंजिल पर पहुंच कर सेकुलर राजनीति पूर्ण रूप से आत्मरक्षात्मक हो गई।
इस दौर में सिर्फ रेडिकल वाम पार्टियां और नागरिक तथा कुछ प्रतिबद्ध गांधीवादी ही मजबूती के साथ धर्मनिरपेक्षता और सद्भाव के लिए लड़ते रहे। यह वह समय है जब मुस्लिम समाज को सरपरस्त तलाशने की जगह सच्चे दोस्तों की तलाश करनी चाहिए। साथ ही अब भारतीय राजनीति में सर्वधर्म समभाव की जगह ‘सर्व धर्म वर्जते’ की सच्ची धर्मनिरपेक्षता की नीति पर अमल की जरूरत है।
वैश्विक अनुभव है कि अल्पसंख्यकों पर हमला बढ़ने पर वे अपने में सिमटने लगते हैं। हमारे पड़ोस में श्रीलंका के तमिल इसके उदाहरण हैं। इसका एक वैश्विक आयाम भी है। इस्लामिक मुल्कों में समाजवाद से लड़ने के लिए अमेरिका ने बादशाहियत के साथ कट्टरपंथऔर मौलवियों मुल्लाओं को बढ़ावा दिया और समाज पर उनके वर्चस्व को स्थापित करने का हर तरह का अभियान चलाया। प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष राजनीति के पक्षधरों का कत्लेआम करने से लेकर उनके दानवीकरण और इस्लाम के दुश्मन के रूप में पेश किया गया। हालांकि यही अमेरिका की गोद में बैठे हुए हिंदुत्ववादी भी प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं के साथ कर रहे हैं। स्वाभाविक है कि भारत के मुसलमानों पर भी इसका असर पड़ा और धर्मगुरुओं, मुल्ला-मौलवियों का राजनीति और समाज पर नियंत्रण और मजबूत हो गया है।
बाटला हाउस कांड के बाद हमने इसे आजमगढ़ में स्पष्ट रूप से देखा है। उस आतंक के वातावरण में किसी भी राजनीतिक दल और संस्था का साहस नहीं हो रहा था कि आज़मगढ़ में नरसंहार का विरोध करें और आज़मगढ़ को बदनाम करने की साजिश के खिलाफ सड़क पर उतरें। उस समय भाकपा माले और उसके छात्र संगठनों ने दिल्ली से लेकर आज़मगढ़ तक विरोध की आवाज बुलंद की । भारी आतंक के बीच 4 दिन के अंदर आज़मगढ़ कलेक्ट्रेट पर विरोध मार्च और धरना सभा की गई तथा कलेक्ट्री कचहरी आज़मगढ़ के नेहरू हाल में राष्ट्रीय स्तर का कन्वेंशन आयोजित किया ।जिसमें दिल्ली से लेकर बिहार तक के भाकपा माले के नेताओं के साथ बुद्धिजीवी और मानव अधिकार कार्यकर्ता शामिल हुए ।
लेकिन इसके ठीक दूसरे दिन अचानक ओलेमा कौन्सिल नामक एक संगठन ने मदरसों की ताकत के बल पर एक बड़ी रैली आयोजित कर पूरे आंदोलन के लोकतांत्रिक चरित्र को नष्ट कर इसे मूलतः उलेमाओं, धर्म गुरुओं और मुसलमानों का सवाल बना दिया। इससे उलेमा काउंसिल रहनुमाओं को सियासी से लेकर माली फायदे हुए । जबकि उलेमा काउंसिल के पहल का फायदा उठाकर आज़मगढ़ जैसे सांप्रदायिक सौहार्द वाले जिले में साम्प्रदायिक उन्माद का माहौल खड़ा करने में संघ और भाजपा कामयाब हो गई। सेकुलर लोकतांत्रिक राजनीति को भारी धक्का लगा। योगी आदित्यनाथ की हिंदू युवा वाहिनी का विस्तार हुआ और उनकी एक यात्रा के समय गोलियां चलीं, जिसमें दो मुस्लिम नौजवान अलग-अलग स्थानों पर मारे गए । जो भाजपा 2023 के विधानसभा चुनाव में आज़मगढ़ में एक भी सीट नहीं जीत पाई है, वही उलेमा काउंसिल के उभार की पृष्ठभूमि मे आज़मगढ़ की संसदीय सीट जीतकर अपना खाता खोलने में सफल हो गई। इस माहौल का असर ऐसा हुआ कि 2o14 के चुनाव में मुलायम सिंह का चुनाव खतरे में फस गया था।
जिस समय गोरखपुर और आज़मगढ़ मंडल में योगी आदित्यनाथ की हिंदू युवा वाहिनी का आक्रामक अभियान चल रहा था, उसी समय गोरखपुर के बड़हलगंज के एक लोकप्रिय चिकित्सक डा. अयूब ने पीस पार्टी बनायी। पीस पार्टी 2012 में मुस्लिम बहुल दो विधानसभा जीतने में कामयाब रही। इसका लाभ अंततोगत्वा बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को मिला । परिणाम यह हुआ की घाघरा के उत्तर का इलाका आज हिंदुत्व का अभेद्य दुर्ग बना हुआ है और पीस पार्टी अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।
पूर्वोत्तर भारत संघी हिंदुत्व के लिए हमेशा से अभेद्य दुर्ग रहा है, जहां सैकड़ों जनजातियां सांस्कृतिक, सामाजिक एथेनिक समूह और मिलिटेंट ग्रुप मौजूद हैं। बांग्लादेश की सीमा से लगा होने के कारण इन इलाकों में बड़े पैमाने पर नागरिकों की आवाजाही होती रही है और अवाम के बीच ऑर्गेनिक संबंध हैं ।
असम में नागरिकता का सवाल का मुद्दा पहले से ही रहा है। जिसके खिलाफ असम आंदोलन चला था। असम के कई जिले मुस्लिम बहुल जिले हैं । इसलिए सेकुलर राजनीति की किसी भी चूक का फायदा सांप्रदायिक ताकतें उठा सकती हैं। यही हुआ भी। असम मूल के परफ्यूम के अरबपति मुस्लिम व्यवसायी और धर्मगुरु बदरुद्दीन अजमल जो मुंबई में पैदा हुए थे । उन्होंने 2005 में असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट बनाया, जो बाद में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट में बदल गया। अजमल जी शीघ्र ही मुसलमानों में लोकप्रिय हो गए। उन्हें सेकुलर राजनीति की कमजोरी और कांग्रेस के साफ्ट हिंदुत्व की असफलता का लाभ मिला।
भारत में धार्मिक और जातीय अस्मिताओं के उभार के दौर में ‘मुसलमान का सच्चा प्रतिनिधि मुसलमान ही हो सकता है’ के एजेंडे पर 2009 के चुनाव में लोकसभा धुबरी सहित एक दर्जन विधानसभा की सीट जीत ली। अजमल साहब की पार्टी की चुनावी सफलता ने आरएसएस को विभाजनकारी साम्प्रदायिक एजेंडा आगे बढ़ाने का मौका दे दिया । एआईयूडीएफ का भय दिखाकर संघ और भाजपा ने असम मे हिंदुत्ववादी शक्तियों को संगठित करने के क्रम में अगप, उल्फा और बोडो उग्रवादियों के साथ समझौता कर लिया। घुसपैठ के नाम पर मुस्लिम विरोधी उन्माद खड़ा कर असम को हिंदुत्व की प्रयोगशाला में बदल दिया। आज असम उत्तर प्रदेश, गुजरात के राह से गुजर रहा है। एआईयूडीएफ की राजनीति के अंदर छिपी कमजोरी बहुत शीघ्र ही असम के मुसलमान समझ गये और अजमल सहब 2024 के चुनाव में सबसे बड़ी हार झेलने के बाद राजनीति के हाशिए पर पहुंच गए हैं। लेकिन तब तक वे मुस्लिम समाज सहित असम के जनतांत्रिक राजनीति को भारी नुकसान पहुंचा चुके थे। विडंबना यह है कि इस समय पूर्व कांग्रेसी हेमंता विश्व शर्मा असम के मुख्यमंत्री हैं, जो उत्तर प्रदेश और गुजरात के हिंदुत्व के आक्रामक मॉडल के साथ प्रतिद्वंदिता कर रहे हैं। आज असम एक पुलिस स्टेट में बदल चुका है।
ऐसी स्थिति में आसाम में सेकुलर और लोकतांत्रिक राजनीति के समक्ष गंभीर चुनौती खड़ी है। अजमल साहब की पार्टी के उत्थान के बाद संघ-भाजपा ने मणिपुर, मेघालय, नागालैंड, अरुणाचल, त्रिपुरा और मिजोरम तक अपने पांव पसार लिए। त्रिपुरा में लोकतंत्र को खत्म कर एक नई तरह की तानाशाही थोपी गई है। वही मणिपुर जल रहा है। असम में हिंदुत्व का विध्वंसक बुलडोज चल रहा रहा है। काले कानून थोपे जा रहे हैं । मुसलमानों की धार्मिक आजादी को निशाना बनाया जा रहा है और हजारों गरीबों को उनके घरों से खदेड़ दिया गया है। असम आज त्रासदी से गुजर रहा है। ऐसे समय में अजमल साहब शायद अपने इत्र का व्यापार बढ़ाने और किसी मजमे में धर्मगुरु की हैसियत से तकरीर करने में व्यस्त होंगे। जब असम कराह रहा है, वे अनुपस्थित हैं।
वर्तमान समय में हैदराबादी ओवैसी बीजेपी के प्रिय और चहेते नेता हैं । जिनका तेलंगाना में हैदराबाद सिकंदराबाद के मुस्लिम-बहुल इलाके के बाहर कोई प्रभाव नहीं है । लेकिन घूम-घूम कर देश के विभिन्न मुस्लिम बहुल इलाकों में जोरदार तकरीर द्वारा मुसलमान को मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री बना रहे हैं। मेहनती हुनरमंद मुस्लिम कारीगर किसान मजदूर कर्मचारी उनके द्वारा दिखाए जा रहे ख्वाब के जाल में उलझ गए हैं। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश के बाद अब बिहार में ओवैसी साहब के एआईएमएआईएम की सफलता से किसी को खुशी हुई होगी, तो वह संघ परिवार ही है । ओवैसी परिवार का आर्थिक और राजनीतिक साम्राज्य निजाम हैदराबाद के समय से ही फल-फूल रहा है। जब उनकी संस्था तेलंगाना के गरीब किसानों के विद्रोह को दबाने में लगी थी तब से ओबैसी खानदान की चौथी पीढ़ी है, जो तभी से अपने संरक्षकों की सेवा में संलग्न है।
जिस दौर में सेकुलर राजनीति के छोटे-बड़े मुस्लिम नेता निशाने पर हों, आजम खां से लेकर संभल के विर्क और गाजीपुर में अंसारी परिवार को तबाह किया जा रहा हो। वहां ओवैसी साहब भारत भ्रमण करने के लिए स्वतंत्र हैं। दिल्ली दंगे में बेगुनाह नौजवान लड़के-लड़कियां बरसों से जेल में हैं। मॉब लिंचिंग हो रही है। मुसलमानों की इबादतगाहों को बुलडोज किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के तराई के पांच जिलों में सैकड़ों दरगाह, मस्जिद, मजारें ढहा दी गई है, लेकिन ओवैसी साहब ज़बानी जमा खर्च के अलावा शांतिपूर्ण सत्याग्रह के लिए भी तैयार नहीं है। वे किसी जनतांत्रिक आंदोलन के साथ खड़े नहीं होते। जनता के बुनियादी मुद्दों पर उनकी आवाज खामोश हो जाती है। मुस्लिम पत्रकारों, पेशेवर लोगों, बुद्धिजीवियों, नागरिकों के साथ दलित कमजोर वर्गों पर तरह-तरह के हमले हो रहे हैं। वे लंदन पढ़े बैरिस्टर हैं और लोकसभा में तकरीर करने में माहिर हैं। लेकिन उनकी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता कितनी कमजोर है। यह उनके कार्रवाइयों से देखा जा सकता है।
ऐसी स्थिति में अगर केंद्र की मोदी सरकार ओवैसी परिवार पर मेहरबान है, तो निश्चय ही इसके कुछ कारण तो होंगे ही।
इसलिए इस दौर में मुसलमान को अकेले चलने की जरूरत नहीं है। उन्हें लुटे-पिटे कमजोर गरीब लोगों और लोकतंत्र के लिए लड़ रहे सभी तरह के राजनीतिक, सामाजिक ताकतों के साथ मिलजुल कर ही आगे बढ़ना होगा। सीएए, एनआरसी विरोधी आंदोलन में प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष वामपंथी ताकते बढ़-चढ़कर शामिल हुई थी। यह बड़ा अनुभव है।
मुस्लिम समाज को सतर्क रहने की जरूरत है ।यह दौर व्यापक संयुक्त कार्रवाई का है, जिसे ऊपर से ही नहीं, जमीनी स्तर पर से चलाना होगा । जो अस्तित्व के लिए संघर्षरत समाज की जरूरत है। आज हर देशभक्त लोकतांत्रिक नागरिक का ऐतिहासिक दायित्व है कि इस उद्देश्य के लिए अपना सम्पूर्ण लगा दे। यह निर्विवाद सत्य है कि देश के सभी नागरिकों के भविष्य के साथ ही मुसलमानों का भी भविष्य सुरक्षित है।

