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किसान आन्दोलनः आठ महीने का गतिपथ और उसका भविष्य-सत्रह

जयप्रकाश नारायण 

भारतीय समाज के यथार्थ से टकराता, राह खोजता किसान आंदोलन

किसान आंदोलन को राज्य के निर्मम दमन से लड़ते हुए भारतीय समाज के अंदर मौजूद विभाजन से भी टकराना पड़ रहा है।

हमारी सामाजिक संरचना, वर्ण व्यवस्था के जटिल  ताने-बाने से गुथी बनी है, जो भाषा धर्म की  चेतना से युक्त पिछड़ी जीवन स्थितियों और उन्नत कारपोरेट पूंजी के गिरफ्त में फँसा  एक क्लासिकल सामाजिक-राजनीतिक ढांचे   का निर्माण करता है । जहां घटनाएं सीधे-सपाट   दिशा  में आगे नहीं बढ़ती।

भारतीय राज्य का ऊपरी संस्तर विश्व साम्राज्यवादी पूंजी के साथ नाभिनालबद्ध है ।

वे एक ऐसे जीवनशैली और जीवन प्रणाली तथा सांस्कृतिक-सामाजिक परिवेश का आभामंडल रचते  हैं, जो 90% से ऊपर भारतीयों के लिए परीलोक की कहानी ही हो सकती है।

सत्ता के शीर्ष पर आरूढ़ शासक वर्गों  की राजसी गलीज जिंदगी, राज्य मशीनरी और संसाधनों के बेशर्म, बेखौफ दुरुपयोग करने के सामंती प्रवृत्ति से ग्रस्त है।

अभी भी उसमें यह क्षमता  है, कि समाज और राज्य को आंतरिक रुप से नियंत्रित कर अपने अनुकूल राजनीतिक, सामाजिक परिस्थितियां बना ले ।

अभी भी भारत के ग्रामीण इलाकों में फैली हुई गरीबी, भुखमरी, अभाव में जी रहा आम नागरिक मनुष्य होने की जद्दोजहद  से गुजर रहा है।

रोजमर्रा की जिंदगी में रोटी-दाल के जुगाड़ में फंसी हुई हमारी बहुत बड़ी आबादी  तक शासक समूहों और उनके प्रतिनिधियों की अपनी पहुंच और पकड़ बनी हुई है, जिस कारण से लोकतंत्र और जन-सरोकार से रहित राजनीतिक ढांचे पूंजी के बहुत महीन जाल में फंसा देने की क्षमता रखता है।

इस यथार्थ में खड़े होकर हम किसान आंदोलन के सामने मौजूद चुनौतियों और उसके द्वारा कि जा रहे प्रयासों पर एक नजर डालते हैं।

आमतौर पर लगता है, कि भारत में मतदान प्रक्रिया समय से और एक कमजोर ही सही, लोकतांत्रिक  ढांचे के अंतर्गत आभासी निष्पक्षता में संचालित होती है।

लेकिन  सत्ता का ऊपरी ताना-बाना और यथार्थ बहुत ही जटिल, उलझे हुए  पूंजी के महीन तारों से जकड़ा हुआ है। वह जो यथार्थ निर्मित करता है, उसकी तस्वीर बहुत भयानक है।

2009 में दोबारा मनमोहन सिंह के नेतृत्व में जीत कर आयी हुई कांग्रेस का सूरज चमक रहा था। मनमोहन सिंह धीर, गंभीर, उदात्त नायक के रूप में प्रतिष्ठा के चरम पर पहुंच चुके थे।

लगता था, एक स्थाई राजनीतिक ढांचा और कंबीनेशन भारत को मिल गया है। लेकिन आंतरिक यथार्थ की गति कुछ और ही दिशा की तरफ बढ़ रही थी।

अपनी बहुचर्चित और विवादित पुस्तक में राना अय्यूब ने एक प्रसंग का जिक्र किया है। वह गुजरात की पूर्व मंत्री गुजरात नरसंहार के दौर में जेल की यात्रा कर चुकी माया कोडनानी से उनके घर पर बात कर रहीं थीं।

माया कोडनानी ने कहा ‘साहेब’ तो अब दिल्ली जा रहा है और आनंदी को, जो इस समय उत्तर प्रदेश की महामहिम राज्यपाल हैं, उन्हें मुख्यमंत्री बनाने जा रहा है।

2012 में प्रतिरोध के सिनेमा का प्रथम चैप्टर आज़मगढ़ में शुरू हो रहा था, तो उस कार्यक्रम के उद्घाटन के लिए मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध लेखिका,  सामाजिक-राजनीतिक चिंतक और मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुंधति राॅय को बुलाया गया था।

उन्होंने सार्वजनिक रूप से नेहरू हाल, आज़मगढ़ में कहा, कि मनमोहन सिंह अब बड़ी भारतीय पूंजी के लिए अनुपयुक्त हो गए हैं। उनकी जगह पर तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने जा रहे हैं।

हमारे जैसे सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए ये सूचनाएं कुछ अजीब सी लगी। हमें इस पर यकीन नहीं हुआ। हम इसे एक परिकल्पना से ज्यादा लेने के लिए तैयार नहीं थे।

लेकिन 2012 के बाद  सत्ता के प्रतिष्ठानों में बैठे, छिपे नौकरशाहों द्वारा ऊपरी स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार के अनुमानित रिकॉर्ड सामने लाये गये।

उसे केंद्रित कर एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन का सृजन किया गया, जिसे अंबानी जैसे कारपोरेट लार्डो के  प्रचार नेटवर्क के द्वारा  आम जनमानस में बैठाया गया।

इस तरह का माहौल बनाया गया  कि मनमोहन सिंह एक असहाय, कमजोर प्रधानमंत्री हैं और घटनाओं को सीधे अपने हाथ से फिसलते हुए देखने की दयनीय स्थिति में पहुंच गए थे ।

तीन साल में ही भारतीय समाज  और राज्य पर मनमोहन सिंह का छाया हुआ  आभामंडल ध्वस्त हो गया।

इसी दौर में ज्ञान, विज्ञान और राजनीतिक  दूरदृष्टिविहीन  सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत वाले अन्ना हजारे कारपोरेट पूंजी और आरएसएस के हजार मुंह वाले प्रचार के माध्यमों के बल पर विराट आंदोलनकारी व्यक्तित्व के तौर पर उभरे।

कांग्रेस की सत्ता पर पकड़ और मनमोहन सिंह की तस्वीर खंडित हो चुकी थी । अनुकूल राजनीतिक अवसर का लाभ उठाते हुए भाजपा कार्यकारिणी की बैठक हुई। जिसमें भावी प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में गुजरात के मुख्यमंत्री का प्रस्ताव आया।

इस प्रसंग  में  ढेर सारी सूचनाएं,  तथ्यगत प्रामाणिक जानकारियां हर जगह उपलब्ध है। कैसे नरेंद्र मोदी ने आडवाणी जैसे बड़े ताकतवर व्यक्तित्व को चुनौती देते हुए  प्रधानमंत्री की दौड़ में अपने गुरु को पीछे धकेल दिया। तर्क था, कारपोरेट पूंजी का निर्लज्ज और खुला समर्थन किसको मिलेगा।

अंबानी बंधुओं और अडानी तथा क्लासिकल पूंजीवाद के प्रतिनिधि कहे जाने वाले रतन टाटा तक को गुजरात वाइब्रेंट के दौरान कहना पड़ा, कि नरेंद्र भाई भारत के प्रधानमंत्री के सबसे योग्य और उपयुक्त व्यक्ति  हैं ।

ज्ञातव्य हो, कि नैनो कार बनाने के टाटा प्रोजेक्ट को बंगाल के किसानों ने बंगाल से खदेड़ दिया तो नरेंद्र मोदी ने कौड़ी के भाव गुजरात में टाटा को जमीन मुहैया करायी थी।

हम जानते हैं, कि अडानी के निजी हेलीकॉप्टर पर बैठे हुए गुजरात के मुख्यमंत्री अदृश्य पूंजी के खुले सहयोग और तीखे आक्रामक प्रचार के बल पर बड़े-बड़े भव्य आयोजनों , रैलियों  के आयोजनों के साथ, सीधे कारपोरेट लुटेरी पूंजी के नियंत्रण में चल रहे टेलीविजन प्रसारणों में 24 घंटे में 23 घंटे स्क्रीन पर दिन-रात छाये रहे।

देखते-देखते भारत के उद्धारक, महाबली, महानायक, महाज्ञानी, दिव्य पुरुष मजबूत नेतृत्व और निर्णय लेने में साहसिक पहलकदमी लेने वाले नेता के रूप में मोदी की काल्पनिक  छवि गढ़  दी गयी ।

2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान राजधानी एक्सप्रेस की तरह धड़धड़ाते हुए नरेंद्र मोदी दिल्ली की प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जा बैठे।

कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था राजनीतिक विश्लेषकों को, सामाजिक कार्यकर्ताओं को और राजनीतिक दलों को।

लेकिन यह हो चुका था, कारपोरेट पूंजी के नग्न समर्थन के बल पर खड़ा किया गया आभामंडल भारत के जीवन में फैले हुए करोड़ों बेरोजगार नौजवानों, लंपट समूह, जाति और धर्म के जहरीले विभाजन में गहराई तक डूबे,  मानवीय गरिमा खो चुके समाज के व्यापक हिस्से में जिस तरह की आशा, उम्मीद और नये भारत का सपना दिखाया गया वह एक अलग ही कहानी है।

साफ है, कि भारत के सत्ता पर  कारपोरेट गठजोड़ का प्रतिनिधि हिंदुत्व के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की घोल के साथ काबिज हो गया है।

उसके सामने निर्धारित कार्यभार था, कि संकट में गहरे तक फंसी हुई  पूंजी के विस्तार और  लूट के लिए भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक ढांचे में जो कुछ भी अवरोध है, जो कुछ भी कल्याणकारी है, जो कुछ भी समाज के हित और उसके जीवन को थोड़ा सा राहत देने वाला है, जो श्रम-कानून, पूंजी के लूट में बाधा हैं, उन सब को हटा कर पूंजी के स्वतंत्र विचरण और लूट के लिए भारत के 135 करोड़ लोगों और हजारों किलोमीटर में फैले हुए भारतीय प्राकृतिक संसाधनों  के दोहन के लिए मार्ग प्रशस्त किया जाय।

पिछले 7 वर्षों में मोदी सरकार अपने मित्र पूंजीपतियों के स्वार्थों की पूर्ति के कार्यभार को  बखूबी अंजाम दे रही  है।

किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में यह एक अवांतर कथा है। जिसे समझने के बाद ही हम आज  किसानों के सामने खड़े किए गए विधिक संकट को समझने की तरफ बढ़ सकते हैं ।

किसान आंदोलन अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए सही निशाने की तलाश कर सकता है और उस पर चोट कर सकता है। आज किसान आंदोलन को  मनुष्य और लोकतंत्र विरोधी ताकत से लड़ना है। जिसे वह बखूबी समझ चुका है।

स्पष्टता और राजनीतिक समझ के चलते ही किसान आंदोलन साढ़े 8 महीने से टिका हुआ है। आंदोलन के शुरुआती 2 महीने बाद जब किसान नेताओं ने यह कहना शुरू किया, कि यह सरकार न भाजपा की है, न मोदी की है, यह अडानी-अंबानी की सरकार है, तो किसान आंदोलन की इसी अनुभूति को वे व्यक्त कर रहे थे ।

इसलिए कालांतर में चलकर किसान आंदोलन ने अडानी-अंबानी के माल, पेट्रोल पंप और उनके उत्पादों के बहिष्कार का नारा दिया तो जिओ की सिम  को पोर्ट कराने की  होड़-सी मच गयी थी ।

अंबानी को यह कहना पड़ा, कि वे कृषि उत्पाद के बाजार में कहीं से भी शामिल नहीं हैं, न ही उनकी कोई ऐसी योजना है।

किसान आंदोलन में शामिल किसान संगठनों और नेताओं को अपनी वैचारिक, राजनीतिक समझ को और स्पष्ट करते हुए  कारपोरेट पूंजी के भारत की राज्य मशीनरी पर निर्लज्ज पकड़ और खेती-किसानी बचाने के इस संघर्ष को सीधे हिंदुत्व-कारपोरेट गठजोड़ के खिलाफ केंद्रित करना होगा और वह ऐसा कर भी रहा है ।

यहीं से कृषि संकट के भंवर में  फंसी गाड़ी, आगे अपने रास्ते पर बढ़ेगी।
(अगली कड़ी में जारी)

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