1985 में जन संस्कृति मंच की स्थापना एक और वामपंथी सांस्कृतिक संगठन की घोषणा मात्र नहीं थी। भारत साल भर पहले ही इंदिरा गांधी की विश्वासघात-पूर्ण हत्या और भयावह सिख-विरोधी जनसंहार के दौर से गुजरा था। यह विफलताओं और विडंबनाओं के एक पूरे युग के चरम बिंदु का साल था। भारतीय स्वतंत्रता और संघीयता की परियोजना जैसे अपने ही विध्वंस को सामने देख रही थी। जमीनी वर्गों की तरफ से किए जा रहे बुनियादी बदलाव के तमाम प्रयासों का असुरक्षा-बोध से घिरी यथास्थितिवादी सत्ता द्वारा आपराधिक दमन किया जा रहा था।
संस्कृति के क्षेत्र में प्रगतिशीलता की लगभग आधी सदी गुजर चुकी थी। इस आधी सदी में प्रगतिशील आंदोलन अपनी ही महान उपलब्धियों को पचा कर संस्कृति की मुख्यधारा के रूप में प्रतिष्ठित हो चला था। एक सुरक्षित विपक्ष के रूप में स्थापित व्यवस्था की स्वीकृति उसे मिलने लगी थी। वर्चस्व के सांस्कृतिक आद्यबिंबों से उसका संघर्ष शिथिल होने लगा था।
जनकवि के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके नागार्जुन की हरिजन गाथा इस त्रासदी का एक सटीक उदाहरण है। इस कविता में दलित मुक्ति का स्वप्न अवतारवादी कल्पना के साथ इस तरह जुड़ जाता है कि उसके भीतर विद्रोह के प्रतिष्ठानीकरण की विडंबना दिखाई देने लगती है।
प्रगतिशील कविता कवियों की संपत्ति बनी रहती है। वह जनता तक नहीं पहुँचती। जनता का मरणांतक संघर्ष उस कविता की विषयवस्तु मात्र बनकर रह जाता है।
गोरख पांडेय की कविताएँ इसी विडंबना से मुठभेड़ करती हैं। ” समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई ” में वे सत्ता और प्रतिष्ठान के भीतर घुस आए समाजवाद का व्यंग्यात्मक चेहरा सामने रखते हैं। कविता में समाजवाद हाथी-घोड़े पर आता है, नोट और वोट से आता है, बिड़ला के घर में समाता है, जनता के नाम पर कुर्सी बनाता है और अंततः आँखों पर परदा डाल देता है।
इसके बरक्स जनता के पलटनिया में जनता स्वयं इतिहास की शक्ति बनकर सामने आती है—“जनता के आवे पलटनिया / हिलेले झकझोर दुनिया।” नक्सलबाड़ी से लेकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में उठते जनसंघर्षों की प्रतिध्वनि इस गीत में सुनाई देती है। यह वही मोड़ है जहाँ गोरख के यहाँ जनता कविता की विषयवस्तु से कविता की सक्रिय शक्ति बनती है।

बंगला कवि सरोज दत्त, लेखिका महाश्वेता देवी, कवि नवारुण भट्टाचार्य, तेलुगु कवि चेरबंडा राजू और पंजाबी कवि पाश ने सांस्कृतिक समायोजन में जिस विप्लव को जन्म दिया था, गोरख पांडेय की कविताएँ भी उसी का एक हिस्सा थीं। अकारण नहीं है कि ये तमाम कवि और इसी परंपरा के वारिस रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ जैसे कवियों को आज तक व्यवस्था की वैधता नहीं मिली है। वे वर्चस्व की संस्कृति के लिए आज भी जीवित चुनौती बने हुए हैं।
इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जरूरत से जन संस्कृति मंच का जन्म हुआ। 26 अक्टूबर 1985 को दिल्ली में हुए स्थापना सम्मेलन में गुरुशरण सिंह अध्यक्ष और गोरख पांडेय महासचिव चुने गए। यह चुनाव भी अपने आप में जसम की प्रकृति का संकेत था। एक ओर पंजाब के महान जननाटककार और रंगकर्मी गुरुशरण सिंह थे। दूसरी ओर कवि, विचारक और संगठनकर्ता गोरख पांडेय।
दोनों के माध्यम अलग थे। लेकिन संस्कृति के बारे में उनकी बुनियादी समझ एक थी। संस्कृति जनता की चीज है। उसे जनता तक पहुँचना चाहिए। और जनता को उसकी रचना में भागीदार बनना चाहिए।
संस्कृति पर जनता का अधिकार
गुरुशरण सिंह की सांस्कृतिक दृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही था कि वे संस्कृति को कुलीन वर्गों की संपत्ति मानने के लिए तैयार नहीं थे। उनके लिए अच्छा नाटक और अच्छी कविता केवल उन लोगों की जरूरत नहीं थी, जिन्हें शिक्षित, सभ्य और कला का पारखी माना जाता है। संस्कृति के सच्चे निर्माता वही हो सकते हैं जो जीवन के निर्माता भी हैं। वे गरीब किसान और मजदूर हैं, बुद्धिजीवी नहीं। उन्हें सांस्कृतिक जीवन से दूर रखना उत्पीड़न का एक रूप है, जिसे चुनौती देना जरूरी है।

गुरुशरण सिंह के रंगकर्म की शुरुआत से जुड़ा एक प्रसंग उनकी पूरी सांस्कृतिक दृष्टि को समझने में मदद करता है। 1958 में वे भाखड़ा-नांगल परियोजना में हाइड्रोलिक इंजीनियर के रूप में काम कर रहे थे। वहाँ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुआ। गुरुशरण सिंह चाहते थे कि परियोजना में काम करने वाले मजदूर भी उसका पूर्वाभ्यास देख सकें। उन्हें बताया गया कि मजदूर शास्त्रीय और श्रेष्ठ संस्कृति को नहीं समझ सकते। इसलिए उन्हें बुलाने का कोई अर्थ नहीं है।
गुरुशरण सिंह ने इस बात को स्वीकार नहीं किया। जिन मजदूरों के श्रम से देश की विशाल परियोजनाएँ खड़ी होती हैं, वे संस्कृति के अधिकारी क्यों नहीं हैं ? कला को समझने की क्षमता का फैसला कौन करता है ? और किस आधार पर ?
यहीं से उनके रंगकर्म की एक निर्णायक दिशा बनी। उन्होंने मजदूरों और आम लोगों के लिए नाटक करने का रास्ता चुना। 1958 में लोहड़ी दी हड़ताल से शुरू हुई उनकी यात्रा आगे चलकर पंजाब के व्यापक जननाट्य आंदोलन में बदल गई। 1964 में उन्होंने अमृतसर नाटक कला केंद्र की स्थापना की। 1969 से गाँवों में जाकर नाटक करने का सिलसिला शुरू किया।
उनके लिए संस्कृति-कर्म का अर्थ था संस्कृति को जनता तक ले जाना और जनता को संस्कृति का अधिकारी मानना। वे जनता को किसी तैयार सांस्कृतिक वस्तु का उपभोक्ता नहीं बनाना चाहते थे। वे उसके जीवन, उसके अनुभव और उसके संघर्ष को संस्कृति के निर्माण की प्रक्रिया में शामिल करना चाहते थे।
उनके लगभग दो सौ नाटकों का संसार किसानों और मजदूरों के शोषण, सामंती उत्पीड़न, स्त्रियों की स्थिति, दलितों पर अत्याचार, पुलिस दमन, नागरिक स्वतंत्रता और सांप्रदायिकता जैसे सवालों से बना था। लेकिन उनके लिए नाटक का सामाजिक सरोकार उसकी कलात्मकता का विरोधी नहीं था। वे यह नहीं मानते थे कि राजनीतिक चेतना से कला कमजोर हो जाती है। उन्होंने अपने रंगकर्म से दिखाया कि सामाजिक प्रतिबद्धता और कलात्मकता एक-दूसरे की दुश्मन नहीं हैं।

गुरुशरण सिंह की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह थी कि उन्होंने जनता को रंगमंच का दर्शक भर नहीं रहने दिया। गाँवों में लोग उनके नाटक देखने के लिए जुटते थे। प्रदर्शन के लिए चंदा करते थे। अपनी बस्तियों में मंडली को बुलाते थे। इस तरह नाटक केवल मंच पर होने वाली घटना नहीं रह गया। वह सामूहिक जीवन का हिस्सा बन गया।
यही जन संस्कृति के स्वप्न का सक्रिय रूप था।
गोरख पांडेय : जनता विषय नहीं, इतिहास की शक्ति है !
गुरुशरण सिंह ने रंगमंच को जनता के बीच पहुँचाया। गोरख पांडेय ने कविता को जनता की भाषा और जीवन से जोड़ा। जसम के संस्थापक महासचिव के रूप में उनकी भूमिका केवल संगठन चलाने की नहीं थी। वे उस सांस्कृतिक आंदोलन की वैचारिक जमीन तैयार कर रहे थे, जिसमें साहित्य जनता के जीवन से अलग खड़ी कोई विशिष्ट दुनिया न हो।
गोरख की कविता में जनता केवल पीड़ित नहीं है। वह इतिहास बनाने वाली शक्ति है। यही उनकी कविता की बुनियादी ताकत है।
समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई में वे उस समाजवाद पर व्यंग्य करते हैं जो जनता के नाम पर सत्ता और प्रतिष्ठान का हिस्सा बन चुका है। जनता के पलटनिया में वही जनता फिर इतिहास के मंच पर लौटती है। वह आती है तो दुनिया हिलती है। नक्सलबाड़ी का उल्लेख आता है। दमन और लूट की व्यवस्था के ढहने का सपना आता है। और अंत में कवि कहता है कि मुक्ति के दिन बहुत दूर नहीं हैं।

गोरख की कविता की यह गति महत्वपूर्ण है। वह केवल व्यवस्था की आलोचना नहीं करती। वह जनता को उसकी अपनी शक्ति का बोध कराती है।
उसके यहाँ भविष्य का सपना किसी राजा, किसी मसीहा या किसी कृपालु सत्ता से नहीं आता। सूरज झोपड़ियों में चमकता है। मेहनत के फूल उगाने वाले दुनिया के मालिक बनते हैं। यानी भविष्य का केंद्र वही लोग हैं, जो वर्तमान में सबसे अधिक वंचित हैं।
सूरज झोपड़ियों में चमकेगा
आएँगे, अच्छे दिन आएँगे
गर्दिश के दिन ये कट जाएँगे
सूरज झोपड़ियों में चमकेगा
बच्चे सब दूध में नहाएँगे
जालिम के पुर्जे उड़ जाएँगे
मिल-जुल के प्यार सभी गाएँगे
मेहनत के फूल उगाने वाले
दुनिया के मालिक बन जाएँगे
दुख की रेखाएँ मिट जाएँगी
खुशियों के होंठ मुस्कुराएँगे
सपनों की सतरंगी डोरी पर
मुक्ति के फरहरे लहराएँगे
इस कविता की आशा को भावुक आशावाद नहीं कहा जा सकता। यह एक सामाजिक स्वप्न है। इसमें अच्छे दिन किसी सत्ता के वादे से नहीं आते। वे मेहनतकश लोगों के मालिक बनने से आते हैं। यह अंतर आज विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
इसी कविता की अनुगूँज हमें बाद में वीरेन डंगवाल की प्रसिद्ध कविता ” आएंगे, उजले दिन आएंगे ” में मिलती है। वीरेन की कविता को गोरख की इसी जनवादी आशा से प्रेरित परंपरा में पढ़ा जा सकता है। वहाँ भी अच्छे दिनों का स्वप्न जनता की मुक्ति और बराबरी से जुड़ता है। इस तरह एक कवि की उम्मीद दूसरे कवि की कविता में नए समय और नए मुहावरे के साथ लौटती है।
गोरख की कविता में लोकभाषा का इस्तेमाल भी महज भाषाई प्रयोग नहीं है। भोजपुरी उनके लिए जनता तक पहुँचने का माध्यम भर नहीं थी। वह जनता की अपनी आवाज थी। समाजवाद बबुआ की पूरी ताकत इसी में है कि वह किसी भारी-भरकम राजनीतिक भाषा में समाजवाद की विडंबना नहीं बताती। वह उसे गाँव की बोलचाल और लोकलय में पकड़ती है। इसी कारण कविता राजनीतिक व्यंग्य भी बनती है और जनगीत भी।
यहाँ गोरख की मौलिकता दिखाई देती है। उन्होंने जनता के लिए लिखने और जनता की भाषा में लिखने के साथ-साथ जनता की राजनीतिक चेतना को कविता की अपनी सौंदर्य-भाषा में रूपांतरित किया। कविता नारा नहीं बनी। लेकिन नारे की सामूहिक ऊर्जा उसमें आ गई।

प्रगतिशीलता से जन संस्कृति तक
यहीं 1985 के जसम की ऐतिहासिक जरूरत को समझा जा सकता है। प्रगतिशील आंदोलन ने हिंदी साहित्य को बहुत कुछ दिया था। उसने साहित्य को सामाजिक यथार्थ से जोड़ा। साम्राज्यवाद, सामंतवाद, शोषण और सामाजिक असमानता के विरुद्ध साहित्यिक चेतना पैदा की। लेकिन समय के साथ उसका एक हिस्सा संस्थानों और प्रतिष्ठानों में समाहित होता गया। जनता के संघर्षों से पैदा हुई सांस्कृतिक ऊर्जा साहित्यिक प्रतिष्ठा में बदलने लगी।
समस्या केवल यह नहीं थी कि प्रगतिशील साहित्य जनता से दूर हो गया था। समस्या यह भी थी कि जनता की संस्कृति को स्वतंत्र रचनात्मक शक्ति के रूप में पर्याप्त महत्व नहीं मिला। मजदूर और किसान कविता के पात्र बन सकते थे। वे कविता के पाठक और श्रोता कम बन पाए। उनके संघर्ष साहित्य की विषयवस्तु बन सकते थे। वे साहित्यिक संस्कृति के सक्रिय निर्माता कम बन पाए।
जसम ने इस दूरी को कम करने की कोशिश की।
इसीलिए उसका नाम भी महत्वपूर्ण है—जन संस्कृति मंच। यह केवल जनवादी लेखकों का मंच नहीं था। यहाँ ‘जन’ संस्कृति का विशेषण मात्र नहीं है। वह उसका आधार है। और ‘संस्कृति’ का अर्थ केवल साहित्य नहीं है। नाटक, गीत, संगीत, लोककलाएँ, सिनेमा और दूसरी रचनात्मक विधाएँ भी इसके दायरे में आती हैं।
गुरुशरण सिंह और गोरख पांडेय इस अर्थ में जसम की मूल आत्मा को व्यक्त करते हैं। एक ने जनता के बीच नाटक किया। दूसरे ने जनता की भाषा में गीत लिखे। एक ने सांस्कृतिक संस्थानों की दीवारें तोड़ीं। दूसरे ने कविता और लोकगीत के बीच की दीवार तोड़ी। दोनों ने कलाकार और जनता के बीच की दूरी कम की।
और यही वह जगह है जहाँ संस्कृति का सवाल राजनीति के सवाल से जुड़ जाता है।
संस्कृति केवल सौंदर्य का नहीं, वर्चस्व का भी सवाल है
संस्कृति कभी निष्पक्ष क्षेत्र नहीं रही। समाज में जिस वर्ग या समूह का वर्चस्व होता है, वह केवल राजनीति और अर्थव्यवस्था पर ही अपना प्रभाव नहीं डालता। वह समाज की स्मृति, उसके मूल्य, उसके प्रतीक और उसकी ‘सामान्य समझ’ को भी प्रभावित करता है।
कौन-सी परंपरा महान है ?
किसे राष्ट्रीय संस्कृति कहा जाएगा ?
किसकी भाषा प्रतिष्ठित होगी ?
किसकी स्मृति सार्वजनिक होगी ?
स्त्री के लिए कैसी जिंदगी आदर्श मानी जाएगी ?
जाति को कैसे समझा जाएगा ?
धर्म और राष्ट्र का संबंध क्या होगा ?
ये सब सांस्कृतिक प्रश्न हैं। और इनके भीतर सत्ता के प्रश्न छिपे होते हैं।
भारत में राजनीतिक हिंदूवाद के उभार ने इस तथ्य को आज और अधिक स्पष्ट कर दिया है। संस्कृति को एक संकीर्ण और एकरूप हिंदू राष्ट्रीय पहचान में ढालने की कोशिश हो रही है। ब्राह्मणवादी सामाजिक पदानुक्रम और ब्राह्मणी पितृसत्ता को परंपरा और भारतीयता के नाम पर स्वाभाविक बनाने की कोशिश होती है। विविधता को भारतीय समाज की वास्तविकता मानने के बजाय उसे एकरूप सांस्कृतिक पहचान के अधीन करने की कोशिश होती है।

मुसलमान की अलग सांस्कृतिक पहचान संदेह का विषय बनती है। दलित की बराबरी की माँग व्यवस्था के लिए चुनौती बनती है। आदिवासी की अपनी संस्कृति और जमीन पर अधिकार का सवाल विकास के नाम पर दबाया जा सकता है। स्त्री की स्वतंत्रता पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्यों के नाम पर सीमित की जा सकती है। और वामपंथी या वर्गीय प्रतिरोध की संस्कृति को राष्ट्र-विरोधी बताना आसान हो जाता है।
यह केवल राजनीतिक प्रचार नहीं है। यह संस्कृति के स्तर पर समाज की पुनर्रचना की कोशिश है।
इसका सबसे खतरनाक पक्ष यह है कि वर्चस्व केवल लोगों से किसी बात को मनवाता नहीं है। वह धीरे-धीरे ऐसी सामाजिक मानसिकता बनाता है जिसमें वर्चस्व स्वाभाविक लगने लगता है। असमानता परंपरा लगती है। पितृसत्ता नैतिकता लगती है। अधीनता संस्कार लगती है। प्रश्न पूछना उद्दंडता लगता है। असहमति देशद्रोह लगती है।
यही वह जगह है जहाँ संस्कृति की लड़ाई निर्णायक हो जाती है।
समर्पण की संस्कृति के विरुद्ध संघर्ष की संस्कृति
मेहनतकश जनता को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करना किसी भी जनवादी राजनीति का अनिवार्य काम है। लेकिन अधिकारों की चेतना केवल राजनीतिक पुस्तिकाओं या भाषणों से पैदा नहीं होती। मनुष्य को अपने जीवन की कल्पना बदलनी पड़ती है। उसे यह कल्पना करनी पड़ती है कि वर्तमान व्यवस्था अपरिवर्तनीय नहीं है। उसे अपने दुख को नियति मानने के बजाय उसका सामाजिक कारण देखना पड़ता है। उसे यह विश्वास करना पड़ता है कि अकेला मनुष्य कमजोर हो सकता है, लेकिन संगठित जनता इतिहास बदल सकती है।
यहीं कविता और नाटक की भूमिका सामने आती है।

गुरुशरण सिंह का नाटक मजदूर से कहता है कि मंच उसके लिए भी है। गोरख की कविता उससे कहती है कि भविष्य में सूरज उसकी झोपड़ी में भी चमक सकता है। जनता के पलटनिया उसे बताता है कि दुनिया को हिला देने वाली शक्ति कहीं बाहर नहीं, जनता के भीतर है। और समाजवाद बबुआ उसे यह सावधानी भी देता है कि उसके नाम पर बोलने वाला हर व्यक्ति या हर सत्ता उसके हित में नहीं होती।
यह संस्कृति की एक पूरी राजनीति है।
यह जनता को केवल मनोरंजन नहीं देती। उसे विवेक देती है। केवल गौरव नहीं देती। सवाल करने की क्षमता देती है। केवल अतीत की महानता नहीं सुनाती। वर्तमान की असमानता को देखने की दृष्टि देती है। केवल समर्पण नहीं सिखाती। संघर्ष की कल्पना देती है।
इस अर्थ में जन संस्कृति किसी एक वर्ग या विचारधारा की सांस्कृतिक मिल्कियत नहीं है। वह लोकतांत्रिक और मुक्ति-कामी संस्कृति की वह परियोजना है जिसमें जनता स्वयं अपनी संस्कृति की निर्माता बनती है।
आज जन संस्कृति की जरूरत पहले से अधिक क्यों है ?
आज इस सवाल की राजनीतिक प्रासंगिकता और बढ़ गई है। राजनीतिक हिंदूवाद की वर्चस्ववादी परियोजना के सामने चुनौती केवल उसके राजनीतिक दावों का प्रतिवाद करना नहीं है। चुनौती उस सांस्कृतिक वातावरण को बदलने की भी है, जिसमें धार्मिक एकरूपता को राष्ट्रीय एकता, सामाजिक पदानुक्रम को परंपरा, पितृसत्ता को नैतिकता और असहमति को राष्ट्र-विरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यदि संस्कृति के माध्यम से लोगों की कल्पना और स्मृति को एक संकीर्ण विचारधारा के अनुरूप ढालने की कोशिश हो रही है, तो उसका प्रतिरोध भी संस्कृति के क्षेत्र में करना होगा। केवल राजनीतिक वक्तव्यों से उस सांस्कृतिक वर्चस्व को नहीं तोड़ा जा सकता, जो रोजमर्रा के जीवन, मनोरंजन, धार्मिक प्रतीकों, इतिहास की व्याख्याओं और सामाजिक व्यवहारों के भीतर अपनी जगह बना रहा है।
इसलिए आज जन संस्कृति का काम केवल लोकगीत और लोकनृत्य बचाना नहीं है। केवल कविता पाठ और नाटक करना भी पर्याप्त नहीं है। जरूरत ऐसी संस्कृति की है जो जनता के जीवन से निकले और फिर उसी जीवन को अधिक गहराई से समझने में उसकी मदद करे। जो दलित को केवल पीड़ित न दिखाए, बल्कि उसके प्रतिरोध और आत्मसम्मान को भी देखे। जो आदिवासी को केवल लोक-सौंदर्य का हिस्सा न बनाए, बल्कि उसके जमीन और जीवन के अधिकार को समझे। जो स्त्री को केवल देवी या माँ के रूप में न देखे, बल्कि स्वतंत्र मनुष्य के रूप में देखे। जो मुसलमान को ‘दूसरा’ न बनाए। जो मेहनतकश मनुष्य को दया का पात्र नहीं, समाज का निर्माता माने।
और सबसे जरूरी बात यह कि ऐसी संस्कृति जनता को अपनी स्थिति के सामने सिर झुकाना न सिखाए।
यही गुरुशरण सिंह और गोरख पांडेय की सबसे बड़ी सीख है।

गुरुशरण सिंह ने कहा नहीं, करके दिखाया कि मजदूर और किसान अच्छे नाटक के अधिकारी हैं। उन्होंने रंगमंच को सभागार से निकालकर गाँव में पहुँचाया। गोरख पांडेय ने कविता को साहित्यिक प्रतिष्ठान की भाषा से निकालकर जनता की बोली और लय में रखा। उन्होंने जनता को कविता का विषय भर नहीं बनाया। उसे कविता की आवाज बनाया। और उसकी सामूहिक शक्ति को भविष्य की कल्पना से जोड़ा।
आज जब संस्कृति को वर्चस्व के सामने समर्पण की शिक्षा देने का माध्यम बनाया जा रहा है, तब जनता की संस्कृति पर जोर देना केवल सांस्कृतिक पसंद का सवाल नहीं है। यह राजनीतिक जरूरत है। जनता को संस्कृति से जोड़ना और संस्कृति को जनता से जोड़ना आज उस फासीवादी परियोजना के विरुद्ध संघर्ष का अनिवार्य हिस्सा है, जो मनुष्य की विविध पहचान को एक संकीर्ण राष्ट्रीय पहचान में समेटना चाहती है और सामाजिक वर्चस्व को संस्कृति के नाम पर स्थायी बनाना चाहती है।
लेकिन इस संघर्ष का अर्थ किसी दूसरी संकीर्ण पहचान को खड़ा करना नहीं है। इसका अर्थ है भारत की उस बहुल, ज़मीनी ,लोकतांत्रिक और प्रतिरोधी सांस्कृतिक परंपरा को फिर से जीवित करना, जिसमें कबीर हैं, फुले हैं, सावित्रीबाई हैं, आंबेडकर हैं, भगत सिंह हैं, लोक की अनगिनत आवाजें हैं और उन सबके बीच अपने समय के मनुष्य की बराबरी और स्वतंत्रता का सपना है।
गोरख के शब्दों में सूरज झोपड़ियों में चमकना चाहिए। मेहनत के फूल उगाने वाले दुनिया के मालिक बनने चाहिए। और यही सपना वीरेन डंगवाल की कविता में नए समय की आवाज के साथ लौटता है। यह सपना किसी दूर के स्वर्ग का सपना नहीं है। यह उस दुनिया का सपना है जिसे मनुष्य अपने संघर्ष से बना सकता है।
इसलिए जन संस्कृति का सवाल आज फिर वही पुराना सवाल लेकर हमारे सामने खड़ा है : संस्कृति किसकी है ?
अगर संस्कृति कुछ लोगों की मिल्कियत है, तो जनता केवल उसकी दर्शक रहेगी। लेकिन अगर संस्कृति जनता की है, तो वह अपनी दुनिया की निर्माता भी हो सकती है।
जन संस्कृति का संघर्ष इसलिए केवल संस्कृति के लिए संघर्ष नहीं है। यह उस मनुष्य के लिए संघर्ष है जो बराबरी से जीना चाहता है, सवाल करना चाहता है, प्रेम करना चाहता है और अपनी दुनिया को बदलना चाहता है।

