समकालीन जनमत
पुस्तक

हृषीकेश सुलभ के उपन्यास ‘दाता पीर’ की पुस्तक समीक्षा

पवन करण


दाता पीर

एक सुनार का बेटा था। चाँद के टुकड़े जैसा सुंदर। उसने आवाज़ लगाई कि कुछ गढ़वा लो, कुछ बनवा लो। उसने सोने जैसा मेरा दिल लिया और तोड़ दिया। न कुछ गढ़ा, न कुछ सँवारा ..।

ये क़बरगाह है साबिर। यहाँ आने के बाद सिरफ़ मुर्दे रुक जाते हैं।दूसरे लोग रुकने के लिए नहीं आते। वे लौट जाने के लिए ही आते हैं।

जीते जी मुर्दा बनने के लिए कलेजा चाहिए साबिर मियाँ। सबके बूते की बात नहीं जीते जी मुर्दों की जिन्दगानी जीना।

किताबें, कहानियाँ, कविताएँ, उपन्यास न होते तो तो जिंदगी की कितनी सूरतें अनजानी रह जातीं। रह भी गई होंगीं। जिंदगी के कितने ही कराहते-काँपते-दम तोड़ते गहरे से चलकर फीके पड़ते या जन्म से ही धुंधले रंगों से कभी हमारा सामना न होता जो कोई कहने-सुनने लिखने की शक्ल में हमारे सामने नहीं रखता।

दाता पीर ऐसी ही दुनिया है। पता नहीं कितने लोग अब तक ज़िन्दगी की इस ढलान से, जिस पर फिसलन ही फिसलन है, से परिचित होंगे। अंधेरा बस वह नहीं होता जिसमें आप जीते और पहचानते है। अन्धेरा वहाँ भी होता है जहाँ आप कभी नहीं गये। अंधेरे की दुनिया उजाले की दुनिया के बराबर ही है।

जो कथन आपको उदासी की राह पर बढ़ा देते है। आपकी आपके भीतर से मुलाकात करवा देते हैं। आपको आपकी तड़प के सामने खड़ा कर देते हैं। दरअसल ‘दाता पीर’ ऐसी ही बेचैनी से भर देने वाली कहन है।

वास्तविक जीवन में आप जिनके पास बैठना बस इसलिए पसंद न करें क्योंकि आपके और उनके बीच बहुत अंतर है। क्योंकि आपको जो हासिल है वह उन्हें हासिल नहीं क्योंकि आप उनके जीवन में पसरे संघर्षों से परिचित नहीं है। मगर ‘दाता पीर’ के ऐसे ही पात्रों को जब आप पढ़ना और जानना प्रारंभ करते हैं तो इस जुड़ाव की प्रक्रिया में आप उन्ही की दरिद्रता और विवशता को जीना शुरु कर देते हैं। ‘दाता पीर’ के जिंदगी के बोझ से हाँफते पात्रों के शत्रुओं के आप भी शत्रु हो जाते हैं।

प्रारंभ से ही गति पकड़ लेता हृषीकेश सुलभ का दाता पीर पाठक के मन को संवेदना, दुख, प्रेम और प्रतीक्षा का गहरा साथी बनाता है। मनुष्य को पर-पीड़ा-चेतन भी करता है।

मनुष्य -मनुष्य के जीवन में अंतर और हिंदी साहित्य की समृद्धि का प्रतीक दाता पीर कितना सच्चा उपन्यास है।

 

पुस्तक: दाता पीर (उपन्यास)

लेखक: हृषीकेश सुलभ
प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन
मूल्य 299/—

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion