इस चुनाव में हमारी-आपकी भूमिका

जनमत

17वीं लोकसभा चुनाव के समय अब यह सवाल पूछना आवश्यक है कि इस चुनाव में कवियों, लेखकों, पत्रकारों, प्रोफेसरों, शिक्षकों, शिक्षितों-सुशिक्षितों, बुद्धिजीवियो, वैज्ञानिको, चिंतकों, विचारकों , इतिहासकारो, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, समाज-वैज्ञानिको, संपादको, संस्कृतिकर्मियो, सांस्कृतिक संगठनों आदि की क्या भूमिका है या होनी चाहिए ? अब अगले सप्ताह से मतदान आरंभ हो रहा है और यह सवाल पूछा ही जाना चाहिए कि हम और आप क्या कर रहे हैं ? क्या कवियो, कथाकारो लेखको, साहित्यकारों ने अपने फेसबुक और व्हाट्सएप आदि पर चुनाव के समय तक चुनाव के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं लिखने बोलने और पढ़ने का निश्चय कर लिया है ? क्या दलित, स्त्री, आदिवासी विमर्शकारों ने कुछ समय तक अपने अपने विमर्श से अलग भारत विमर्श में अपने को शामिल कर लिया है ?

बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक सब मतदाताओं से बहुत सोच समझ कर विवेक पूर्ण ढंग से मतदान करने की अपील कर रहे हैं। अभी डेढ़ सौ वैज्ञानिकों ने मतदाताओं से यह अपील की है कि वे समझ बूझ कर विवेक पूर्ण ढंग से मतदान करें और इस चुनाव में भेदभाव बढ़ाने वाले, विभाजित करने वालों,  भय उत्पन्न करने वालों को खारिज करें।

वैज्ञानिक समुदाय का आवाहन है कि वे अविवेक के खिलाफ वोट दें। प्रमुख भारतीय संस्थानों के इन वैज्ञानिकों के अनुसार यह चुनाव निर्णायक है जो संविधान के प्रमुख मौलिक अधिकारों के पुनः स्वीकरण, समर्थन को तलाशेगा जिसमें विश्वास के अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है। इसकी रक्षा के लिए हमें लिंचिंग करने वालों, अपमानित करने वालों और धर्म, जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्र आदि के आधार पर विभाजित करने वालों को खारिज करना होगा।

हम ऐसी राजनीति के साथ नहीं हो सकते जो हमें विभाजित और भयाक्रांत करती है और हमारे समाज के एक बड़े हिस्से को हाशिए पर ठेल देती है। स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों, धार्मिक अल्पसंख्यक और गरीबों से जिन्हें मतलब नहीं है। अब जब लुम्पेन आधारित ‘पापुलिज्म’ के सामने साक्ष्य आधारित, तथ्य आधारित राजनीति का अभाव है, हमें इस चुनाव में विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। इन वैज्ञानिकों ने रवीन्द्र नाथ ठाकुर की ‘भयमुक्त मानस’ वाली काव्य पंक्ति उद्धृत की है और उसे संवैधानिक मूल्यों को रिफ्लेक्ट करने वाला कहां है।

संभवत पहली बार भारत के प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों के प्रमुख डेढ़ सौ वैज्ञानिकों ने भारतीय मतदाताओं से यह अपील की है कि वे असमानता, अभित्रास, डांट डपट, विभेद, भेदभाव और अविवेक के खिलाफ मतदान करें। यहां यह उल्लेख आवश्यक है कि नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के एक वर्ष बाद ही 2015 में पहली बार तीन विज्ञान अकादमी ने देश में असहिष्णुता और और अबौद्धिकता के बढ़ने की बात कही थी।

प्रभात पटनायक, अशोक मित्रा, अमित कुमार बागची जैसे अर्थशास्त्रियों, रोमिला थापर, इरफान हबीब, डी एन ओझा, हरबंस मुखिया जैसे इतिहासकारों और फिल्मकार गिरीश कर्नाड, कुमार साहनी, सईद मिर्जा, कलाकार विवेक सुंदरम, नीलिमा शेख, अपर्णा कौर, रंगकर्मी एम के रैना, अनुराधा कपूर आदि बुद्धिजीवियों ने मतदाताओं से भाजपा और नरेंद्र मोदी को खारिज करने की अपील की है। मोदी और भाजपा को इन सबने अल्पसंख्यक समुदाय का विरोधी बताया है।

संभव है और अनुमान भी कि देश के विभिन्न हिस्सों से जागरूक व समर्पित और सही अर्थों में देशभक्त समूहों ने मतदाताओं से ऐसी अपील की हो। संभव है पटना, भोपाल और लखनऊ-दिल्ली से जो 4 हिंदी भाषी राज्यों और देश की राजधानी है जहां कुल सांसद सीट 156 है, कई कवि लेखक ने भी मतदाताओं से अपील की हो। प्रश्न स्टैंड का है जिसे मुक्तिबोध ने लगभग 60-65 वर्ष पहले कहा था ‘तय करो किस ओर हो तुम’।

इस चुनाव में हम सबको यह तय करना होगा कि हम किस के साथ हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा और आर एस एस के साथ या इनके खिलाफ जहां कहीं कारगर ढंग से विपक्ष खड़ा है उसके साथ। अपीलें सामान्य मतदाताओं तक नहीं पहुंचती। वह माहौल का निर्माण करती हैं। कविता और लेखन में प्रगतिशील और जनवादी होना आसान है, जीवन में ऐसा होना कम है। इसी कारण संभवत अधिकांश कवि, लेखक, आलोचकगण सक्रियतावादी नहीं है।

एक संसदीय क्षेत्र विशेष को लेकर संस्कृति कर्मी ही नहीं फेसबुकिए भी सक्रिय हो सकते थे। वे तफसील से उस संसदीय क्षेत्र का वर्तमान इतिहास प्रस्तुत कर प्रत्याशियों में से सही व विवेकशील प्रत्याशी के पक्ष में एक माहौल बना सकते थे। संभव है ऐसा कईयों ने अवश्य किया होगा क्योंकि वे सब चिंतित और परेशान है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार से वही प्रभावित हैं। कवियों को ही शब्द और भाषा की रक्षा करनी है जिसे मोदी ने 5 वर्ष में काफी विकृत किया है।

नए शब्द निर्माण में शब्द के मूल अर्थ को बदलकर अपने अनुकूल बनाने मे, उसके अर्थ गरिमा नष्ट करने में, सार्थक और मूल्यवान शब्दों को निरर्थक और मूल्यहीन बनाने में, अर्थवान शब्दों को अर्थहीन करने में , स्वनिर्मित एक शब्द पर सबका ध्यान केंद्रित करने में मोदी अप्रतिम हैं। प्रथम अक्षरों को जोड़कर नई शब्द निर्मिती में मोदी अकेले हैं। ताजा उदाहरण ‘सराब’ है जिसे उन्होंने सपा, रालोद और बसपा के प्रथम अक्षर को जोड़कर बनाया। जैसा शब्द निर्मित होगा वैसा ही देश भी निर्मित होगा क्योंकि दोनों का निर्माता एक ही है। हम कल्पना कर सकते हैं कि मोदी का न्यू इंडिया – नवीन भारत किस प्रकार का भारत होगा। भारत का वास्तविक अर्थ ‘प्रकाश में रत’ वहां क्या कायम रह सकेगा ? भारत की जो अपनी विशिष्ट पहचान है क्या वह बनी रह सकेगी ?

यह चुनाव भारत की आत्मा को बचाए रखने का है भारत कागज के टुकड़े पर बना और मौजूद एक राष्ट्र नहीं है। क्या यह चुनाव भारत की आत्मा को कायम रखने का नहीं है जिसका सबसे बड़ा दायित्व कवियों, लेखकों, बुद्धिजीवियों, समाज वैज्ञानिकों, संस्कृतिकर्मियों और सांस्कृतिक संगठनों पर है कि वे किस प्रकार मतदाताओं को देश के वर्तमान चित्र से अवगत कराते हैं। देश आज एक व्यक्ति के हवाले है। ऐसा नेहरू के समय भी में भी नहीं था।

आपातकाल के दिनों को छोड़कर इंदिरा गांधी ने भी ऐसा नहीं किया था। लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएं उस समय पूरी तरह नष्ट नहीं हुई थी। अभी चुनाव आयोग ने मोदी की बायोपिक ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ रिलीज करने की अनुमति दे दी है। 30 करोड़ में 38 दिनों में बनने वाली फिल्म आज रिलीज हो रही है। 30 साल तक भाजपा में रहने वाले आनंद पंडित इस फिल्म के प्रोड्यूसर हैं जिन्होंने चुनाव आयोग को यह बताया कि फिल्म का भाजपा से कोई नाता नहीं है। भारत के 10 वें मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन सेशन और 23वें भारतीय चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा में अंतर है। पद वही रहता है, पद पर बैठने वाले बदल जाते है।

प्रधानमंत्री के पद पर जवाहरलाल नेहरू थे और अभी नरेंद्र मोदी हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त सेशन 12 दिसंबर 1970 से 11 दिसंबर 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त थे। के गोविंदनकुट्टी ने उनकी जीवनी लिखी – ‘ऐन इंटीमेट स्टोरी’ – कोर्णाक पब्लिशर्स 1994। शेषन ने अपने नाश्ते में नेताओं को खाने की बात कही थी – ‘मैं नाश्ते में राजनीतिज्ञों को खाता हूं’।

क्या कोई लोकतंत्र विपक्ष के बिना कायम रह सकता है ? भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने प्रतिपक्ष को, विपक्षी दलों को कीड़े और मानवेतर विविध प्रजातियों में से एक कहा था। मोदी विरोधी को राष्ट्र विरोधी कहना अब एक सामान्य बात है। पिछले चुनाव में भाजपा को मात्र 31 प्रतिशत वोट मिले थे। उत्तीर्णांक से भी कम। क्या 69 प्रतिशत भारतीय राष्ट्र विरोधी हैं ? यह लोकतंत्र के प्रति गहरी घृणा का सूचक है। निजी अधिपत्य और एक व्यक्ति विशेष का सर्वत्र प्रभुत्व, नेतृत्व लोकतंत्र की ह्रास का प्रमाण है। जब प्रश्नकर्ताओं, असहमत व्यक्तियों, समूहों, संगठनों और अपने विरोधियों पर हमलेे कराये जाते हों, हमलावरों को उकसाया जाता हो, तो हमें यह समझ लेना चाहिए कि यह ‘लोकतंत्र का अंतिम क्षण है’। रघुवीर सहाय ने इसके बाद लिखा था ‘कहकर आप हंसे’। यह हमें तय करना होगा कि भारत हास्य रस में बदल रहा है या करुण और वीभत्स रस में।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विश्व दृष्टि से शायद ही किसी कवि, कलाकार, बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक-समाज वैज्ञानिक की विश्व दृष्टि मेल खाती हो। उनकी विश्व दृष्टि को एकांतिक, अपवर्जक – एक्सक्लूसिव, बेअदब, पूर्वग्रह युक्त, संकीर्ण , गौण और अनपढ़ संकर्मण ठाकुर ने माना है – द टेलीग्राफ, 3 अप्रैल 2019। उन्होंने विस्तार से बताया है कि कैसे केंद्रीय मंत्रिपरिषद रबड़ स्टैम्प है और वरिष्ठ मंत्रियों की भी अपनी आवाज नहीं है। उनकी विभागीय स्वायत्तता नहीं है। प्रधानमंत्री को उनके सुझाव नहीं चाहिए। मोदी का स्वभाव सवाल सुनने का नहीं है। उन्होंने 5 वर्ष में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस तक नहीं की है। कैबिनेट की बैठक के बिना नोटबंदी की उन्होंने घोषणा की। सबका श्रेय वे स्वयं लेते हैं। उनके आगमन के पहले इस देश में कुछ भी नहीं था। उनके बाद भी शायद कुछ नहीं बचेगा। वे भारत की सुरक्षा केवल अपने हाथों से देखते है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बाद विश्व के प्रमुख शासकों में संभवत उनका स्थान दूसरा है जिन्होंने कम झूठ नहीं कहे ‘सत्यमेव जयते’ के देश में ‘झूठमेव जयते’ का सचमुच कोई महत्व है ?

देश ‘जी हां वाद’ के दौर से गुजर रहा है। ‘हां में हां’ मिलाने वाले कम नहीं हैं। वचन का अनुपालन महत्वपूर्ण है। क्या भारत एक ‘दास युग’ में प्रवेश कर रहा है। भारत में कभी दास युग नहीं रहा था। आज अनुपालकों का, आज्ञाकारियों का झुंड फैल रहा है। गांधी और नेहरू पर हमले जारी हैं। गांधी की प्रतिमा को गोली मारी जा रही है। कट्टरता और धर्मांधता को वोट का हथियार बना दिया गया है। शिकायतकर्ता राष्ट्रद्रोही बताए जा रहे हैं। भाजपा पार्टी अमित शाह के अधीन है। पहले गुजरात गांधी-पटेल के नाम से जाना जाता था। बाद में वह मोदी-शाह के नाम से जाना जाने लगा। मार्गदर्शक मात्र दर्शक बनकर रह गए हैं – आडवाणी और जोशी। देश बड़ा है। वह मात्र दर्शक नहीं रह सकता। देश किसी भी व्यक्ति, दल और संगठन से बड़ा है। प्रधानमंत्री पद पर कोई व्यक्ति हमेशा नहीं रहेगा। अमित शाह जी सदैव भाजपा अध्यक्ष नहीं रहेंगे।

क्या सचमुच कांग्रेस का घोषणा पत्र, 2019 जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है ‘पाकिस्तानी साजिशों का एक दस्तावेज’ है। भाजपा के खिलाफ एकजुट हुए विपक्षी दलों को उन्होंने ‘महामिलावट’ कहा था। यह भी कहा था कि उनके सत्ता में आने पर नक्सली गतिविधियां बढ़ेगी। कांग्रेस ने अपने चुनावी वादे में आफसपा की समीक्षा की बात कही है। मोदी ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कहा है। कांग्रेस के घोषणा पत्र में उदारीकरण के मार्ग को बदलने के संकेत हैं। यह इसलिए भी जरूरी है कि देश की कुल संपत्ति यों का 70 प्रतिशत एक प्रतिशत आबादी के पास है। संसद में 400 से अधिक करोड़पति सांसद है। अपराधी सांसदों की संख्या भी कम नहीं है। सामान्य जन का वास्तविक प्रतिनिधि वहां बहुत बहुत कम है। वे जन प्रतिनिधि नहीं हैं। वास्तविक अर्थ में ‘पीपुल’ के प्रतिनिधि देश के कवि, कलाकार, संस्कृतिकर्मी और बुद्धिजीवी हैं। इसी कारण यह सवाल जरूरी है कि चुनाव में जिस पर देश का भविष्य निर्भर है, हमारी और आपकी क्या भूमिका है ? क्या भूमिका होनी चाहिए ?

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