हेमन्त कुमार
आज से ठीक सौ साल पहले अपने मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्षरत दलित समुदाय के अग्रणी नेता राय बहादुर मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी के आह्वान पर 27 अगस्त 1925 को नरसिंह बाड़ी (अल्मोड़ा) तथा 24-25 सितंबर 1925 को द्योलीडांडा (अल्मोड़ा) में विशाल शिल्पकार सम्मेलन आयोजित किए गए थे।
दोनों ही सम्मेलन तत्कालीन समाज में व्याप्त जातिवादी परंपराओं के खिलाफ दलित समुदाय का पहला सांगठनिक शक्ति प्रदर्शन था। इन दोनों सम्मेलनों के माध्यम से दलित समुदाय ने अपनी शक्ति एवं शौर्य दोनों का बखूबी प्रदर्शन किया।
अपने समाज की वर्तमान चुनौतियों से उबरने एवं भावी पीढ़ी के हितों की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध दलित समुदाय ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हजारों की संख्या में जुट कर अपनी एकजुटता का परिचय दिया था। कई दिनों की पैदल यात्रा के बाद द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन में प्रतिभाग करने पहुंचे दलितों में गजब का उत्साह था।

राय बहादुर मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने सम्मेलन में पारित समस्त प्रस्तावों को सशर्त मंजूरी दे दी थी।
गौरतलब है कि ब्रिटिश हुकूमत के दौरान दलित समुदाय पर हो रहे जातिगत शोषण के विरोध में तथा ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित धर्मांतरण अभियान को रोकने के लिए आर्य समाजी नेताओं द्वारा चलाए जा रहे जनेऊ धारण कार्यक्रम के बाद उत्पन्न गतिरोध को थामने के लिए राय बहादुर मुंशी हरि टम्टा जी ने दलित समुदाय की सुरक्षा एवं मूलभूत अधिकारों के लिए द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन का आयोजन किया था। जिसमें दलित समुदाय के अधिकारों एवं सुरक्षा से संबंधित 21 प्रस्ताव पारित किए गए। तदुपरांत ब्रिटिश सरकार ने तत्काल प्रभाव से दलित समुदाय की पीड़ा को ध्यान में रखते हुए भूमिहीन दलितों को 30,000 एकड़ भूमि उपलब्ध कराने, दलित वर्ग के युवाओं के लिए पुलिस व सेना में भर्ती पर लगी रोक को हटाने, उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से शिल्प कलाओं का कार्य करने वाले दलित जातियों को शिल्पकार नाम दिए जाने, उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मजदूर एवं किसानों के लिए कृष्णा डे कृष्णा नाईट नाम से 150 से भी अधिक विद्यालय खोलने तथा उनमें शिल्पकार समाज के ही शिक्षक और पर्यवेक्षक नियुक्त किए जाने, 1925 से ही म्यूनिसिपलिटी बोर्ड व जिला बोर्ड में शिल्पकारों को प्रतिनिधित्व दिया जाने, शिल्पकार वर्ग को 1935 में अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किए जाने का आदेश जारी किया था।

ब्रिटिश शासन के दौर में आयोजित द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन वास्तविक रूप से दलित चेतना एवं सामाजिक न्याय की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण सम्मेलन था, जिसका प्रभाव आज भी कायम है।
इस सम्मेलन से न सिर्फ दलित समुदाय के लिए शिक्षा एवं रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए थे बल्कि तत्कालीन समय में कई कल्याणकारी योजनाएं भी लागू हुए। आज सौ साल बाद भी द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन की स्मृतियां जन समुदाय के मानस पटल पर अक्षरश: अंकित हैं। यही वजह थी कि सौ साल बाद वर्ष 2025 में द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन के शताब्दी समारोह आयोजन करने हेतु शिल्पकार समुदाय में पूर्व की भांति वहीं जोश वहीं जज्बा बरकरार था।
भले ही समय बदल गया हो लेकिन हालात आज भी वहीं हैं। यही वजह थी कि शताब्दी समारोह के माध्यम से अपने युग पुरुष को श्रद्धा सुमन अर्पित करने तथा समाज को पुनः एकजुट करने एवं उनके हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से द्योलीडांडा शताब्दी समारोह समिति द्वारा शताब्दी समारोह आयोजन करने का निर्णय लिया गया। शताब्दी समारोह आयोजन करने के संबंध में सर्वप्रथम श्री दया शंकर टम्टा जी, पौत्र मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी संपादक समता साप्ताहिक समाचार पत्र तथा एस सी एस टी शिक्षक एसोसिएशन उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष श्री संजय कुमार टम्टा जी के आह्वान पर 3 अगस्त 2025 को अल्मोड़ा नगर निगम सभागार में एक बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता श्री दया शंकर टम्टा जी द्वारा की गई।

बैठक में द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन की याद में धूमधाम से शताब्दी समारोह मनाए जाने तथा सौ वर्ष पूर्व पारित प्रस्तावों का मूल्यांकन एवं वर्तमान में शिल्पकार समाज की चुनौतियों के आधार पर 21 बिंदुओं का प्रस्ताव पारित करने का निर्णय लिया गया। बैठक में कार्यक्रम के सफल आयोजन हेतु कार्यकारिणी का गठन किया गया तथा कई समितियां बनाई गई। तत्पश्चात कार्यक्रम की संपूर्ण रूपरेखा के लिए शताब्दी समारोह समिति द्वारा दूसरी बैठक 31अगस्त 2025 को आयोजित की गई।
22 सितंबर 2025 को समिति द्वारा एक प्रैस कॉन्फरेंस बुलाई गई, जिसमें शताब्दी समारोह से संबंधित संपूर्ण जानकारी साझा की गई तथा यह भी बताया गया कि समिति 24 सितंबर 2025 को द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन की याद में द्योलीडांडा (ग्रेनाइट हिल) अल्मोड़ा में स्मृति कार्यक्रम आयोजित करेगी तथा 28 सितंबर 2025 को रैमजे इंटर कॉलेज अल्मोड़ा में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ विशाल जन सम्मेलन आयोजित करेगी। तत्पश्चात 24 सितंबर 2025 को द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन की स्मृति में द्योलीडांडा (ग्रेनाइट हिल) में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री दया शंकर टम्टा तथा संचालन श्री संजय कुमार टम्टा द्वारा किया गया।
इस अवसर पर सर्वप्रथम मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के पश्चात तत्कालीन समय में कुमाऊं गढ़वाल मंडल से आए सभी डेलीगेट्स को याद किया गया तथा उपस्थित वक्ताओं द्वारा मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने तथा एकजुट होकर समाज के लिए कार्य करने की अपील की गई।
सन् 1925 में आयोजित द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन की भांति ही शताब्दी समारोह के लिए भी दलित समुदाय में गजब का उत्साह देखने को मिला। 28 सितंबर 2025 को उत्तराखंड के कुमाऊं व गढ़वाल मंडल सहित देश के विभिन्न राज्यों से लोग इस कार्यक्रम में प्रतिभाग करने आए। आयोजन समिति द्वारा लंबे समय से की जा रही तैयारियों का सकारात्मक प्रभाव इस कार्यक्रम में साफ तौर पर दिखाई दिया।
28 सितम्बर 2025 को प्रातः 8 बजे से ही आमंत्रित अतिथियों व गणमान्य व्यक्तियों ने अल्मोड़ा शहर के मध्य चौघानपाटा में मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी के मूर्ति स्थल पर एकत्र होना शुरू कर दिया। मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी की मूर्ति पर पुष्पांजलि अर्पित करने के पश्चात समस्त आगन्तुक पंक्तिबद्ध होकर आयोजन स्थल की ओर रवाना हुए। इस जुलूस में विभिन्न जनपदों से आए शिल्पकार संगठन, मूलनिवासी संघ, बामसेफ संगठन, कर्मचारी संगठन, महिला समूह अपने-अपने बैनर तले मुंशी हरि प्रसाद टम्टा के नारों के उदघोष के साथ आगे बढ़ रहे थे।
जुलूस का मुख्य आकर्षण सूचना विभाग अल्मोड़ा की सांस्कृतिक टीम द्वारा प्रस्तुत छोलिया नृत्य था। जिसमें सांस्कृतिक परिधानों व आभूषण पहने युवक युवतियों ने अपने अद्भुत नृत्य से जुलूस में चार चांद लगा दिए। जुलूस अल्मोड़ा के मुख्य बाजार से होते हुए आयोजन स्थल रैमजे इंटर कॉलेज के प्रांगण में पहुंचा। जहां आयोजन समिति के सदस्यों ने समस्त आगन्तुकों का अभिवादन कर स्वागत किया गया। तत्पश्चात कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं संरक्षक श्री दया शंकर टम्टा जी तथा समिति के सदस्यों द्वारा मुख्य अतिथि श्री अजय टम्टा माननीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री भारत सरकार, विशिष्ट अतिथि श्री प्रदीप टम्टा माननीय पूर्व विधायक व लोकसभा एवं राज्यसभा सांसद, श्री मनोज तिवारी माननीय विधायक विधानसभा अल्मोड़ा, श्री ललित फर्स्वाण पूर्व विधायक कपकोट बागेश्वर, डॉ जीत राम पूर्व विधायक थराली चमोली, श्री अजय वर्मा माननीय मेयर नगर निगम अल्मोड़ा, डॉ सोहनपाल सुमनाक्षर राष्ट्रीय अध्यक्ष भारतीय दलित साहित्य अकादमी, श्री करम राम प्रदेश अध्यक्ष एस सी एस टी इम्प्लाइज फैडरेशन उत्तराखंड, श्री रघुनाथ लाल आर्य पूर्व निदेशक शिक्षा विभाग एवं प्रदेश अध्यक्ष वैचारिक महासभा, श्री चंद्र बल्लभ टम्टा उद्योगपति एवं संस्थापक शिल्पकार टाइम्स नई दिल्ली का बैज अलंकरण व पुष्प गुच्छ भेंट कर स्वागत किया गया। अतिथियों द्वारा मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी के चित्र पर पुष्प अर्पित करने के पश्चात श्री दयाशंकर टम्टा जी ने मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी के संपूर्ण जीवन के विषय में अपने विचार रखेे।
कार्यक्रम संयोजक श्री संजय कुमार टम्टा द्वारा द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए गए। तत्पश्चात चंद्र शेखर आर्य, पीयूष कुमार तथा रमेश लाल की टीम ने अपने गीत के माध्यम से मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख किया तथा सुप्रसिद्ध रंगकर्मी ध्रुव टम्टा जी के निर्देशन में घुघुतिया लोक सांस्कृतिक मंच से कुंवर राज की टीम द्वारा महामानव ‘मुंशी हरि प्रसाद टम्टा’ तथा द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर नाट्य मंचन किया गया।
कार्यक्रम में कोक स्टूडियो फेम उत्तराखंड की सुप्रसिद्ध जागर गायिका कमला देवी द्वारा राजुला मालुशाही लोक गीत प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर उपस्थित अतिथियों के कर कमलों द्वारा सन् 1934 में मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी द्वारा संस्थापित तथा उनके भाई ललता प्रसाद टम्टा तथा भांजी लक्ष्मी टम्टा (उत्तराखंड की पहली शिल्पकार महिला स्नातक व पहली शिल्पकार महिला संपादक) द्वारा संपादित ‘शोषित-पीड़ित वर्ग का प्रतिनिधि साप्ताहिक एवं समता व बंधुत्व भावना का प्रतीक’ ऐतिहासिक समाचार पत्र ‘समता’ के वर्तमान अंक का विमोचन किया गया। साथ ही एडवोकेट महेश प्रसाद टम्टा जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘एक महानायक मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी’, मनवर लाल भारती द्वारा हस्त लिखित पुस्तक ‘अतीत की धुंधली परछाई’ व स्मारिक ‘शिल्पकार समाज के अग्रदूत- उत्तराखंड के अंबेडकर राय बहादुर मुंशी हरि प्रसाद टम्टा’ तथा प्रकाश चंद्र आर्य द्वारा संपादित स्मारिका ‘उत्तराखंड शिल्पकार समाज के स्वतंत्रता सेनानी एवं समाज सुधारक’ स्मारिका का विमोचन भी किया गया। शिल्पकार समाज को एक डिजिटल प्लेटफार्म उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शिक्षक विमलेश राहुल द्वारा निर्मित उत्तराखंड का पहला एंड्रॉयड एप्लीकेशन का अनावरण भी किया गया जो कि गूगल प्ले स्टोर से अपलोड होगा।
आयोजन समिति द्वारा कला, साहित्य, शोध एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले दर्जनों व्यक्तियों को प्रमाण पत्र एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में ताम्र कला, काष्ठ कला, ऐपण कला, चित्रकला, मूर्ति कला, रिंगाल आदि से बनाए गए सामग्रियों तथा दलित साहित्य से सुसज्जित स्टॉल आकर्षण के केंद्र रहे। इस अवसर पर उपस्थित मुख्य अतिथि केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री श्री अजय टम्टा जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि “द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप एक ऐसा सम्मेलन था जिसमें सामाजिक न्याय के तहत शिल्पकारों को शिक्षा-सरकारी सेवाओं तथा राजनीतिक में अवसर दिए जाने की मांग की गई थी, जो कि उस वक्त की एक महत्वपूर्ण मांग थी। उन्होंने अल्मोड़ा नगर में बद्रेश्वर मंदिर के समीप हाल ही में निर्मित मुंशी हरि प्रसाद टम्टा धर्मशाला के बारे में भी विस्तार से बताया, जिसका उद्घाटन 28 अगस्त 2025 में स्वयं उन्हीं के द्वारा किया गया था।” विशिष्ट अतिथि भूतपूर्व सांसद श्री प्रदीप टम्टा जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि मुंशी हरी प्रसाद टम्टा द्वारा आयोजित द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन से शिल्पकारों को पढ़ने का मौका मिला तथा भूमिहीन शिल्पकारों को भूमि उपलब्ध कराई गई। लेकिन अधिकांश शिल्पकारों को अब तक उस भूमि का मालिकाना हक नहीं मिला पाया है। उन्हें मालिकाना हक दिलाने के लिए सामूहिक प्रयास करने की अपील की तथा कांग्रेस शासन के दौरान अल्मोड़ा जनपद के गरूड़ाबाज क्षेत्र में मुंशी हरी प्रसाद टम्टा जी की स्मृति में शिल्प उन्नयन संस्थान का शिलान्यास होने के बावजूद भी कार्य नहीं हो पाने की स्थिति में केन्द्रीय मंत्री अजय टम्टा जी से उक्त कार्य के लिए बजट आवंटित कर कार्य पूर्ण करने का आग्रह किया। कार्यक्रम में मौजूद सभी विशिष्ट अतिथियों एवं वक्ताओं ने राय बहादुर मुंशी हरी प्रसाद टम्टा जी की विरासत को आगे बढ़ाने तथा एकजुट होकर समाज के लिए कार्य करने की अपील की।
सन् 1925 में आयोजित शिल्पकार सम्मेलन का मूल आधार तत्कालीन दलित समुदाय की वास्तविक स्थितियों के अनुरूप मुंशी हरि प्रसाद टम्टा जी द्वारा पारित 21 प्रस्ताव थे। उन्हीं की तर्ज पर शताब्दी समारोह में भी दलित समुदाय की वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम संयोजक श्री संजय कुमार टम्टा द्वारा 21 प्रस्ताव पारित किए गए। जो कि श्री अजय टम्टा माननीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री भारत सरकार के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति महोदया श्रीमती द्रौपदी मुर्मू तथा माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को प्रेषित किए गए। कार्यक्रम में पारित 21 प्रस्तावों का विवरण इस प्रकार है-
1. आजादी से पूर्व मुंशी हरिप्रसाद टम्टा जी के प्रयासों से लगभग 30 हजार एकड़ में बसाए गए हरि नगरी गांवों एवं खुशी राम आर्य जी एवं सरकारों द्वारा समय-समय पर आवंटित भूमि में रह रहे अनुसूचित समाज के लाखों लोगों को आज तक भूमि का मालिकाना हक नहीं मिला है। प्रदेश के इन मूल निवासियों को न्याय देते हुए भूमि का स्थायी मालिकाना हक प्रदान करते हुए उक्त भूमि को श्रेणी-1 में दर्ज किया जाए। इससे इन वर्गों की आर्थिक सुरक्षा मजबूत होगी और भूमि विवादों का समाधान होगा।
2. देश की आजादी से लेकर आज तक अनुसूचित जाति समाज के हजारों परिवार भूमिहीन है। इन परिवारों को तत्काल भूमि प्रदान की जाए, ताकि उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो और सामाजिक न्याय स्थापित हो।
3. उत्तराखंड राज्य में यदि कोई अनुसूचित जाति (शिल्पकार) अपनी रोजी-रोटी के लिए पुश्तैनी धंधा किसी सरकारी भूमि पर 10 वर्षों से अधिक समय से संचालित कर रहा हो, तो उसे उस भूमि का मालिकाना हक प्रदान किया जाए। इससे पारंपरिक कौशलों का संरक्षण होगा और आर्थिक स्वावलंबन बढ़ेगा।
4. राज्य सरकार के सभी सरकारी विभागों के विभिन्न संवर्गों में अनुसूचित जाति जनजाति वर्ग के प्रतिनिधित्व के आंकड़ों के लिए वर्ष 2012 में मात्र 3 माह में रिपोर्ट देने के लिए जस्टिस इरशाद हुसैन कमेटी का गठन किया गया था। वर्ष 2016 में इस कमेटी ने राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है। जिसे आज तक दबाया गया है। इसे शीघ्र ही सार्वजनिक किया जाए। जिससे कि इन वर्गों के प्रतिनिधित्व की सही जानकारी प्राप्त हो सके।
5. प्रदेश के अनुसूचित जाति जनजाति एवं निर्धन परिवारों के बच्चे प्रारंभिक शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं, लेकिन कम छात्र संख्या एवं क्लस्टर नीति के कारण इन्हें बंद किया जा रहा है। इससे इन वर्गों के बच्चों की शिक्षा से वंचित होने की आशंका है। इन स्कूलों को बंद करने के बजाय इनमें गुणात्मक सुधार किया जाए, प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में पांच शिक्षक, एक प्रधानाध्यापक सहित, माध्यमिक विद्यालयों में सभी विषयों के अध्यापक, प्रधानाध्यापक, प्रधानाचार्य, कार्यालय कर्मी, स्वच्छक, रात्रि चौकीदार की नियुक्ति हो तथा पर्याप्त कमरे, खेल के मैदान आदि की व्यवस्था की जाए। जिससे सार्वजनिक शिक्षा को सुदृढ़ और मजबूत किया जा सके।
6. सरकारी स्तर पर दिए जा रहे ठेके व निजी क्षेत्रों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के लिए आरक्षण व्यवस्था को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए एवं नगर निकायों व सरकारी विभागों में पर्यावरण मित्रों की ठेका प्रथा को समाप्त कर स्थाई नियुक्तियां प्रदान की जाए।
7. संविदा, आउटसोर्सिंग, उपनल, दैनिक मजदूरी, मनरेगा, भोजन माता आदि पदों की नियुक्ति में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आरक्षण व्यवस्था का कड़ाई से पालन किया जाए। यदि नियुक्ति के समय आरक्षण नियमों का उल्लंघन हुआ हो, तो स्थायीकरण के दौरान इसे सुधार कर आरक्षण सुनिश्चित किया जाए, ताकि सभी वर्गों को समान अवसर मिलें।
8. विद्यालयी शिक्षा, उच्च शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत अनुसूचित जाति एवं जनजाति के छात्रों को छात्रवृत्ति एवं अन्य सहायता समयबद्ध रूप से प्रदान की जाए, छात्रवृत्ति की जटिल आनलाइन प्रक्रिया के कारण 70-80% छात्र आवेदन करने से वंचित रहे हैं. इसका सरलीकण करते हुए छात्रवृत्ति की धनराशि 50% तक बढ़ाई जाए एवं अभिआवकों की वार्षिक आय सीमा 2.50 लाख से बढ़ाकर 8 लाख की जाए।
9. उत्तराखंड के शिल्पकारों को पुश्तैनी धंधा एवं आधुनिक गृह निर्माण से संबंधित नई तकनीकों के लिए जिले स्तर पर कार्यशाला स्थापित कर प्रशिक्षित किया जाए। तत्पश्चात उन्हें भूमि आवंटन एवं ब्याज-रहित ऋण प्रदान कर कुटीर उद्योग स्थापित करने में सहायता दी जाए, जिससे रोजगार सृजन और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिले। यह कार्य करते हुए उनमें सम्मान की भावना उत्पन्न की जाए।
10. वर्ष 2000 से पूर्व एवं बाद में उत्तराखंड के सभी सरकारी एवं अर्थ-सरकारी कार्यों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बैकलॉग पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं। इन पदों को विशेष अभियान चलाकर शीघ्र भरा जाए, ताकि एससी/एसटी वर्गों की आरक्षण नीति का पूर्ण लाभ मिल सके।
11. प्रदेश की राजधानी देहरादून में शिक्षा एवं कोचिंग के लिए राज्य के विभिन्न जिलों के दूरदराज क्षेत्रों से आने वाले अनुसूचित जाति के बालक-बालिकाओं के लिए अलग-अलग छात्रावास खोले जाएं। इससे उनकी शिक्षा निरंतर बनी रहेगी और शहरी असुविधाओं से मुक्ति मिलेगी।
12. 1947 में मुंशी हरी प्रसाद टम्टा जी के प्रयासों से अल्मोड़ा इंटर कॉलेज के करीब डिप्रेस्ड क्लास हॉस्टल के नाम से एक छात्रावास खोला गया था। इसके लिए उनके द्वारा भूमि भी प्रदान की गई थी। जिसे बाद में ज्ञानोदय छात्रावास नाम दिया गया। 1991 में इसे कर्नाटक खोला में शिफ्ट किया गया। वर्ष 2000 में इसके भवन में भूकंप के कारण दरार आने के बाद इसे पूरी तरह बंद कर दिया गया। इसका पुनर्निर्माण कर इसे पुनः मुंशी हरिप्रसाद टम्टा छात्रावास के रूप में संचालित किया जाए।
13. उत्तराखंड सरकार की राज्याधीन सेवाओं की सीधी भर्तियों के विज्ञापनों में रोस्टर की दोषपूर्ण नीतियों के कारण आरक्षित वर्गों के पदों की संख्या नगण्य हो रही है। रोस्टर से संबंधित इन विसंगतियों को तत्काल दूर किया जाए, जिससे आरक्षण का वास्तविक लाभ सुनिश्चित हो।
14. उत्तराखंड में वर्ष 2012 से पदोन्नति में आरक्षण पर लगी रोक के कारण उच्च पदों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति का प्रतिनिधित्व नगण्य हो गया है। इसे पुनः लागू कर राज्याधीन सेवाओं के उच्च पदों में सभी वर्गों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए।
15. प्राकृतिक आपदाओं, सरकार/निजी कंपनियों द्वारा भूमि अधिग्रहण के मामले है, अनुसूचित वर्ग को उनके नाम से भूमि दर्ज न होने एवं अन्य कारणों से उचित और जरूरी मुआवजा या तो नहीं मिल पाता है या बहुत कम व देर से मिलता है। इस विषय में व्यवस्थागत उपाय किए जाएं।
16. अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को कड़ाई से लागू किया जाए, इसके अनुश्रवण हेतु अनुसूचित वर्ग के हितों के लिए प्रतिबद्ध संस्थाओं/ संगठनों गणमान्य सदस्यों की सलाहकारी कमेटी का गठन किया जाए, जो राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय आयोग को रिपोर्ट करें। पिछले वर्षों के अत्याचार मामलों की केस-टू-केस जांच की जाए तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं पर फर्जी मुकदमे निरस्त किए जाएं।
17. स्पेशल कंपोनेंट प्लान एवं ट्राइबल सब प्लान बजट के आवंटन एवं खर्च को अनुसूचित जाति व जनजाति वगों के हितों में सुनिश्चित करने हेतु व्यवस्थागत प्रणालियां विकसित की जाएं, इससे संबंधित शत-प्रतिशत व्यय इन्हीं वर्गों के लिए किया जाय। इस संबंध में सरकार से श्वेत पत्र या विस्तृत रिपोर्ट जारी करने की मांग की जाती है।
18. राज्य में कुछ भू-भाग ऐसे हैं जहां तकनीकी कारणों के चलते जातिगत अत्याचार होने पर अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में इन हिस्सों में अनुसूचित जाति पर जातिगत अत्याचार काफी अधिक बढ़ गए हैं। अतः राज्य के इन हिस्सों में रहने वाले अनुसूचित जाति के सदस्यों के संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित करने के लिए विशेष संवैधानिक और वैधानिक उपाय किए जाएं।
19. मुंशी हरी प्रसाद टम्टा के सहयोग से प्रदेश में 150 से भी अधिक प्राथमिक विद्यालय खोले गए थे, लेकिन उनके नाम से कहीं भी शिक्षण संस्थान नहीं हैं। प्रदेश स्तर पर विश्वविद्यालयों, कॉलेज परिसरों, छात्रावासों, पुस्तकालयों, खेल संस्थाओं, स्टेडियम एवं सार्वजनिक संस्थाओं के नाम मुंशी हरिप्रसाद टम्टा जी के नाम पर रखे जाएं। साथ ही प्रदेश की पहली महिला स्नातक व देश में अनुसूचित जाति वर्ग की पहली महिला पत्रकार/संपादक लक्ष्मी टम्टा के नाम पर सार्वजनिक पुस्तकालय एवं विशेष लक्षित योजना संचालित की जाए।
20. प्रदेश में पूर्व में ही अनुसूचित जाति समाज के लिए प्रयुक्त अपमानजनक शब्दों को प्रतिबंधित किया गया है. इसके बाद भी इस समाज के गांवों को इन अपमानजनक नामों से संबोधित किया जाता है. शीघ्र ही इनके साइन बोर्ड हटाते हुए इन्हें सरकारी रिकार्ड से हटाया जाय. ग्रामीणों की सहमति से इन गांवों के नाम परिवर्तित किए जाए।
21.अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग इस प्रदेश का मूलनिवासी समाज रहा है। वह यहां के धातु शिल्प कला/ताम शिल्प कला/वास्तु कला/काष्ठ कला/रिंगाल कला/मूर्ति कला/नृत्य कला/ऐपण कला. वाद्य यंत्र कला/छोलिया नृत्य, जागर, आदि कलाओं सहित नौले, धारे, ऐतिहासिक मंदिरों, भवनों, मूर्तियाँ, शिल्पकलाओं आदि का निर्माता संवाहक व संरक्षक रहा है। इस कला के संरक्षण, सृजन, अभिलेख, साहित्य के इतिहास, समाजशास्त्र, एंथ्रोपोलॉजी, भाषा साहित्य आंदोलन आदि पर शोध के लिए राज्य स्तर पर एक शोध संस्थान की स्थापना की जाए एवं इन वर्गों से आगे आने वाले शोधार्थियों के लिए राज्य स्तर पर विशेष फैलोशिप की व्यवस्था की जाए।
इस प्रकार शिल्पकार समुदाय से संबंधित तमाम समस्याओं के संदर्भ में 21 बिंदुओं का ज्ञापन माननीय अजय टम्टा जी को सौंपा गया। अन्त में कार्यक्रम अध्यक्ष श्री दया शंकर टम्टा जी ने शताब्दी समारोह में उपस्थित अतिथियों को ताम्र भेंट कर सम्मानित किया तथा कार्यक्रम के सफल आयोजन हेतु उपस्थित सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया।
द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन की स्मृति में शताब्दी समारोह का आयोजन शिल्पकार समुदाय की एकजुटता, उपलब्धियों तथा कला साहित्य शिक्षा आदि में उनकी भूमिका, सामाजिक राजनैतिक सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक क्षेत्र में शिल्पकार समुदाय का योगदान आदि के दृष्टिगत एक सफल आयोजन रहा। यद्यपि द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन वास्तविक रूप से शिल्पकार समुदाय का जातिगत जुल्म एवं उत्पीड़न के खिलाफ एक सांगठनिक आंदोलन था, जिसकी भव्यता को इसके व्यापक स्वरूप से समझा जा सकता है। सौ साल पहले आयोजित इस सांगठनिक आंदोलन ने दलित अस्मिता के मायने बदल दिए थे। तत्कालीन समय में प्रतिशोध के जो स्वर उत्पन्न हुए थे, वे आज भी बुलंद हैं।
यह महज एक सम्मेलन नहीं बल्कि तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप जन आंदोलन का शंखनाद था। अतः शिल्पकार समुदाय की वर्तमान चुनौतियों का आकलन तथा उनके समाधान हेतु द्योलीडांडा शिल्पकार सम्मेलन से प्रेरणा लेते हुए समाज हित में बेहतर कार्य करने का संकल्प लेना होगा ताकि शिल्पकार समाज का भविष्य सुरक्षित हो सके।
भिक्यासैण अल्मोड़ा
उत्तराखंड

