अक्तूबर 2023 से लेकर अबतक दस साल के छोटे-छोटे 20,000 से ज्यादा बच्चों की इज़राइली सुरक्षा-बल द्वारा की गयी हत्या को एक स्वतंत्र जाँच दल के अध्यक्ष ने उन्हें ‘आतंकी’ बता कर मार डाला जाना बताया है; वह कहते हैं कि उनकी योजना है कि महिलाओं को कुपोषित करके, नवजात शिशुओं को इन्क्यूबेटर से महरूम करके और स्कूलों को तबाह करके फिलिस्तीनी जनता की जैविक एवं सामाजिक निरंतरता को अवरुद्ध किया जाना सुनिश्चित कर दिया जाय
‘द हिन्दू’ के कृष्णदास राजगोपाल द्वारा किया गया न्यायमूर्ति एस0 मुरलीधर का साक्षात्कार
इज़राइल द्वारा अधिग्रहीत पूर्वी येरुशलम समेत समस्त फिलिस्तीनी भूक्षेत्र में बच्चों पर ढाये जा रहे जुल्मों की स्वतंत्र जाँच के लिये संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा गठित अन्तर्राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एस0 मुरलीधर ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है। इस रिपोर्ट में 7 अक्तूबर 2023 को हमास द्वारा की गयी गोलीबारी से लेकर अब तक कम से कम 20,179 मृत और 44,143 घायल बच्चों का विस्तृत विवरण है।
ओडिशा उच्च-न्यायालय के पूर्व मुख्य-न्यायाधीश और उच्चतम-न्यायालय के इस अधिवक्ता सर्वाधिक संवेदनशील फिलिस्तीनी अवाम-महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर क्रमबद्ध ढंग से ढाये गये जुल्मों का वर्णन करते हैं। इसी साक्षात्कार का किंचित संपादित अंशः
महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को विशेष रूप से निशाना बनाये जाने के मूल कारण क्या हैं?
मौजूदा कलह की जड़ें 1947 के उस द्विराष्ट्रीय ढाँचे में हैं जिसका फिलिस्तीनी विरोध करते हैं क्योंकि इसके सम्बन्ध में उनसे कभी बात ही नहीं की गयी थी। नाबका और यौम-किप्पुर युद्ध के फलस्वरूप इज़राइल ने अपने अधिकार-क्षेत्र में लगातार विस्तार किया है। इसके अलावा इज़राइल का सपना संयुक्त राष्ट्र संघ के संकल्प के बरखि़लाफ़ है, वह इस आधार-वाक्य पर काम करता है कि जिन इलाकों पर उसक कब्ज़ा हो जाता है उनसे हटने के लिये उससे नहीं कहा जा सकता। इस आयोग के कार्यक्षेत्र में फिलिस्तीन का अधिकृत-क्षेत्र और इज़राइल दोनों में इन गहन संवेदनशील मसलों की जड़ों की तलाश करना शामिल था। इनमें से कुछ की जड़ें ढूँढते हुये हमें पुरातन-काल में जाना पड़ता है।
क्या बच्चों को उपलब्ध संरक्षित-स्थिति खत्म करके उन्हें एक सुचिन्तित जंग का हथियार बना दिया गया है?
दस साल के बच्चे को भी ‘आतंकी’ बना दिया गया है। इससे उनके सारे अधिकार छिन गये हैं। उन्हें ‘खेल-खिलौनों’ और ‘चाँदमारी के निशानों’ में तब्दील कर दिया गया हैै। इज़राइली सिपाही उन्हें देखते ही गोली मार देते हैं और अपने इस कृत्य का औचित्य स्पष्ट करते हुये बताते हैं कि उन्होंने किसी बच्चे को नहीं वरन एक आतंकी को मार गिराया है।
किस विन्दु पर पहुँचकर मानवता के विरुद्ध किया गया यह अपराध सुविचारित नस्लकुशी में बदल जाता है?
नस्लकुशी में किसी एक समूह के ‘सुविचारित-विनाश’ का उद्देश्य सन्निहित होता है। आयोग की 2025 की रिपोर्ट में फिलिस्तीनियों को उनकी जमीन, संसाधनों और सांस्कृतिक जड़ों से महरूम किये जाने के उद्देश्य से लगातार किये जाने वाले हमलों का वर्णन है। अब निशाना बनाकर बच्चों की हत्या किये जाने से फिलिस्तीनी लोगों की जैविक एवं सामाजिक निरंतरता को समाप्त कर दिये जाने की मंशा सुनिश्चित की जाती है। इस रणनीति में गर्भवती महिलाओं को निशाना बनाया जाना, उन्हें कुपोषित रखना और नवजात शिशुओं को इन्क्यूबेटर से वंचित कर दिया जाना भी शामिल है। 97 प्रतिशत स्कूलों को ढहा देने और क्वाडकाॅप्टर्स, स्नाइपर्स और ड्रोन्स से सुचिह्नित हमलों से यह मानने की पर्याप्त वज़ह मिल जाती है कि निशाना बना कर बच्चों की हत्या किया जाना नस्लकुशी के किसी बड़े मंसूबे का ही हिस्सा है।
इज़राइल के सम्पूर्ण असहयोग के मद्देनज़र इस आयोग ने, यह सत्यापित करने के लिये, कि इस रिपोर्ट में अंकित विवरण विधिक रूप से पूर्णतः अकाट्य हैं, किन मानकों की सहायता ली है?
हमने केवल स्वतंत्र स्रोतों से प्राप्त संपुष्ट प्रमाणों का उपयोग किया है। यदि कोई बच्चा बताता है कि इज़राइली जेलों में उसके साथ कैसा व्यवहार हुआ था, तो हमने जेल में उसकी उपस्थिति स्थापित करने के लिये फोरेन्सिक तरीकों का इस्तेमाल किया। हमने स्वास्थ्य-सेवकों, पत्रकारों और पीड़ितों के बयान दर्ज किये। हमने इज़राइली सिपाहियों द्वारा सोशल मीडिया में डाली गयी तस्वीरों, मेडिकल-रिपोर्टों और फुटेजेज़ का विश्लेषण किया। मार्के की बात यह है कि अपने 18 पृष्ठों के खंडन में इज़राइल ने किसी भी प्रमाण पर कोई विवाद नहीं खड़ा किया है।
इस रिपोर्ट में इज़राइली सैन्य इकाइयों का नाम स्पष्ट रूप से लिया गया है। क्या यह भविष्य में उसे अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध-अपराधों के अन्तर्गत आरोपी बनाने के लिये आधारभूत ढाँचा है?
ऐसा होना ही चाहिये। जवाबदेही तय करने की कार्यवाही कभी ठीक तरीके से नहीं की जाती, इसलिये हमने दायित्व तय करने में मददगार सबूतों को विशेष रूप से चिह्नित किया है। अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन समेत 16 से 17 देशों के नागरिक आई0डी0एफ0 ( इज़राइल डिफेन्स फोर्स) में अपनी सेवायें दे रहे हैं। विभिन्न समझौतों में शामिल राष्ट्रों के नागरिक यदि किसी युद्ध-अपराध में संलिप्त हों ‘अन्तर्राष्ट्रीय विधि’ का इस्तेमाल करते हुये उनकी जाँच करवाना उन राष्ट्रों के लिये अनिवार्य है, चाहे वह अपराध किसी भी जगह हुुआ हो।
तकनीक-चालित जंग और कत्लेआम की हक़ीक़त के बीच मनोवैज्ञानिक-पृथक्करण को अन्तर्राष्ट्रीय-विधि किस प्रकार सम्बोधित करता है?
अन्तर्राष्ट्रीय-विधि इसकी व्याख्या इस प्रकार करता हैः जब किसी सिपाही को पता होता है कि ‘क्वाडकाॅप्टर न तो कभी हिचकिचाता है, न रुकता है और लगभग कभी चूकता नहीं’ तो इस कार्यवाही की तुलना किसी वीडियो-गेम से करने का नतीजा भी उसे अच्छी तरह पता होता है। किसी हथियार का इस्तेमाल अधिक से अधिक क्षति पहुँचाने के लिये किया जाना भी अन्तर्राष्ट्रीय-विधि में स्वीकार्य है, इसमें किसी प्रकार के संशोधन की गुंजाइश नहीं है। मूलभूत आवश्यकता इस बात को ध्यान में रखने की है कि उससे होनेवाली क्षति का परिमाण क्या है, और यहीं इस तथ्य को भी ध्यान मंे रखना चाहिये कि वे बच्चों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं।
क्या यह सिपाहियों में निजी अनुशासन का पतन है या यह कोई विचारधारा है जिसका प्रवाह सीधे नेसेट (इज़राइली संसद) से नीचे उतर रहा है?
7 अक्तूबर 2023 के दो दिन बाद नेसेट के डिप्टी स्पीकर ने सोशल मीडिया पर ‘‘इरेज ग़ज़ा’’ पोस्ट किया था। खुलेआम की गयी यह कार्यवाही उन सिपाहियों को उपलब्ध ‘दंड से सम्पूर्ण सुरक्षा (इम्यूनिटी)’ का ही प्रदर्शन करती है। अन्तर्राष्ट्रीय-विधिक प्रक्रिया के लिये यह परीक्षा की घड़ी है।
क्या इज़राइली न्यायपालिका ने अपनी सेना का बचाव करने के लिये अपनी स्वतंत्रता को पूरी तरह तिलांजलि दे दी है?
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इज़राइली न्यायपालिका इस पूरे प्रकरण में हो रहे अन्याय की अनदेखी कर रही है। किसी अपहृत बच्चे का ‘प्रत्यक्षीकरण’ एक मूलभूत समाधान होता है। यदि वही उपलब्ध नहीं है तो हमारे पास सही मायनों में कोई न्याय-पद्धति ही नहीं है। इसीलिये जरूरत है एक सक्षम, सक्रिय अन्तर्राष्ट्रीय विधि-व्यवस्था की। अन्तर्राष्ट्रीय आपरााधिक न्यायालय का आधार ही है कि यदि कोई देश लोगों के प्रति न्याय नहीं कर पा रहा है या न्याय करने में हीला-हवाली कर रहा है तो उसे न्याय के दरवाजे तक लाया जा सके। और यहाँ ये दोनों ही तथ्य मौजूद हैं।
इज़राइल ने इस आयोग के निष्कर्ष को संस्थागत पूर्वाग्रह बता कर खारिज़ कर दिया है। इसपर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
हाँलाकि हमें इज़राइली नागरिकों और सैनिकों से बात करनी चाहिये थी पर इज़राइल ने ऐसा होने नहीं दिया। हम तो एक खोजी संस्था हैं और इज़राइल जो भी सामग्री उपलब्ध कराता उसका संज्ञान लेने के लिये हम तैयार होते। सच को उजागर करने के अलावा हमारा दूसरा कोई कार्यवृत्त नहीं था।
क्या वास्तव में आपकी सिफारिशों में कोई वास्तविक-शक्ति है या उन्हें पश्चिमी सदस्यों द्वारा बड़ी आसानी से दरकिनार कर दिया जायेगा?
मुझे उम्मीद है कि उनकी अनदेखी नहीं की जायगी। हमने अपनी रिपोर्ट सुरक्षा-परिषद, यूरोपीय-संघ और राजदूतों के समक्ष प्रस्तुत कर दी है। इस प्रकार की कोई रिपोर्ट विवेचकों को सामाजिक मामलों में अपना पक्ष रखने के लिये उद्वेलित करती है जिसका अन्तिम परिणाम होता है सरकार द्वारा अपने रवैये का बदला जाना।
‘द हिन्दू’ दिनांक 01-07-2026 से साभार
अनुवादः दिनेश अस्थाना

