Tuesday, May 17, 2022
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सिने दुनिया: पैरसाइट (दक्षिण कोरियाई) और द प्लैटफॉर्म (स्पैनिश): अमीरों के लिए जो मौसम सुहाना, गरीबों की वह त्रासदी है..

दक्षिण कोरिया में कई अमीर लोगों ने ऐसे घर बना रखे हैं कि जहां अगर ऐटमी हमला हो, तो उनके तहखानों में कुछ समय तक छिपकर सर्वाइव किया जा सके। मालिक और नौकर के बीच के संघर्ष में एक दिन ऐसी नौबत आ जाती है कि एक नौकर को तहखाने में छिपना पड़ता है और पुलिस उसे बाहर ढूंढती रहती है और उसे मरा हुआ समझ लेती है। इस नौकर का बेटा कल्पनाएं करता है कि उसने बहुत पैसे कमा लिए हैं और वह घर खरीद लिया है, जिसके तहखाने में उसका पिता छिपा हुआ है। वह कल्पना करता है कि पिता तहखाने से बाहर आ गया है और पत्नी, बेटी और बेटे के साथ शराबें पीते हुए और लज़ीज खाना खा रहा है। ‘पैरसाइट’ फिल्म का पिता दुनिया के ऐसे तमाम तहखानों में कैद है।


साल 2019 में दो बड़ी और बहुत जरूरी फिल्में आईं, जिन्होंने क्लास डिस्क्रिमिनेशन को बहुत गहराई से बयान किया। आर्थिक गैरबराबरी और उसके जाल को दिखाने वाली इन फिल्मों में एक साउथ कोरियन फिल्म ‘पैरसाइट’ है और दूसरी स्पेनिश फिल्म ‘द प्लैटफॉर्म’, जिसका स्पेनिश नाम है ‘एल होजो’ (El hoyo), जिसका एक मतलब रिक्तता या खला भी होता है। साउथ कोरियन फिल्मकार और पटकथा लेखक बॉन्ग जून हो की फिल्म ‘पैरसाइट’ तो पूरी दुनिया में देखी गई, सराही गई और इस फिल्म को बेस्ट फिल्म समेत चार श्रेणियों में ऑस्कर अवॉर्ड भी मिले, लेकिन स्पेनिश फिल्मकार गल्दर गज़तेलु-उर्रुतिया (Galder Gaztelu-Urrutia) की साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म ‘द प्लैटफॉर्म’ को उतनी चर्चा नहीं मिली। लेकिन जिन लोगों ने यह फिल्म देखी है, वे जरूर यातनाओं से गुजरे होंगे और वे उस दुनिया का तसव्वुर नहीं कर सकते, जो गैरबराबरी पर इस कदर टिकी हो कि जहां प्रेम, भरोसा, न्याय खत्म हो गया लगे और जिंदा बचे रहने की जद्दोजहद ही सबसे अहम हो जाए।
पैरसाइट का मतलब परजीवी होता है। जंतु विज्ञान में ऐसे जीव जो किसी जीव या वनस्पति के भीतर या ऊपर पलते हैं और उन्हीं से अपना भोजन लेते हैं, पैरसाइट या परजीवी कहे जाते हैं, लेकिन भाषा इसका इस्तेमाल मुहावरे की तरह भी करती है और वहां परजीवी कहने का मतलब कामचोर, दूसरों पर आश्रित रहने वाला और चापलूस भी होता है। मतलब यह कि भाषा इंसान को भी परजीवी की तरह बरतती है और इस तरह की भाषा का उद्गम शक्तिशाली लोगों के मार्फत होता है। अगर आंदोलनकारियों को आंदोलनजीवी और परजीवी कहने की बात छोड़ भी दी जाए तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपंग, अपाहिज या विकलांग आदि को दिव्यांग कहना शुरू किया तो बगैर किसी आधार के यही कहा और इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर बगैर शारीरिक मेहनत के दूसरों पर निर्भर रहते हुए अपने भोजन को जुटाना परजीवी है, तब तमाम उद्योगपतियों को परजीवी कहा जाना चाहिए क्योंकि उनका सारा उत्पादन और मुनाफा मजदूरों के श्रम पर टिका होता है, लेकिन बर्ताव में जब परजीवी कहा जाता है तो इसकी ध्वनि गरीब निकलती है। बॉन्ग जून हो की फिल्म ‘पैरसाइट’ भी इसी कहानी को लेकर आती है, जहां दुनिया का एक बड़ा हिस्सा ‘परजीवी’ की तरह जी रहा है।


यह तीन परिवारों की कहानी है। एक पार्क परिवार है, जो मालिक है और दो मजदूर परिवार हैं। किम परिवार एक मजदूर परिवार है, जो एक चॉल में रहता है। किम कि-टीक, उसकी पत्नी चंग-सूक, बेटी किम कि-जंग, और बेटा किम कि-वू के स्ट्रगल और अपनी जिंदगियों को थोड़ा बेहतर करने की जद्दोजहद में हम देखते हैं कि वह मालिकों से नहीं लड़ता, बल्कि अपनी जगह बनाने के लिए अपने जैसे लोगों से लड़ता है। पूंजीवादी दुनिया में मालिकों के बनाए इस सिस्टम में ‘नौकर’ कभी मालिकों से नहीं लड़ता, बल्कि मालिकों से लड़ने वाले नौकरों के खिलाफ कई नौकर खड़े कर देता है। पार्क परिवार ने एक नया घर खरीदा है। एक आलीशान घर, जो कितना बड़ा है और उसमें कुछ गुप्त चीजें भी हो सकती हैं, मालिक परिवार को नहीं पता। इस घर में काम करने वाली गृह सहायिका गूक मून-ग्वांग यहां तब भी काम करती थी, जब पार्क परिवार ने इसे नहीं खरीदा था। पुराने मालिक ने इस घर को इस तरह बनाया हुआ है कि अगर साउथ कोरिया पर ऐटमी हमला होता है तो इसके तहखाने में कुछ समय तक रहा जा सके। यह राज नए मालिक को नहीं पता, लेकिन गृह सहायिका को पता है।

गरीबी और बदहाली में इंसान उस तरह का नैतिक नहीं रह सकता, जिस तरह की नैतिकताएं खाए-पीए-अघाए लोगों की ईजाद हैं। इस बात को जावेद अख्तर का एक शेर बहुत खूबसूरती से कहता है कि-
नर्म अल्फ़ाज भली बातें मोहज़्ज़ब लहजे
पहली बारिश ही में ये रंग उतर जाते हैं

बारिश के दिनों में जब मालिक परिवार का बेटा घर के पार्क में टेंट लगाकर सुख उठा रहा होता है और उसके मां-बाप खूबसूरत मौसम की खुमारी में सेक्स करके इस वक्त को एंजॉय करना चाहते हैं, उसी वक्त नौकर परिवार के लिए यह मौसम आग बरसाने जैसा है। उसकी चॉल में पानी भर गया है और वह जो थोड़ा-बहुत सामान बचा सकता था, बचाकर रेलवे स्टेशन पर हजारों लोगों के बीच प्लैटफॉर्म पर सो रहा है। ऐसे में नैतिक होने की बात अश्लील जान पड़ती है। लेकिन दिक्कत यह है कि तमाम नौकर अपने सर्वाइकल के संघर्ष में मालिकों पर असर नहीं डालते, अपने जैसे नौकरों के ऊपर चढ़कर अपनी जगह बनाते हैं। जैसा किम परिवार ने किया।

हां, मालिक दूसरी तरहों का काम करते हैं। मालिक लोगों को धार्मिक बनाते हैं, नैतिकताएं स्थापित करते हैं और उन्हें स्वत: माने जाने का एक दबाव भी बनाते हैं। वे बताते हैं कि यह करना अपराध है और इसका अपराध बोध इतना होना चाहिए कि अपराधी खुद के लिए सजा खुद तय कर ले। मालिक पापों से मुक्ति के कैदखाने बनाते हैं। …और जब अपराधी अपने लिए सजा तय कर लेता है तब वह स्पेन के उस कैदखाने को चुनता है, जिसे ‘द प्लैटफॉर्म’ या ‘द होल’ कहा गया। स्पेनिश फिल्म ‘द प्लैटफॉर्म’ देखते हुए उसके कैदखाने में मैं किम परिवार को ही देख रहा था, जिसे अपने ‘पापों’ को धोने के लिए और ‘सभ्य समाज’ में अपनी इज्जतदार जिंदगी शुरू करने के लिए चुनना होता है। ‘द प्लैटफॉर्म’ एक ऐसे कैदखाने की फैंटसी है, जो वर्टिकली बना है। दुनिया में शायद ही कहीं किसी इमारत में फ्लोर की गिनती ऊपर से नीचे होती हो, लेकिन इस फिल्म का जो कैदखाना है, उसमें सबसे ऊपरी मंजिल शून्य है और इसकी गिनती नीचे जाते-जाते बढ़ती जाती है। ज्यादातर लोगों, यहां तक कि कैदखाने के अधिकारियों को भी यही पता था कि यह 200 मंजिला है, लेकिन यह इससे कहीं ज्यादा होती है। इससे बाहर निकलने के लिए सबसे ऊपर यानी शून्य पर पहुंचना जरूरी है, इससे जान पड़ता है कि यह इमारत धरती के भीतर बनाई गई होगी। इसमें दो तरह के कैदी आते हैं। एक वे जिन्होंने कोई पाप किया हो और जो अपने मन को स्वच्छ करना चाहते हैं और दूसरे वे जिन्होंने कोई अपराध किया हो और जिन्हें समाज में फिर से इज्जत से जीने के लिए यहां सजा पूरी करने के लिए कहा गया हो। इस कैदखाने में सभी की सजा एक साल है और इसे पूरी करने वाले को एक डिप्लोमा दिया जता है, जिससे उसकी समाज में बहुत इज्जत होती है। लेकिन मजे की बात यह है कि 333 फ्लोर के इस कैदखाने से कभी कोई निकल नहीं पाया है।

‘पैरासाइट’ के किम जैसे लोगों ने जो अपराध किया है, उस ‘पाप’ से छुटकारे के लिए ‘द प्लैटफॉर्म’ का यह कैदखाना तमाम तरह के लालच देता है। इस कैदखाने की हकीकत कभी बाहर नहीं आई है। कई लोग तो इसमें आने को अपनी खुशकिस्मती समझते हैं। इस कैदखाने के हर फ्लोर पर एक रूम है, जिसे दो कैदी शेयर करते हैं। ऐडमिशन के समय हर कैदी से उसका पसंदीदा खाना पूछा जाता है, जो उसके लिए बनाया जाएगा। हर कैदी अपने साथ अपनी पसंदीदा कोई भी एक चीज ला सकता है। इस फिल्म का मुख्य किरदार गोरेंग (इवान मसाग होर्ता) एक उपन्यास लेकर आता है। उसने यह कैदखाना डिप्लोमा करने के लिए खुद चुना है। कैदखाने में उसके रूम पार्टनर त्रिमगासी (जोरियन इग्वेलैर) ने किसी की हत्या की है और वह यहां अपनी पसंदीदा चीज एक धारदार चाकू लेकर आता है। वह यहां पहले से कैद है और गारेंग की नैतिक बातों पर हंसना सीख चुका है। इस कैदखाने में हर महीने फ्लोर और पार्टनर बदलते रहते हैं। यहां तक तो सब ठीक लग रहा है, लेकिन यहां कुछ भी ठीक नहीं है। सबसे ऊपर शून्य फ्लोर पर सभी कैदियों का पसंदीदा खाना बनाया जाता है और एक प्लैटफॉर्म पर रखकर नीचे भेजा जाता है। सभी कमरों के बीचों-बीच एक होल है, जिससे भोजन और शराब से भरा वह प्लैटफॉर्म आता-जाता है। प्लैटफॉर्म हर फ्लोर पर दो मिनट रुकता है और इसी दौरान भोजन करना होता है। सबके लिए खाना होते हुए भी पचासवें फ्लोर के कैदियों तक भी वह नहीं पहुंच पाता। ऊपर के जो लोग हैं, वे नीचे के लोगों से नफरत करते हैं। हालात ऐसे बनते हैं, जहां त्रिमगासी गोरेंग को मारकर खा जाना चाहता है। गोरेंग पहले तो अपने उपन्यास को खाकर जैसे-तैसे सर्वाइव करता है और बाद में अपनी कैदी पार्टनर के जिस्म को खाकर एक महीना गुजारता है। जब वह छठवें फ्लोर पर पहुंचता है तब उसे भरपूर खाना मिलता है और वह सोचने-समझने की स्थिति में आता है तो अपने ब्लैक पार्टनर के साथ इस सिस्टम को बदल देना चाहता है।
इस फिल्म के शुरुआत में एक डायलॉग है- ‘दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं। कुछ ऊपर, कुछ नीचे और कुछ वे जो गिर जाते हैं।’ यहां गिरने से मलतब शायद गोरेंग जैसे लोगों से है, जो बदलाव चाहते हैं और चूंकि ऊपर वालों से संवाद मुश्किल है तो नीचे वालों से बात करते हैं। लेकिन नीचे का नरक इतना वीभत्स है कि वहां कोई भरोसा नहीं उपज पाता। यह फिल्म यातनाओं का सफर है, जहां त्रिमगासी जैसे हत्यारों से भी नफरत नहीं होती। वह मरकर भी याद आता रहता है। ‘पैरसाइट’ और ‘द प्लैटफॉर्म’ दोनों ही फिल्मों में क्लास की बात की गई है। दोनों में ही अपनी तरह की त्रासदियां हैं, लेकिन ‘द प्लैटफॉर्म’ आपको बहुत डिस्टर्ब कर सकती है। इस फिल्म की एक कैदी मिहारू आपको नींद से जगा सकती है। अगर आप किसी ‘पॉजिटिव’ देश में रहते हैं तो इस फिल्म को न देखें।

(फोटो गूगल से साभार)
फ़िरोज़ ख़ान
फ़िरोज़ ख़ान कवि और पत्रकार हैं. देश की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाॅग्स पर कविताएँ और सिनेमा पर कुछ लेख-साक्षात्कार प्रकाशित। इनकी कुछ कविताओं का मराठी में अनुवाद हो चुका है। नवभारत टाइम्स, बम्बई के एडिटोरियल विभाग में कार्यरत। सम्पर्क: 7303745705 ई मेल: firojwriter2013@gmail.com
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