मानसा में सखी सुल्तान

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इस 23 मार्च को पंजाब के मानसा कस्बे में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की तीन ख़ूबसूरत मूर्तियों का अनावरण किया गया. अनावरण  भाकपा माले महासचिव कॉमरेड दीपांकर भट्टाचार्य के हाथों हुआ. इसी के साथ माले के पांच दिन चलने वाले राष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत हुई लेकिन यह आलेख सम्मेलन के बारे में नहीं है.

ऊंची टँकी वाले जिस छोटे-से साफ सुथरे पार्क में ये मूर्तियां स्थापित हैं, वहां से एक ऊबड़-खाबड़ सी सड़क घूम कर गेहूं की कच्ची फसलों के लहराते समंदर के किनारे स्थित सम्मेलन-स्थल की तरफ़ जाने वाले हाइवे की ओर निकलती है. इस सड़क पर हाइवे से कोई पचास मीटर पहले बायीं ओर गुम्बद वाली एक ऊँची-सी इमारत है, जो सिर्फ़  सादगी के कारण ध्यान खींचती है.
एक नज़र में तय करना मुश्किल होता है कि यह कोई दरगाह है, मस्ज़िद है, गुरुद्वारा है या मंदिर है. बाहर कुछ लिखा जरूर है, लेकिन पंजाबी लिपि न जानने वाले पढ़ नहीं सकते. अंकों में लिखा 786 जरूर पढ़ा जा सकता है. मगर खुले दरवाज़े से झांको तो हिन्दू देवमूर्तियों की कई झाँकियाँ दीख पड़ती हैं.
सुबह की टहल करते हुए मेरी नज़र इस इमारत पर पड़ी. चंद लोगों का आना जाना शुरू हो गया था. ये सभी आसपास के गरीब या निम्नमध्यवर्गी किसान और मजदूर लोग थे. यह सब तब पता चला जब मैं उत्सुकतावश इमारत के खुले दरवाज़े को पार कर भीतर के अहाते में पहुंचा और कुछ लोगों से बातचीत हुई.
भीतर का नज़ारा अद्भूत था। भीतर बेहद खुला हुआ साफ सुथरा सहन था, जिसमें एक ओर एक पूरी कतार विभिन्न देवी देवताओं की झांकियों की थी. इनमें काली की कई छवियाँ थीं जिनमें एक घोड़े पर सवार थी. एक पंच महादेव थे, जिनमें गणेश और हनुमान को तो मैंने आसानी से पहचान लिया लेकिन एक अन्य मूंछोवाला चेहरा किसका था, यह न जान सका. क्या स्वयं भगवान राम थे ?
दूसरी ओर अलग कोनों में कई मज़ारें थीं. इनमें से एक पर पीर लखदाता बाबा का नाम लिखा हुआ था. टूटीफूटी हिंदी में मुझे बताया गया कि इनकी बड़ी मान्यता है. दूसरी मज़ारों पर कुछ और नाम लिखे थे, जिनमें से कुछ ,मुझे बाद में गूगल से पता चला, कि लखदाता बाबा के ही दूसरे नाम हैं. जैसे सखी सुल्तान और पीर लालनवाला. पता चला कि पंजाब के दोनों टुकड़ों में पीर लखदाता के करोड़ो मुरीद हैं, जिनमें मुसलमान, हिन्दू और सिख बराबरी से शरीक़ हैं. इस त्रिवेणी संस्कृति  को इस दरगाह के अहाते में मैं धड़कता हुआ देख रहा था.
रामनवमी का त्यौहार भी अभी गुजरा था. बंगाल और बिहार से विचलित करने वाली खबरें लगातार आ रही थीं. एक के बाद एक भाईचारे के लिए मशहूर हमारे शहर दंगाई आग के हवाले किए जा रहे थे. ऐसा लगता था जैसे हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे के खून की प्यासी दो कौमें हैं, जो एक दूसरे को तबाह करने के लिए ही पैदा हुई हैं. ठीक ऐसे समय पंजाब के इस कोने में हिन्दू मूर्तियों और मुस्लिम मज़ारों के बीच एक छत के नीचे खड़ा होना एक अजीब अहसास था.
पीर लखदाता, सखी सुल्तान या सखी सरवर की मूल दरगाह पाकिस्तान के डेरा गाज़ी खान में है. मार्च अप्रैल में यहां हर साल विराट उर्स होता है, जिसमें सीमा के आर पार से लाखों लोग तमाम दुश्वारियों और दिक़्क़तों के बावजूद शामिल होते हैं.
बारहवीं सदी के पीर लखदाता भी अजमेर के सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती की तरह बड़े गरीबनेवाज माने गए हैं. सूफियों का एक ही सन्देश था- इंसान से मुहब्बत करो. गरीबों की मदद करो. हर एक इंसान अल्ला मियाँ के नूर से लबरेज़ है, इसलिए किसी एक की भी बेक़दरी करना अल्लाह की बेक़दरी है.
सूफी मत का उदय भले ही अरब की धरती पर इस्लाम भीतर से हुआ हो, लेकिन बहार इसे भारत की धरती पर मिली. यह भारत की मिट्टी में रच-बस गया और ख़ूब फला फूला. इसने मजहबों, धर्मों, आस्थाओं की दीवारें तो गिराई ही, वर्ग और जेंडर की खाइयों को भी मिटा डाला. भारत की चारो दिशाओं में हिन्दू मतपद्धतियों को भक्ति की विभिन्न धाराओं से सराबोर करता सूफीमत भारत का आध्यात्मिक अवचेतन बन गया.
यही वो बात थी, जिससे हमारी हस्ती मिटाए न मिटती थी. यह अकारण नहीं है कि अंग्रेजों के आने के पहले, बक़ौल इतिहासकार हरबंस मुखिया, भारत वर्ष में साम्प्रदायिक दंगे का एक भी उदाहरण नहीं मिलता.
भारत सूफी देश है. दंगाई धार्मिकता भारत की परंपरा नहीं, अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद की सौगात है. एक सूफी देश को बर्बर दंगाई देश में बदलते देखना आसान काम नहीं है।
यही सब सोचता सड़क पर आ निकला. सामने दीवार पर भाकपा माले के सम्मेलन की इबारत लिखी थी- फ़ासीवाद को हराओ/ जनता का भारत बनाओ.

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