20 जुलाई 2026 की दिल्ली को प्रवेश-बिंदु बनाते हुए यह न्यूज-फीचर छात्र आंदोलनों के बदलते सामाजिक चरित्र, मीम और रील की राजनीतिक भाषा, परीक्षा और रोजगार के संकट तथा किशोरों-नौजवानों पर पुलिस बल के इस्तेमाल की लंबी परंपरा की पड़ताल करता है।
20 जुलाई : लुटियन्स दिल्ली की तरफ बढ़ती बिना नेतृत्व वाली आबादी
सरकार-समर्थक पत्रकारों, कलाकारों और सोशल मीडिया एजेंटों ने जिस आंदोलन को अभद्र गालियों और दिशाहीन भीड़ से भरा बताया, असल में वह पहली बार था जब देश के अलग-अलग हिस्सों से आई यह युवा आबादी बिना किसी बड़े संगठनात्मक इंतज़ाम के अपने दम पर लुटियन्स दिल्ली की तरफ कूच करने को आतुर दिखाई दी। कारण समझे तो मात्र 2026 में हालिया शिक्षा प्रणाली मे व्याप्त भ्रष्टाचार ने लाखों बच्चों के भविष्य को एक साल पीछे धकेल दिया और करीब 21 मासूमों ने आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर ली।
ये आंदोलनकारी बस एक हठ पर अड़े थे, सरकार एक कदम पीछे ले और अपनी गलती माने !
इस युवा पीढ़ी के लिए यह कुछ ऐसा था, मानो घर के मुखिया को उनकी गलती पर टोकना और उनसे वह भूल मनवाना। लेकिन सबकी अपेक्षाओं के परे, देश के ‘सुप्रीम लीडर’ की सरकार ने गृह मंत्री के संरक्षण में 20 जुलाई को पुलिस और आरएएफ की सहायता से इसे कुचलने की हर संभव कोशिश की।

दोपहर करीब एक से दो बजे के बीच अशोक रोड पर पुलिस कार्रवाई शुरू हुई। शाम तक यह पालिका बाजार और आसपास के हिस्सों तक फैल चुकी थी। आँसू गैस, भीषण लाठीचार्ज और पैलेट गन के हमलों के बीच से गुजरते ये घायल और बिखरे हुए युवा अंधेरा होने तक दोबारा जंतर मंतर लौटते रहे, कुछ समूहों में तो कुछ अकेले !
कई के सिर फटे थे, कईओं की पीठ और शरीर पर नीले-काले पड़ चुके निशान थे। कई चेहरें मासूम रुलाई, भय, अपमान और मानसिक आघात के साथ वापस आए।
लोधी रोड से जंतर मंतर तक नाकाबंदी होने के कारण मैं पैदल ही लगभग साढ़े चार किलोमीटर प्रदर्शनकारियों की संख्या को आँकता आगे बढ़ रहा था। जिसे मेनस्ट्रीम राष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों ने हजारों या दसियों हजार बताया वो असल में इस आँकड़े से कई गुना थी। दोपहर करीब 1 बजे कुछ और परिचित सह पत्रकारों से जब मुलाकात हुई तो कन्फर्म हुआ की प्रदर्शनकारियों की आबादी एक लाख से आधिक है।

20 जुलाई को दिल्ली की सड़कों पर जो कुछ भी हुआ, उसके बाद 21 से 25 जुलाई तक भारत के लगभग हर मोबाइल फोन ने किसी न किसी रूप में उस आंदोलन को दर्ज किया; घायल चेहरे, पुलिस की लाठियाँ, मीम, गालियाँ, रील, नाचते प्रदर्शनकारी और एक ऐसी पीढ़ी, जिसने पुलिस की मार खाते हुए भी अपनी कमर नहीं झुकाई।
जंतर मंतर : विपक्ष का जादुई मंतर या सिस्टम से निराश युवाओं का आंदोलन/बवंडर
सीजेपी के आह्वान पर सोनम वांगचुक और स्टेज के दाईं तरफ प्लास्टिक की तिरपाल डाले कई आंदोलनकारी संगठनों के छात्रों ने जंतर मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की और शुरुआती 18 दिनों तक राष्ट्रीय मीडिया ने इससे दूरी बना के रखी। इस परिस्थिति में खबरों को जनता तक पहुँचने का काम किया स्वतंत्र पत्रकारों ने जो यूट्यूब, इंस्टाग्राम पर पल पल की अपडेट बनाए हुए थे।
जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए लोगों को केवल प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से आए छात्रों की भीड़ मानना, विपक्ष की भेजी पलटन समझना या विदेशी ताकतों का हाथ होना बोलने-गरियाने मात्र से यह सच नहीं बन जाएगा। इस पूरे आंदोलन में कुल चार दफा जाकर मैंने कई प्रदर्शनकारियों से बात की, अलग अलग समूहों में बैठे युवाओं के पोस्टर्स, मोबाईल स्क्रीन के वॉलपेपर, उनके गानों, लाइव परफॉरमेंस को अपनी भाषा में डिकोड करने और समझने की कोशिश की।
यहाँ बिहार के जहानाबाद से आए पोस्टग्रेजुएट रवि थे, जिनका कहना था कि “मैं देश के लिए आया हूँ।” आईआईटी पटना की एमबीए छात्रा बेतू यादव थीं, जिन्होंने अकादमिक काउंसलर की नौकरी छोड़कर पहले दिन से आंदोलन में शामिल होने की बात कही। सहारनपुर का 20 वर्षीय लकड़ी का कारीगर जुनैद था, जो किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी नहीं कर रहा था, लेकिन छात्रों के समर्थन में आया था। पुणे में कैटरिंग का काम करने वाले 42 वर्षीय सागर झा चौदह दिनों से वहाँ थे सिर्फ अपने बच्चों के भविष्य के लिए।

यहाँ कानून के विद्यार्थी थे, यूपीएससी अभ्यर्थी थे, आईटीआई कर रहे युवा थे, गायक थे, सामाजिक कार्यकर्ता थे, मोबाइल कंपनी में नौकरी करने, केब चलाने, गिग वर्क का काम करने वाले बारहवीं पास युवक थे और अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाले कामगार भी।
इस भीड़ को एक करने वाला कोई साझा समूह नहीं था। उसे जोड़ रही थी परीक्षा-व्यवस्था पर अविश्वास, रोजगार को लेकर अनिश्चितता, परिवारों का टूटता आर्थिक भरोसा और यह भय कि वर्षों की पढ़ाई तथा तैयारी किसी लीक हुए पेपर या भ्रष्ट भर्ती प्रक्रिया के सामने बेकार हो सकती है।
द हिन्दू के जी संपथ को दिए इंटरव्यू में आईसा की राष्ट्र अध्यक्ष नेहा बोरा कहती है, “हमारी भूख हड़ताल सरकार से अपनी मांगे मनवाने के लिए ही नहीं थी। ये देश के उन नौजवानों की चेतना जगाने के लिए भी थी जो इस व्यवस्था से परेशान हैं, उन्हें इस आंदोलन में शामिल करने का एक जरिया, और भूख हड़ताल सिर्फ गांधीवादी तरीका है कहना गलत होगा, जेल में भगत सिंह और उनके साथियों ने भी यही जरिया अपनाया था। ”
2025 के सरकारी श्रम आँकड़ों के अनुसार 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग में बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत और शहरी युवाओं में 13.6 प्रतिशत थी। इन आँकड़ों से भी आगे परीक्षा की तैयारी में लगे वे युवा हैं, जिन्हें तकनीकी तौर पर बेरोजगार न मानकर विद्यार्थी कहा जाता है, जबकि उनका पूरा परिवार नौकरी की एक परीक्षा पर निवेश कर रहा होता है।
2026 के नीट पेपर लीक ने करीब 20 लाख अभ्यर्थियों को प्रभावित किया। सीबीआई ने बाद में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी से जुड़े विशेषज्ञों, बिचौलियों और कोचिंग संस्थानों से जुड़े लोगों सहित 13 व्यक्तियों के खिलाफ आरोप दाखिल किए। इसलिए यह आंदोलन सिर्फ एक परीक्षा का भावुक विस्फोट नहीं था; इसकी जमीन वर्षों से तैयार हो रही थी।
राज्य बनाम किशोर और नौजवान
20 जुलाई की तस्वीरों में सबसे बेचैन करने वाली बात केवल चोटों की संख्या नहीं, बल्कि घायल लोगों की उम्र थी।
फील्ड दस्तावेजीकरण में बड़ी संख्या में किशोर और बीस से तीस वर्ष के युवा घायल दिखाई दिए। तीन अलग-अलग तरह की लाठियाँ या प्रहार करने वाले उपकरण और पेलेट गन का इस्तेमाल होते देखा गया। उनकी तकनीकी पहचान, अधिकृत इस्तेमाल और पुलिस प्रोटोकॉल से अनुरूपता की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है और न्यायालय में अब कई वरिष्ठ एडवोकेट इस पर सवाल खड़े कर रहे है।
दिल्ली पुलिस ने आधिकारिक तौर पर लगभग 60 प्रदर्शनकारियों और 118 पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात कही। स्वतंत्र दस्तावेजीकरण और अस्पतालों से पहुँची सूचनाएँ इससे अधिक संख्या करीब 200 घायल प्रदर्शनकारियों की ओर संकेत करती हैं।

कम-से-कम चार लोगों, जिनमें एक पत्रकार भी शामिल था, की गंभीर पैलेट चोटों के साथ पहचान हुई है। 20 जुलाई को पैलेट से घायल लोगों में से एक 26 वर्षीय युवक की सफदरजंग अस्पताल की मेडिकल केस-शीट इस हिंसा की प्रकृति को और स्पष्ट करती है। अस्पताल के रिकॉर्ड में मरीज द्वारा जंतर मंतर पर करीब चार बजे “पेलेट गन” से हुए हमले की वारदात दर्ज हुई। डॉक्टरों ने उसके दाहिने हाथ, कोहनी, पीठ और बगल पर कई 2–4 मिलीमीटर के गोल और अंडाकार छेद दर्ज किए, जिनके आसपास नीले पड़ी अंदरूनी चोटें और छर्रों से हुए गोल घाव थे। चिकित्सकीय नोट में इन्हें स्पष्ट रूप से “छर्रों के घुसने से हुए घाव” जैसा बताया गया है। अलग-अलग हिस्सों में दर्ज घावों की संख्या करीब बीस तक पहुँचती है।
एक्स-रे में शरीर के भीतर चमड़ी से निचली परत में कई बाहरी पदार्थ दर्ज किए गए। उपलब्ध एक्स-रे फिल्मों में भी कई छोटे हड्डी/धातु/कांच आदि के टुकड़े दिखाई देते हैं। हालांकि मेडिकल रिकॉर्ड यह तय नहीं करता कि ये बाहरी पदार्थ प्लास्टिक के थे या धातु के। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आरएएफ की जनरल डायरी में इस्तेमाल किए गए गोल बारूद को “प्लास्टिक पेलेट” बताया गया है, जबकि घायलों के शरीर में एक्स-रे से दिखाई देने वाले ये कण कई रेपोर्टों मे धातु के बताए जा रहे है।
वर्दी, संस्था और जवाबदेही के बीच
द हिन्दू की पड़ताल में सामने आई आरएएफ की जनरल डायरी एंट्री में 55 गैर-इलेक्ट्रिकल शेल, 15 इलेक्ट्रिकल शेल, पाँच टियर-स्मोक ग्रेनेड और प्लास्टिक पैलेट वाली दो बैलिस्टिक कारतूसों के इस्तेमाल का उल्लेख है। रिकॉर्ड के मुताबिक यह फायरिंग डीसीपी के आदेश पर हुई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने आरएएफ का गोला-बारूद लॉग सुरक्षित रखने का निर्देश दिया और पैलेट गन के इस्तेमाल को असाधारण परिस्थितियों तक सीमित रखने की बात कही।
लेकिन 20 जुलाई को बल प्रयोग की कहानी केवल हथियारों की संख्या तक सीमित नहीं थी।

उसी दिन का एक वीडियो एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा को एक महिला प्रदर्शनकारी को थप्पड़ मारते हुए दिखाता है। दिल्ली हाई कोर्ट में इस वीडियो का उल्लेख करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि महिला उस समय कुछ नहीं कर रही थी और थप्पड़ “अकारण” दिखाई देता है। घटना के बाद लांबा के खिलाफ पुलिस शिकायत भी दर्ज कराने की कोशिश हुई।
कुछ दिनों बाद यही वीडियो एक दूसरे मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के सामने फिर आया। यह मुकदमा 20 जुलाई की कार्रवाई की जाँच का नहीं था, एक 68 वर्षीय महिला की 2025 की कथित अवैध हिरासत की अदालत-निर्देशित जाँच लांबा की निगरानी में थी। याचिकाकर्ता ने थप्पड़ वाले वीडियो का हवाला देते हुए उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाया और जाँच किसी दूसरे अधिकारी को सौंपने की माँग की। अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया। जस्टिस गिरीश कठपालिया ने कहा कि यदि अधिकारी ने गलत किया है तो उसे परिणाम भुगतने चाहिए, लेकिन इससे उसे हर मामले में पक्षपाती नहीं माना जा सकता। इसी सुनवाई में अदालत ने कहा; “संस्था को बदनाम करना बंद करो”।

अदालत ने यह भी कहा कि केवल किसी वीडियो में अधिकारी को महिला को थप्पड़ मारते देखे जाने के आधार पर उसकी पूरी छवि को धूमिल नहीं किया जा सकता; विरोध का मौलिक अधिकार संसद जैसे “संप्रभुता के केंद्र” को नुकसान पहुँचाने तक नहीं जाता। अदालत ने यह संभावना भी रखी कि भीड़ संसद में प्रवेश करती तो हालात कहीं अधिक हिंसक हो सकते थे।
यहीं 20 जुलाई की घटना एक कठिन सवाल छोड़ती है। वर्दी पहने अधिकारी द्वारा कैमरे के सामने महिला को थप्पड़ मारना एक व्यक्ति की कार्रवाई है, लेकिन उस कार्रवाई से संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठाना क्या स्वयं संस्था को बदनाम करना है ? और अगर नागरिक को पुलिस के व्यवहार से संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने से पहले उस अधिकारी की पूरी न्यायिक प्रक्रिया समाप्त होने का इंतजार करना पड़े, तो संस्थागत जवाबदेही की शुरुआत कहाँ से होगी ?
20 जुलाई की कार्रवाई में ऐसे सवाल और भी थे। सोशल मीडिया पर कील लगी लाठी के वीडियो सामने आने पर दिल्ली पुलिस और पीआईबी ने उन्हें उस दिन के प्रदर्शन से असंबंधित बताते हुए “फैक” कहा था। बाद में अल्ट न्यूज की जाँच; वीडियो मेटाडाटा, geolocation और प्रत्यक्षदर्शियों के आधार पर यह स्थापित करने में सफल रही कि वीडियो 20 जुलाई का ही था और एक पुलिसकर्मी के हाथ में कील लगी लाठी दिखाई दे रही थी।
इसी तरह सुबह जंतर मंतर के पास दिखाई दिया पत्थरों से भरा ट्रक भी अफवाह और आधिकारिक जवाब के बीच फँसी कहानी बन गया। अवधेश कुमार की न्यूज़लॉन्ड्री पड़ताल ने पाया कि ट्रक 16 जुलाई की एक सड़क दुर्घटना के बाद पुलिस द्वारा जब्त किया गया था और संसद मार्ग थाने की हिरासत में था। लेकिन 20 जुलाई की सुबह वह पत्थरों से भरा प्रदर्शन स्थल के पास कैसे पहुँचा, उसके बाद अलग-अलग जगहों पर क्यों दिखाई दिया और उसे कब खाली किया गया? इन सवालों पर पुलिस अधिकारियों के अलग-अलग बयान सामने आए। न्यूज़लॉन्ड्री की जाँच किसी सुनियोजित साजिश को स्थापित नहीं करती, लेकिन पुलिस हिरासत में मौजूद वाहन की लगातार बदलती जगह और परस्पर विरोधी स्पष्टीकरण उस दिन की पुलिस व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े करते हैं।
पूरे दिन की कार्रवाई—बैरिकेड, बसों से रास्ता रोकना, लगातार आँसू गैस, पैलेट, अलग-अलग तरह की लाठियाँ, सादे कपड़ों में मौजूद लोगों पर उठे सवाल और घायल प्रदर्शनकारियों की संख्या, एक ऐसी पुलिस व्यवस्था का दृश्य जरूर प्रस्तुत करती है जो इस जमावड़े को किसी भी तरह खत्म करना चाहती थी।
और यह सवाल 20 जुलाई से शुरू नहीं होता।

विविधता से भरे देश की राजधानी की पुलिस पर राजनीतिक और वैचारिक पक्षधरता के आरोप पिछले एक दशक में बार-बार लगे हैं। कभी जामिया की लाइब्रेरी में घुसकर छात्रों को पीटती पुलिस दिखाई देती है, तो कुछ ही सप्ताह बाद जेएनयू में नकाबपोश हमलावरों के सामने उसकी कथित निष्क्रियता पर सवाल उठते हैं; कभी कपिल मिश्रा के भाषण पर एफआईआर दर्ज करने में देरी पर हाई कोर्ट सवाल करता है, तो कभी हिंदू राष्ट्र की शपथ वाले कार्यक्रम को लेकर पुलिस का पहला हलफनामा खुद सुप्रीम कोर्ट को दोबारा जवाब माँगने पर मजबूर करता है। इन घटनाओं को जोड़ने वाली कोई न्यायिक घोषणा नहीं है कि दिल्ली पुलिस “संघ की पुलिस” है, लेकिन उसके राजनीतिक रूप से असमान व्यवहार का सवाल लगातार सार्वजनिक रिकॉर्ड में लौटता रहा है।
दिल्ली में 20 जुलाई का सवाल केवल यह नहीं था कि पुलिस ने कितना बल इस्तेमाल किया। सवाल यह भी था कि राज्य किन नागरिकों को खतरे की तरह देखता है और उस खतरे से निपटने के लिए किन हथियारों और अपवादों को सामान्य बनाता है। इस इतिहास का सबसे भयावह अध्याय दिल्ली से लगभग आठ सौ किलोमीटर दूर, कश्मीर में बहुत पहले लिखा जा चुका था।
माछिल से तुफ़ैल तक : जब ‘ कम घातक ’ हथियार सामूहिक अंधेपन की व्यवस्था बने
माछिल फर्जी मुठभेड़ ने 2010 के कश्मीर आंदोलन की जमीन तैयार की, जबकि 17 वर्षीय तुफ़ैल अहमद मट्टू की मौत ने उस गुस्से को पूरे कश्मीर में फैला दिया। अप्रैल 2010 में नदिहाल गाँव के शहज़ाद अहमद ख़ान, रियाज़ अहमद लोन और मोहम्मद शफ़ी लोन को सेना के लिए पोर्टर का काम दिलाने के बहाने घर से ले जाया गया, माछिल सेक्टर में तीनों को फर्जी एनकाउंटर में मारकर पाकिस्तानी घुसपैठिए घोषित कर दिया गया। पहचान सामने आने के बाद कश्मीर के आम युवाओं में न्याय की माँग को लेकर विरोध की यह एक नेतृत्वविहीन लहर थी।
एमनेस्टी के अनुसार, 11 जून को तुफ़ैल अहमद मट्टू जब ट्यूशन से घर लौट रहा था तब दो पुलिसकर्मियों पर उसे मारने का आरोप लगा; प्रत्यक्षदर्शियों और पोस्टमॉर्टम संबंधी विवरणों में उसके सिर पर आँसू गैस का गोला लगने की बात सामने आई। उसकी मृत्यु ने माछिल के बाद जमा आक्रोश को एक व्यापक युवा विद्रोह में बदल दिया।
इसके बाद एक ऐसा चक्र शुरू हुआ जिसमें एक नौजवान की मौत अगले प्रदर्शन को जन्म देती और अगला प्रदर्शन एक और मौत में बदल जाता। तीन महीनों के भीतर सुरक्षा बलों की गोलीबारी और अत्यधिक बल के इस्तेमाल में सौ से अधिक नागरिक मारे गए। यही वह पृष्ठभूमि थी जिसमें सरकार ने जीवित गोलियों के कथित ‘कम घातक’ विकल्प के रूप में पैलेट-फायरिंग शॉटगन को कश्मीर में उतारा। मानवाधिकार संस्थाओं के अनुसार, भीड़ पर इसका पहला सार्वजनिक रूप से दर्ज इस्तेमाल 14 अगस्त 2010 को सोपोर में हुआ।

लेकिन पैलेट गन ने मौतों को रोकने वाली किसी मानवीय तकनीक का रूप नहीं लिया। एक 12-बोर पंप-एक्शन शॉटगन से एक साथ दर्जनों या सैकड़ों छोटे धातु के छर्रे निकलते, जिनकी दिशा को नियंत्रित करना संभव नहीं होता। वे प्रदर्शनकारी, राहगीर, बच्चे और घरों के भीतर मौजूद लोगों में फर्क नहीं करते। इसीलिए ‘नॉन-लीथल’ कहे गए इस हथियार ने कश्मीर में आँखें छीनने, चेहरों को छलनी करने और शरीर के भीतर स्थायी रूप से धातु छोड़ देने की एक पूरी पीढ़ीगत स्मृति को तैयार किया।
पैलेट गन की शुरुआत 2010 के आंदोलन के दौरान हुई, लेकिन उसका सबसे व्यापक और व्यवस्थित इस्तेमाल 2016 में बुरहान वानी की हत्या के बाद हुआ। जुलाई 2016 से फरवरी 2017 के बीच 6,221 लोग पैलेट से घायल बताए गए, जिनमें 782 को आँखों की चोटें लगीं।
दस साल बाद, जब दिल्ली के युवा प्रदर्शनकारियों के चेहरों और शरीर पर पैलेट के निशान दिखाई दिए, तो कश्मीर का वह इतिहास राजधानी के बीचोंबीच लौट आया। जिस हथियार को कभी ‘कश्मीर की असाधारण परिस्थिति’ के नाम पर सामान्य बनाया गया था, उसका इस्तेमाल अब देश की राजधानी में शिक्षा और रोजगार की माँग कर रहे युवाओं पर दर्ज हुआ।

आंदोलन की नई भाषा : हर दिशा में एक अलग स्टोरी
व्यंगकार सुनील शर्मा उर्फ रोफल गांधी के शब्दों में:
“जंतर मंतर का नज़ारा कुछ ऐसा था जैसे आप रील की दुनिया में घुस गए हों। हर दिशा में एक अलग स्टोरी चल रही थी।”
यहाँ आया आंदोलनकारी अन्ना के जनलोकपाल जैसे भाषण-मंच के सामने बैठी अनुशासित भीड़ नहीं था। कोई पुलिस के सामने कैमरा रखकर सवाल कर रहा था, कोई लाठी खाने के तुरंत बाद वीडियो बना रहा था, कोई मीम का अभिनय कर रहा था और कोई पुलिसकर्मी से ठिठोली करते हुए अपनी रील पूरी कर रहा था।
मोबाइल फोन यहाँ सिर्फ रिकॉर्डिंग का उपकरण नहीं था। वह मंच, गवाह, समाचार चैनल, सुरक्षा-कवच और संगठनात्मक माध्यम सब कुछ था।
पुराने छात्र आंदोलनों में नारा किसी संगठन की वैचारिक भाषा से निकलकर भीड़ तक पहुँचता था। यहाँ नारा मीम से निकला, रील में बदला, व्हाट्सऐप समूहों में फैला और फिर पोस्टर बनकर सड़क पर लौट आया। सीजेपी का शुरुआती उभार भी ऑनलाइन व्यंग्य के रूप में हुआ; कुछ ही दिनों में उसके सोशल मीडिया खातों पर करोड़ों लोग जुड़ गए। बाद के विरोध प्रदर्शनों ने ऑनलाइन हास्य और ऑफलाइन जुटान को एक-दूसरे का विस्तार बना दिया।

इस आंदोलन की भाषा कभी बेहद रचनात्मक, कभी बचकानी, कभी अश्लील और कभी असाधारण रूप से राजनीतिक थी। इसमें कोई केंद्रीय संपादक नहीं था। इसलिए एक ही आंदोलन में संविधान, शिक्षा, रोजगार और जवाबदेही के पोस्टरों के साथ निजी गालियाँ और मोदी पर की गई ‘विशेष’ टिप्पणियाँ भी दिखाई दीं।
गालियों की जमीन किसने तैयार की ?
युवा पीढ़ी की भाषा को निर्वात में पैदा हुआ मानना सुविधाजनक लग सकता है लेकिन इस पीढ़ी ने केंद्र में भाजपा के अलावा किसी दूसरी सरकार को लगभग देखा ही नहीं। उसने राजनीति को सबसे पहले संसद की कार्यवाही, टेलीविजन बहस, चुनावी भाषण, आईटी सेल के वीडियो, व्हाट्सऐप संदेश और सोशल मीडिया क्लिप के माध्यम से जाना।
उसने संसद के भीतर भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी को एक मुस्लिम सांसद के लिए सांप्रदायिक और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते देखा। उसने प्रधानमंत्री को एक चुनावी रैली में मुसलमानों के लिए ‘घुसपैठिए’ शब्द का इस्तेमाल करते सुना। उसने कपिल मिश्रा को पुलिस अधिकारी के बगल में खड़े होकर सड़क खाली कराने का अल्टीमेटम देते हुए देखा, उस भाषण के अगले दिन उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा फैली जिसने 53 लोगों की जान ली।
इसलिए जब प्रदर्शन में “56 इंच”, “बाल नरेंद्र” और दूसरे मीम-संदर्भ सामने आए, तो वे केवल राजनीतिक अशिष्टता नहीं थे। वे उसी केंद्रीकृत प्रचार-भाषा को उलटकर सत्ता पर फेंकने की कोशिश भी थे।
यहाँ तर्क यह नहीं होना चाहिए कि सत्ता की अभद्र भाषा प्रदर्शनकारियों की हर गाली को जायज़ बना देती है। सवाल यह है कि सार्वजनिक संवाद की मर्यादा पर व्याख्यान देने वाले वही लोग उस भाषा की राजनीतिक वंशावली पर मौन क्यों हैं, जिसे पिछले डेढ़ दशक में मंचों, संसद, टीवी स्टूडियो और संगठित डिजिटल अभियानों ने सामान्य बनाया ?

2019 के भारतीय आम चुनाव से जुड़े एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भाजपा-समर्थक लगभग 600 व्हाट्सऐप समूहों का अध्ययन करते हुए दर्जनों समन्वित हैशटैग अभियानों की पहचान की। इससे समझ आता है कि डिजिटल भाषा सिर्फ स्वतःस्फूर्त जन-अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि वर्षों से सत्ता द्वारा भी संगठित राजनीतिक औजार रही है।
ये युवा पीढ़ी उसी औजार को सत्ता के खिलाफ घुमा रही है लेकिन अधिक विकेन्द्रीकृत, अधिक बेतरतीब और कहीं अधिक कटाक्ष के रूप में।
कोविड के बाद : ऑनलाइन दुनिया का सड़क पर उतरना
कोविड के दौरान स्कूल, कॉलेज, कोचिंग, दोस्ती, मनोरंजन और राजनीतिक बहस—सब मोबाइल की स्क्रीन में सिमट गए थे।
यह पीढ़ी ऑनलाइन पढ़ी, ऑनलाइन परीक्षा दी, ऑनलाइन ठगी गई, ऑनलाइन भर्ती की तारीखें टलते देखती रही और ऑनलाइन ही उसने पेपर लीक, आत्महत्याओं तथा रोजगार संकट की खबरें साझा कीं।
कोविड के बाद जंतर मंतर पर पहुँची यह आबादी इंटरनेट को पीछे छोड़कर सड़क पर नहीं आई थी। वह इंटरनेट को अपने साथ सड़क पर लेकर आई थी।
इसीलिए हर व्यक्ति रिपोर्टर भी था और विषय भी। प्रदर्शन के दौरान रिकॉर्ड हुए वीडियो केवल बाद की स्मृति नहीं थे; वे उसी समय पुलिस, मीडिया और सरकार के दावों को चुनौती दे रहे थे।
यूट्यूब वीडियो और बटन-माइक रिपोर्टिंग ने विरोध प्रदर्शनों में समाचार निर्माण का नियंत्रण बदल दिया। पहले टीवी कैमरा तय करता था कि कौन-सा चेहरा और नारा राष्ट्रीय दृश्य बनेगा। अब सैकड़ों फोन एक साथ अलग-अलग संस्करण तैयार करते हैं। इससे राज्य और मुख्यधारा मीडिया का एकाधिकार कमजोर होता है, लेकिन अफवाह, अधूरी सूचना और एल्गोरिदमिक उत्तेजना का जोखिम भी बना रहता है।

सीएए–एनआरसी विरोध प्रदर्शनों पर हुए शोध में भी सोशल मीडिया को, व्यक्तिगत असंतोष का सामूहिक जुटान में बदलने वाले महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में दर्ज किया गया था। 2026 में यह प्रक्रिया कहीं अधिक तेज़ और विसुअल नेरेटिव के साथ विस्तार ले चुकी है।
मधुमक्खी का छत्ता, जिसे रानी मधुमक्खी की दरकार नहीं
अन्ना हज़ारे के जनलोकपाल आंदोलन में एक चेहरा था, मंच था, ‘टीम’ थी और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपेक्षाकृत साफ-सुथरी मध्यवर्गीय भाषा थी। उसी आंदोलन के एक हिस्से से बाद में आम आदमी पार्टी का उदय हुआ।
2026 के आंदोलन को लेकर शुरुआती अंदेशा था कि यह भी किसी नए राजनीतिक दल, चुनावी चेहरे या ‘मसीहा’ को जन्म देगा। लेकिन दिन बीतते बीतते इसकी संरचना वैसी नहीं दिखी।
सोनम वांगचुक, अभिजीत डिपके, नेहा और दूसरे सार्वजनिक चेहरे महत्वपूर्ण जरूर थे, मगर आंदोलन का पूरा नियंत्रण किसी एक नेता के हाथ में नहीं था। अलग-अलग शहरों में लोग व्हाट्सऐप समूहों, इंस्टाग्राम अपडेट और लाइव लोकेशन के सहारे बिना एक केंद्रीय संगठन के इकट्ठा हुए।
यह युवाओं का ऐसा मधुमक्खी का छत्ता था जिसे हर समय रानी मधुमक्खी की जरूरत नहीं थी।
यही कारण है कि 18 जुलाई की तड़के हुई हिरासतों और 20 जुलाई के पुलिस दमन से आंदोलन के खत्म होने की बजाय नए वीडियो, नए चेहरे और नए स्थानीय प्रदर्शन पैदा हुए। किसी एक चेहरे को उठा लेने से संदेश का स्रोत बंद नहीं हुआ।

पुलिसिया दमन और छात्र आंदोलन का लंबा इतिहास
20 जुलाई को इतिहास से काटकर देखना आसान है। लेकिन भारत में कैंपस, बेरोजगार अभ्यर्थी और राज्य की पुलिस बार-बार एक-दूसरे के सामने खड़े हुए हैं।
1997: चंद्रशेखर प्रसाद
जेएनयू छात्रसंघ के दो बार अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर प्रसाद ने दिल्ली के सुरक्षित राजनीतिक गलियारों में बने रहने के बजाय सीवान लौटकर मजदूरों, किसानों और छात्रों के बीच काम करना चुना। 31 मार्च 1997 को सीवान में कामगारों की हड़ताल के संबंध में नुक्कड़ सभा करते हुए उनकी हत्या कर दी गई। जिसके बाद जेएनयू के हजारों छात्रों का आक्रोश दिल्ली की सड़कों पर प्रधानमंत्री आवास की तरफ बढ़ा जिसे पुलिस ने लाठीचार्ज से काबू किया और इस सभी में 50 से अधिक छात्र घायल हुए। और यही वो सीवान है जहां 20 जुलाई के बाद पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर AK47 से 9 राउन्ड फायरिंग की।
चंद्रशेखर छात्र राजनीति की उस पुरानी परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें विचार, संगठन, दीर्घकालिक जनकार्य और व्यक्तिगत जोखिम साथ चलते थे और जहां छात्र आंदोलन दिल्ली से निकालकर विभिन्न दूरवर्ती राज्यों तक पहुंचे। आज के आंदोलन की भाषा उनसे बिल्कुल अलग हो सकती है, लेकिन शिक्षा, भ्रष्टाचार, रोजगार और सत्ता के खिलाफ खड़े होने का प्रश्न दोनों को जोड़ता है।
2016: रोहित वेमुला और हैदराबाद विश्वविद्यालय
रोहित वेमुला की संस्थागत मृत्यु ने उच्च शिक्षा संस्थानों के भीतर जातिगत भेदभाव को राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न बनाया। उनके अंतिम पत्र की पंक्ति; “मेरा जन्म मेरी घातक दुर्घटना है” एक निजी त्रासदी से आगे जाकर संस्थान, जाति और मनुष्य की गरिमा के संबंध पर बड़ा सवाल बन गई।
मार्च 2016 में कुलपति अप्पा राव की वापसी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई हुई। दर्जनों छात्र पुलिस बर्बरता का शिकार हुए और गिरफ्तार किए गए। यहाँ संस्थान और राज्य अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे की रक्षा करती संरचनाओं की तरह दिखाई दिए।

2018: एसएससी पेपर लीक
एसएससी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के खिलाफ हजारों अभ्यर्थी संसद मार्ग पहुँचे। प्रदर्शनकारियों ने लाठीचार्ज का आरोप लगाया; दिल्ली पुलिस ने इसे धक्का-मुक्की और भीड़ को हटाने की कार्रवाई बताया तथा 207 लोगों को डिटेन किया गया।
अर्थात पेपर लीक के खिलाफ दिल्ली की सड़क पर पहुँचना 2026 में अचानक पैदा हुआ विचार नहीं था।
2019–20: जामिया, जेएनयू और सीएए–एनआरसी
15 दिसंबर 2019 को दिल्ली पुलिस जामिया मिलिया इस्लामिया के परिसर और पुस्तकालय में घुसी। आँसू गैस और लाठीचार्ज में सौ से अधिक विद्यार्थी घायल हुए। बाद में सामने आए वीडियो में पुलिसकर्मी पुस्तकालय के भीतर छात्रों को पीटते दिखाई दिए।
5 जनवरी 2020 को नकाबपोश लोगों ने जेएनयू में छात्रों और शिक्षकों पर डंडों और लोहे की छड़ों से हमला किया। दर्जनों लोग घायल हुए और पुलिस पर मौके पर मौजूद रहते हुए हस्तक्षेप न करने के आरोप लगे।
उसी वर्ष उत्तर-पूर्वी दिल्ली की हिंसा में 53 लोग मारे गए, जिनमें 40 मुस्लिम थे। एक वायरल वीडियो में पुलिसकर्मी फैज़ान और चार अन्य घायल मुस्लिम युवकों को पीटते और राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर करते दिखाई दिए। फैज़ान की अगले दिन मृत्यु हो गई। 2026 में दिल्ली की एक अदालत ने इस मामले में दो पुलिसकर्मियों को तलब किया।
यह फेहरिस्त इसलिए जरूरी है क्योंकि राज्य की हिंसा हमेशा केवल लाठी नहीं होती। कभी वह परिसर में घुसना है, कभी हिंसक भीड़ के सामने निष्क्रिय रहना, कभी घायल लोगों को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर करना और कभी प्रदर्शनकारियों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ की श्रेणी में डाल देना।
2022: रेलवे भर्ती आंदोलन
आरआरबी–एनटीपीसी परीक्षा परिणामों के खिलाफ बिहार और उत्तर प्रदेश में बड़े प्रदर्शन हुए। प्रयागराज में पुलिस छात्रावासों और लॉजों में घुसी और छात्रों को पीटने के आरोप लगे। उत्तर प्रदेश प्रशासन ने कार्रवाई के बाद छह पुलिसकर्मियों को निलंबित किया।
20 जुलाई के आंदोलन में शामिल अनेक युवाओं की स्मृति में ये सभी घटनाएँ एक साथ मौजूद थीं भले उन्होंने उन्हें प्रत्यक्ष न देखा हो पर उनके फोन ने उन्हें ये सब बार-बार दिखाया है।

‘फॉरेन फंडिंग’ और सरकार का तैयारशुदा इकोसिस्टम
पिछले एक दशक में लगभग हर बड़े जन आंदोलन को किसी न किसी समय विदेशी ताकत, विपक्षी दल, शहरी नक्सल, खालिस्तानी, जिहादी, राष्ट्र-विरोधी या ‘टुकड़े-टुकड़े’ साजिश के रूप में प्रस्तुत किया गया।
यह पैटर्न राज्य, पार्टी, केबल टेलीविजन और सोशल मीडिया नेटवर्क के बीच बना एक ऐसा इकोसिस्टम है जिसमें आंदोलन के वास्तविक सामाजिक कारणों पर बहस करने के बजाय उसके पीछे किसी छिपे हुए ‘मास्टरमाइंड’ की तलाश की जाती है।
2026 के आंदोलन के साथ भी ‘स्पॉन्सर्ड’, ‘विपक्ष द्वारा संचालित’ और ‘असली छात्र नहीं’ जैसे आरोप लगाए गए। भाजपा नेता रमेश बिधूड़ी ने बाद में यह तक कहा कि प्रदर्शन में छात्रों से अधिक ‘पंचर लगाने वाले’ और ‘ताला बनाने वाले’ थे। यह टिप्पणी आंदोलन की सामाजिक विविधता का खंडन नहीं, बल्कि मेहनतकश लोगों की राजनीतिक मौजूदगी को अपमान में बदलने की कोशिश के रूप में पढ़ी जा सकती है।
जंतर मंतर पर जुनैद जैसे लकड़ी के कारीगर का होना आंदोलन को कम छात्र-आंदोलन नहीं बनाता। वह इस सवाल को बड़ा बनाता है कि शिक्षा और रोजगार की विफलता का असर केवल परीक्षा देने वाले पर पड़ता है, या उस पूरे समाज पर जो उसके भविष्य पर निर्भर है ?
गायब-हाज़िर चोटें, लेकिन सवाल अभी बाकी हैं
20 जुलाई को केवल हिरासत में लिए गए लोगों, क्षतिग्रस्त वाहनों और आधिकारिक चोटों की संख्या के जरिए नहीं समझा जा सकता। उसकी असली तस्वीर उन चोटों में भी दर्ज है जो कैमरे में दिखाई दीं; फटे सिर, काली पड़ चुकी पीठ, सूजे हुए पैर, पैलेट से छलनी चेहरे, और उन चोटों में भी जो दिखाई नहीं देतीं: भय, अपमान, घबराहट और वह मानसिक आघात जिसे कई युवा अपने साथ घर ले गए और कुछ उनको सबूत बनाए धरनास्थल पर वापस बैठ गए।
यह जानना जरूरी है कि बल का इस्तेमाल किस क्रम में हुआ; क्या पर्याप्त चेतावनी दी गई; कौन-कौन से हथियार इस्तेमाल किए गए; क्या सादे कपड़ों में मौजूद लोगों को पुलिस कार्रवाई में शामिल होने का अधिकार था; और किशोरों तथा युवा प्रदर्शनकारियों को किस अनुपात में शारीरिक बल का सामना करना पड़ा। पैलेट से गंभीर रूप से घायल कम-से-कम चार लोगों की पहचान, आरएएफ की डायरी में दर्ज हथियारों का ब्यौरा और आधिकारिक रिकॉर्ड में ‘प्लास्टिक पैलेट’ तथा कुछ चिकित्सकीय रिकॉर्ड में शरीर के भीतर दर्ज बाहरी पदार्थ के बीच का सवाल, ये सब अपने आप में स्वतंत्र और पारदर्शी जाँच की माँग करते हैं।

22 जुलाई को दिल्ली विश्वविद्यालय में आइसा की अध्यक्ष सावी से जंतर मंतर पर हुई बातचीत ने हिंसा के एक और पक्ष की तरफ इशारा किया। उनके अनुसार कार्रवाई केवल भीड़ को हटाने तक सीमित नहीं थी; उसमें पहचान, पहनावे और जेंडर के आधार पर चुना हुआ अपमान भी शामिल था। सावी ने बताया:
“पुलिस ने बिना महिला अधिकारियों के हमें एलआईसी बिल्डिंग में घेर लिया, दीवार की तरफ धकेला, डंडों से पीटा और गालियाँ देते हुए वहाँ से निकल जाने को कहा।”
उनकी गवाही के मुताबिक महिलाओं पर शारीरिक हमला और उनका अपमान हुआ, जबकि मुस्लिम पहनावे वाले छात्रों तथा दलित और जेंडर-विविध प्रदर्शनकारियों को अधिक आक्रामक तरीके से निशाना बनाए जाने के आरोप सामने आए। ये निष्कर्ष नहीं हैं, लेकिन ऐसी गंभीर गवाहियाँ हैं जिन्हें निष्पक्ष जाँच के बिना खारिज भी नहीं किया जा सकता।
सड़क पर हुई हिंसा के बाद घायल प्रदर्शनकारियों को आरएमएल अस्पताल में एक और तरह की परीक्षा से गुजरना पड़ा। अस्पताल प्रबंधन ने किसी औपचारिक टिप्पणी से इनकार कर दिया। लेकिन परिसर में कई घंटे बिताने के दौरान घायल लोगों के साथ आए रिश्तेदारों, देखभालकर्ताओं और नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बात करने वाले कुछ कर्मचारियों ने असमान व्यवहार और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए।
उनके अनुसार, गंभीर रूप से घायल प्रदर्शनकारियों को लंबे समय तक इंतजार कराया गया, प्राथमिक उपचार के दौरान ताने मारे गए और कुछ को पर्याप्त जाँच तथा उपचार पूरा होने से पहले ही छुट्टी दे दी गई। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि मामूली खरोंचों के साथ आए पुलिसकर्मियों को प्राथमिकता दी जा रही थी, जबकि कई गंभीर रूप से घायल प्रदर्शनकारी उपचार के लिए इंतजार करते रहे। अस्पताल प्रबंधन पर ‘ऊपरी दबाव’ में जल्दी छुट्टी देने का आरोप अभी स्वतंत्र पुष्टि माँगता है, लेकिन उससे जुड़ी गवाहियों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
22 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने कथित पुलिस ज्यादती के वीडियो पर स्वतः संज्ञान लेने की तत्काल माँग स्वीकार नहीं की। बाद की कार्यवाही में अदालत ने आरएएफ के गोला-बारूद रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने और घायलों के उपचार से जुड़े निर्देश दिए। यह क्रम स्वयं बताता है कि संस्थागत प्रतिक्रिया एकरैखिक नहीं थी; पहले अनिच्छा, फिर सीमित हस्तक्षेप।

लेकिन 20 जुलाई के बाद का सबसे दिलचस्प दृश्य अदालत या अस्पताल में नहीं, फिर उसी जंतर मंतर पर दिखाई दिया।
जिस पुलिस कार्रवाई से आंदोलन को तितर-बितर करने की कोशिश हुई थी, उससे अगले दिनों में जगह को खाली नहीं किया जा सका। 21 से 25 जुलाई के बीच युवा फिर लौटते रहे। टूटे हुए मंच और उजड़े हुए छोटे-छोटे ठिकाने फिर आबाद हुए। और नए लोग आए, मोबाइल कैमरे फिर खुले, पोस्टर फिर बने और एक बार फिर जंतर मंतर उस पीढ़ी की राजनीतिक प्रयोगशाला में बदल गया।
यह इस आंदोलन की प्रकृति के बारे में एक महत्वपूर्ण संकेत था। शायद इसे हर समय किसी मसीहा, सर्वमान्य नेता या ‘रानी मधुमक्खी’ की जरूरत नहीं थी। एक व्यक्ति को हटाना, मंच तोड़ देना या भीड़ को एक शाम हिंसक रूप से खदेड़ देना संदेश के स्रोत को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं था। उसका स्रोत अब एक मंच पर बैठा नेता नहीं, बल्कि हजारों मोबाइल फोन, छोटे-छोटे समूह और अलग-अलग शहरों से आए युवाओं के बीच बना नेटवर्क था।
और फिर 25 जुलाई की दोपहर ढलते धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर आई।
जिस इस्तीफे को कुछ दिन पहले तक सरकार के पीछे हटने की लगभग असंभव शर्त माना जा रहा था, वही खबर अचानक जंतर मंतर पर मौजूद हर मोबाइल फोन में चमक रही थी। कहीं फिल्मी गाने बज रहे थे, कहीं मीम बन रहे थे, कहीं लोग चिल्ला रहे थे और कहीं बस एक मासूम-सी हँसी थी कि सरकार से गलती मनवाई जा सकती है। उसी दिन जंतर मंतर पर उमड़ी खुशी और इसके बाद प्रदर्शनकारियों के हटने की प्रक्रिया शुरू हुई; आंदोलन के चुनिंदा प्रतिनिधियों ने भी सरकार द्वारा उनकी माँगें स्वीकार किए जाने के बाद आंदोलन वापस लेने की घोषणा की।
इस आंदोलन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि इसलिए शायद केवल एक मंत्री का इस्तीफा नहीं है। उसने उस धारणा में दरार डाली कि वर्तमान सरकार सार्वजनिक दबाव के सामने कभी पीछे नहीं हटती। पीछे हटती है तो चुनावी मौसम के आसार देखकर या फिर 40 करोड़ “नए” वोटर्स को देखकर। जिसने शिक्षा, परीक्षा, भर्ती और रोजगार जैसे प्रश्नों को तकनीकी प्रशासनिक समस्याओं से निकालकर सीधे राजनीतिक जवाबदेही के प्रश्न में बदल दिया।
15 साल विज्ञापनों की दुनिया में छाए रहने के बाद नरेंद्र मोदी युवाओं से बात करने इंस्टाग्राम पर आधी रात में आए और ओल्ड स्कूल अंकल की तरह बतियाने लगे। जबकि इससे पहले उन्होंने ना किसानो से बात की, ना मुसलमानों से. बल्कि सरकार तो यहाँ तक कह गई कि बिना मुसलमानों के ही जीतते रहेंगे।
और शायद इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि आंदोलन ने अपनी संभावित अगली यात्रा की झलक दे दी।
क्या यह ऊर्जा केवल दिल्ली और बड़े शहरों तक सीमित रहेगी, या छोटे कस्बों और परीक्षा-केंद्रित सामाजिक दुनिया तक फैलती जाएगी?
क्या यह पीढ़ी अपनी डिजिटल भाषा को टिकाऊ राजनीतिक संगठन में बदल पाएगी ?

क्या मीम किसी संस्था का विकल्प बन सकता है या वह केवल संस्था तक पहुँचने का नया रास्ता है ?
क्या नेतृत्वविहीन और विकेन्द्रीकृत आंदोलन अपनी आंतरिक हिंसा, गाली, गलत सूचना और जवाबदेही की समस्याओं से निपटने की क्षमता विकसित कर सकता है ?
और सबसे बढ़कर—जब युवा राज्य से संवाद, उत्तर और सुधार माँगते हैं, तो उन्हें बैरिकेड, आँसू गैस, पैलेट और लाठी से क्यों जवाब दिया जाता है ?
20 जुलाई की शाम घायल और स्तब्ध युवा फिर जंतर मंतर लौट आए थे—कुछ समूहों में, कुछ अकेले। किसी के सिर पर पट्टी थी, किसी की टाँग पर गहरे घाव थे, कोई चुप बैठा था और कोई फिर कैमरा खोलकर बोलने लगा था।
पाँच दिन बाद उसी जगह वे एक मंत्री का इस्तीफा अपने मोबाइल फोन पर पढ़ रहे थे।
शायद इसी छोटे-से अंतराल में इस आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक अर्थ छिपा है; मार खाने और अपनी बात मनवाने के बीच की दूरी इस पीढ़ी ने पहली बार अपने अनुभव से नापी है।
यह लौटना केवल प्रदर्शन स्थल पर वापसी नहीं था।
यह अपने आप में एक राजनीतिक वक्तव्य था।
चोटें दिखाई दे रही थीं।
जवाबदेही अभी अधूरी थी।
लेकिन शायद पहली बार इस पीढ़ी को यह भी दिखाई दिया कि दबाव बनाने से सत्ता पीछे हट सकती है।
सवाल अब भी वहीं खड़े हैं लेकिन उन्हें पूछने वाली आबादी अब पहले जैसी नहीं रही।
लेख में शामिल सभी तस्वीरें – सौरभ कुमार
संदर्भ –https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2246237®=48&lang=2
https://thediplomat.com/2026/07/who-is-responsible-for-the-june-20-police-brutalities-in-new-delhi/?
https://www.youtube.com/watch?v=DFXCVbc9GQU
https://youtu.be/v492bcQ5ibs?si=KMNV-MQWsH7RUq8Z
chrome-extension://efaidnbmnnnibpcajpcglclefindmkaj/https://arxiv.org/pdf/2104.13259
chrome-extension://efaidnbmnnnibpcajpcglclefindmkaj/https://arxiv.org/pdf/2102.10531
https://www.investing.com/news/world-news/two-decades-of-mass-protests-in-india-4809205?
https://www.thequint.com/news/india/before-kanhaiya-came-chandu-a-jnu-president-killed-19-years-ago?
Documentary film – Ek Minute ka Moun by Ajay Bharadwaj
https://www.thequint.com/news/india/before-kanhaiya-came-chandu-a-jnu-president-killed-19-years-ago?
https://www.hrw.org/news/2022/02/21/india-biased-investigations-2-years-after-delhi-riot?

