पवन करण
एक अभुआता समाज कायनात की सारी बुलबुलों की गर्दन मरोड़ रहा है….!
रुपम मिश्र की कविताएँ हिंदी कविता की समृद्धि की सूचक हैं। उनका कविता संग्रह ‘एक जीवन अलग से’ इस बात का प्रमाण है कि हिंदी कविता जिस भाषा, गठन, कथन और रूप में लिखी जा रही है, वह भविष्य गामी और भरोसेमंद है। हिंदी की समकालीन कविता यही है और उससे पीछे मुड़कर देखने की उम्मीद करना व्यर्थ है, वह खुद को आगे लेकर ही जायेगी।
कमाल है कि समकालीन हिंदी कविता में आ रहे नये कवियों में अपनी भाषा, कहन कथन और गठन को लेकर कोई संकोच नहीं, बल्कि उनकी कविताचर्या में चेतना संपन्न आश्वस्तिकारक दृढ़ता है। हिंदी कविता में आ रही नई पीढ़ी से और हम क्या चाहते हैं। उसकी कविता आगत की कविता है और विगत को वह अपने कंधों पर ढोना नहीं चाहती।
बाजार और पहचान उसे तरह-तरह से प्रभावित करने के फेर में उसके इर्द-गिर्द तरह-तरह के प्रपंच रचता रहता है मगर यह उल्लेखनीय है कि फंदे की पहचान उसकी दृष्टि का स्थायी तत्व है। जहां कविता है वहां यह दृष्टि उपस्थित है। वह जानती है कि वह अपने रचने वाले कवि को सितारा नहीं बना सकती मगर वह उसे शूल जरुर बनाये रख सकती है। चुभकर चीख निकाल देने वाला शूल।
रुपम मिश्र अपनी कविता के शीर्ष तक पहुंचने के क्रम में, अपनी भाषा के रास्तों, खासतौर पर बोली की गलियों और पगडंडियों पर दीर्घ अवधि की यात्राएं करती हैं। उनके पास अपनी बात कहने के लिए पर्याप्त से भी अधिक धीरज है, जो हिंदी कविता में नये आस्वाद की तरह है। पढ़ने के क्रम में जिसका हिस्सा पाठक को भी बनना पड़ता है, संग्रह की पहली कविता से ही पाठक रूपम की छाया की तरह व्यवहार करने लगता है। लेखक की काया…पाठक की छाया।
रूपम की कविता में पुरुष जो प्रेमी भी है उसमें इतनी समझदारी और संवेदना होनी चाहिए कि उसकी यहां इतनी पूछ हो रही है और लगातार हो रही है, तरह-तरह से उससे संवाद किया जा रहा है। न तो उसे उसके कृत्यों के लिए अपमानित किया जा रहा है न उसे उसके स्वार्थों और धोखों के लिए प्रताड़ित किया जा रहा है। बस उसे उसके भीतर की मनुष्यता के रखरखाव की ओर प्रेरित किया जा रहा है। उससे बेहतर होने की उम्मीद की जा रही है। ताकि दुनिया को निरंतर बेहतर बनाये रखने के उपक्रम में जुटे रहा जा सके। कविताओं के पाठक सोचें क्या वह इस लायक हैं। इन कविताओं में उनकी शक्ल कौन सी है।
हिंदी कविता में स्त्री कवियों ने जिस ताप और तेवर के साथ प्रवेश किया है वह विस्मयकारी आश्चर्यजनक और बेचैनी से भर देने वाला है। वे कह रही हैं और खूब और सही कह रही हैं। कविता में खाली पड़ा स्थान वे अपनी विवेकवान उपस्थिति से भर रही हैं, बल्कि कहें तो वे वहां रहने को जिसके बाहर उनका नाम खुदा हो, अपना घर बना रही हैं। किराये के घर में रहना उन्हें मंजूर नहीं।
बांचिए की उनके पास बताने-कहने-लिखने को कितना है। कविता में विचार, भाषा और प्रतिरोध की आवश्यक समझ उनकी अपनी है। जो उन्हें मौलिकता के साथ-साथ विश्वसनीयता भी प्रदान करती है, लग रहा हैं वे हमारे समाज और हमारी भाषा की कवि हैं। रूपम मिश्र ऐसी ही कवि हैं-
◆हम अभी बिछड़ रहे हैं तो क्या एक-दूसरे का पता तो जानते हैं, जहां कटे हुए जंगल के किसी पेड़ की नमी होगी मैं जान जाउंगी तुम यहां आये थे
किसी पाटी जा रही नदी का उदास बैराज जब रोकेगा
फफक कर रोने का मन करेगा तो समझूंगी
तुम्हारा करुण मन यहां से तड़पकर गुजरा है।
◆मुझे हैरत है कि जहां भाषा में गाली सिर्फ स्त्री के लिए बनी है, वही तुम एक अनजान स्त्री की आंखों का लिहाज करके कैसे चुप रह गये
◆तुम्हारी हंसी है या खिलखिलाहटों का जादुई दर्पण
मैं इस हंसी को हथेली में भरकर आने वाले समय के लिए आस बो रही हूँ
मैं तुम्हें सोचकर उम्र गुजार सकती हूं
◆मैं एक अछूत बर्तन की तरह घर के कोने में पड़ी थी
◆मैं तुम्हारी आंखों से दुनिया देखने चली थी
दुनिया ने निहारे दलाल की तरह हंसकर
तुम्हारी ही विद्रूप तस्वीर सामने रख दी
◆एक ऐसा जीवन होता जिसमें हम उम्र भर मनुष्य बनना
और प्रेम करना सीखते
◆हम गांधी और नेहरु को पापा भइया से महान नहीं समझते थे
डरना झुकना विरोध न करना
सच में हम मां के बनाए खिलौने थे
◆ये उड़ना चाहती हैं, उड़ने से पंख टूटते नहीं
मजबूत होते हैं बस यही नहीं जानतीं
कितनी आकाशगंगाएं डाका बन इनकी आंखों से झरती हैं और ये प्यासी ही मर जाती हैं
◆हम जो थोड़े से बचे रहे खुद में
उसे खुद के अच्छा कहलाने में खर्च कर दिया
◆सत्ता का चरण द्वारे निर्लज्ज अखबार और नौ मन मेकअप पोते एक एंकर
◆मैं हमेशा टिकोरे के बीज को ऐसे छिपकली कि वो
फिसलकर ननिहाल की दिशा में गिरता
उधर से आती चिड़िया को ध्यान से देखती
ठेठ होता है वो ननिहाल जिसकी स्मृतियां बच्चों के लिए सुखद नहीं होतीं
◆प्रतिरोध का लाल रंग जैसे चेहरे पर पुता हो
गुस्सा आता है कि उस रंग की भाषा सिखाने तुम तक कोई नहीं पहुंचा
◆पिताओ! वो ठग पिताओ! निज स्वार्थ मर्यादा के लिए
तुमने ही सबसे ज्यादा ठगा बेटियों को
और बेटियों ने सबसे ज्यादा मोह किया पिताओं से
◆रोम जला भर जानना काफी कैसे हो सकता है
जब रमईपुरा और कुँजड़ान कैसे जले आप नहीं जानते
◆अपने कदमों की धमक पर इतराना तो ठीक है पर
बहुत मचक कर चलने पर धरती पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है
( लोक भारती से प्रकाशित बढ़िया संग्रह है… मैनें पढ़ लिया आप भी पढ़िये )
लोकभारती प्रकाशन
मूल्य 176 रुपये (पेपरबैक)
समीक्षक पवन करण का जन्म 18 जून, 1964 को ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ। उन्होंने पी-एच.डी. (हिन्दी) की उपाधि प्राप्त की। जनसंचार एवं मानव संसाधन विकास में स्नातकोत्तर पत्रोपाधि।
उनके प्रकाशित कविता-संग्रह हैं-‘ इस तरह मैं’, ‘स्त्री मेरे भीतर’, ‘अस्पताल के बाहर टेलीफोन’, ‘कहना नहीं आता’, ‘कोट के बाजू पर बटन’, ‘कल की थकान’, ‘स्त्रीशतक’ (दो खंड) और ‘तुम्हें प्यार करते हुए’। अंग्रेजी, रूसी, नेपाली, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, गुजराती, असमिया, बांग्ला, पंजाबी, उड़िया तथा उर्दू में उनकी कविताओं के अनुवाद हुए हैं और कई कविताएँ विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में भी शामिल हैं।
‘स्त्री मेरे भीतर’ मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, उर्दू तथा बांग्ला में प्रकाशित है। इस संग्रह की कविताओं के नाट्य-मंचन भी हुए। इसका मराठी अनुवाद ‘स्त्री माझ्या आत’ नांदेड महाराष्ट्र विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में शामिल और इसी अनुवाद को गांधी स्मारक निधि नागपुर का ‘अनुवाद पुरस्कार’ प्राप्त। ‘स्त्री मेरे भीतर’ के पंजाबी अनुवाद को 2016 के ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया।
उन्हें ‘रामविलास शर्मा पुरस्कार’, ‘रजा पुरस्कार’, ‘वागीश्वरी पुरस्कार’, ‘शीला सिद्धान्तकर स्मृति सम्मान’, ‘परम्परा ऋतुराज सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, ‘स्पंदन सम्मान’ से भी सम्मानित किया जा चुका है।
सम्प्रति : ‘नवभारत’ एवं ‘नई दुनिया’, ग्वालियर में साहित्यिक पृष्ठ ‘सृजन’ का सम्पादन तथा साप्ताहिक-साहित्यिक स्तम्भ ‘शब्द-प्रसंग’ का लेखन।
ई-मेल : pawankaran64@rediffmail.com

