मऊ। राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ और जन संस्कृति मंच, मऊ के तत्वावधान में 26 मई को कवि सुभाष राय की चर्चित कृति ‘दिगंबर विद्रोहिणी अक्क महादेवी’ पर केंद्रित ‘अभिनव कदम’ पत्रिका के विशेषांक का लोकार्पण हुआ। इस मौके पर ‘ भक्तिकाव्य के सरोकार और अक्क महादेवी ‘ विषय पर वक्ताओं ने अपनी बात रखी।
मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कवि व हिंदी विभाग,बीएचयू के आचार्य प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि कन्नड़ की महान कवयित्री अक्क महादेवी पर सुभाष राय ने जितने मन से पुस्तक लिखी है ,’अभिनव कदम’ पत्रिका ने उतने ही मन से इस पर विशेषांक भी प्रकाशित किया है।हिंदी में यह एक विरल उदाहरण है कि किसी एक कृति पर किसी पत्रिका का विशेषांक आया हो।
प्रो शुक्ल ने आगे कहा कि ‘दिगम्बर विद्रोहिणी’ पुस्तक स्वरूप तादात्म्य से लिखी गई पुस्तक है जिसमें भक्ति के ज्ञानात्मक आधार को समझने की कोशिश है। पुस्तक में धर्म की जगह आध्यात्म पर जोर दिया गया है और स्त्री पक्षधरता का बहुत मूल्यवान विश्लेषण भी किया गया है। इसमें कल्याण की यूटोपिया को रविदास के बेगमपुर की पूर्व पीठिका के रूप में भी समझा गया है। प्रेम इस पुस्तक का केंद्रीय आधार है और पुस्तक में श्रम की महत्ता पर विस्तार से बात की गई है।

अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने कहा कि अभिनव कदम का यह विशेषांक संपादकीय समर्पण का आधार है।इस विशेषांक में जीवन विवेक दिखाई देता है।अक्क महादेवी पुस्तक को लिखकर सुभाष राय ने एक यादगार कार्य किया है।इसमें भूगोल के दायरे में कविता के महत्व की पहचान की गई है।
मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित वरिष्ठ आलोचक रघुवंशमणि ने बताया कि यह पुस्तक अक्क महादेवी के साथ-साथ दक्षिण भारत के भक्ति युग को समझने में पाठकों की मदद करती है। उत्तर भारत में भक्ति के उदय को पराजय बोध से जोड़ने वाली अवधारणा के आधार पर बताया कि दक्षिण में जब पराजय बोध नहीं था तो वहां का भक्ति आंदोलन कैसा रहा होगा, यह अक्क महादेवी से पता लगता है। आत्मसातीकरण और समतलीकरण के तात्विक पैमानों से तटस्थ होकर भक्ति युग का अध्ययन करने की जरूरत है। अक्क महादेवी के साहित्य में भक्ति और धर्म का अंतर दिखता है जहां भक्ति का महत्व प्रमुख है।

आत्म वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ कवि व चिंतक सुभाष राय ने भक्ति के प्रादुर्भाव के बारे में कहा कि यह जनता के भीतर उपजी यातना की देन थी। आम लोगों की इसी व्यथा और यातना का गान भक्ति है। स्त्रियों पर सामाजिक बंदिशों ने उन्हें ईश्वर के शरण में भक्ति की एक राह दिखाई। लेकिन दक्षिण की कवयित्रियों में अपने आखिरी समय में भगवान से भी विद्रोह का स्वर दिखता है।
विशिष्ट वक्ता कवि विशाल श्रीवास्तव ने कहा कि हिंदी की अकादमिक दुनिया से सीधे तौर पर न जुड़े होने के बावजूद भी सुभाष जी ने अक्क महादेवी पर एक अच्छा काम किया। उन्होंने मुक्तिबोध के निबंध से भक्तिकालीन कविता और समय को व्याख्यायित किया। आगे बताया कि शिवत्व की अवधारणा कन्नड़ लेखक रामानुजन की पुस्तक में विस्तार से उद्धरित है, जिससे अक्क महादेवी का भी संबंध है। अक्क ने स्त्री मुक्ति और स्त्री स्वतंत्रता की बात 12वीं सदी में किया, जब सामाजिक जटिलताएं व्यापक थी।

युवा आलोचक संजय राय ने कहा कि सुभाष जी की गतिशीलता और संवेदना का समन्वय अटूट है जिसकी परिणति अक्क महादेवी पुस्तक है।
स्वागत वक्तव्य संयोजक व ‘अभिनव कदम’ पत्रिका के संपादक जयप्रकाश धूमकेतु ने दिया। कार्यक्रम का संचालन जन संस्कृति मंच , उत्तर प्रदेश के सचिव रामनरेश राम ने किया। धन्यवाद ज्ञापन ओम प्रकाश सिंह ने किया।
इस अवसर पर गीतकार राघवेंद्र प्रताप सिंह व कुमारी आंचल और जाह्नवी ने अपना गीत भी प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर अब्दुल अजीम खां राम अवतार सिंह वीरेंद्र कुमार ओम प्रकाश सिंह, मनोज कुमार सिंह जिला अध्यक्ष जसम, मऊ,धनंजय शर्मा राम शिरोमणि मौर्य प्रसेन सुरेश राघवेंद्र सिंह पिंकी लालचंद बलवंत सुभाष यादव संजय राय रामनवल श्री राम सिंह डॉक्टर तेजभान शकील अहमद बसंत कुमार सहित मऊ के आस पास के कई साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

