फ़िल्म स्क्रीनिंग में कब हँसते और चुप होते हैं लोग

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सितम्बर महीने में रिलीज़ हुई दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘अपनी धुन में कबूतरी’ धीरे –धीरे हिट होती जा रही है. 20 दिन से कम के अंतराल में इसकी तीन शहरों में तीन सफल स्क्रीनिंगें हुईं. 2 अक्टूबर को रुद्रपुर शहर के नवरंग रेस्तरां में हुई शानदार स्क्रीनिंग से फ़िल्म स्क्रीनिंग के बारे में कुछ नए निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं.

मुख्यधारा के पैसा कमाऊ सिनेमा के विपरीत दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘अपनी धुन में कबूतरी’ कई लोगों के सहयोग से निर्मित हुई है इसलिए इसके बनने और फिर दिखाने में मुनाफ़े को बढ़ाने की बजाय विषय को लोगों तक जाने की मंशा अधिक है. इसलिए यह फ़िल्म तेजी से उन जगहों पर भी पहुँच जा पा रही है जहां व्यावसायिक तरीके से चल रहे सिनेमा हाल नहीं हैं. ऐसी जगहों पर फिर उन समूहों के साथ फ़िल्म टीम की मैचिंग हो रही हैं जो खुद भी मनोरंजन को मुनाफ़े की कड़ी न मानते हुए सामाजिक सौहार्द के पुल के रूप में देखते हैं. रुद्रपुर में भी जब नवरंग रेस्तरां के हाल को 2 अक्टूबर की दुपहर को सिनेमा हाल में बदला जा रहा था तो यही बात लागू हो रही थी. यहाँ रुद्रपुर के सांस्कृतिक संगठन ‘क्रिएटिव उत्तराखंड’ के महत्व को समझाना जरुरी है. साल 2005 में शुरू हुआ यह समूह अपने निरंतर प्रयासों से शहर की सांस्कृतिक छवि को बदलने में सफल रहा है. ‘क्रिएटिव उत्तराखंड’ ने अपनी सांस्कृतिक यात्रा में महत्वपूर्ण निर्णय लेते दो साल पहले रुद्रपुर शहर के एक सरकारी स्कूल के कैंपस में एक लाइब्रेरी की शुरुआत की. लाइब्रेरी इनके नियमित बैठने का अड्डा और ऑफिस भी है. लाइब्रेरी को संचालित करने के अलावा ये साल भर कुछ न कुछ गतिविधियां करते रहते हैं जिसकी वजह से ‘अपनी धुन में कबूतरी’ की स्क्रीनिंग के समय शाम 4 बजते –बजते हाल में रखी 70 कुर्सियां पूरी तरह भर चुकी थीं और किसी तरह 30 कुर्सियां और अटाई गयीं. जो हाल आमतौर पर किटी पार्टी, बड्डे पार्टी और शादी की सालगिरह पार्टियों से ही गुलजार रहता था वहां 2 की शाम को नए सिनेमा का जलवा था. आयोजकों को यह हाल भी इसलिए मुफ्त मिला क्योंकि यहाँ के युवा मालिक मनीष और विनीत ने ‘क्रिएटिव उत्तराखंड’ द्वारा पिछले महीने आयोजित शेखर जोशी की कहानी पर आधारित एकल नाट्य प्रस्तुति ‘गोपुली बुबू’ से बेहद प्रभावित थे और इस कारण इस संस्था को अपना सहयोग देना चाहते थे. इसी सहयोग की वजह से नए सिनेमा के दर्शकों को दस्तावेज़ी सिनेमा की बहस के साथ गर्म चाय और नाश्ते का मजा भी मिला.

इस तरह जब 2 अक्टूबर की शाम को औपचारिक परिचय के बाद जब फ़िल्म की स्क्रीनिंग शुरू हुई तो दर्शक एक नए अनुभव के लिए तैयार हो चुके थे.

 

मेरे लिए स्क्रीनिंग के दौरान दर्शकों के हाव –भाव और उनकी प्रतिक्रियाओं को समझना फ़िल्म की गुणवत्ता को समझने के लिए लिटमस टेस्ट सरीखा होता है. इस फ़िल्म को रुद्रपुर के दर्शकों ने भी पसंद किया यह इस बात से पता चला क्योंकि स्क्रीनिंग के पूरे 41 मिनट के दौरान एक बार भी फोन न बजा बल्कि एक बार फोन की घंटी हल्का सा बजने पर लोगों ने तुरंत फोन बंद करने का दवाब भी बनाया. ‘अपनी धुन में कबूतरी’ की कहानी गरीबी में पली बढ़ी कुमाउनी लोक गायिका कबूतरी देवी के जीवन संघर्ष की कहानी है जिसमे बीच –बीच में उनकी गायकी की लाइव और अभिलेखीय रिकार्डिंग भी सुनने को मिलती है. इस 41 मिनट की फ़िल्म में आये कुमाउनी अंशों के हिंदी में सबटाइटल दिए हैं. इस वजह से हाल में बैठे गैर कुमाउनी दर्शकों ने भी फ़िल्म का पूरा आनंद लिया. पूरी फ़िल्म के दौरान पांच –छः बार दर्शकों ने ठहाके लगाये. समवेत स्वर में लगे ठहाकों से फ़िल्म देखने का मजा कई गुना बढ़ जाता है. कोई संजीदा विश्लेषक बार –बार लगे इन ठहाकों से दर्शकों की समझ पर शक कर सकता है जबकि ऐसा है नहीं. इस फ़िल्म के दौरान ठहाके तब –तब लगे जब-जब कबूतरी जी अपनी विसंगतियों या उनसे उपजे व्यंग को व्यक्त कर रहीं थीं. जैसे सबसे पहले जब उन्होंने बचपन में हुई अपनी शादी की बात करी और इसकी विसंगति को तल्खी के साथ व्यक्त किया और खुद भी अपने ऊपर हंसी तो लोग भी हंस पड़े. दूसरा मौका तब आया जब वो अपने पति के साथ अपने रिश्ते की बात बता रहीं थीं और इसी क्रम में उन्होंने बताया कि कैसे एक बार वे इस बात पर अड़ गयीं कि नेताजी (उनके पति का लोकप्रिय संबोधन) जब तक उन्हें 2000 रुपये नहीं देंगे वो गाने का प्रोग्राम नहीं करेंगी. उनके इस साहस पर भी लोग हँसे. फ़िल्म के अंत के करीब जब निर्देशक ने नए लिखे जा रहे गानों और उसकी नानी द्वारा गाये गानों के बारे में उनके नाती से बात करी तब भी ठहाके लगे. नाती की यह बात कि अब के गाने दिल को नहीं तन को हिलाते हैं जबकि उसकी नानी के गाये गाने मन को हिलाते थे, लोगों के मन के अन्दर तक पैठ कर गयी थी. ऐसा ही एक मौका तब बना जब कबूतरी जी ने अपने समय के पति –पत्नी के संबंधों पर चुटीली टिप्पणियां कीं.

असल में दर्शकों का समवेत स्वर में जोर से ठहाके लगाना विसंगतियों से उपजा हास्य ही है जिसको लगाकर दर्शक एक तरह से कबूतरी जी के साथ अपनी साझेदारी ही दिखा रहे थे. ऐसा भी मौका कई बार आया जब ठहाके नहीं बल्कि हाल में पसरी चुप्पी थी और यह भी दर्शकों की अपने कलाकार के साथ साझेदारी को व्यक्त कर रही थी.

 

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