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दलितों का भारत बंद : दलित आन्दोलन का नया दौर और नया रूप

 

पिछले चार सालों में भारत में दलित आन्दोलन नए रूप में विकसित होना प्रारम्भ कर चुका है.रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या,गुजरात का ऊना आन्दोलन,सहारनपुर में भीम आर्मी का आन्दोलन,महाराष्ट्र के भीमा कोरे गांव का संघर्ष और 2 अप्रैल का दलितों द्वारा किया गया स्वत:स्फूर्त भारत बंद,इन सभी आंदोलनों ने यह साबित किया है कि भारत में दलित आन्दोलन अब नए दौर में प्रवेश कर चुका है.

आज के समय में दलित आन्दोलन ज्यादा व्यापक मुद्दों,विस्तृत नजरिये और उग्र तेवर के साथ सामने आया है. लोकतंत्र पर बढ़ते फासीवादी हमले और हिंदुत्व के मनुवादी एजेंडे को सरकारी संरक्षण में लागू करने की कोशिशों के खिलाफ आज का दलित आन्दोलन देश के हर कोने से उठ खड़ा हो रहा है.यह अब सिर्फ हिस्सेदारी या प्रतिनिधित्व के सवाल ही नहीं उठा रहा है, बल्कि मान सम्मान, जमीन और जीविका के अधिकार और जाति उन्मूलन के बड़े सवालों को भी संबोधित कर रहा है.

यह कहना अनुचित नहीं होगा कि बाबा साहब डा. आंबेडकर की वैचारिक विरासत के असली वारिस इन्हीं आंदोलनों के बीच से निकलेंगे. महाराष्ट्र के दलित पैंथर को छोड़ दें तो डा. आंबेडकर के बाद भारत में दलित आन्दोलन मूलत: सत्ता विमर्श और चुनावी सौदेबाज़ी के लिए दलित जनाधर को इस्तेमाल करने और इसके जरिये दलितों के लिए छोटे मोटे सुधार हासिल करने की रणनीति पर काम करता रहा है.

उत्तर प्रदेश में बसपा ने कांशीराम के नेतृत्व में इस रणनीति को सफलता पूर्वक अंजाम दिया था. लेकिन आज परिस्थिति बदल चुकी है. हिंदुत्व की राजनीति के दीर्घकालीन सोशल इंजीनियरिंग के तहत विकसित हुई नयी राजनीति में दलित अपनी संख्या के आधार पर भागीदारी का दावा नहीं कर पा रहा बल्कि हिंदुत्व की शक्तियां उलटे दलितों की अच्छी खासी संख्या को हिन्दू पहचान के तहत गोलबंद करने में सफलता पा चुकी हैं.

दलितों को हिन्दू धर्मध्वजा के तहत लाना महज एक चुनावी रणनीति नहीं है बल्कि यह मनुवाद की आधुनिक चालबाजी है जिससे हिंदुत्व की सामजिक स्वीकार्यता को विस्तार देने की कोशिश हो रही है.

जिस समय दलितों को कंधे पे बिठाकर मंदिर में प्रवेश कराया जा रहा है. दलित राष्ट्रपति और महामंड्लेश्वर बनाये जा रहे हैं, ठीक उसी समय दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ गई हैं. आरक्षण के अधिकार से लेकर सम्मानजनक जीवन के अधिकार पर मनुवादी-सामन्ती संगठित हमला चल रहा है.आज दलितों से वे सारे अधिकार छीन लेने और सीमित कर देने की कोशिश चल रही है जिसे डा. आंबेडकर के संघर्षों के जरिये संविधान ने उपलब्ध कराये थे. ऐसे समय में दलितों का आक्रोश और विक्षोभ स्वाभाविक है.यह आक्रोश संघनित होते होते किसी बड़े आन्दोलन का रूप अवश्य लेगा.

2 अप्रैल के भारत बंद ने इस आन्दोलन की संभावना को अभिव्यक्त किया है. सोशल मीडिया के जरिये स्वत:स्फूर्त ढंग से आयोजित होने वाले इस बंद ने दलितों की युवा पीढ़ी के मन में पल रहे आक्रोश को सामने ला दिया साथ ही यह भी साबित किया की यह नई पीढ़ी अब दब कर रहने वाली नही है,समाज के ठेकेदार नेताओं की कृपा के भरोसे बैठे नही रहेंगे बल्कि खुद आगे आकर संघर्ष करेंगे.

 संघनित आक्रोश की अभिव्यक्ति

20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण कानून में बदलाव करने के लिए नया आदेश जरी किया जिसके तहत दलित उत्पीड़न के मामलों में बिना जांच किये एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमें नही लिखे जा सकेंगे.और किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ इस कानून के तहत मुकदमा दर्ज करने से पहले विभागध्यक्ष की अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया.सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले दलितों के भीतर सुलग रहे असुरक्षा की भावना को और अधिक भड़का दिया है.केंद्र और राज्यों में बीजेपी सरकार के संरक्षण में पहले से ही दलितों पर उत्पीड़न की घटनाये बढ़ी हुई है.न्यायलय के जरिये अरक्षण के अधिकार पर पिछले दरवाजे से अंकुश लगाने की कोशिश चल ही रही है.

इस परिदृश्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने आग में घी डालने का काम किया.सोशल मीडिया पर इस निर्णय की भर्त्सना शुरू हो गई और वहीं से भारत बंद का विचार निकल पडा.बिना किसी केंद्रीकृत योजना और नेतृत्व के पूरे देश भर के छोटे छोटे दलित संगठनों और व्यक्तियों, विशेषकर नौजवानों ने अभूतपूर्व एकता और जुझारूपन दिखाते हुए इस बंद को सफलतापूर्वक अंजाम दिया.सोशल मीडिया पर तैरता हुआ यह अभियान व्यापक दलित, आदिवासी और पिछड़ी आबादी के बीच पहुँच गया और 2 अप्रैल का दिन ऐतिहासिक प्रतिरोध का दिन बन गया.
लगभग पूरे देश के शहरों, कस्बों जिला मुख्यालयों पर जनसैलाब उमड़ पडा.आमतौर पर भारत में दलित आन्दोलन शांतिपूर्ण और अनुशासित रहता आया है.लेकिन इस बार जिस तरह एक साथ पूरे देश के दलित सड़कों पर उतरे इसके कारण सरकारों के हाथ पाँव फूल गए.उन्होंने सपने में भी नही सोचा होगा कि आन्दोलन का स्वरुप ऐसा भी हो सकता है.बंद के दिन देश के विभिन्न हिस्सों में हिंसा की घटनाओं के कारणों के बारे में जो रिपोर्टिंग हुई है उससे यह साफ़ है कि पुलिस ने या तो जान बूझकर या फिर नासमझी में भीड़ को उग्र होने के लिए उकसाया.आजमगढ़ जिले की सगडी तहसील पर हुई हिंसा के अनुभव से यह बात साबित होती है.वहां पर पुलिस दलितों से अपने सामन्ती पूर्वाग्रह के तहत निपटने की कोशिश में भीड़ को हिंसा के लिए भड़काया.

आन्दोलनकारियों से बात करने और उनकी बात सहानुभूति पूर्वक सुनने की बजाय तुरंत लाठीचार्ज कर दिया गया. उन्हें यह एहसास था कि दलित आन्दोलनकारी बल प्रयोग से डर कर पीछे हट जाएगी.लेकिन इस बार आन्दोलनकारी युवा जोश से लबरेज़ थे.उन्होंने पुलिस दमन का जम कर मुकाबला किया. मध्यप्रदेश और राजस्थान के कई शहरों में पुलिस के साथ हिन्दू संगठनो के लोग खुलेआम आन्दोलनकारियों पर हमला करते नजर आये.भीम आर्मी के प्रभाव वाले मेरठ और पश्चिमी यूपी के जिलों में तो पुलिस ने दलित युवाओं पर शत्रुता पूर्ण तरीके से जुल्म ढाए जैसे वे किसी दुश्मन देश के सैनिक हों.
बंद के बाद बड़े पैमाने पर दलितों का पुलिस दमन किया गया .लेकिन दमन, उत्पीड़न के बावजूद इस आन्दोलन ने यह साबित कर दिया कि सौदेबाज़ी और याचना की दलित राजनीति के दिन अब पूरे हो रहे हैं,और दलित युवा अब अपने सवालों के जवाब के लिए 5 साल इंतजार नही करेंगे.अपमान और अन्याय झेलते हुए अब वे ‘अपनी’ सरकार आने का इंतजार नहीं करेंगे.उत्तर प्रदेश में भीम आर्मी के आन्दोलन ने इस प्रवृत्ति की शुरुआत पिछले साल मई में ही कर दी थी.

दोस्त और दुश्मन की पहचान कराता आन्दोलन

2 अप्रैल के भारत बंद की एक खासियत यह रही कि वामपंथ ने खुलकर अपनी ताकत के साथ इसमें भागीदारी की.पुलिस दमन भी झेला.सड़क पर उतरी भीड़ में नीले झंडों के साथ लाल झंडे की मौजूदगी ने परिवर्तनकामी राजनीति के लिए नया उत्साह पैदा किया है.रोहित वेमुला की हत्या के खिलाफ चले आन्दोलन से इस एकता की शुरुआत हुई थी.ऊना आन्दोलन में भी वामपंथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष में उतरा.भारत बंद ने वाम आन्दोलन और दलित जनमानस को और नजदीक लाने का काम किया है.अस्मितावादी मंडलवादी राजनीति में वाम विरोधियों के लिए यह उपस्थिति बेहद खटकने वाली रही है.अब वे जोर शोर से इस बात का प्रचार करने में लग गए हैं कि वामपंथ दलित आन्दोलन को हाइजैक करने में लगा है.एक ओर वे यह आरोप लगाते रहे कि वामपंथ दलित आन्दोलन के मुद्दों को समझना नहीं चाहते, जाति के प्रश्न को समझना नहीं चाहते.लेकिन अब जब क्रन्तिकारी वाम अपनी गलतियों से सीखते हुए जाति उन्मूलन के प्रश्न को उठाते हुए ‘जय भीम- लाल सलाम’ का नारा दे रहे हैं तो दलित राजनीति के अस्मितावादी ठेकेदारों को नागवार गुजर रहा है. इसके विपरीत देखें तो न तो भारत बंद में न ही उसके बाद पुलिस उत्पीड़न के विरोध में कोई भी दल समर्थन में खुलकर नहीं आया.सभी पार्टियाँ अपने नफा नुकसान के आधार पर रणनीति बनाने में लगी हुई थीं.

भारत बंद ने निश्चित तौर पर दलित युवाओं के जुझारू तेवर को दुनिया के सामने ला दिया है.सरकार का मुंह जोहने की बजाय जनांदोलन के जरिये बदलाव लाने की बात अब वह समझ चुका है.यह जुझारूपन दलित आन्दोलन के संकीर्ण नजरिये को व्यापक बनाते हुए जाति उन्मूलन और समाजवाद की दिशा में बढ़ेगा, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए और इसके लिए प्रयास किया जाना चाहिए.

(युवा आलोचक डॉ. रामायन राम जन संस्कृति मंच की उत्तर प्रदेश इकाई के सचिव हैं.)

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