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ज़ेर-ए-बहस

उत्तर प्रदेश में गरीब दलित महिला होना अपराध हो गया है

2012 में निर्भया आंदोलन के बाद 2020 में हाथरस में हुई दलित बेटी की बलात्कार हत्या के खिलाफ फिर उसी तरह पूरा देश उठ खड़ा हुआ है। तब दिल्ली के अभूतपूर्व आंदोलन के साथ ही पूरे देश मे विरोध प्रदर्शन हुए थे जिसके चलते सभी दोषी पकड़े गए और सजा भी हुई । उस समय की मनमोहन सिंह सरकार ने जस्टिस वर्मा कमेटी का गठन किया, जिसकी संस्तुति के आधार पर बलात्कार की परिभाषा का दायरा व्यापक हुआ तथा एक नया कानून बना।उस समय बलात्कारियों को फाँसी देने की मांग उठी थी और कानूनी प्रकिया के माध्यम से दोषियों को फाँसी दी गयी । इसमें पीड़िता सवर्ण जाति और मध्यवर्ग से थीं और दोषी गरीब तबकों से ( संभवतः दलित और पिछड़ी जाति) के थे ।

वहीं ताजा वीभत्स घटना 2020 में उत्तर प्रदेश के हाथरस की है ।  इस बेटी को न्याय मिले इसके लिए भी देश खड़ा हुआ और इन आंदोलनकारियों का दमन भी सरकार के द्वारा खूब हुआ । लेकिन इन दोनों घटनाओं में समाज और सरकार के व्यवहार में अंतर साफ दिखाई दे रहा है । निर्भया के दोषियों को बचाने के लिए किसी जाति विशेष के लोगों के द्वारा न पंचायत की गई और न ही रैली निकाली गयी और सरकार भी दोषियों को बचाने का प्रयास करते हुए नहीं दिखी थी । हाथरस की घटना में लेकिन उल्टा हो रहा है, यहां 12 गाँव के सवर्ण जाति के लोगो ने पंचायत कर आरोपियों को बचाने के लिए आवाज उठाई है, क्षत्रिय महासभा के लोगो ने एलान किया कि पूरे देश में राम राज्य यात्रा निकालकर आरोपियों को बचायेंगे ।

यह सिलसिला यही नहीं रुकता है, पीड़िता की चरित्र हत्या का अभियान चलता है। भाजपा नेता कह रहे हैं कि लड़की आवारा थी, बदचलन थी और लड़के सब निर्दोष हैं। यह सब  प्रशासन और सत्ता दोनों की मिली भगत से हो रहा है, वरना आधी रात को पीड़िता की डेडबॉडी को पुलिस के द्वारा न जलाया जाता। सारे सबूत नष्ट न किये जाते । जहां तक मेरी जानकारी है आजाद भारत में यह पहली बार हुआ होगा जब एक बलात्कार पीड़िता का अंतिम संस्कार भी परिवार वालों को नहीं करने दिया गया, हाँ अंग्रेजों ने जरूर शहीद भगतसिंह के मृत शरीर को उनके माँ – बाप को नहीं दिया था।

पितृसत्तात्मक सोच के पोषकों द्वारा महिला विरोधी अपराधियों को बचाने का काम पहली बार नहीं हो रहा है, लेकिन अबकी बार बलात्कार के आरोपियों को जो सवर्ण जाति से जुड़े हैं, बचाने की जो एकदम नंगी और क्रूर कोशिश इस बार हो रही है, वह बेमिसाल है । हम अजय सिंह बिष्ट की सरकार से पूछना चाहते हैं कि इन लोगो के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? आंदोलनकारियों के हाथ पैर तोड़ने वाली यहां तक कि राहुल गांधी को धक्का देकर गिरा देने वाली व प्रियंका गांधी की गर्दन पर हाथ डालने वाली उत्तर प्रदेश की पुलिस इन लोगो को किसके कहने पर बचा रही है।

पूरे मामले में शासन-प्रशासन की संलिप्तता की ओर इशारा करते ऐसे ही तल्ख सवाल माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने भी ADG-लॉ एंड आर्डर प्रशांत कुमार से पूछा कि क्या उन्हें संशोधित बलात्कार कानून 2013 के बारे में जानकारी है ? और जब वे सीधे जांच में भी शामिल नहीं हैं तो कैसे उन्होंने यह बयान दे दिया कि बलात्कार नहीं हुआ है ? माननीय उच्च न्यायालय ने अतिरिक्त प्रधान सचिव (गृह) अवनीश अवस्थी से पूछा कि इस सारे मामले के लिए जवाबदेह DM के खिलाफ अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई, जब कि इसी मामले में SP के खिलाफ Action हो चुका है ?
दरअसल पूरे घटनाक्रम को देखने से ऐसा लगता है जैसे अपराधियों को बचाने वाले जाति- गिरोह, राजनीतिक ताकतें और राज्य मशीनरी एक टीम के बतौर काम कर रहे हैं।

हाथरस घटना के बाद एक नई बहस खड़ी की जा रही है कि पीड़िता की कोई जाति नहीं होती है । नहीं साहब, पीड़िता की जाति होती है । हाथरस की पीड़िता किसी दबंग जाति की होती क्या तब भी DM  साहब यह कहते कि कोरोना से मर जाती तो कुछ भी नहीं मिलता, अभी सरकार ने 25 लाख आपको दिया है । अपराधी अगर दलित समुदाय के होते क्या तब भी उन्हें इस तरह पुलिस संरक्षण में पंचायत करने की इजाजत दी जाती ?

हिन्दू रक्षा सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रबुद्धनन्द गिरी ने कहा है कि भारत में सदियों से वर्णव्यवस्था लागू है जिसके टूटने से समाज टूट जाएगा। उनसे मैं पूछना चाहती हूँ कि क्या दलित हिन्दू नहीं है ? जाति व्यवस्था को आप नष्ट नहीं होने देना चाहते हैं क्योंकि उसके नष्ट होने से आपका वर्चस्व नष्ट हो जाएगा। आखिरी सवाल उन लोगों से है जो कंगना रानावत को देश की बेटी कह रहे थे और उनके अंगना को बचाने के लिए पूरे देश को सर पर उठाये हुए थे, लेकिन जब एक दलित की बेटी के साथ इतना जघन्य अपराध हुआ, तब उनके मुंह में दही क्यों जम गयी ? कहना गलत न होगा कि योगी के रामराज में गरीब, दलित और महिला होना ही सबसे बड़ा अपराध है ।

मीना सिंह

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