समकालीन जनमत
कहानी

मोहम्मद उमर की कहानी “बशीर”

(इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र मोहम्मद उमर महादेवी वर्मा स्मृति महिला पुस्तकालय से जुड़े हैं . उमर की रिपोर्टिंग, लेख और समीक्षाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं. आज समकालीन जनमत के पाठकों के लिए प्रस्तुत है उमर की कहानी ‘बशीर’. अपनी प्रतिक्रियाओं से हमें जरूर अवगत कराएं.-सं.)                                                                   
                                                                     
                            बशीर
[1]
 
“अल्लाह मियाँ कभो न माफ करिहैं, एक पागल से जउन भिड़त जात अहा न…..या अल्लाह!” 
यह कहते हुए बशीर एक धक्के में मस्जिद से बाहर था। बशीर अपने अल्लाह मियाँ से मिलने आया था लेकिन उसी अल्लाह मियाँ के बंदों ने बशीर को उसके घर से बाहर निकाल दिया। हर जुमे को बशीर के साथ यही होता था।
बेगमवार्ड मुहल्ले में बशीर लोगों के लिए मनोरंजन का एक पात्र बन चुका था। शाम को चौराहे पर जमने वाली महफिलों में बशीर के आने का इंतज़ार होता। रियाज़ भाई बशीर को देखते ही ‘भौं, भौं” की ध्वनि करते और पूरा बेगमवार्ड चौराहा बशीर पर टूट पड़ता। बच्चों से लेकर बूढ़े तक बशीर का मजाक उड़ाते। कोई हर रोज बशीर की शादी का वायदा कर उसे हीरोइनों की फोटो दिखाकर मजाक बनाता तो कोई कहता कि बशीर के लिए उसने एक नौकरी रखी है। कभी बशीर को कहा जाता कि उसका अरब जाने का पासपोर्ट तैयार है, बस वह अपना सामान तैयार रखे। इसके बाद तो बशीर एकदम खुश हो जाता, उसके झुर्रीदार मुरझाए चेहरे पर हँसी खिल पड़ती। लेकिन बस इतने के ही बाद सभी लोग ठहाका मार कर हँसते। लोग इतनी जोर से हूटिंग करते हुए हँसते कि बशीर समझ जाता कि उसके साथ मजाक हुआ है। वह फूट फूट कर रोने लगता। कुछ एक दरियादिल लोग उसे कुछ खिला पिला देते या सलाम भाई अपनी दुकान से कुछ मिठाईयां देकर लोगों पर चिल्लाते-
 
“अरे तुम लोगन का तमीज नहीं है! कब सहूर सिखबो तुम सब! का गुनाह सवाब नहीं जनतो कि पागल से भिड़े पा केतना अजाब है, तुम लोगन के दीन ईमान सब बेकार है!”
बशीर। हालात का मारा हुआ एक मजदूर। एक निम्न जाति का मुस्लिम श्रमिक। उम्र करीब चालीस बरस लेकिन वह दिखता पचास का था। चेहरे पर झुर्रियां। श्रम के बोझ के तले झुकी हुई पीठ। मटमैले कपड़े और फ़टी हुई शर्ट के भीतर से निहारती हुई उसकी गरीबी। बशीर के माँ बाप बचपन में ही गुज़र गए थे। बेगमवार्ड चौराहे पर अपना घर था जिसकी चौखट ही उसे नसीब थी। बशीर को बचपन से ही बदअक्ल माना जाता। जैसे उसकी बुद्धि सामान्य से कम थी।
बशीर खलिहर नहीं था। बशीर मुहल्ले में ही मौजूद नियाज भाई के इंडियन होटल पर बर्तन धोता था और खाना लगाता था। बाप ने गरीबी के चलते बचपन से काम पर लगा दिया था ताकि कम से कम होटल का बचा खुचा बशीर को खाने को मिल जाये। लेकिन नौकरी कुछ दिन की रही। एक दिन बशीर के अब्बा गुज़र गए और उस दिन बशीर दहाड़े मारकर रोया था। कुछ दिनों बाद अम्मा भी गुज़र गईं। बशीर का कोई नहीं था। दो भाईयों ने अपनी मेहनत से सरकारी नौकरी पाई लेकिन न शादी के पहले न ही शादी के बाद, उन्होंने बशीर की तरफ मुँह किया। बचपन में होटल से कमाकर इन्हीं भाइयों की फीस भरी थी। भाइयों के बच्चे कभी एक वक़्त का कुछ बचा खुचा उसे फेंक देते जिसे वह खुशी-खुशी खा लेता।
आमतौर पर यह होता भी है कि हीन बुद्धि वाला जो होता है, परिवार में उसकी अहमियत नहीं होती है। और परिवार ही जब बेदखल कर दे, तो समाज का क्या! बशीर ऐसा भी पागल न था। हालातों ने ऐसा पीसा था कि समझदार होने का मौका न मिला। बचपन में ही माता पिता का न होना और बाद में घर परिवार की इस बेरुखी ने रही सही कसर पूरी कर दी थी।
[2]
उस दिन शाम को बेगमवार्ड चौराहे पर बड़ा जोर से शोर मचा। लोग हाट! हाट! करते हुए बड़ी जोर से दौड़े। रियाज़ भाई की गर्दन बड़ी मुश्किल से छुटी। गर्दन छूटते ही के मुँह पर पाँच छह मुक्के पड़े, फिर क्या बरसात शुरू हो गयी। “या अल्लाह..छोड़ देया, पागल से न भिड़त जा अल्ला मियाँ न छोड़िहै तू सबे…. ए अम्मा मर गए!” बशीर अब जमीन पर बैठ चुका था। उसकी घिग्घी बँध चुकी थी। वह बेतहाशा रो रहा था। रुदन में एक कराह थी, एक आह थी! सलाम भाई दुकान छोड़कर मजमे की तरफ कूद पड़े थे। ‘अरे मार डलबो का ओहका! चला बहुत भै!…” लोग हटने लगे थे। रियाज़ भाई चौराहे पर पान की दुकान पर जा बैठे थे। वह हँस भी रहे थे और बार-बार कहे जा रहे थे ” बतावा ई हरामजादा तो मार डावत आज हमका!…” लोग हँस रहे थे और रियाज़ भाई के मजे भी ले रहे थे। बेगमवार्ड चौराहे पर जो भी आता और घटनाक्रम सुनता, तुरंत रियाज़ भाई से पूछता और रियाज़ भाई वही डायलॉग मारते “बतावा ई हरामजादा………..”।
बशीर फूट-फूटकर रो रहा था। उसके मुँह से भलभला कर खून निकल रहा था। सलाम भाई और कुछ नेकदिल लोग बशीर को बहला फुसलाकर चुप करा रहे थे। मोमिन भाई ने कहा “काहे गर्दन पकड़ा यार ओनके तू? जानत अहा कि पिट जाबा तबो पे लड़ गया, अच्छा चला तोहार पट्टी कराए देई..” बशीर रोते हुए बोल पड़ा “मोमिन भाई! अल्ला मियाँ के कसम हम कुछ नाही किहे, ऊ पहिले हमरे अम्मा का गारी दिहिन…” इतना कहकर रो पड़ा। सलाम भाई बोल पड़े “हरामी बाटेन मोमिन भाई सब के सब, ई बिचारा बहुत सीधा है आज के बाद जे बशीर से भिड़ी हम पुलिस बुलाये देब ” (पान की गुमटी की तरफ खड़े मजमे की तरफ देखते हुए सलाम भाई बोले) लेकिन सलाम भाई यह अक्सर कह दिया करते थे। क्योंकि वह बशीर को दिलासा दिलाना चाहते थे। सलाम भाई दुकान चला रहे थे। उनकी भी अपनी मजबूरी थी। वह बशीर को उसकी मनपसंद मिठाइयां खिला देते थे, इससे ज्यादा कुछ करना उन्हें भी खतरा मोल लेने जैसा लगता था। बशीर को बचाते हुए कभी-कभी तो सलाम भाई भी मजाक बन जाते थे।
बशीर मुहल्ले में सलाम भाई के घर के कुछ मोटे काम कर देता था। कभी किसी के घर हल्की फुल्की मजदूरी कर देता था। लेकिन लोग उसे इतना तंग करते कि एक जगह नहीं टिक पाता था। कभी शादाब भाई के होटल पर बर्तन धुल देता तो एकाध प्लेट बिरयानी या कबाब पराठा मिल जाता था। बशीर अपने घर के आगे के दालान में सोते-सोते रात गुज़ार देता। आज अपने ही घर में उसे रहने को एक कमरा तक मुहैया न था।
बशीर जब दुख दर्द में होता अल्ला मियाँ को याद करता। एक बशीर और एक उसके अल्ला मियाँ। वह बहुत रोता और अल्ला मियाँ से ढेर सारी शिकायतें करता लेकिन अल्ला मियाँ बशीर की न सुनते। वह जुमे के दिन टोपी लगाकर मस्जिद जाता लेकिन एक सजदा ठीक से न नसीब हो सका। वह सजदे में जाता कि उसके फटे पजामे को देखकर बच्चे हँसते और कुछ शरारती बच्चे मस्जिद में रखी झाड़ू की सींक को निकाल पजामे के फटे हुए हिस्से में डाल देते। कभी कोई पानी डाल देता। बशीर मस्जिद से बाहर आ जाता। आते-आते वह हाथ उठाकर अल्लाह से रोता लेकिन अल्ला मियाँ उसकी कभी न सुनते। बशीर ईद और रमज़ान में बड़ा खुश होता। इफ्तार की दावतों में जाता लेकिन बच्चे तो बच्चे बड़े उसके हाथ से प्लेट छीन लेते। लोग छेड़ते हुए बोलते ” तू कबसे रोज़ा रहे लग्या हो? पगलो आगल दीनदार होइ गएन..”। बशीर हाथ जोड़ता, पेट दिखाता तो उसे खाने को मिल जाता। कुछ नेकदिल लोग गुस्सा भी करते कि पागल से भिड़ना गुनाह है लेकिन वह बशीर के वकील तो नहीं थे। एक पागल के चक्कर में लोगों से सम्बंध क्या बिगाड़ना!
इधर कुछ दिनों से बशीर दिखा नहीं। बेगमवार्ड चौराहे पर शाम को महफ़िल तो जमती लेकिन बशीर से भिड़े बिना खलिहर लोगों की चाय गले से न उतरती। बशीर तस्करा होना जरूरी था। ननकू भाई गोश्त काटते हुए बोले “बशिरवा नाहीं देखान हो कइउ दिन से, एक दुइ दिन तो नागा करत रहा मगर सलाम भाई तोहरे घरे तो रोज़ जात रहा”। सड़क के ठीक पार दुकान की बेंच से बैठे हुए सलाम भाई बोले ” घर पा भी नहीं आवा है आजकल तीन चार दिन से। दुपहर के खाना हमार हियाँ खात रहा और झाड़ू मार देत रहा बड़ी खुशी-खुशी। आज बल्कि भाभी कहतो रहीं की कहऊँ बशीर दिखे घर भेज दिहो”! इसके बाद ननकू भाई अच्छा बोलके अपने काम में जुट गए। सलाम भाई आगे बोलते रहे ” अरे भिड़त जात हैं ओहसे सब के सब तो का करे आई ऊ? सब रोज़ा नमाज़ बेकार है अगर पागल से भिड़त हो तो..”।
वाकई बशीर क्या करने आता भी! बशीर को अब कुछ ज्यादा ही तंग किया जा रहा था। बशीर के घर पर बशीर की कोई पूछ नहीं थी। कभी-कभी तो वह रात सलाम भाई के दुकान के चबूतरे पर गुज़ार देता। रमज़ान में सभी का देखा देखी टोपी लगा लेता और तरावीह पढ़ने जाता लेकिन कभी पूरी न पढ़ सका। अल्ला मियाँ से इतना गिड़गिड़ाता लेकिन शायद अल्ला मियाँ भी एक गंदे नापाक और बदअक्ल पागल से अपनी मस्जिद को गन्दी नहीं करवाना चाहते थे। वरना उन्हें तो ‘कुन फयकुन’ वाली शक्ति प्राप्त है। वह चाहते लोगों का दिल पलट देते या किसी फरिश्ते को भेजकर सभी को पिटवा देते लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। बशीर की आह की शायद अल्लाह मियाँ के यहाँ कोई जगह नहीं थी।
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बेगमवार्ड चौराहे से कुछ 100 मीटर या 150 मीटर पर बड़ा सा खुला मैदान है। इधर मकान कम हैं और आमतौर पर दिन में भी सन्नाटा पसरा होता है। वहाँ के एक कोने पर कूड़े का ढेर लगा होता है जिसे नगर पालिका की गाड़ी साफ करती है। आज वहाँ से एक लाश मिली थी। लोगों ने देखते पहचान लिया कि यह क्षत-विक्षत शव बशीर का है। मुँह और नाक से खून आ रहा था। आज ज़ख्म बहुत ज्यादा थे लेकिन आज बशीर दहाड़े मारकर रो नहीं रहा था। आज वह चुपचाप सो रहा था। बशीर के शव से कुछ दूर उसकी टोपी पड़ी हुई थी। शव बहुत पुराना नहीं था। ज्यादा से ज्यादा रात का रहा होगा। लेकिन लोग वहाँ ठहर नहीं पा रहे थे। धीरे-धीरे मजमा इकट्ठा होने लगा था। लोग एक दूसरे के कान में कहते कि “कउनो मार दिहिस लागत अहै…”। कोई कुछ अटकलें लगाता।
सलाम भाई को सदमा लगा था। वह घटनास्थल पर ही लोगों पर बिफर पड़े थे।
“अब भिड़ो न तुम सब! चला गवा बिचारा! कउनो जुआड़ी होई, मार दिहा। रात मा शराब पी पी के जुआँ खेलत हैं सब! का होई मुसलमानन के!..”
बशीर के मरने से पहले उसके साथ क्या हुआ होगा? क्या उसी तरह छेड़छाड़ हुई होगी? कैसा दुर्व्यवहार हुआ रहा होगा? जो भी हुआ रहा हो लेकिन वह बेगमवार्ड चौराहा होता तो सलाम भाई थे न! मजलूमों पर हुए ज़ुल्म को भला वह बर्दाश्त करते थे? कभी नहीं! लेकिन वह वहाँ नहीं थे! बशीर ने क्या एक बार भी आवाज़ न दी होगी सलाम भाई को? जरूर दी होगी! पहले अल्ला मियाँ फिर अम्मा अब्बा फिर सलाम भाई की तरफ देखता था, लेकिन जब कल रात में देखा होगा तो सलाम भाई नहीं रहे होंगे। क्या उसने जोर से बुलाया होगा? शायद जरूर, भला सलाम भाई से नज़दीक था ही कौन! यही सब सोच सोचकर सलाम भाई की आँखें आज नम थीं। काश बेगमवार्ड चौराहे के थोड़े पास होता कि कोई दौड़कर सलाम भाई को बता देता, बुला लेता!
कुछ लोगों में बशीर के प्रति गहरी सहानुभूति थी। वह दुख प्रकट कर रहे थे। और बाकी लोगों में चुप्पी थी। लोग शांत थे और शायद कुछ लोगों को पश्चाताप भी हो रहा था। बशीर के मृत शरीर को फिर घर का बरामदा ही मिला। भाइयों में कोई रुदन नहीं। आँसू थे लेकिन रोये नहीं। दिल पत्थर का तो था लेकिन किस पत्थर का बना था! सलाम भाई फ़फ़क पड़ते। बशीर के अपने रोना तो दूर, सोच रहे थे कब इसका कफ़न दफ़न हो। सलाम भाई, मोमिन भाई को अफसोस था। आज वैसे रो तो रियाज़ भाई भी दिए थे लेकिन अब क्या! गलती का एहसास तब क्या होना जब बहुत देर हो चुकी थी।
पुलिस आई थी लेकिन शुरुआती तहकीकात के बाद लौटा दी गयी। पुलिस को एक पागल से इतना क्या वास्ता! उसे नोट चाहिए और वो मिल ही चुकी थी। बशीर की मौत कुदरती मानी गयी। बशीर अपनी मौत से मर गया? सलाम भाई चाह रहे थे मामला आगे बढ़े लेकिन जब परिवार वाले साथ नहीं तो क्या मतलब! और बाद में यही कहकर इत्मीनान मिला “अब तो ऊ चलै गवा”!
सलाम भाई उस दिन बार-बार लोगों से एक किस्सा सुना बड़ा अफसोस करते “एक दफा जावेद भाई हम दुकान बन्द करके आगे बढ़े रहे। तभी एहके रोवे के आवाज़ आई, बहुत जोर से चिल्लान..हम वापस भगे तो जानत हो, ई जौन वसीम के लड़का है, ई अउर छोट-छोट लड़कन रहेन और हम ई बताई कि जउन का, का कहत हैं ओहका? अरे उहै हाँ, हाँ याद आवा, पैड के उपरवा जउन कॉपी फसावे वाली क्लिप होत है, वही लड़कन जउन इम्तेहान मा लइ जात हैं, वही बशीर के आगे जहाँ से पेशाब किया जात है, वही नली का दबाए दिही रहेन…बिचारा..बिचारा सोवत रहा और तड़प गवा। हम गए जब तो भगेन लड़कन….और नसीम इतना बड़ा होइके हँसत रहेन..अरे बहुत सतावा गा….”।
बशीर की मिट्टी उठ चुकी थी। सलाम भाई, मोमिन भाई पूरे रास्ते काँधे बदलते रहे। दोनों को गहरा अफ़सोस भी हुआ था। आज बशीर अपने अम्मा अब्बा के बगल पहुँच गया था।
बशीर आज एक किस्सा है। आज बेगमवार्ड चौराहे पर वह एक कहानी भर है। सलाम भाई ने बशीर को खिलाया पिलाया। कभी-कभी फटे पुराने कपड़े भी देते। सलाम भाई नमाज़ रोज़ा कम ही करते हैं लेकिन गरीबों के लिए दिल खुला रखते हैं। यही हाल मोमिन भाई का है। अब रियाज़ भाई पक्के नमाज़ी हैं लेकिन बशीर को बहुत तड़पाया।
बशीर एक निम्न जाति का था। उसके हालात ने उसे और जर्जर कर दिया था। वह बदअक्ल और ईंटा चलाने वाला पागल नहीं था। वह हिंदी और उर्दू को पहचान लेता था। उसकी समझ विकसित होती, अगर उसे मौका मिलता। हालात ने बशीर को कुचल दिया। चालीस बरस में पीठ झुक गयी थी। लेकिन वह माँग कर खाने वालों में से नहीं था। सलाम भाई की दुकान पर कुछ खाता तो बदले में काम करा देता। दुपहर का खाना खाता तो घर बुहार देता। वह श्रमिक था कोई अघाया हुआ भिखारी नहीं। पसीना बहाकर खाना जानता था।
बशीर को उसकी बिरादरी के नाम से चिढ़ाया जाता। उसकी माँ के चरित्र पर सवाल खड़े किए जाते। उसे नीच बताया जाता। बशीर साफ सुथरा नहीं था। भला हो भी कैसे सकता था! जमादार तो आनुवंशिक रूप से गंदे होते हैं! हराम सुअर के बीच से उसके अब्बा कूड़ा बिनते। बाद में छोटे मोटे कबाड़ी बने लेकिन कुछ दिन को। उसके भाइयों के पास नौकरी थी तो लोग भिड़ने से बचते थे लेकिन सम्मान न हासिल हुआ था। बशीर के अल्ला मियाँ ने भी शायद बशीर के साथ भेद किया। बशीर के अल्ला मियाँ शायद बशीर की बिरादरी देखते थे।

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