समकालीन जनमत
ज़ेर-ए-बहस

कृषि क्षेत्र के लिये कोई तुरंता इलाज़ बेमानी है

( मानव विकास संस्थान के दिल्ली चेयर के प्रोफेसर सारथी आचार्य और ‘ रिवाइविंग जाॅब्स : ऐन एजेन्डा फाॅर ग्रोथ’ के सम्पादक हैं, सन्तोष मेहरोत्रा का यह लेख ‘ द हिन्दू ’  में प्रकाशित हुआ है। समकालीन जनमत के पाठकों के लिए इसका हिन्दी अनुवाद दिनेश अस्थाना ने किया है ) 

 

किसानों समेत लगभग समस्त वर्गों के लोग इस बात पर एकमत हैं कि कतिपय कृषि उत्पादों के विपणन के लिये 1960 में प्रारम्भ की गयी कृषि उत्पाद विपणन समिति (ए0पी0एम0सी0)– मंडी-नीतियाँ, समय बीतने के साथ अपनी उपादेयता खो चुकी हैं और कृषि क्षेत्र के विकास में व्याप्त मंदी, फसल-योजना की धीमी गति और भूमि में निवेश में हिचकिचाहट के मद्देनज़र इस व्यवस्था को अब एक नयी नीति की आवश्यकता है।

पिछले दिनों वर्तमान सरकार ने बाजार की शक्तियों की क्षमता बढ़ाने और किसानों और अर्थव्यवस्था को और अधिक शक्तिशाली बनाने के उद्देश्य से उत्पादों की बिक्री के लिये बाजार को और अधिक खोल दिया है। इन कानूनों के अनुसार अब किसान अपने उत्पाद ए0पी0एम0सी0 मंडियों की सीमा के बाहर कहीं भी और किसी को भी बेचने के लिये स्वतंत्र हैं। इसके अतिरिक्त इन कानूनों में किसानों और खाद्य-प्रसंस्करण कम्पनियों के बीच साझेदारी के माध्यम से ठेका खेती को प्रोत्साहित किये जाने और विशेष परिस्थितियों को छोड़कर सामान्य स्थिति में असीमित भंडारण के भी प्रावधान किये गये हैं।

किसान क्या चाहते हैं

अभी जब मैंने किसानों से बात की तो उन्होंने तीन बातें सामने रखीं। एक, उनके उत्पादों का मूल्य उत्पादन लागत में उचित लाभ जोड़कर निर्धारित किया जाना चाहिये; दो, दामों मंे उतार-चढ़ाव कम से कम होना चाहिये; और तीन, विधिक या प्रशासनिक अधिकारियों की दखलंदाजी एकदम नहीं या बहुत थोड़ी होनी चाहिये– साहब-सुबा से मामला सुलटाने में उन्हें बहुत दिक्कत होती है।

इन कानूनों के प्रारूप से किसानों की उपरोक्त तीनों चिन्तायें ग़ायब हैं। इसके अलावा, उनका कहना है कि इन कानूनों की वापसी के साथ ही नयी व्यवस्था में इस क्षेत्र में और अधिक फसलों को शामिल करने के लिये और व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा। मतलब, अगर सरकार किसानों को धान और गेहूँ के स्थानपर सब्जियाँ उगाने के लिये प्रोत्साहित करे तो उपरोक्त तीनों प्राविधानों को पूरा करने के लिये किसानों को पर्याप्त बाजार उपलब्ध रहे।

नये बाजार कहाँ हैं

न्यूनतम समर्थन मूल्य की मंडियों का हाल तो जगज़ाहिर है, पर नये बाजार पता नहीं कितने भयानक दैत्य साबित होंगे, उनके ऊपर कोई लगाम नहीं होगी। इस प्रकार एक ओर तो मंडियों की बदअमनी का सबको पता है, मुश्किल हालात में स्थानीय नेतागण (सांसद, विधायक, पंचायत सदस्य) किसी तरह समझा-बुझाकर किसानों के गुस्से पर पानी डाल ही देते हैं, दूसरी ओर नयी व्यवस्था क्या-क्या क़हर ढायेगी, इसका कुछ नहीं पता और यह भी नहीं पता कि ऐसे हालात में किसान अपनी शिकायत कहाँ दर्ज कराये। इसके अलावा, जब सरकार कहती है कि मंडी-एमएसपी व्यवस्था जारी रहेगी तो सवाल उठता है कि कब तक? जब बाहरी व्यापारी अधिक अच्छा दाम देंगे तो किसान मंडी के बजाय वहीं जायेंगे (जैसा कि गुरुचरन दास ने अपने हालिया लेख में  इंगित किया है; ीजजचेरूध्ध्इपजण्सलध्3928उ3त्)। नतीजतन व्यापार में कमी के चलते दो-तीन साल में जब वर्तमान मंडियाँ कमजोर पड़ जायेंगी या बन्द हो जायेंगी तो उनका क्या होगा ?

इसमें बहुत सारे पेंच हैं। बड़े व्यापारी किसी भी बहाने से कीमतें घटा सकते हैं, जैसे कि उत्पाद में दोष बताकर, माल का आधिक्य बताकर (रुकिये, देखते हैं), भुगतान में हीला-हवाली करके आदि। चूँकि बड़े व्यापारियों की संख्या सीमित होती है (कम से कम स्थानीय स्तर पर), इसलिये यह सम्भावना बहुत अधिक है कि वे कार्टेल (उत्पादन, वितरण या सेवाओं को नियंत्रित करने के लिये संगठन) बना लें। किसानों की संख्या बहुत अधिक होती है; वे कई कुन्तल/टन उत्पाद किराये के ट्रैक्टर पर लादकर दूर से आते हैं इसलिये उनके हाथ बँधे होते हैं; वापस जाकर दुबारा माल लाने में ढुलाई का खर्च दोहरा हो जायेगा इसलिये अपना माल औन-पौने भाव माल बेच देने के अलावा उनके पास कोई दूसरा चारा ही नहीं होता। हालात तब और भी खराब हो जाते हैं जब किसानों को तुरंत नकदी की जरूरत होती है, छोटे किसानों के साथ ऐसा ही होता है क्योंकि मंडी में एमएसपी पर माल बेचनेवालों में उनकी संख्या 90 प्रतिशत से अधिक होती है।

कारपोरेट खरीदारों की चाँदी

दूसरे कानून के भी कमोबेश ऐसे ही पेंच हैं जिसका फायदा कारपोरेट खरीदार उठा सकते हैं जैसे किसी न किसी बहाने पूरा माल न खरीदना, भुगतान में देरी करना और अगर किसान शिकायत भी करे तो वकीलों की सेना खड़ी कर देना, इकरारनामे की महीन छपाई, उसकी भाषा और इन सबके अलावा इन्तज़ार कर लेने की उनकी क्षमता।

दोनों स्थितियों में समस्या है दो गैरबराबर पक्षों के बीच इकरारनामा- चाहे वे व्यापारी हों या कारपोरेट; वे बहुत थोड़े होते हैं, पैसे से भरपूर होते हैं और उनका समझौता अनपढ़ या बहुत कम पढ़े छोटे किसानों के साथ होता है (लगभग 85 प्रतिशत के पास दो हेक्टेयर या उससे भी कम ज़मीन होती है) तो नतीज़ा भी गै़रबराबर होता है।

दूसरा पेंच विभिन्न क्षेत्रों एवं फसलों में है। कृषि-विपणन कानूनों के अनेक समर्थकों का कहना है कि उत्तर-भारत के गेहूँ-धान क्षेत्रों के बाहर के किसान कोई प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। स्पष्टतः ऐसा इसलिये है कि देश में लगभग 15 कृषि-जलवायु के अलग-अलग क्षेत्र हैं और उनमें 50 से ज्यादा फसलें उगायी जाती हैं।

मुद्दे और उन पर किसानों की प्रतिक्रियायें

हम यह भी भूल जाते हैं कि किसी क्षेत्र-विशेष से आनेवाले किसान, अपने-अपने मुद्दों पर विराध प्रदर्शन करते रहे हैं जैसे 1860 में पूर्वी भारत के किसानों का नील की खेती का विरोध, मापिलाओं का 1921 का विद्रोह और यहाँ तक कि वर्ली आदिवासी विद्रोह भी। और हाल के दिनों में 1970 और 2010 के बीच शरद जोशी के नेतृत्व में महाराष्ट्र के किसानों का विद्रोह या कावेरी-जल की माँग में किया गया तमिलनाडु के किसानों का विद्रोह। ऐसी ढेरों मिसालें हैं। समस्याओं को लेकर किसानों द्वारा किये गये विद्रोह उन्हें भी प्रभावित करते हैंः वे एकसार नहीं होते।

2020 में यदि कोई नयी योजना लाई जा रही है तो विडम्बना यह है कि इसके प्रावधान समस्त किसानों, कृषि-भूमियों और फसलों के लिये, पूरी तरह अपारदर्शी, असमान और आधी-अधूरी जानकारियों वाले और अपूर्ण बाजार खोलने के लिये हैं और एक समान हैं, ऐसा क्यों ? अर्धसिंचित क्षेत्रों और उनके किसानों का क्या बनेगा जहाँ उपज की सम्भावना पूरी तरह से रामभरोसे है ? उन छोटे और सीमान्त किसानों का क्या होगा जिनके पास बाजार में बेचने के लिये कुछ नहीं है और जो आमतौर पर अपनी बात भी नहीं कह पाते ? अगर किसान गेहूँ-चावल की जगह अधिक कच्ची फसलें जैसे सब्जियाँ और फल या कीड़ों के प्रति संवेदनशील फसलें जैसे कपास उगाते हैं तो उनके सम्भावित नुकसान की भरपाई कैसे होगी ? या, फिर उन भूमिहीन मजदूरों का क्या होगा जो अपने वतन से विस्थापित होकर किसी दूसरी जगह काम करने जाते हैं (जैसे बिहार के मजदूर पंजाब में ) ? क्या सिर्फ कृषि-बाजारों के लिये किसी तुरंता इलाज की जगह सम्पूर्ण कृषि जगत के लिये एक समग्र नीति नहीं होनी चाहिये ?

विशेषज्ञों की अनुशंसायें

कृषि-क्षेत्र की गतिहीनता और उसकी लागत में बढ़ोत्तरी की समस्या का समाधान एम0एस0 स्वामीनाथन आयोग और/या अशोक देवलाली समिति द्वारा प्रस्तावित क्रमबद्ध दृष्टिकोण के माध्यम से ही किया जा सकता है। पंजाब-हरियाणा में पानी सोखने वाले धान की फसल की जगह दूसरी फसलें उगाये जाने जैसे कुछ विशिष्ट उदाहरण अवस्था-अंतरण मात्र हैं; कहा जा रहा है कि पाँच साल में धान के खेत 25 से 30 प्रतिशत तक कम हो जायेंगे और इस छोटी अवधि में उनका जो भी नुकसान होगा उसकी भरपाई सरकार कर देगी। ऐसे ही महाराष्ट्र में गन्ने के मामले में भी ऐसा किया जा सकता है।

तुरंता इलाज कभी कारग़र नहीं होता चाहे वह कृषि का क्षेत्र हो, उद्योग का हो या अर्थव्यवस्था का। इसी तुरंता इलाज के चलते 1991 के बाद कई उद्योगों को बन्द कर देना पड़ा, नतीजतन दूसरी मंदी आयी और लाखों लोग बेरोजगार हो गये। तुरंता इलाज के चलते कृषि-क्षेत्र का हाल भी इससे अलग नहीं होगा।

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