जीवन को एक कार्निवल के रूप में देखने वाला कवि कुँवर नारायण

  कमोबेश दो शताब्दियों की सीमा-रेखा को छूने वाली कुँवर नारायण की रचना-यात्रा छह दशकों से भी अधिक समय तक व्याप्त रही है। उनका पूरा लेखन आधुनिक हिंदी कविता के उत्कर्ष का पर्याय है। अपने सारभूत रूप में उनकी कविताएँ जीवन और मृत्यु से जुड़ी चिंताओं, राजनीति और संस्कृति की विसंगतियों, मानवीयता और नैतिकता की समयानुकूल अनिवार्यताओं, मिथक और इतिहास की सर्जनात्मक संभावनाओं, व्यक्ति-परिवार-समाज के बीच सापेक्षिक संबंधों को लेकर लगातार मुखर रही हैं और जहाँ कहीं भी जरूरत हुई, उन्हें प्रश्नांकित करती रही हैं। उनकी कविताओं और चिंतन में…

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आत्म-अलगाव (एलिअनेशन) का प्रश्न और मुक्तिबोध

( गजानन माधव मुक्तिबोध (जन्म : 13 नवंबर 1917-मृत्यु :11 सितंबर 1964) हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, आलोचक, निबंधकार, कहानीकार तथा उपन्यासकार रहे हैं . प्रस्तुत लेख समकालीन जनमत पत्रिका के प्रधान संपादक राम जी राय द्वारा लिखे जा रहे आलेख का सम्पादित अंश है.) क्या मुक्तिबोध आत्मनिर्वासन (सेल्फ़ एलिअनेशन) की समस्या को आाधुनिक मानव जीवन की केंद्रीय समस्या के रूप में देखते हैं? आचार्य नामवर सिंह ऐसा मानते हैं लेकिन आत्मनिर्वासन को आत्म विभाजन और फिर अस्मिता का लोप ठहराते हुए उसे अपने समय के चालू अस्तित्ववादी मुहावरे में…

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