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साहित्य-संस्कृति

वर्ग की अवधारणा को खंडित नहीं करता, बल्कि व्यापक बनाता है अस्मितावाद : डॉ रामायन राम

अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान

दलित चेतना के कवि आशाराम जागरथ और सी बी भारती ने कविताएं सुनाईं

लखनऊ। ” अस्मितावाद न तो सर्वहारा को विभाजित करता है, न ही वर्गीय अवधारणा को खंडित करता है, बल्कि उपेक्षित अभिव्यक्तियों को शामिल करके इसे व्यापक बनाता है। लिहाजा, अस्मितावाद को वर्ग के खिलाफ समझने के बजाय बदलाव की विचारधारा बनाने की जरूरत है। ”

यह बात आलोचक डॉ रामायन राम ने शनिवार को यूपी प्रेस क्लब में ‘अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान’ में कही। जन संस्कृति मंच (जसम) द्वारा आयोजित व्याख्यान का विषय था – ‘अस्मिता के आयाम : साहित्य, संस्कृति और राजनीति’।

डॉ राम ने अस्मितावाद को लेकर भारत के अतीत और वर्तमान में मौजूद असहजता के जिक्र के साथ अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि अस्मितावाद भारतीय राजनीति में लंबे समय से काम कर रहा है, लेकिन उसे स्वीकार करने वाला, अपना कहने वाला कोई नहीं है। यहां तक कि इसके लाभार्थी भी खुद को अस्मितावादी कहने या कहलाने से परहेज करते हैं। उन्होंने अस्मितावाद को परिभाषित करते हुए कहा कि यह कुछ और नहीं, बल्कि उपेक्षित, वंचित, हाशिये की अभिव्यक्तियों को जगह देने और केंद्र में लाने का प्रयास है; दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों इत्यादि की अभिव्यक्तियों पर लगातार विमर्श चलाते रहना है।

उन्होंने अस्मितावाद को देखने के वामपंथी और दक्षिणपंथी नजरिये का फर्क भी सामने रखा। वामपंथी नजरिया जहां इसे वर्ग की अवधारणा को पूर्ण और समावेशी बनाने वाले साधन के रूप में देखता है, तो दक्षिणपंथी नजरिया समाज को विभाजित करने वाले औजार के रूप में। दक्षिणपंथियों का तर्क है कि जब आर्थिक समृद्धि के साथ सर्वहारा मध्यम-वर्ग में बदलता जा रहा है, तो वामपंथी वर्ग संघर्ष की जगह अस्मितावाद को ले आये हैं। पश्चिमी लोकतंत्र और मुक्त-बाजार पूंजीवाद के पैरोकार फुकुयामा जैसे लोग आरोप लगाते हैं कि वामपंथी अस्मितावाद की प्रतिक्रिया में दक्षिणपंथी अस्मितावादियों को फलने-फूलने का मौका मिलता है। यह उत्पीड़ित को ही उत्पीड़न का जिम्मेदार ठहराने जैसा है। यूजीसी रेगुलेशन की प्रतिक्रिया में ‘ब्राह्मणवाद जिंदाबाद’ के नारों में इसी तर्क-पद्धति का इस्तेमाल हो रहा है।

डॉ राम ने अस्मितावाद को समझने में राष्ट्रवादियों और मार्क्सवादियों से हुई चूक की भी चर्चा की। मार्क्सवादियों का जोर था कि वर्ग एक मुकम्मल अवधारणा है और वर्ग संघर्ष से सामंती अवशेष अपने आप खत्म हो जायेंगे, जाति के सवाल खुद-ब-खुद हल हो जायेंगे। उन्होंने अस्मितावाद को वर्गीय अवधारणा को कमजोर करने वाला समझा। सीपीआई द्वारा डॉ आंबेडकर पर सर्वहारा के बीच फूट डालने का आरोप लगाया गया। राष्ट्रवादियों ने तो सामाजिक बदलाव और राजनीतिक बदलाव के कार्यक्रमों को ही अलग रखा। इसे प्रख्यात राष्ट्रवादी सुरेंद्रनाथ बनर्जी के इस कथन से समझा जा सकता है कि अगर हमारी बच्चियां स्कूल नहीं जाती हैं, स्त्रियां घरों में कैद रहती हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम आजादी पाने के अधिकार से वंचित हो जाते हैं। आंबेडकर का मत था कि जाति का उन्मूलन ही राष्ट्र और लोकतंत्र की बुनियाद हो सकता है, जिसे तवज्जो देने के बजाय राष्ट्रवादियों ने उन पर अंग्रेजों से सांठ-गांठ का आरोप लगाया।

डॉ राम ने अस्मितावादी राजनीति के भटकावों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि छोटी जातीय अस्मिताओं के बरअक्स एक व्यापक हिंदुत्ववादी अस्मिता की छतरी बनायी जा रही है, जिसमें वे समाहित होती जा रही हैं। जिस रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की जड़ें आंबेडकरवाद में थीं, आज उसके दफ्तरों पर नीला और भगवा झंडा एक साथ लहरा रहा है। वंचितों के सत्ता में भागीदारी का संघर्ष एक मंत्री पद पाने में सिमट रहा है। फासीवादी चुनौती के सामने हमने अस्मितावादी दलों के आत्मसमर्पण को भी देखा है। फिर भी, अस्मितावाद आज पश्चिम में एक नव-वामपंथी विचार के रूप में देखा जा रहा है, जो लोकतंत्र को ज्यादा सुसंगत और समावेशी बना रहा है। कुछ भटकावों के बावजूद, भारत में इसे दक्षिणपंथी विचार के रूप में देखने की समझ से मुक्त होने और इसकी मदद से वर्ग की अवधारणा को ज्यादा पूर्ण बनाने की जरूरत है।

अपने अध्यक्षीय भाषण में ‘समकालीन जनमत’ के संपादक रामजी राय ने कहा कि हमारे स्वतंत्रता संघर्ष में जितनी भी कमजोरियां रही हों, पर उनमें भारत को एक आधुनिक राज्य बनाने का स्वप्न था। यह स्वप्न अधूरा रहने के कारण भी बहुत से मसले खड़े होते रहते हैं। आधुनिकता की इस अधूरी परियोजना को पूरा करने की जरूरत है। आंबेडकर ने आजाद भारत में यह सवाल रखा कि वोट की समानता तो मिल गयी, पर सामाजिक समानता का क्या ? इस सवाल की सबने अनदेखी की। फिर भी, अलग-अलग रूप में लड़ाइयां चलती रहीं और अब भी चल रही हैं।

कार्यक्रम दो सत्रों में था। दूसरे सत्र में फैजाबाद से आए दलित चेतना के कवि आशाराम जागरथ और सी बी भारती ने अपनी कविताएं सुनाईं। आसाराम जागरथ ने ‘ खास गिलास ‘, ‘ बुरी नीयत ‘, ‘ ढ़हता हुआ दुर्ग ‘ आदि कविताओं के माध्यम से सामाजिक भेदभाव को उकेरा । ‘चौथा आदमी’ कविता में वे कहते हैं ‘एक आदमी रोटी बेलता है /दूसरा मुफ्त में तोड़ता है /एक तीसरा आदमी/ रोटी तोड़ता भी है /और रोटी से खेलता भी है /परंतु एक चौथा आदमी भी है /बस तकता है टुकुर-टुकुर/ यह चौथा आदमी अछूत है’

वे बताते हैं कि इस स्थिति के लिए सनातनी व्यवस्था जिम्मेदार है । एक अन्य कविता में वह कहते हैं ‘छुआछूत के हिमायतियों! जाओ स्वर्ग में../ छोड़ जाओ इस नरक को/ हम पापियों के लिए/ गरीबों के लिए/ अछूतों-शूद्रों-महिलाओं के लिए/ और हां, सभ्यताओं के लिए’

इस मौके पर सी बी भारती ने ‘ तुम्हारा और मेरा बचपन ‘, ‘स्थानांतरण’, जोंक, परिवेश, मनोवृति, भेड़िया, चेतना के स्वर आदि कई कविताओं का पाठ किया। अपनी कविता ‘ यह कैसा लोकतंत्र? ‘ में सवाल उठाते हुए कहते हैं ‘ क्या आजादी केवल तीन रंग के तिरंगे झंडे का ही नाम है ?/ रामचनवा का बचपन अब भी आखिर क्यों भूखा नंगा है?/ लोकतंत्र केवल अभिजात्यों और सामंतों का फंडा है ?’

कार्यक्रम के आरंभ में जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि कौशल किशोर ने अनिल सिन्हा के रचनात्मक व्यक्तित्व पर रोशनी डाली और कहा कि उन्हें याद करना औपचारिकता मात्र नहीं है बल्कि उनके संघर्ष से अपने लिए ऊर्जा लेना है। वह सृजन, विचार और संगठन के व्यक्ति थे। उन्होंने विपुल साहित्य की रचना की। उन्हें खौफनाक होते समय की पहचान थी और सतर्क रहने की उनकी हिदायत थी। हमारा वर्तमान दमनकारी और विभाजनकारी है ऐसे में अनिल सिन्हा हमें वैचारिक ऊर्जा देते हैं।

कार्यक्रम का संचालन सांस्कृतिकर्मी सुचित माथुर ने किया । जन संस्कृति मंच की ओर से तस्वीर नक़वी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

इस अवसर पर सुमन गुप्ता, सुहेल वहीद, विमल किशोर, असगर मेहदी, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, अनूप मणि त्रिपाठी, समीना खान, अलका पाण्डेय, मन्दाकिनी राय, बी आर विप्लवी, सुरेश कुमार, के के शुक्ला, के के वत्स, उदयनाथ सिंह, शांतम निधि, ए शर्मा, राकेश कुमार सैनी, सत्यप्रकाश चौधरी, रोहित यादव, आशीष कुमार भारती, धर्मेन्द्र कुमार, रमेश सिंह सेंगर आदि मौजूद रहे।

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