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‘ किसानों ने सरकार और व्यवस्था की कमजोर नस पकड़ ली है ’

इलाहाबाद। संवाद की ओर से 17 जनवरी को ‘ कृषि कानून-2020 ‘ सामूहिक चर्चा का योजन किया गया जिसमें कवि, पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुशील मानव ने अपनी बात रखी।

उन्होंने कहा कि “पूँजीवाद की मूल प्रवृत्ति उत्पाद और उत्पाद के संसाधनो पर कब्जा करने की होती है। इससे पूंजी की सत्ता निर्मित होती है। दुनिया के तमाम उत्पादों और उत्पाद के संसाधनों पर कब्जा करने के बाद पूंजीवाद ने कृषि की ओर अपने पंजे बढ़ाए। और एक एक करके दुनिया के तमाम उत्पादों पर कब्जा कर लिया लेकिन भारत का कृषि क्षेत्र पूंजीवाद के चंगुल से न सिर्फ़ अछूता रहा बल्कि दुनिया के तमाम पूंजीवादी दुष्परिणामों जैसे कि साल 2008 की वैश्विक मंदी और कोविड-19 वैश्विक महामारी जैसे प्रकोपों से भी देश की अर्थव्यवस्था को डांवाडोल होने से बचाये रखा। पूंजीवाद की प्रबल समर्थक केंद्र सरकार ने देश के सारे सार्वजिनक सेवाओं , संसाधनों और संपत्तियों को कार्पोरेट के हाथों में सौंपने का मन बना रखा है। इसी उद्देश्य के तहत उसने कृषि क्षेत्र को भी कार्पोरेट के सुपुर्द करने के लिए तीन कृषि क़ानून लेकर आये। ये कृषि क़ानून अध्यादेश की शक्ल में कोविड-19  के पीक टाइम में लाया गया ताकि समुचित विरोध न हो सके।

सुशील मानव ने कहा कि जीवन की तीन बुनियादी ज़रूरतें रोटी, कपड़ा और मकान में से दो यानि मकान और कपड़ा बनाने वाले क्षेत्र तो पहले ही कार्पोरेट के हाथों में सौंपे जा चुके हैं, बची रोटी तो उसे छीनने के लिए ये तीन नये कृषि क़ानून बना दिये गये हैं।  इसके तहत पहले किसानों की दी जाने वाली तमाम सब्सिडी खत्म कर दी गईं। कुछ ज़ो जारी ती उनमें ये नियम लाये गये कि आप पहले पूरा पैसा देकर खरीदिए फिर आपकी सब्सिडी आपके खाते में आएगी।

किसानों से बातचीत के हवाले से उन्होंने बताया कि उन्हें पहले ब्लॉक से रियायती दामों पर ज़रूरी चीजें जैसे कि दवा, बीज, कृषि उपकरण आदि मिल जाते थे लेकिन अब कई बार खरीदने के बाद भी सबसिडी के पैसे नहीं आए। इसके बाद हमने ब्लॉक से लेना बंद कर दिया। ये तरीका है सेवाएं और सबसिडी छीनने का।

सुशील मानव ने आगे कहा कि कृषि के कार्पोरेटाईजेशन और व्यावसायीकरण का ही परिणाम है कि सांवा-कोदो, काकुन, बेझरा, ढेरुवा, मोथी, सनई, पेटुवा, सेहुवां, मकरा व बर्रै जैसे अनेक अनाजों की खेती ही बंद हो गई है। कृषि के व्यवसायीकरण से कृषि जैव विविधता को बहुत नुकसान पहुंचेगा। इससे कृषि पारिस्थितिकी को भी क्षति पहुंचेगी। लोग देशज और स्थानीय फसलों को जो कि उस पारिस्थितिकी में तमाम रोग और प्रतिकूल मौसम में भी बेहद कम लागत में पैदावार देती है (भले ही परिमाण में अपेक्षाकृत कम) की बजाय अधिक पैदावार और मुनाफा के फेर में अधिक लागत लगातार कंपनी के बीज, खाद, कीटनाशक अधिक कीमतों पर लेकर खेती करेंगे और आशानुरूप परिणाम न निकलने और भारी लागत खर्च से बड़े कर्ज़ में फँसकर आत्महत्या करने जैसे कदम उठाएंगे।

उन्होंने तीनों कृषि कानूनों के बारे  विस्तार में अपनी बात रखते हुए बताया कि कैसे यह कानून कृषि के क्षेत्र में निजीकरण लाकर किसानों के ऊपर पहले से गहराते संकट को ही कानूनी तौर पर भी प्रमाणिकता प्रदान करता है।

उन्होंने यह भी बताया कि कैसे आवश्यक उत्पाद अधिनियम कानून ज़रूरी खाद्य उत्पादों को भी बाज़ार के हाथों छोड़ देगा जो कि किसी भी आपदा के समय ज़रूरी समान जो सरकार वितरित करती है अब नहीं कर पाएगी। वो बताते हैं कि नेहरू ने यह कानून आज़ादी के बाद लाया था, बंगाल में आए हुए आकाल जैसी त्रासदी को कभी दोबारा न होने देने के लिए।

इन कानूनों में जो कानून कृषि में व्यापार क्षेत्र को खोलने की बात करता है, वह कानून कॉरपोरेटों के पक्ष में तो है और उससे किसान अपने ही खेतों पर मज़दूर बन कर रह जाएंगे और फसल खराब होने पर यह भी हो सकता है कि कॉर्पोरेट उसकी फसल को न ले। ऐसे किसी भी विवाद के वक़्त किसान कोर्ट में भी नहीं जा सकेगा क्योंकि यह कानून किसानों से यह अधिकार भी छीन लेगा।

उन्हों कांट्रैक्ट क़ानून पर कहा – “ये क़ानून किसानों को विवाद की स्थिति में सिविल कोर्ट जाने से रोकता है। कांट्रैक्ट फार्मिंग के इस कानून की वजह से देश में भूमिहीन किसानों के एक बहुत बड़े वर्ग के जीवन पर गहरा संकट आने वाला है।

देश में कुल 26.3 करोड़ परिवार कृषि कार्य करते हैं। लेकिन इसमें से सिर्फ़ 11.9 करोड़ किसानों के पास खुद की ज़मीन है। जबकि 14.43 करोड़ किसान भूमिहीन हैं। भूमिहीन किसानों की एक बड़ी संख्या ‘बंटाई’ पर खेती करती है। इस नए कानून के जरिए पूंजीपतियों के हितों को संरक्षित करके कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए खुला छूट दिया जा रहा है। गांव का कोई भूमिहीन किसान इन बड़े निजी क्षेत्र की फर्म से मुकाबला कैसे करेगा? कार्पोरेट कंपनियां मशीनों के जरिए खेती का कार्य करेंगी न कि मजदूरों के जरिए। इस तरह यह कानून देश के 14 करोड़ भूमिहीन किसानों के भविष्य को प्रभावित करने जा रहा है।

अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको ने गुजरात के साबरकांठा ज़िले में कुछ आलू किसानों के विरुद्ध पेटेंट कानून (Patent Law) का उल्लंघन करने के आरोप में मुकदमा दायर किया था। कंपनी ने किसानों पर FC5 किस्म के उस आलू की खेती करने का आरोप लगाया था, जिसका पेटेंट पेप्सिको के पास है। पेप्सिको का कहना था कि आलू की इस किस्म के बीजों की आपूर्ति करने का अधिकार केवल उसी के पास है और इन बीजों का प्रयोग भी कंपनी के साथ जुड़े हुए किसान ही कर सकते है। अन्य कोई भी व्यक्ति  आलू की खेती के लिये इन बीजों का प्रयोग नहीं कर सकता। कंपनी ने 9 किसानों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर 4.2 करोड़ रुपए का हर्जाना मांगा था।”

उन्होंने कहा-” बंदरगाह विशेषकर गुजरात के पहले ही अडानी को सौंपे जा चुके हैं। इन बंदरगहों को स्पेशल इकोनॉमिक जोन में रखा गया है इसका मतलब है कि वहां कोई क़ानून काम नहीं करेगा। न वहां की रिपोर्टिंग की जा सकती है। अभी देश भर में दो सिलोस बना रहे हैं अडानी वो भी स्पेशल इकोनॉमी जोन में आता है। और अब कांट्रैक्ट फॉर्मिंग को भी क़ानूनो प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। ये पूरे देश को ही क़ानूनी प्रक्रिया से बाहर कर देंगे जहां सिर्फ कार्पोरेट का राज चलेगा।

कृषि क़ानून व किसान आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया पर बोलते हुए उन्होंने कहा-“कृषि कानूनों की लीगलिटी और किसान आंदोलन पर 6 याचिकाएं थीं सुप्रीम कोर्ट में लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश देने से पहले वो याचिकाएं नहीं सुनीं जिनमें कानूनों को संवैधानिक तौर पर गलत बताया गया था। संसद में वॉइस वोट से जिस तरह से कानून पास करवाए गए उस पर दायर याचिकाओं को बाईपास करके सिर्फ प्रदर्शनों वाले पक्ष को सुप्रीम कोर्ट में तवज्जो मिली। प्रदर्शनकारी कानूनों को गलत बताकर रद्द करने की मांग कर रहे हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कानूनों की मेरिट पर बिना कुछ कहे सुलह के लिए कमेटी बना दी। जिसमें कृषि कानूनों पर लेख लिखने वाले सरकार के समर्थक लोग हैं।

  कृषि कानूनों को रद्द करने और एमएसपी व एमएसपी पर खरीद की गारंटी के क़ानून की मांग लेकर 26 नवंबर 2020 से जारी किसान आंदोलन पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि – “ये नये दौर का नया किसान आंदोलन है। जो सीधे सीधे सरकार की प्रो-कार्पोरेट पोलिसी के खिलाफ़ टकरा रहा है। इसलिए अपनी अंतर्वस्तु में ये किसान आंदोलन न सिर्फ़ राजनीतिक है। बल्कि ये किसान आंदोलन हमारे राजनीतिक अर्थशास्त्र को भी बदल कर रख देगा, इसमें वो कूव्वत है। दरअसल किसानों ने इस देश की सरकार और व्यवस्था की कमजोर नस पकड़ ली है। दशहरा पर नरेंद्र मोदी के साथ अडानी-अंबानी का पुतला फूँकने से शुरु हुआ कार्पोरेट का विरोध रिलायंस के पेट्रोल पंप और रिलायंस स्टोर के घेराव से होते हुए जीयो सिम पोर्ट कराने और अब जीयो के टॉवर तोड़ने तक पहुंच चुका है। ये किसान आंदोलन हमें सिखाता है कि आंदोलन में कितने धैर्य और दीर्घकालीन समय देने की ज़रूरत होती है।”

बातचीत के अंत मे छात्रों ने सुशील मानव जी से सवाल भी पूछे और उन्होंने उन सवालों पर विस्तार से बातें रखी।

स्टडी सर्किल में सोम, शशांक, शहरयार, विकास, रोहित, प्रिंस, प्रदीप्त, कवि, उमाकांत,शात्री, सुनील मौर्य, सोनू, अनिरुद्ध, शिवानी, प्राची, सौम्या, बिपिन, उत्कर्ष, यश आदि मौजूद रहे।

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