पवन करण
जो प्रेम हठ नहीं करता वो बच नहीं सकता!
ए.के. रामानुजन की तीन सौ रामायण निबंध-पुस्तक जिसे रामानुजन ने पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय में लिखा। जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास स्नातकों के पाठ्यक्रम में शामिल करने के पश्चात कट्टरपंथियों के दबाव में विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद ने पाठ्यक्रम से हटा दिया।
एक ऐसा निबंध जिसमें रामकथा की विविधता और उसके भीतर छिपे अर्थों के बारे में बताया गया के क्रम में, बोधिसत्व के कविता संग्रह ‘अयोध्या में कालपुरुष’ में शामिल दस पर्वों और एक समापन पर्व में बँटी ‘राम’ पर पुस्तक-शीर्षक केंद्रित दीर्घ-गाथा-कविता को पढ़ा जा सकता है। इसे एक और जुड़ाव कह देना उचित होगा।
संग्रह में शामिल चौदह खंडों में बँटी अवध में प्रचलित लोककथा पर आधारित एक अन्य कविता, जिसकी लोक में पूर्व से संवेदनात्मक पहचान है को ‘हिरणी का अयोध्या की रानी कौशल्या से विनय-पत्र!’ को भी इसके विस्तार के रूप में बाँचा जाना चाहिए।
डोर बढ़ती हुई यहाँ तक आती है।
जब हम आचार्य चतुरसेन लिखित महाभारत का सार ‘धर्मोरक्षति’ पढ़ते हैं, उसमें कृष्ण पर केंद्रित एक अत्यंत मार्मिक खंड ‘कृष्ण की अंतर्वेदना’ पढ़ने को मिलता है जिसमें आख़िर में युद्ध भूमि में राधा कृष्ण को ढूँढती-भटकती, गिरती-पड़ती, घूमती है और कृष्ण उससे बचते-छिपते-भागते हैं। अयोध्या में कालपुरुष में चौदह भागों में बँटी बोधिसत्व की एक कविता’ कृष्ण की अंत्येष्ठी’ शामिल है। भारतीय प्राचीन साहित्य जो अधिकांश धार्मिक साहित्य है, में एक चरित्र पर कुछ या कई मिथकीय कथाएँ हैं। लेखकों अध्येताओं नें मिथकीय चरित्रों को अपने-अपने ढंग से लिखा है और उनकी व्याख्या की है।
कृष्ण कथा पर आधारित जो लेखन पाठक को सर्वाधिक संवेदनशीलता से जोड़ता है, वह शिवाजी सावंत का युगंधर और मृत्युंजय है, जिनमें कृष्ण का संपूर्ण चरित्र सबसे मानवीय और नज़दीकी रूप में है। आठ खंडों में विभाजित एक कविता ‘जरासंध का अखाड़ा’ भी इस संग्रह में शामिल है जो स्वभाविक रूप में कृष्ण से जुड़ती है। मैं यहाँ मिथकीय चरित्रों पर लिखीं अनेक कविताओं का उदाहरण नहीं दे रहा हूँ। उनका ज़िक़्र, उनकी स्मृति, आलोचना और धिक्कार मैं आप पर छोड़ता हूँ।
‘दारा शुकोह का पुस्तकालय और औरंगजेब के आँसू!,’ ‘अजातशत्रु और बिम्बिसार’ तथा ‘सम्राट अशोक का नरक’ जैसी दीर्घ गाथा कविताएँ, इस कविता संग्रह और कवि को मिथकीय संसार से बाहर निकालने का आवश्यक और सचेत कार्य करती हैं। इन कविताओं में अनदेखी अनजानी रोचकता भी है।
इस कविता संग्रह का संयोजन और प्रस्तुति अलग है। इसकी कविताओं में आपको खुद के साथ दूर तक पैदल चलना पड़ता है। चलते हुए आपके पैर ही आपके साथ होते हैं-
●कोई औरंगजेब नहीं चाहता कि दारा जिंदा लौटकर आये
सबको अपने पुस्तकालय ले जाकर सत्ता के खिलाफ सोचना सिखाए!
●आँसुओं की लड़ियाँ मुक्ति नहीं दिलातीं किसी को
●जिनके पास शस्त्र नहीं, उनके शोकाकुल विलाप सुने नहीं जाते, ऐसा ही चल रहा है न जाने कब से!
●जिस त्रिशूल पर काशी टिकी है, वही शिव का त्रिशूल
प्रेम करने वालों की छाती में गड़ा है
●धर्म बदलने से सत्ता नहीं बदल जाती
वह वैसे ही बनी रहती है, घाट खो जाते हैं
नदियों का पुरातन जल वही रहता है
●हत्या पुण्य है यह बात
एक विचार के रूप में लोगों को बताई गई
हत्या कर्तव्य है कुछ लोग ऐसे भी सोचने लगे
सत्तासीन राजा शव होता है वैभव का
इतिहास कहता है कि पृथ्वी पर
किसी द्वारा बनवाए नर्क का विचार
पहली बार मगध में संभव हुआ
हे भारत! तुम देख नहीं सकते
किंतु मैं देख रहा हू
मेरे साथ अनेक और लोग देख रहे हैं
लेकिन वे किसी कारण मौन हैं
क्या तुम्हारे राज्य में जो मौन हैं
क्या तुम जानते हो वे कौन हैं
बिना हत्या के अंतिम जय नहीं मिलती
नहीं होती धर्म की स्थापना
(राजकमल से प्रकाशित इस संग्रह को मैनें पढ़ लिया। आप भी पढ़िये।)
पुस्तक: अयोध्या में कालपुरुष
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
मूल्य: 151 रुपये (पेपरबैक)

