Tuesday, May 17, 2022
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राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ में ‘ महामारी की त्रासदी और हम ’ का लोकार्पण

मऊ। राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ में 22 नवंबर को आयोजित एक कार्यक्रम में पत्रिका ‘ अभिनव कदम ‘ द्वारा करोना महामारी पर प्रकाशित पुस्तक ‘ महामारी की त्रासदी और हम ‘ का लोकार्पण वरिष्ठ कवि मदन कश्यप, प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल , सुभाष राय, शिवकुमार पराग ,विंध्याचल यादव, अमरजीत राम द्वारा किया गया।

लोकार्पण के बाद “कविता का समाज और समाज की कविता” विषय पर विचार गोष्ठी हुई। विचार गोष्ठी में आधार वक्तव्य देते हुए शिवकुमार पराग ने आचार्य शुक्ल को रेखांकित करते हुए कहा कि कविता से प्रकृति की रक्षा होती है। अपने समय को समझने के लिए कविता अनिवार्य है। आज शत्रुता, हिंसा लोगों के दिल दिमाग में भरा जा रहा है।

डॉक्टर विंध्याचल यादव ने कविता अपनी मानवीय संवेदना के कारण हमेशा जनपक्ष में खड़ी होती है। यही कारण है कि कविता का समाज हमेशा जनतात्रिक होता है। अपने अनेक अंतर्विरोधों के बाद भी तुलसी कहते हैं ” जो अनीति कछु भाखऊ भाई, तब मोंही बरजउ भय विसराई”।

प्रोफेसर श्री प्रकाश शुक्ल ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ का स्वरूप देखकर साहित्य के विकास का एहसास हुआ। कविता का समाज दीर्घजीवी होता है और अपने वास्तविक समाज का निर्माण भी करता है। कविता वहीं बड़ी होती है जो समाज से सम्बद्ध होती है। वह समाज समृद्ध होता है जो अपने समय की कविता से जुड़ा होता है। महामारी की नियति को ठीक से कविता ने ही पहचाना है, कविता कहती है कि महामारी दैवी नहीं है यह समाज ,धर्म और सत्ता द्वारा रची जाती है। कविता और समाज का रिश्ता प्रतिस्पर्धा का नहीं परस्परता का होता है। इस रिश्ते से ही हमारे सामाजिक संस्कृति का निर्माण होता है।कविता में दो तत्व स्वप्नदर्शिता एवं लोकतांत्रिकता मुख्य है, यह काव्य में कसौटी की तरह काम करती है।

मदन कश्यप ने कहा कि मनुष्य और प्रकृति के संबंधों को पुनः परिभाषित करने की जरूरत है। कविता मनुष्यता की मातृभाषा है। आवाज जब एक सीमा से तेज होती है तो बंद हो जाती है,किसान की आवाज सबसे कमजोर आवाज थी पर उसने देश की सत्ता की बोलती बंद कर दी, कविता को देखने की दृष्टि हमेशा व्यक्ति और समाज में विभक्त रहती है व्यक्ति और समाज का रिश्ता भी अन्योन्याश्रित है।हमारी भाषा,सभ्यता ,संस्कृति संगीत हमें समुदाय से सभ्यता की ओर ले जाती हैं, साहित्य की भूमिका समाज को रचने मे है।

श्री सुभाष राय ने कहा कि संस्था के निर्माण में कुछ मैं भी सहयोगी रहा हूं पर यहां आने के बाद तबीयत प्रसन्न हो गई। संस्था में लगे चित्र से लगता है कि किसी सभा में यह सभी लोग हैं और इनकी अध्यक्षता करते हुए गौतम बुद्ध दिखते हैं जो समाज की मुक्ति के लिए अपनी मुक्ति टालते हैं।अपना निर्माण टालते हैं। जयप्रकाश धूमकेतु ने अपनी मुक्ति समाज की मुक्ति के लिए टाल दी। आने वाले दिनों में जब विभिन्न साहित्यकारों पर बात होगी तब अभिनव कदम का स्मरण किया जाएगा।

प्रथम सत्र के गोष्ठी का संचालन संजय राय और अध्यक्षता सुभाष राय ने की। दूसरे सत्र में बाहर से आए हुए कवियों व स्थानीय कवियों ने काव्य पाठ किया। दूसरे सत्र के अध्यक्षता वरिष्ठ कवि मदन कश्यप एवं संचालन जयप्रकाश धूमकेतु ने किया।


कविता पाठ में प्रमुख रूप से मदन कश्यप, डॉक्टर श्री प्रकाश शुक्ल ,सुभाष राय ,शिवकुमार पराग ,अमरजीत राम, दयाशंकर तिवारी ,मधुर नजमी, गिरीश मासूम, मृत्युंजय तिवारी, जितेंद्र मिश्र काका, बृजेश राय, आदि कवियों ने काव्य पाठ किया। ओम प्रकाश सिंह ने अंत में आए हुए कवियों और मेहमानों का आभार व्यक्त किया।

गोष्ठी में प्रमुख रूप से डॉ रतन खत्री, तय्यब पालकी, रमेश राय, डॉक्टर शकील अहमद, भानु प्रताप राय, अजीम खान, बिरेंद्र कुमार, बसंत कुमार, फतेह बहादुर यादव, राम नवल, सुमित उपाध्याय, केदार सोनकर, प्रवीण कुमार, विष्णु अतुल सिंह, साधु यादव, अरविंद आदि प्रमुख रूप से शामिल रहे।

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