चित्तप्रसाद का 1940 में बनाया गया ‘ जलियांवाला बाग ’ हत्याकांड पर एक दुर्लभ चित्र

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इस चित्र को क्रूर औपनिवेशिक शासन के विरोध में एक मुक्तिकामी चित्रकार के साहसिक कला कर्म के रूप देखा जाना चाहिए. साथ ही यह सुदूर पंजाब की इस घटना पर पूर्वी बंगाल के चटगाँव के एक युवा चित्रकार के सही अर्थों में प्रादेशिकता की संकीर्णता से परे जाकर शोषितों के ‘चित्रकार’ की बनने की प्रक्रिया का एक अहम् चित्र भी है.

अपनी कला यात्रा में , बाद के दौर में चित्तप्रसाद ने महाराष्ट् , तमिलनाडु , आंध्र प्रदेश , कश्मीर और बंगाल आदि प्रांतों की जनता और उनके सुख-दुःख को अपने चित्रों में स्थान देते हुए सही अर्थों में जनता के चित्रकार के रूप में अपना दायित्त्व निभाया.

क्या ‘ प्रगतिशील’ चित्रकार कहलाने का सरकारी तमगा लगाए करोड़ों का धंधा करने वाले, चित्तप्रसाद के समकालीन चित्रकारों में किसी ने भी इस दायित्त्व को समझने की कभी कोशिश भी की ?

प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट एसोसिएशन के प्रमुख चित्रकार फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा ने संस्था की पहली प्रदर्शनी के इश्तेहार में कहा था “I do not quite understand no, why we still call our Group “Progressive.” Not that the most retrogressive institutions call themselves so, but we have changed all the chauvinist ideas and the leftist fanaticism which we had incorporated in our manifesto at the inception of the Group.  Today we paint with absolute freedom for content and techniques almost anarchic ; same that we are govern by one or two elemental and eternal laws of aesthetics order, plastic coordination and colour composition . We have  no pretensions of making rapid revival of any school or movement in art . We have studied the various schools of paintings an sculptures  to arrive at a vigorous synthesis. We found this in the course of working an impossibility…the gulf between the so-called people and the artists cannot be bridged.

इस जन विरोधी बयान देने वाले सूज़ा और उनके लगभग सभी साथी आज़ादी के तुरंत बाद विदेश रहने चले गए और वहीं रह कर ‘ आधुनिक भारतीय चित्रकला ‘ को गुमराह करने में पूरी जिंदगी लगा दी. इन चित्रकारों के ऐसे प्रयास को सरकारी अकादमियों , सरकारी कला संग्रहालयों के साथ साथ कला-सट्टेबाज़ों ने कंधे से कन्धा मिला कर साथ दिया. इसलिए हमें यह जान कर आश्चर्य नहीं होता कि आज  भारतीय कला बाज़ार के नब्बे प्रतिशत से ज्यादा का धंधा इन्ही आठ दस कलाकारों के जरिये ही हो रहा है.

हमें  बाज़ार के ऐसे आईपीएल जैसे सट्टे बाज़ी से कोई लेना देना नहीं है पर  चित्तप्रसाद, जैनुल आबेदिन, कमरुल हसन, सोमनाथ होर , भाऊ समर्थ आदि चित्रकारों को भुला कर ‘ प्रगतिशील चित्रकार ‘ शब्द को अपने स्वार्थ में मनमाने ढंग से व्याख्यायित करने वाले धंधे बाज़ों की ऐसी साज़िशों के खिलाफ खड़े होना क्या हमारा एक जरूरी दायित्त्व नहीं है ?

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