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शिक्षा से ही समाज बदलेगा, समानता आएगी – डॉ मंदाकिनी राय

सावित्रीबाई फुले व फातिमा शेख की याद में परिसंवाद और कवि गोष्ठी

लखनऊ।  एपवा, जसम और आइसा की ओर से चार जनवरी को एसबीएम लाइब्रेरी के सभागार में ‘ यादें सावित्रीबाई फुले व फातिमा शेख ‘ का आयोजन किया गया। प्रमुख वक्ता इतिहास की प्रवक्ता डॉ मंदाकिनी राय थीं ।

उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में जब भी आधुनिक शिक्षा की बात महिलाओं के संदर्भ में की जाएगी तो सबसे प्रथम नाम सावित्री बाई फुले एवं फातिमा शेख का लिया जाएगा | उन्नीसवीं सदी की प्रथम शिक्षिका जिन्होंने आधुनिक बालिका स्कूलों की शुरुआत की और महिला शिक्षा को ज्ञान की कुंजी माना। वह जानती थीं कि इसी से समाज बदलेगा और समानता आएगी। उनका आंदोलन शिक्षा, सामाजिक सुधार के लिए तथा समाज की प्रभुत्वशाली संस्कृति के विरुद्ध था।

डॉ मंदाकिनी का कहना था कि सावित्रीबाई को काफी विरोध का सामना करना पड़ा । उनका संघर्ष आसान नहीं था। उस समाज में एक महिला के लिए पहले अपने जातीय एवं वर्गीय व्यस्था से लड़ना था। उस वक्त औपनिवेशिक सत्ता से संघर्ष चल रहा था, ऐसे में सावित्रीबाई फुले एवं फातिमा शेख ने स्कूलों को स्थापित किया। उनका संघर्ष वर्तमान समय में महिलाओं के लिए प्रेरणा का श्रोत है।

डा मंदाकिनी राय का यह भी कहना था कि शिक्षा की हालत आज ऐसी है कि लड़कियों को शिक्षा से बाहर करने के तमाम उपक्रम किए जा रहे हैं। देश लोकतांत्रिक है लेकिन हमारे परिवार और समाज में कितनी लोकतांत्रिकता है, इस पर प्रश्न चिन्ह है। ऐसे में हमारी पहली जरूरत है कि न सिर्फ स्कूली शिक्षा बल्कि लोकतंत्र की शिक्षा से भी हमारे परिवार और समाज को शिक्षित-दीक्षित किया जाए।

बीज वक्तव्य देते हुए एपवा की जिला संयोजक सरोजिनी बिष्ट ने बढ़ती हुई हिंसा व बलात्कार पर अपनी चिंता जताते हुए कहा कि बलात्कारियों को संरक्षण मिल रहा है। राम-रहीम, आसाराम, कुलदीप सेंगर को पैरोल, बेल मिलता है, वहीं सामाजिक आंदोलन के कार्यकर्ताओं का दमन-उत्पीड़न हो रहा है। मनुवादी विचारों की तो हवा बह रही है। ऐसे में महिलाओं का संगठित होना जरूरी है। जन आंदोलन को तेज करके ही सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख की क्रांतिकारी विरासत को आगे बढ़ाया जा सकता है।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में विमल किशोर, हिना रिज़वी, रेणु शुक्ला, साजिदा सबा, प्रिया वर्मा, श्रद्धा बाजपेई, नैय्यर उमर, रोहिणी जॉन, शांतम निधि और संविधा ने अपनी कविताओं व शायरी के रंग से श्रोताओं को परिचित कराया।

गोष्ठी की अध्यक्षता विमल किशोर ने की। इस मौके पर उन्होंने तीन कविताएं सुनाईं। ‘ऐ यह सुंदर लड़कियां’ तथा ‘एक मुट्ठी रेत’ में पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के दुख-दर्द व उपेक्षा को व्यक्त किया। वहीं ‘युद्ध के विरुद्ध’ कविता में वे कहती हैं ‘यह युद्ध का मंजर/ गहराई तक भेद रहा मर्म को /हर तरफ चीत्कार और तबाही/बेवा होती स्त्रियां /बेटे के इंतजार में बूढ़ी होती मां/अपना सहारा ढूंढती’और आगे सवाल करती हैं ‘मानवता लहूलूहान है/ जिंदगी का चीरहरण हो रहा है/ और हम मूक दर्शक बने देख रहे हैं /हमारा खून खौलता क्यों नहीं/ यह खून पानी तो नहीं हो गया’।

प्रिया वर्मा ‘आरम्भिक शिक्षक’ में अपने भाव को कुछ यूं व्यक्त किया ‘व्यवस्था का सबसे बारीक़ पेंच हूँ /गाहेबगाहे कस दी जाती है व्यवस्था मेरे जैसों के चुंबक के सहारे से/पेंचकस जिस हाथ में है उसी के दिए रुपयों से छड़ी खरीदती हूँ इसके लिए /कि नागरिक बन रहे हैं इस फैक्ट्री में /आने वाले किसी कल के लिए’। रेणु शुक्ला ने ‘कश्मीर’ शीर्षक से तीन कविताओं का पाठ किया। ‘स्त्रियां’ कविता में कहती हैं ‘ताबूत में आखिरी कीलें/ लगाने का काम करेंगी /यदि उन्हें जिंदा दफनाने की होगी कोशिश/ श्मशान में मचाएंगी वे हुड़दंग /यदि आग में उन्हें झोंकाने की होगी कोशिश’।

साजिदा सबा और हिना रिज़वी ने अपने कलाम से समां बांधा। जहां साजिदा सबा ने ‘किचन से कलम तक’ के संघर्ष को अपनी ग़ज़ल सुना कर बताया। वहीं हिना रिजवी ने स्त्री के अन्दर बराबरी की जो चाह है, इस आकांक्षा व भाव को अपनी नज़्म के द्वारा व्यक्त किया। नैय्यर उमर साहब साहब पीछे नहीं थे। उन्होंने ‘पाप की मां’ कविता सुनाई।

कविता पाठ की शुरूआत युवा कवयित्री संविधा से हुई। उन्होंने ‘बिगड़ी हुई औरत’ सुनाई तो शांतम निधि अपनी कविता के माध्यम से क्वीयर समाज की अनुभूति और संघर्ष को व्यक्त किया। रोहिणी जान ने ‘गुहर’ और ‘इल्म’ से तालियां बटोरी। श्रद्धा वाजपेई ने ‘षडयंत्र’ तथा ‘बलात्कार’ कविता का पाठ किया। सरोजिनी बिष्ट ‘सुनो लड़कियों’ में कहती हैं- ‘सुनो लड़कियों /तुम बुरी बन जाना/स्वर्ग की चाहत न पालना/गमले में उगा फूल न बनना…. /पोखर में ठहरा पानी न बनना…. /बंद किताब के पन्ने न बनना/ख़ुद को बयाँ करता वो सफ़ह बन जाना/हाँ, उस सफ़ह में एक लफ्ज़ “इंकलाब ” ज़रूर लिखना…/सुनो लड़कियों आज एक कलम उठाओ /और एक कोरे सफ़ह में लिख डालो /मैं एक बुरी लड़की’।

जन संस्कृति मंच की ओर से सईदा सायरा ने सभी का स्वागत किया तथा इस मौके पर एक कविता भी सुनाई।धन्यवाद ज्ञापित किया एपवा की कमला गौतम ने। उन्होंने बताया कि 3 जनवरी से 9 जनवरी तक पूरे सप्ताह सावित्रीबाई-फातिमा शेख की स्मृति में एपवा की ओर से जन अभियान चलाया जा रहा है । इसकी शुरुआत 3 जनवरी को शहीद स्मारक पर संयुक्त प्रदर्शन से हुआ। आगे लखनऊ के विभिन्न क्षेत्रों जैसे हरदासीखेड़ा, मोहेबुल्लापुर, गोराही आदि जगहों पर आयोजनों के द्वारा महिला विरोधी, जातिवादी-सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ जन प्रतिरोध को तेज किया जाएगा। इस अवसर पर कौशल किशोर, धर्मेंद्र कुमार, श्री प्रकाश मिश्रा (इलाहाबाद), फरजाना महदी, सुचित माथुर, ज्योति राय, नमिता, सिम्मी अब्बास, हर्षवर्धन, ए शर्मा, सुकृति, राकेश सैनी आदि मौजूद रहे।

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