समकालीन जनमत
जनमत

स्वाधीनता आंदोलन का वाम तेवर

                                      

आज़ादी का अमृत महोत्सव उसके लिए लड़ने वालों को याद करने का भी मौका है। यह आज़ादी उपनिवेशवाद से लड़ाई करके हासिल की गयी थी। इस लड़ाई ने हमारे देश के भीतर स्वाधीनता की आकांक्षा को जन्म दिया था। आधुनिक भारत के रूप को बनाने में इस लड़ाई का निर्णायक योगदान है। जिसे आज देश की एकता कहा जाता है उसे न केवल भौगोलिक बल्कि भावनात्मक रूप से भी हासिल करने में आजादी की लड़ाई का योगदान है।

सीधी बात यह है कि यदि अंग्रेजी राज को हम भारत की एकता का संस्थापक कहेंगे तो यह एकता महज ब्रिटिश भारत तक सीमित रहनी थी लेकिन आजादी की जंग उन इलाकों के साथ ही रजवाड़ों के भीतर भी चली थी। तेलंगाना में निज़ामशाही के विरुद्ध संघर्ष से लेकर कश्मीर में कबाइलियों के हमले को अपने दम पर नाकाम करते हुए महाराजा हरिसिंह की रियासत के भारत विलय तक देश के प्रत्येक क्षेत्र के लोगों ने उपनिवेशवाद से लड़ते हुए वर्तमान भारत की तस्वीर का निर्माण किया है। इस भौगोलिक समेकन के साथ ही आजादी के उस संघर्ष ने देश को भावनात्मक रूप से भी एकताबद्ध किया। धर्मों और संस्कृतियों से भरे इस देश में इस एकता को हासिल करने और कायम रखने के लिए जिन सिद्धांतों का सृजन किया गया उन्हें ही हम धर्मनिरपेक्षता और विविधता में एकता के नाम से जानते हैं। न केवल इतना बल्कि आज़ादी के बाद की आत्मनिर्भरता के लिए ही शुरू से स्वदेशी का भाव भी आज़ादी की लड़ाई के साथ जुड़ा रहा।

इस आंदोलन ने हिंदी साहित्य के लेखन को गहराई से प्रभावित किया। इसमें रचनात्मक के साथ वैचारिक लेखन भी शामिल था। प्रसिद्ध आलोचक रामचंद्र शुक्ल ने उपनिवेशवाद को व्याख्यायित करते हुए इसे क्षात्र धर्म के साथ वणिक धर्म का मेल कहा। पुराने साम्राज्यों से उपनिवेशवाद का भेद करने के लिहाज से यह महत्वपूर्ण बात थी। इस सिलसिले में अन्य बातों के अतिरिक्त इसका भी उल्लेख जरूरी है कि बाल गंगाधर तिलक की शब्दावली से उनका प्रेरित होना और चंद्रशेखर आजाद से उनकी निकटता प्रामाणिक रूप से साबित हो चुकी है। इस प्रत्यक्ष संबंध को छोड़ दें तो भी उनके लेखन में स्वाधीनता आंदोलन की अनुगूंजें सुनी जा सकती हैं। अपने समय की साहित्यिक प्रवृत्ति छायावाद की पृष्ठभूमि के रूप में स्वाधीनता आंदोलन की विशेषता को उन्होंने दो मामलों में लक्ष्य किया। इस दौर में स्वाधीनता आंदोलन का प्रसार देहाती इलाकों में हुआ। याद दिलाने की बात नहीं कि इस प्रसार में गांधी के आगमन का निर्णायक योगदान है। देहाती इलाकों में आंदोलन के प्रसार के चलते साहित्यिक रचनाओं का भी व्यापक प्रचार हुआ। दूर-दूर तक मैथिली शरण गुप्त की भारत भारती को लोग पढ़ते थे। इस किताब की विशेषता थी कि देश को काव्य ग्रंथ का विषय पहली बार बनाया गया था।

भारत के स्वाधीनता आंदोलन की दूसरी जिस बड़ी विशेषता का उल्लेख आचार्य शुक्ल ने किया है वह उसकी अंतर्राष्ट्रीयता से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि हमारे देश का स्वाधीनता आंदोलन दुनिया भर में मुक्ति के लिए चलने वाले संघर्षों के मेल में दिखायी पड़ा। उसका यह अंतर्राष्ट्रीय पहलू इस बात से भी प्रकट है कि 1857 में जब उसकी शुरुआत हुई तो लंदन में रह रहे मार्क्स का उसे समर्थन मिला। उसके तीन साल पहले ही रेल आने के अवसर पर मार्क्स ने लिखा कि इसका लाभ भारत देश को तब मिलेगा जब भारतीय लोग ब्रिटेन की सत्ता उखाड़ फेंकें या ब्रिटेन में मजदूर वर्ग पूंजीपतियों का शासन खत्म कर दे। ध्यान देने की बात है कि भारत संबंधी ये लेख मार्क्स ने अमेरिका के एक अखबार में लिखे थे। स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े हुए लगभग सभी नेताओं ने विभिन्न अवसरों पर अंतर्राष्ट्रीय संदर्भों का उल्लेख किया। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि वे अपने देश की तरह ही सभी देशों की आजादी चाहते थे। न केवल इतना बल्कि वे अंग्रेजी राज के विस्तार के लिए दुनिया भर में जारी युद्धों में भारतीयों की भागीदारी की भी मुखालफ़त करते थे।

स्वाधीनता आंदोलन ने जिस भावना को व्यापक मान्यता प्रदान करायी वह सभी मनुष्यों को मुक्ति की प्रेरणा प्रदान करती थी। स्वतंत्रता के बारे में इसी सोच ने जयशंकर ‘प्रसाद’ की कविता में हिमाद्रि तुंग श्रृंग पर ‘स्वयंप्रभा, समुज्ज्वला स्वतंत्रता’ को प्रतिष्ठित कराया जिसको ही हासिल करने के लिए अमर्त्य वीर पुत्रों को बढ़े चलना था। यहां तक कि ‘निराला’ ने सरस्वती से जो वर मांगा वह भारत में प्रिय स्वतंत्र रव भरने का था जो अमृत मंत्र नव भी था। स्वतंत्रता का यह स्वर ही नया मंत्र था जिसे भारत में गुंजा देने की प्रार्थना निराला ने सरस्वती से की। समसामयिक साहित्य को प्रभावित करने की स्वाधीनता आंदोलन की क्षमता का कारण विशाल जनसमुदाय को आंदोलन में बड़े पैमाने पर शामिल कर लेना था। इसके कारण ही उस दौर के साहित्यिक लेखन को व्यापक लोकप्रियता हासिल हुई। सबको शिक्षा नहीं सुलभ थी इसलिए सार्वजनिक पुस्तकालयों की लड़ी के सहारे लोगों ने किताबें पायीं और पढ़ीं। आंबेडकर ने शिक्षित होने की बात सबसे पहले अनायास नहीं की थी।

अंग्रेजी राज ने अपने स्थायित्व के लिए लोगों को विभाजित करने की नीति अपनायी थी इसलिए भी स्वाधीनता आंदोलन को जनता की एकता स्थापित करने की योजना बनानी पड़ी। धार्मिक एकता की बात हमने पहले ही की है। लगभग प्रत्येक कदम पर हमें इसके सबूत मिलते हैं। कारण यह भी था कि अंग्रेजों से पहले के शासन में धार्मिक आधार पर भेदभाव का न के बराबर उदाहरण दिखाई देते हैं। इसी विरासत को 1857 की क्रांति ने अपनाया था। इसमें बेगम हज़रत महल से लेकर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तक और मौलवी अहमदुल्ला शाह से लेकर नाना फड़नवीस तक शामिल रहे। इसके बाद भी कांग्रेस के अध्यक्षों में दादा भाई नौरोजी, बदरुद्दीन तैयबजी से लेकर गोपालकृष्ण गोखले तक थे।

गांधी के आने के बाद तो यह एकता स्वाधीनता की लड़ाई का आधार ही बन गयी । कांग्रेस की धारा से अलग क्रांतिकारियों की धारा में अशफ़ाकुल्ला खान, राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह की दोस्ती को कौन भुला सकता है ! जिस जलियांवाला बाग को पर्यटन के अनुकूल बनाने के लिए लहू के निशान तो मिटाये ही गये, उस पर बनी फ़िल्म ‘सरदार उधम’ को घृणा का प्रचार कहकर आस्कर में भेजने से रोक दिया गया उस सभा को संबोधित करने वालों में सैफ़ुद्दीन किचलू भी थे। बहुत बाद में नौसेना विद्रोह के जिन नेताओं का मुकदमा लड़ने के लिए नेहरू ने काफी अरसे बाद वकीलों का कोट पहना उनमें कैप्टन सहगल के साथ कैप्टन शाहनवाज़ भी थे।

धार्मिक एकता के ही दायरे में बौद्ध धर्म भी आता है। स्वाधीनता के बाद आंबेडकर ने धर्म बदलकर बौद्ध धर्म ग्रहण किया लेकिन उस आंदोलन के दौरान भी बहुतेरे लोग बौद्ध धर्म से जुड़े रहे। इनमें से राहुल सांकृत्यायन का नाम तो सभी जानते हैं जिनका नाम ही बुद्ध के पुत्र के नाम पर रखा गया। उनके अतिरिक्त हिंदी के प्रसिद्ध कवि नागार्जुन का नाम भी मशहूर बौद्ध दार्शनिक के नाम पर रखा है। लेखन के स्तर पर भी आचार्य नरेंद्र देव ने बौद्ध दर्शन के बारे में पुस्तक लिखी। मैथिलीशरण गुप्त की रचना ‘यशोधरा’ महात्मा बुद्ध की पत्नी के नाम पर लिखी गयी । रामवृक्ष बेनीपुरी से लेकर आचार्य परशुराम चतुर्वेदी तक बहुत सारे विद्वानों ने बुद्ध के जीवन को रचना का विषय बनाया। रामचंद्र शुक्ल ने तो ‘लाइट आफ़ एशिया’ का हिंदी काव्यानुवाद ‘बुद्धचरित’ के नाम से किया। कहने की जरूरत नहीं कि इसके पीछे केवल धार्मिक एकता की ही बात नहीं थी। उस समय के नेतागण जानते थे कि वे एशियाई जागरण के अंग हैं और हमारे अधिकांश पड़ोसी देशों से हमारी दोस्ती बुद्ध के बहाने हो सकती है। उस समय के बौद्धिक भारत को आजादी के बाद पड़ोसी देशों का मित्र ही बनाना चाहते थे।            

स्वाधीनता आंदोलन के इस पहलू के साथ ही लोकतंत्र की धारणा भी जुड़ी हुई है। लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन ही नहीं है। बहुमत के साथ ही अल्पमत को भी अभिव्यक्ति और अन्य तमाम किस्म की आजादियों के बिना लोकतंत्र को बहुत आसानी के साथ बहुमत की तानाशाही में बदला जा सकता है। इस खतरे को पहचानने के कारण ही आजादी के संघर्ष के दौरान ही सामाजिक एकता का भी ताना बाना बुना गया। समाज सुधार की तत्कालीन कोशिशों को भी उसी संघर्ष का अंग मानना होगा क्योंकि सभी नेता जानते थे कि पुराने भारत में लौटना सम्भव नहीं। नये भारत की उस समय जो भी तस्वीर बनायी गयी उसमें जातिवाद जनित भेदभाव के विरोध के साथ ही स्त्री की सहभागिता का तत्व भी जुड़ा रहता था।

राजनीति के स्तर पर भले ही समाज सुधार और राजनीतिक अधिकार की धाराओं में भिन्नता रही हो लेकिन साहित्य के लिए उनकी एकता और मेल के कारण ही प्रेमचंद के साहित्य का उदय हुआ जिसमें अंग्रेजीराज के विरोध के साथ ही जातिभेद का विरोध तथा जमींदारों के शोषण का विरोध था। आगामी भारत की आत्मनिर्भरता के लिहाज से आजादी मिलने से पहले ही तमाम आर्थिक उपाय सोचे गये थे जिनमें सबसे महत्वपूर्ण उपाय योजना आयोग का गठन था। इसी तरह स्वावलम्बन के लिए ही आंबेडकर ने ‘राजकीय समाजवाद’ का प्रस्ताव किया था । भूलना नहीं चाहिए कि आंबेडकर मूल रूप से अर्थशास्त्र के विद्यार्थी रहे थे। उनके अमेरिकी प्रवास के अनुभव ने ही उन्हें रिजर्व बैंक का सपना दिया जो आर्थिक उथल पुथल के समय निजी पूंजी की स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगाने का काम करने वाली संस्था होनी थी। कहना न होगा कि आजादी के आंदोलन के इस स्वरूप को गढ़ने में रूस की समाजवादी क्रांति का गहरा दबाव था। इसी वाम दबाव ने हमारे संविधान में देश की प्रभुसत्ता का मालिक ‘हम भारत के लोग’ को बनाया। इनमें मजदूर और किसान बहुमत में थे जिनको ट्रेड यूनियनों तथा किसान सभाओं के झंडे तले संगठित करने में वामपंथियों ने निर्णायक भूमिका निभायी। शायद इसीलिए लेखकों को भी प्रगतिशील लेखक संघ में एकत्र करने में उनकी भूमिका बेहद प्रभावी रही थी। साथ ही स्वस्थ राजनीतिक नेताओं की नयी पौध का निर्माण करने के लिए विद्यार्थियों को एकजुट में भी वामपंथियों ने गहरी रुचि ली।                                    

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