Sunday, January 16, 2022
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किसान आन्दोलनः आठ महीने का गतिपथ और उसका भविष्य-छब्बीस

जयप्रकाश नारायण 

किसान आंदोलन का भविष्य

(आखिरी कड़ी)

किसान आन्दोलन  को इस समय तीन मोर्चों पर संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा। पहला मोर्चा उन्होंने 26-27 तारीख को राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाकर सुदृढ़ करने की योजना बना ली है।

ढाई हजार से ज्यादा प्रतिनिधियों के भाग लेने और विभिन्न सवालों पर गंभीर मंथन करने के बाद जो दिशा निकलेगी, वह किसान आंदोलन को आगे ले जाने के लिए निर्णायक भूमिका निभाएगी।

25 सितंबर को राष्ट्रव्यापी बंद का आवाहन करके किसान आंदोलन ने सिंघु बॉर्डर से अपने इरादे का संकेत दे दिया है।

दूसरा, किसान आंदोलन को भारतीय समाज के वर्ण-व्यवस्था जन्य सबसे जटिल समस्या को संबोधित करना होगा। भारतीय समाज जातियों में  विभाजित श्रेणी मूलक समाज है। जिस कारण से मजबूत जाति विभाजित समाज है।

नागरिक की चेतना के निर्माण में जाति व्यवहार और जातियों की स्थिति एक निर्णायक भूमिका निभाती है। जिसमें खुले और आंतरिक तौर पर आपस में शंकाएं तथा दूरियां रहती हैं।

किसान आंदोलन ने इस दिशा में मजबूत बेहतरीन कदम उठाए हैं। आंदोलन के केंद्र में पंजाब के किसानों के होने के चलते जाति व्यवस्था जनक समस्याओं से आंदोलन के मोर्चे पर एक सीमा तक विजय पायी जा चुकी है।

लेकिन उत्तर भारत के विस्तृत फैले हुए मैदानों में अभी इस सवाल को हल करना बाकी है। आने वाले समय में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब जैसे राज्यों के चुनाव होने हैं।

कारपोरेट पूंजी पर पलने वाली राजनीतिक ताकतों ने जाति विभाजन को अपने राजनीतिक स्वार्थों में तीव्र कर दिया है। छोटी-छोटी जातीय पार्टियां बना कर सत्ता में भागीदारी, हिस्सेदारी के नाम पर सौदेबाजी का खेल शुरु हो चुका है।

आने वाला पांच-छः महीना उत्तर प्रदेश में जातियों के मध्यवर्गीय दलाल, ठेकेदार और विखंडित समूहों द्वारा, जो जातियों से ऊपर उठ गए हैं; अपने स्वार्थों के लिए तीव्र जाति विद्वेष और टकराव पैदा करने की कोशिश होगी। हालांकि इसके मूल में उनके सौदेबाजी की आकांक्षा ही प्रधान होती है। इनकी कोई राजनीतिक दृष्टि नहीं होती है, न भविष्य का कोई सपना होता है।यह सभी सिर्फ किसी न किसी दल के साथ सत्ता में हिस्सेदारी और कुछ सौदेबाजी कर  आर्थिक और राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं।

इसलिए उत्तर प्रदेश में  आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए किसान मोर्चे को इस सवाल पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

तीसरा, अभी तक किसान आंदोलन ने अपने को किसी राजनीतिक दल के साथ नहीं जोड़ा है। राजनीतिक पार्टियों से दूरी बनाए रखी है। लेकिन भाजपा विरोधी पक्ष लेकर किसान मोर्चा ने भविष्य का संकेत दे दिया है ।

उत्तर प्रदेश में दूसरा जो सवाल है, वह भाजपा द्वारा सांप्रदायिक उन्माद बढ़ाना। इस दिशा में सरकार और संघ की तरफ से पुरजोर प्रयास चल रहा है ।

इस क्रम में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार मुस्लिम नामों से बने शहरों, कस्बों, संस्थानों के नाम बदल कर उन्हें उत्तेजित करने और अपने तीखे नफरती  बयानों के द्वारा एक सांप्रदायिक उन्माद फैलाने की कोशिश शुरू कर दी है।

अफगानिस्तान में तालिबान के सत्तारूढ़ होने ने भाजपा को एक सुनहरा अवसर दे दिया है। उसका पूरा प्रचार अभियान तालिबानियों के झूठे-सच्चे कामों को आपराधिक बर्बरता के स्तर पर  प्रचारित करना और इसके साथ मुस्लिम समाज को जोड़ना और उसे अलगाव में डालने पर केंद्रित है। प्रधानमंत्री द्वारा 14 अगस्त को विभाजन की स्मृतियों को ताजा करने का प्रयास उत्तर प्रदेश के संदर्भ में ही हमें देखना होगा।

एक बात बहुत स्पष्ट हो चुकी है, कि गुजरात  मॉडल को भारत में अब नहीं बेचा  जा सकता है। जिस मॉडल को मीडिया और कारपोरेट पूंजी के भारी प्रचार और आभा मंडल के द्वारा उत्तर भारत के नागरिकों में प्रचारित किया गया और एक हद तक स्वीकृति दिलाई गई, उसके अंदर छिपा क्रूरता-विद्रूपता, मनुष्य विरोधी पूरी प्रवृत्ति और व्यापक मेहनतकश जनता की गरीबी, बेहुरमति और कारपोरेटपरस्ती की पूरी पोल खुल चुकी है।

इसलिए आने वाले समय में भाजपा या मोदी सरकार गुजरात मॉडल का नाम लेने से भी डर रही है। उन्होंने एक नया मॉडल उत्तर प्रदेश का जोगी मॉडल को इधर बड़े जोर-शोर से प्रचारित करना शुरू किया है। कोविड महामारी की दूसरी लहर में जिस तरह की बदइन्तजामी, अराजकता, हाहाकार, दर्द भरी चीखें, रोते-बिलखते परिजन ऑक्सीजन और बेड के लिए तड़पते-मरते हुए लोग दिखे।

उसको ही मोदी और शाह ने आकर बनारस में  जोगी सरकार के इस सवाल पर भी कसीदे पढ़े। उन्होंने बताया कि पूरे दुनिया में उत्तर प्रदेश ने सबसे बेहतर ढंग से कोविड महामारी का प्रबंधन किया है। जबकि बीमारी, उसकी बर्बरता और विनाश, उत्तर प्रदेश का शायद ही कोई परिवार बचा नहीं होगा, जिसने न भोगा हो या देखा हो।

उत्तर प्रदेश में चल रहे पुलिस राज को भी महिमामंडित किया जा रहा है। इसे एक मजबूत सरकार के रूप में और कठोर निर्णय लेने वाली  सरकार के तौर पर पेश किया जा रहा है।

इस  सरकार का कहर दलितों, कमजोर वर्गों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों पर बरपा हो रहा है। कानून नाम का कोई शासन ही नहीं है।

उच्च न्यायालय के बार-बार चेतावनी देने के बाद भी योगी सरकार किसी भी तरह के संवैधानिक विधिक मान्यताओं को मानने के लिए तैयार नहीं है।

सरेआम फर्जी मुठभेड़ में हत्या, महिलाओं के साथ बलात्कार, पुलिस का महिलाओं पर बर्बर अत्याचार, उनके सीने पर चढ़कर पुलिस अधिकारियों द्वारा महिलाओं,  बच्चों और बुजुर्गों तक पर जुल्म आम बात हो गई है।

लगातार घृणा अभियान चलाकर उत्तर प्रदेश में क्रूरता भरा समाज निर्मित किया जा रहा है। जिसके द्वारा पूरे प्रदेश में भय का वातावरण पैदा कर दिया गया है। किसान आंदोलन ने अपने मंच से मिशन उत्तर प्रदेश 2022 की घोषणा तो जरूर कर दी है, लेकिन उसे इस सवाल पर बहुत सतर्क और गंभीर रहना होगा।

उत्तर प्रदेश में लोकतांत्रिक विरोध के लिए रत्ती भर भी जगह इस सरकार ने नहीं छोड़ी है। हालांकि  किसान आंदोलन ने योगी सरकार को धीरे-धीरे पीछे  हटने के लिए मजबूर कर दिया है। लेकिन उत्तर प्रदेश के बड़े राजनीतिक दलों ने जिस तरह से योगी सरकार के अत्याचार और अपराध पर परदादारी की है और किसान आंदोलन के प्रति  औपचारिक रूख  अपनाया  है, उसे हमें जरूर समझना होगा।

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक दलों ने अपने कार्यकर्ताओं को जो, मूलतः किसान परिवारों से आते हैं, इस आंदोलन के मुद्दों और कानून की भयानकता से परिचय कराया होता, उन्हें संगठित किया होता तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी एक बड़ा किसान आंदोलन निश्चय ही खड़ा हो जाता।

इसलिए उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन को इस सवाल को जरूर संबोधित करना होगा। जातियों की  गोलबंदी, पूंजी निवेश, सत्ता के लालच और अपने समाज के साथ गद्दारी, जो मूलतः कृषक समाज है, के कारण ये सारे दल ऊपर-ऊपर  सौदेबाजी करते हैं।

लेकिन नीचे के जनाधार में फैले आर्थिक संकट के कारण जमीन पर कोई उत्साह नहीं है। हमें इस सवाल को भी गंभीरता से लेना होगा।

दलितों के ऊपर उत्तर प्रदेश में भारी दमन अभियान चलाया जा रहा है। केंद्रीय मंत्रिमंडल और उत्तर प्रदेश के संभावित मंत्रिमंडल विस्तार में संभवतः कुछ दलित समाज के प्रतिनिधियों को शामिल कर यह धूर्तता भरा अभियान चलाया जाएगा कि भाजपा ने देखो दलित जातियों  पिछड़ों और गरीबों को प्रतिनिधित्व दिया है और उनको सम्मान दिलाया है।

इसका संकेत संसद में मोदी ने अपने मंत्रियों का परिचय कराते दे दिया था।  उत्तर प्रदेश का चुनाव पिछड़ी जातियों को केंद्र करते हुए लड़ा जाएगा। पिछले साढ़े चार वर्षों में दलितों-पिछड़ों, गरीबों पर हमले हुए हैं, उन्हें तबाह किया गया है, पीटा गया है, हत्याएं हुई हैं।

इस आड़ में यह अपराध छिपाने  की कोशिश चल रही है।

नौजवानों में व्यापक आक्रोश है। वह एक संघर्ष का मंच तलाश रहे हैं, जहां उनके सवालों को भी संबोधित किया जाए, उन्हें सम्मान मिले, उनके आरक्षण की रक्षा हो और उन्हें सामाजिक बराबरी के स्तर पर खड़ा कर  किसान आंदोलन को व्यापक किया जा सकता है। यह एक बड़ी चुनौती है।

आखरी चुनौती जो किसान आंदोलन के सामने है, उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में वामपंथी राजनीतिक दलों को छोड़कर  आर्थिक नीतियों पर किसी विपक्षी सरकार, सत्ताधारी विपक्षी पार्टियों का कोई विरोध कभी नहीं रहा है। लगभग सभी पार्टियों में सर्व सहमति रही है।

सभी सरकारों ने निजीकरण, सरकारी संपत्ति को कंपनियों को बेचना हो, कारपोरेट पूंजी को आकर्षित करना हो और विकास के नाम पर किसानों से कौड़ी के दाम पर जमीन का अधिग्रहण, यह सब में इन सरकारों में मतैक्य रहा है।

भारत में कारपोरेट के साथ विदेशी पूंजी के गठजोड़ को लेकर ही विकास का मॉडल ले आ रहे हैं और भारत की वास्तविकता के साथ अपने को जोड़कर कोई एक नया  मॉडल जो भारत के श्रम-शक्ति, प्राकृतिक संपदा के समन्वय से आर्थिक परियोजना को हमें जनता के सामने रखना होगा।

इसमें गरीबों के लिए रोजगार, खेत मजदूरों के लिए काम, उनकी जिंदगी के सुरक्षा की गारंटी, मध्यम किसानों के लिए पूंजी निवेश, बटाईदार किसानों के अधिकारों की गारंटी और कृषि के क्षेत्र में व्यापक इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की लड़ाई को तेज करना होगा और इन सारी पार्टियों की आर्थिक नीतियों को बेनकाब करते हुए इनकी नीतियों को किसान आंदोलन को गंभीर चुनौती देनी होगी।

इसलिए आने वाले समय में किसान आंदोलन को इन बाधाओं को पार करना है । आंदोलन समाज को बहुत कुछ सीखने का मौका देता है।

हमने आजादी के दौर में बहुत सामान्य  सवालों से अपनी बातें शुरू की थी। हमारे पूर्वजों ने कुछ नौकरियां, कुछ इज्जत, कुछ रोजगार जैसे छोटे-छोटे सवालों से आजादी की लड़ाई की शुरुआत की थी, लेकिन बाद के दौर में क्रांतिकारी आंदोलन की धारा और परिस्थितियों के विकास के साथ-साथ  लोगों ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा देकर आजादी की लड़ाई को जन आंदोलन और जन क्रांति में बदल दिया था। और भारी कुर्बानी दी।

लोकतंत्र के निर्माण की दो दिशाएं होती हैं, एक नीचे से जनता की सक्रियता को समायोजित करना, उसे संगठित करना, उसके लोकतांत्रीकरण को गति गति देते हुए जाति, धर्म, क्षेत्र के विभाजन को मिटाते हुए  सामूहिक हितों के साथ समग्र राष्ट्र को जोड़ना और ऊपर से राजनीतिक पहल कदमी लेकर एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन का निर्माण करना।

यह लोकतंत्र के  निर्माण का सबसे स्वस्थ और मजबूत मार्ग होता है। किसान आंदोलन के सामने यह सवाल दरपेश है। किसान आंदोलन को आज भारत के लोकतंत्र के भी सवाल को हल करना है।

जिस तरह से भारतीय लोकतंत्र की सारी संस्थाओं को ध्वस्त किया जा रहा है, नागरिकों के अधिकारों को छीना जा रहा है  छात्रों, बेरोजगारों के लिए किसी तरह की परियोजनाएं नहीं शुरू की जा रही हैं, इन सब सवालों को किसान आंदोलन को संबोधित करना है।

अभी किसान आंदोलन में संविधान बचाओ, देश बचाओ, आजादी बचाओ जैसे नारे तो आ गए हैं, लेकिन इसे और सुव्यवस्थित करना होगा और खुद लोकतंत्र की मूल अवधारणा पर मजबूती से खड़ा होकर के   सभी  नागरिकों के अधिकारों की गारंटी, समानता, बंधुत्व, भाईचारा जैसे सवालों को उन्नत स्तर पर ले जाकर किसान आंदोलन को बहुत आगे ले जाया जा सकता है।

मुझे उम्मीद है, कि यह किसान आंदोलन इस दिशा में आगे बढ़ेगा और भारत में मौजूद गहरे कृषि संकट को हल करते हुए भारत के किसानों और मजदूरों के भविष्य को संवारा जा सकता है। और भारत के लोकतंत्र का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है।  भारत के नागरिकों के आंतरिक संबंधों को लोकतांत्रिक आधार पर समृद्ध करते हुए उत्पादन शक्तियों के बीच के संबंधों को श्रम की गरिमा के आधार पर पुनःनिर्धारित कर एक विकसित औद्योगिक राष्ट्र में बदला जा सकता है।

भारत ने अभूतपूर्व जन सक्रियता आज के दौर में देखी है, इस सक्रियता को भारत के निर्माण  और विकसित औद्योगिक राष्ट्र के स्तर तक उन्नत करते हुए हमें किसान आंदोलन को भारत के लोकतांत्रीकरण की सर्वोच्च मंजिल तक पहुंचाना होगा।

क्रांतिकारी वामपंथी ताकतों के लिए यह सबसे बेहतर अवसर है।

किसान आंदोलन ने भारत के करोड़ों जनगण में एक नई तरह की चेतना, आत्मविश्वास और संघर्ष करने की क्षमता का विकास कर दिया है। एक क्रांतिकारी जनवादी नीति का विकास करते हुए किसान आंदोलन को नई ऊंचाई पर ले जाने की जिम्मेदारी वाम जनवादी ताकतों के कंधों पर आ पड़ी है और मैं समझता हूँ, इस जिम्मेदारी को उन्हें उठाते हुए किसान आंदोलन के साथ अपनी एकता को विकसित करते हुए भारत के सभी संघर्षशील शक्तियों को एकताबद्ध करने, उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने और एक नए जनवादी भारत के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने का कार्यभार पूरा करना चाहिए!

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