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जनमत

घोषित और अघोषित आपातकाल

पिछले 5 वर्ष से देश में ही नहीं विदेश में भी भारत में अघोषित आपातकाल की चर्चा हो रही हैं। उस पर लेख आदि लिखे जा रहे हैं। 2018 के अंत में प्रिंसटन विश्वविद्यालय में इतिहास के हेटन स्टॉकडन  प्रोफेसर और आधुनिक भारत के इतिहासकार ज्ञान प्रकाश (18 अप्रैल 1952) की प्रकाशित पुस्तक ‘इमरजेंसी क्रॉनिकल्स: इंदिरा गांधी एंड डेमोक्रेसी टर्निंग प्वाइंट’ (हैमिस हैमिल्टन, 2018) की ‘रिव्यू ऑफ बुक्स’ (18 जुलाई 2019) की समीक्षा और अपने लेख ‘इंडिया: ए लॉन्ग एंड अनडिक्लेयर्ड इमरजेंसी’ में 50 वर्षीय भारतीय निबंधकार और उपन्यासकार पंकज मिश्र ने आरंभ में ही अंबेडकर के 25 नवंबर 1949 के भाषण की चर्चा की है।
अंबेडकर के इस भाषण की चर्चा बार-बार की जाती है पर केवल राजनीतिक दलों ने ही नहीं अंबेडकरवादियों और दलित राजनीतिक दलों ने भी इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया। उस समय अंबेडकर की कही गई बातें आज सच हो रही हैं। अंबेडकर ने कहा था कि जाति और वर्ग में बंधे समाज में समानता और भाईचारा जहां मौजूद न हो, राजनीतिक लोकतंत्र के लिए सामाजिक रूपांतरण आवश्यक है। उन्होंने आशंका प्रकट की थी कि राजनीति में समानता होगी और सामाजिक आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी। राजनीति में हम एक आदमी-एक वोट और एक वोट-एक मूल्य को मान्यता दे रहे होंगे पर समाजार्थिक जीवन में हम सामाजार्थिक संरचना के तर्क से एक मनुष्य-एक मूल्य के सिद्धांत को अस्वीकार करते रहेंगे। समाजार्थिक जीवन में समानता का यह अस्वीकार कब तक जारी रह पाएगा ? अंतर्विरोधों का यह जीवन कब तक कायम रहेगा ? अगर हमने इसे लंबे समय तक जारी रखा, अपने राजनीतिक जीवन को जोखिम और संकट में रखते हुए तो यह राजनीतिक लोकतंत्र की संरचना में विस्फोट कर देंगे। असमानता के शिकार लोग कब तक चुप और शांत रहेंगे ? पंकज मिश्र मानते हैं अंबेडकर को आपदाओं के विस्फोट का जो भय था वह भारत में 2014 के बाद के चुनाव के बाद साकार हुआ जब एक हिंदू प्रभुत्ववादी प्रधानमंत्री बने।
16 मई 2014 और 23 मई 2019 केवल 21वीं सदी के भारत की ही नहीं स्वाधीन भारत की अहम तारीखे हैं जब 16वीं और 17वीं लोकसभा के चुनाव में भाजपा को बहुमत प्राप्त हुआ। पिछले 5 वर्ष में ‘सेकुलर भारत’ समाप्त हुआ। प्रधानमंत्री ने 17 वी लोकसभा चुनाव के बाद के अपने भाषण में यह कहा कि पिछले 5 वर्ष में धर्मनिरपेक्षता की कोई बात नहीं की गई। साफ संकेत था कि धर्मनिरपेक्षता प्रमुख नहीं है। समय-समय पर कांग्रेस सहित जिन राजनीतिक दलों ने ‘ सेकुलर सेकुलर ’ की रट लगाई थी उसका संबंध केवल चुनाव से था। वह दिखावा था। आर एस एस के शब्दकोश में ‘सेकुलर’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ के लिए कोई स्थान नहीं है। संघ-भाजपा का बार-बार नेहरू पर आक्रमण धर्मनिरपेक्षता पर आक्रमण है क्योंकि विभाजन के बाद भारत पाकिस्तान की तरह धार्मिक राष्ट्र नहीं बना। इसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने में नेहरू की सर्वोपरि भूमिका है। धार्मिक राष्ट्र में स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र के लिए कोई स्थान नहीं होता। आज यह तीनों केवल संकटग्रस्त नहीं है बल्कि उन्हें क्रमश अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए कमजोर किया गया है।
स्वतंत्र भारत में भारत का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप निरंतर कमजोर होता गया है। सभी कांग्रेसी कभी सेकुलर नहीं रहे। अनेक कांग्रेसियों का हिंदू प्रेम किसी से छुपा नहीं रहा है। हिंदू महासभा में कांग्रेसियों की सक्रियता थी। कई कांग्रेसी एक साथ दो नाव पर सवार थे। कांग्रेस और हिंदू महासभा दोनों में वे विराजमान थे। स्वाधीनता आंदोलन में जब कांग्रेस सर्वप्रमुख हुई कांग्रेसियों ने दो नावों की सवारी अधिक नहीं की। नेहरू के कारण आजाद भारत में हिंदू राष्ट्र के योजनाकारों की अधिक नहीं चली। संघ की परियोजना में हिंदू राष्ट्र था पर परिस्थितियां उसके पक्ष में नेहरू के समय तक नहीं थी।
आजादी के बाद 7 दिसंबर 1947 को आर एस एस की दिल्ली शाखा के वार्षिक सम्मेलन में गोलवलकर ने 90 मिनट के अपने भाषण में यह कहा था कि संघ राजनीतिक दल नहीं है। उन्होंने इसका खंडन किया था कि संघ हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए कार्यरत है। 3 फरवरी 1948 को गांधी की हत्या के 4 दिन बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था और आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया था। गांधी की हत्या के पहले गोलवलकर को गिरफ्तार नहीं किया गया था जबकि सांप्रदायिक हिंसा की योजना बनाने में उनकी भूमिका के पर्याप्त प्रमाण थे।
विभाजन के समय संयुक्त प्रांत के गृह सचिव राजेश्वर दया (12.8.1909-17.9.1999) ने अपनी पुस्तक ‘ए लाइफ ऑफ आवर टाइम्स’ ;ओरियन्ट लोंगमैन (1998) में कई ऐसे प्रमाण प्रस्तुत किए हैं जो गोलवलकर की सांप्रदायिक हिंसा के योजनाकार के रूप में है। गोलवलकर 1940 से 1973 तक मृत्युपर्यंत संघ के सरसंघचालक रहे हैं। संघ में उनकी भूमिका सर्वाधिक है। नरेंद्र मोदी ने अपनी पुस्तक ‘ज्योतिपुंज’ ;16 व्यक्तियों की जीवनियां में उनकी तुलना बुद्ध, शिवाजी और तिलक से की है। दूसरी ओर इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने उन्हें ‘नफरत का गुरु’ कहां है। गोलवलकर ने संघ का विस्तार किया। उनके नेतृत्व में संघ के कई खुले संगठन बने। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का जन्म भारतीय जनसंघ के जन्म से पहले हुआ। आजादी के कुछ सप्ताह पहले संघ ने अंग्रेजी में ‘आर्गनाइजर’ पत्रिका का प्रकाशन 3 जुलाई 1947 को आरंभ किया।
संघ के सक्रियतावादी प्रचारकों का तर्क था कि विभाजन के संबंध में संघ के विचारों और पक्षों को समझना-समझाना जरूरी है। 1949 में इस पत्रिका ने संघ की राजनीतिक सहभागिता के पक्ष में तर्क दिए। 1 दिसंबर 1949 के ‘आर्गनाइजर’ में के आर मलकानी ने संघ की राजनीतिक हिस्सेदारी की बात की। 21 मई 1964 को मुंबई की संदीपनी साधनशाला में भारत के सभी धर्मावलंबियों के एकजुट होने की बात कही थी और यह कहा था कि हिंदू हिंदुस्तानियों के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला शब्द है जो सभी धर्मों से ऊपर है। इस सम्मेलन में प्रस्तावित संगठन का नाम विश्व हिंदू परिषद रखा गया। 29 अगस्त 1964 का स्थापना दिवस है। आर एस एस की अनुवांशिक शाखा का नारा है ‘धर्मो रक्षति रक्षतः’।
अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने इसे और बजरंग दल को धार्मिक उग्रवादी संगठन बताया था और ‘  वर्ल्ड  फैक्टबुक’ में ‘राजनीतिक दबाव समूह’ की श्रेणी में रखा था।
इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को विभाजित कर बैंक का राष्ट्रीयकरण और प्रिवीपर्स की समाप्ति के बाद समय से एक वर्ष पहले 1971 में लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की। अब वे 1967 की इंदिरा गांधी नहीं थी। ‘गरीबी हटाआ’ का नारा गूंजा। इस चुनाव पर सुनील खिलनानी की टिप्पणी है कि उन्होंने एक तरह से राष्ट्रीय मतदाता मंडल की रचना कर डाली। इसके पहले एक ही समय केंद्र और राज्य के चुनाव हुआ करते थे। इस चुनाव के बाद ही केंद्र और राज्य का आपसी तालमेल भंग हुआ। मतदाताओं का ध्यान क्षेत्रीय समस्याओं से हटाकर हटकर दिल्ली पर केंद्रित होने लगा। 4 वर्ष बाद ही इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय आया था जिसमें 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी द्वारा सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग सही माना गया। 13 दिन बाद 25 जनवरी जून 1975 को इंदिरा गांधी की सलाह पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल की घोषणा की।
घोषित और अघोषित आपातकाल मे जेपी और परोक्ष रूप से ही सहीं क्या गुजरात की कोई भूमिका दिखाई नहीं देती ? उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल के विरुद्ध छात्रों ने आंदोलन आरंभ किया – 20 दिसंबर 1973 से 16 मार्च 1974 तक। गुजरात के इस छात्र आंदोलन से जयप्रकाश नारायण के आंदोलन और आपातकाल का संबंध है। अगर गुजरात में छात्र आंदोलन ना होता, तो भी जैसी परिस्थितियां थी जयप्रकाश नारायण का आंदोलन निश्चित रूप से होता। 3 जनवरी 1975 को ललित नारायण मिश्र की हत्या हुई थी और उसके 5 दिन बाद 8 जनवरी को सिद्धार्थ शंकर ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने की सलाह दी थी। गुजरात में इसके पहले माहौल देखकर इंदिरा गांधी ने चिमन भाई पटेल का इस्तीफा ले लिया था और बाद में वहां की विधानसभा भंग की गई। राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने के बाद। इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया और हटाया भी। 21 महीने बाद 21 जून 1977 को आपातकाल हटा दिया गया। अगर वे पूरी तरह तानाशाह होती तो आपातकाल जारी रख सकती थी।
भारत जैसे देश में मुसोलिनी और हिटलर के लिए कोई जगह नहीं है। यहां लंबे समय तक आपातकाल जारी नहीं रह सकता – घोषित हो या अघोषित। ज्ञान प्रकाश ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि आज आपातकाल की औपचारिक घोषणा नहीं है। प्रेस सेंसरशिप नहीं है और कानून का विधिसम्मत निलम्बन नहीं है पर भारत पिछले 5 वर्ष में एक आंतरिक घेराबंदी का ‘स्टेट’ बन चुका है। अंबेडकर ने लोकतंत्र को केवल ‘फार्म’ में नहीं ‘फैक्ट’ में भी सुरक्षित रखने को कहा था। इस वर्ष के आरंभ में पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने विषाक्त, जहरीले संप्रदायवाद को इंदिरा गांधी के आपातकाल से कहीं अधिक खतरनाक कहा था। प्राय सभी भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों ने अघोषित आपातकाल की बात बार-बार कहीं।
इंदिरा गांधी की कार्यशैली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली में अंतर है। भारतीय लोकतंत्र को बार-बार क्षत-विक्षत किया गया। इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को स्थगित किया। 1975 में आपातकाल लागू करने के पहले बेरोजगारी चरम पर थी और मुद्रास्फीति भी। आज लगभग वैसी ही स्थिति है। जहां तक भारत में ‘सत्तावाद’ की बात है, इसका अपना पुराना इतिहास है। आपातकाल लगाने के 24 घंटे के भीतर इंदिरा गांधी ने सैकड़ों विरोधी नेताओं और सक्रियतावादियों को गिरफ्तार किया था। कइयों को नजरबंद किया था। समाचार पत्रों के कार्यालयों की विद्युत आपूर्ति ठप कर दी गई थी। आज के कश्मीर की स्थिति यह है कि वहां सभी दलों के नेता या तो नजरबंद हैं या कैद। कश्मीर से सभी समाचार पत्र प्रकाशित नहीं हो रहे हैं। वहां किसी प्रकार की कोई जनविरोधी घोषणा भी नहीं है। संविधान में भारतीय नागरिकों को जो मौलिक अधिकार प्राप्त हैं, वे अमल में कम है।
बड़ा सवाल यह है क्या सचमुच भारत में लोकतंत्र जीवंत है ? लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं है। अंबेडकर ने लोकतंत्र को केवल कार्यप्रणाली या प्रक्रिया न कहकर ‘मूल्य’ कहां है। भारतीय लोकतंत्र को क्षतिग्रस्त करने का कार्य इंदिरा गांधी ने किया था। वह अब चरम पर है। संविधानेत्तर शक्तियां कहीं अधिक फनफना और हिनहिना रही है। भीड़ हिंसा बढ़ी है। किसी को कहीं भी फंसाया जा सकता है। उस पर तरह-तरह के आरोप मढ़े जा सकते है।
घोषित और अघोषित आपातकाल में अंतर है। इंदिरा गांधी के समय घोषित आपातकाल था। नरेंद्र मोदी के समय अघोषित आपातकाल है। इंदिरा गांधी के पास केवल सत्ता लोभ था। उनके पास कोई बड़ा एजेंडा नहीं था। आज की सरकार का एजेंडा बड़ा है। यह हिंदू राष्ट्र का एजेंडा है। संविधान और लोकतंत्र के कायम रहते इस एजेंडे की ओर बढ़ा गया है। विरोधी स्वर आज बर्दाश्त के बाहर है। परेशान करने के लिए सरकार के पास अनेक तरीके हैं। भारत अब ‘धार्मिक राष्ट्र’ बनने की ओर बढ़ रहा है। विरोधी दल अशक्त और हतवाद हैं। भाजपा और संघ के पास एक विचारधारा है। पूरी दुनिया में उदारवादी लोकतंत्र कमजोर पड़ा है। इसका आज की वैश्विक पूंजी से संबंध है। चुनाव लीला में सारे दल डूबे हुए हैं। कांग्रेस ने भी हिंदू कार्ड खेला था पर यह उनका अपना इलाका नहीं था। इस पर कॉपीराइट संघ और उसके संगठनों का है। कांग्रेस इस इलाके में बहुत दूर तक नहीं जा सकती थी। 80 के दशक में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों ने कोशिश की। असफल रहे। बाद में उनकी हत्या भी हुई। कांग्रेस की फजीहत होनी थी, हुई। आज वह कहां है ? और भाजपा ? कहीं कोई साम्यं है ? कांग्रेस आज हाफ रही है और भाजपा दौड़ रही है।
अघोषित आपातकाल में सच्ची खबरें रोक दी जाती हैं। बच्चे नमक रोटी खा रहे हैं स्कूल में। यह माननीय कलेक्टर महोदय को बर्दाश्त नहीं होता। अघोषित आपातकाल में सच मर रहा है और झूठ विहंस रहा है। घोषित आपातकाल 70 के दशक में था 20 वीं सदी में। अघोषित आपातकाल 21वीं सदी के दूसरे दशक में है – ‘न्यू इंडिया’ में।

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