आक्रोश और साहित्य: बजरंग बिहारी तिवारी

आक्रोश पुराना शब्द है| पाणिनि के यहाँ (अष्टाध्यायी, 6.3.21) इसका प्रयोग मिलता है- ‘षष्ठया आक्रोशे’| इसका आशय है कि यदि भर्त्सना का भाव हो तो षष्ठी तत्पुरुष समास करने में विभक्ति का लोप नहीं होता| आक्रोश गम्यमान हो तो उत्तरपद रहते षष्ठी विभक्ति का अलुक् होता है जैसे ‘चौरस्य कुलम्’ चोर का खानदान, और अगर आक्रोश गम्यमान न होकर प्रतीत हो अर्थात् सामान्य अर्थ में हो तो अलुक् नहीं होता जैसे ‘ब्राह्मण कुलम्’| पुराने कोशों में ‘नामलिंगानुशासन’ जिसका प्रचलित नाम ‘अमरकोश’ है में आक्रोश दोष देने के अर्थ में है…

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