आम बजट : खुशफहमियों से भरा पिटारा

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इस चुनावी बजट में खुश होने की कई वजहें हैं पर क्या वे कारण इतने ठोस और विश्वसनीय भी हैं

 

संजय श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार

आम बजट के बारे में खास बात यह है कि यह सालाना सरकारी संस्कार और अनिवार्य आर्थिक अनुष्ठान है. यह आर्थिक दस्तावेज ही नहीं राजनीतिक साहित्य भी है. बजट भी राजनीति का दर्पण होता है जैसे सहित्य समाज का. सियासी तकाजे और चाह इसका चरित्र हर साल बदल देते हैं. कभी यह सख्त होता है तो कभी वायवीय. इसकोको सही सही बांचना हमेशा से कठिन होता है क्योंकि इसमें “बिटविन द लाइंस” बहुत होती है, जो अंकड़े पेश किये जाते हैं उनका घोर सरकारीकरण किया जा चुका होता है. पिछली बार सरकार ने अपने बजट को सबके सपनों का बजट बताया था, इस बार प्रधानमंत्री कहते हैं कि यह किसानों, गरीबों, वंचितों का बजट है. अब या तो पिछले बजट के सारे सपने चुक गये या फिर यह वर्ग छूट गया जिसको फिर से सपने दिखाने की जरूरत समझी गयी.

सरकार के कार्यकाल के आखीरी साल में आने वाला बजट चुनावी होता है और इसे जनकल्याणकारी, लोकलुभावन जैसे विशेषणों का मुलम्मा चढा कर पेश किया जाता है. यह बजट भी चुनावी है, इस बजट में अगर समर्पण का पन्ना होता तो उसपर लिखा होता मतदाताओं को सादर समर्पित. किसानों को एक तरफ रखें तो महज स्वास्थ्य बीमा और उज्जवला जैसी दो स्कीम से तकरीबन साठ करोड़ मतदाताओं को जो कुल आबादी का 45 फीसदी से अधिक बैठते हैं, लुभाना यही राजनीतिक संदेश देता है.

आजाद भारत में कई चुनावी बजट पेश हो चुके हैं और अनुभव यही है कि इनके प्रावधान अधूरे ही रह जाते हैं. इसी सरकार के पिछले आम बजटों की तुलना करें तो तमाम वादे और आर्थिक लक्ष्य आज तक पूरे नहीं हो सके हैं, फिर यह तो इसी सरकार का चुनावी बजट है. घोषणाओं और योजनाओं की भरमार अपेक्षित ही थी लेकिन उन्हें ठोस रूपरेखा के साथ पेश किया जाता, कुछ महत्वपूर्ण योजनाओं का नतीजा इसी साल निकलता दिखता तो इन्हें इसे उम्मीदों और आकाक्षाओं से परे जाकर देखने की जरूरत नहीं पड़ती. कुछ भी हो, अहले दानिश ने बहुत सोच कर उलझाया है. वित्त मंत्री के नोट और वोट के संतुलन कौशल की तारीफ करनी होगी.

उनके इस खुशफहमी के पिटारे में देश के प्रथम नागरिक महामहिम राष्ट्रपति महोदय से ले कर देश के अंतिम नागरिक तक के लिये, सभी के लिये कुछ न कुछ मौजूद है पर यह कुछ न कुछ में से कुछ भी कब हासिल होगा यह अलग विषय है. शफक,धनुक, महताब घटायें, तारे, नगमें, बिजली, फूल, उस दामन में क्या क्या कुछ हैं, दामन हाथ में आये तो. कबीर होते तो इस बजट को सेमल फूल बताते.

बजट से सबसे अपेक्षा ज्यादा आम आदमी को होती है. वह जो न तो बड़ा किसान या कश्तकार है न ही उद्यमी, उद्योगपति अथवा व्यापारी. यह विविधताओं से भरा मध्य वर्ग है. महंगाई के मारे इस वर्ग की मुराद बस इतनी है कि उसकी आमदनी बढे, बचे. बच्चों की शिक्षा, नौकरी और रोजगार इसकी मुख्य चिंताएं हैं. हर तरह की आर्थिक मार इसी तबके के सिर आती है. यह वर्ग बजट में ठगा हुआ सा महसूस कर रहा है. कमाई से हुई आयकर में कोई छूट नहीं मिली, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य मद में परोक्षत: टैक्स बढ गया.

2014 में जब वित्त मंत्री विपक्ष में थे तब उनकी यह मांग थी कि आयकर सीमा दो लाख से बढ़ाकर पांच लाख कर देनी चाहिए. नौकरीपेशा वर्ग सबसे बड़ा कर दाता है, बीते वित्तीय वर्ष में एक आदमी ने 76,306 रुपये टैक्स जमा किया है. जबकि बिजनेसमैन और व्यक्तिगत बिजनेसमैन तबके का औसत बनता है 25, 753 रुपये जो नौकरीपेशा करदाताओं से काफी कम है. फिर भी रियायत न मिलना इन्हें निराश करता है. जीएसटी लागू होने के बावजूद व्यापारियों द्वारा कर चोरी या उसमें हेराफेरी रुकी नहीं है, बकौल वित्त मंत्री, “व्यवसायियों द्वारा बेहतर कर अनुपालन आचरण प्रदर्शित नहीं किया जा रहा है”, ऐसे में जीएसटी की सफलता का ढोल पीटना और उन्हें राहत देना नौकरीपेशा वर्ग को सालता है. यही हाल नोटबंदी का भी है जिसके फायदों की सूची कर दाताओं की बढी संख्या पर ही खत्म हो जाती है.

आम आदमी के बाद जो देश का सबसे बड़ा और मजबूर वर्ग है वह है सीमांत किसान. शहरी मतदाताओं की पार्टी कही जाने वाली भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल के आखीरी पूर्ण बजट में गांवों का रुख किया है और इस बार कृषि, किसानी और किसानों का ख्याल खास तौर पर रखा है. ग्रामीण क्षेत्र के विकास पर जोर देकर कई उद्‌देश्य साधने की कोशिश की गई है. देश की 65 फीसद आबादी या अधिसंख्य मतदाता खेती किसानी से जुड़ा है. भले ही कृषि क्षेत्र सालाना दो फीसदी से भी कम की वृद्धि कर पा रहा हो पर किसानों की आमदनी दो गुना करने का राग ने द्रुत लय पकड़ ली है. ग्रामीण क्षेत्र की आमदनी बढ़ गई तो दस फीसदी के विकास दर का सपनीला आंकड़ा छुआ जा सकता है. कहने को न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का पुराना वादा पूरा हुआ, अब उन्हें लागत का डेढ गुना दाम मिलेगा. खरीफ फसल से उन्हें 50 फीसदी के मुनाफे की गारंटी है. 22 हजार मंडियों का नेटवर्क बनाने और प्याज, टमाटर व आलू जैसी उपज को बाजार की अस्थिरता से बचाने के लिए 500 करोड़ की ऑपरेशन ग्रीन योजना उनको उत्साहित कर सकती है. पर उनके उनके उत्साह को तब पाला मार सकता है जब यह असलियत सामने आयेगी कि जब यह सब थोथे चने हैं.

रबी की फसल का दाम डेढ गुना मिला इसका कोई प्रमाण नहीं है. खरीफ की किसी भी फसल की आर्थिक और उत्पादन लागत को जोड़ दें और जमीन का किराया तथा किसान की मेहनत को छोड़ दें तो भी सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य से फसल की कुल लागत तकरीबन दो गुना बैठती है. किसानों को उपज का दाम कितना मिलेगा, यह आने वाले दिनों में साफ होगा पर यह तय है कि वह दाम कहीं से भी डेढ गुना नहीं होने वाला. यह महज जुमला ही रहेगा.

स्वास्थ्य के क्षेत्र में इस बजट में बहुत बड़ा कदम उठाया गया है. 10 करोड़ परिवारों को 5 लाख रुपए सालाना का मेडिकल कवर वाकई क्रांतिकारी है. इसके साथ साथ हर तीन संसदीय क्षेत्रों के बीच एक अस्पताल और डेढ़ लाख आरोग्य केंद्र बनाने की योजना और कुछ दूसरी घोषणाएं यह जताती हैं कि वाकई सरकार देश वासियों खास कर गरीबों की सेहत को ले कर गंभीर है. पर उसकी गंभीरता तब आधारहीन साबित हो जाती है जब यह मालूम होता है कि वाकई यह महज घोषणा है. पिछली बार स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए कुल जीडीपी का 1.4 फीसदी हिस्सा आवंटित किया गया था, जो इस साल घटाकर 1.13 प्रतिशत है.फिलहाल सरकारी स्तर पर तमाम बीमा योजनाएं लागू हैं उनका क्या हश्र है यह छोड़ भी दें तो इस नयी स्वास्थ्य बीमा योजना पर इस साल कोई काम संभव नहीं है क्योंकि इसकी कोई पूर्व रूप रेखा ही नहीं है. यही नहीं पता कि यह सेवा कैसे अमल में आयेगी, इसका भारी भरकम किश्त कौन अदा करेगा. बीमा कंपनियां तो सरकार से पैसा लेती रहेंगी पर दस करोड़ परिवार इस का उपयोग कर पाएंगे, इसमें संदेह है.

कुल स्वास्थ्य बजट ही 52000 करोड़ का है, जो नाकाफी है. ओवरबिलिंग करने वाले निजी अस्पतालों की लूट से गरीब मरीजों को बचाने के लिये क्या व्यवस्था है. उन्होंने इस फैसले का दिल खोलकर स्वागत किया है. ज़ाहिर है जब भी यह लागू हुआ तो उनकी भरपूर कमाई होगी. जहां 63 फीसदी प्राइमरी स्वास्थ्य केंद्रों में ऑपरेशन थिएटर की सुविधा और 29 फीसदी में लेबर रूम नहीं हो और 82 फीसदी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरी की कमी हो वहां बेहतर यह रहता कि इनको ही सक्षम बनाने की प्रक्रिया शुरू की जाती न कि नये अस्पतालों की हवाई घोषणा.

बजटीय दावा है कि 70 लाख नौकरियां इस साल सृजित होंगी. पहले हर साल दो करोड़ नौकरियों का वादा किया गया था. बीते सालों में कम से कम 6 करोड़ नौकरियां मिलनी चाहिये थीं मिलीं 6 लाख ऐसे में इस वादे का क्या ही कहना. हर जिलें में कौशल विकास केंद्र खोलने से क्या फायदा होगा जब राज्यों में तमाम सरकारी पद समाप्त करने की आशंकाएं बनी हुयी हैं. सरकार को उम्मीद है कि कारपोरेट टैक्स कम कर देने और लघु उद्यम को सहायता देने से नौकरियां पैदा होंगी यह उसी तरह का जैसे निर्यात वृद्धि के 15 फीसदी तक पहुंचने का आंकड़ा. हालत यह हैं कि लोहा सीमेंट सस्ते न होने से और बजटीय प्रावधानों में कोई खास तवज्जो न मिलने से रीयल एस्टेट और अवसंरचनात्मक विकास की कोई साफ सूरत नजर नहीं आती है.

कपड़ा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कुछ उद्योंगों विनिर्माण क्षेत्र तथा निजी निवेश में भी बढोतरी दिखते नहीं दीख रही ऐसे में आर्थिक विकास और नई नौकरियों की आमद की राह कठिन मालूम होती है. कभी एक भरा पूरा बजट रेल का होता था, अबकी बार वित्तमंत्री ने महजचंद मिनटों में रेलवे जैसे महत्वपूर्ण विभाग को निपटा दिया. पिछले साल रेल हादसों की अधिकता के चलते सरकार को अपना रेल मंत्री तक बदलना पड़ा इसके बावजूद इस बजट में आम यात्रियों की सुरक्षा पर कोई खास ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया गया. जिन थोड़ी बहुत सुविधाओं और लक्ष्यों की घोषणा की गयी उनके लिये इंतजार करना पड़ेगा और यह दो साल लंबा भी हो सकता है.

बात अगर आर्थिकी के कुछ ठोस बिंदुओं की करें जैसे राजकोषीय और वित्तीय घाटा, सकल घरेलू उत्पाद तथा विकास दर की तो यह चुनावी साल है, कच्चे तेल की कीमतें बढत पर हैं, मौसम के मार की आशंका है ऐसे में जब सरकार पिछले साल के लिये निर्धारित वित्तीय और राजकोषीय घाटे का लक्ष्य नहीं पा सकी तो इस साल उसका दावा फिर गलत होने वाला है, जीडीपी और विकास दर का आकलन जिन आंकड़ों के आधार किया जा रहा है वे विश्वस्त नहीं हैं और इन पर विवाद है यह सभी जानते हैं. वैसे भी यह देश की खुशहली और समग्र विकास का तय पैमाना नहीं है.

अचरज की बात यह कि देश की अर्थव्यवस्था से जिस काले धन की सफाये की बात की जाती थी इस बजट में ऐसी कोई कोशिश नजर नहीं आयी, संभवत: सरकार ने मान लिया कि नोटबंदी से देस्ध का सारा काला धन खत्म हो चुका है. निस्संदेह बजट सपनीला है पर ऐसा भी नही कि बजट में कुछ भी हो ही नहीं, कई प्रावधान ऐसे हैं जिससे सकारात्मक संकेत मिलते हैं बशर्ते सरकार की सदिच्छा उन पर चलने की हो. सरकार को पता है कि इसी साल 8 राज्यों में चुनाव होने हैं, अगर समय से पहले न हुये तो अगले साल लोकसभा चुनाव भी ऐसे में अगर जितनी उम्मीदें बजट से जगायी हैं उसमें से शतांश भी पूरी न हुयी तो आम चुनावों का नजारा उपचुनावों जैसा हो सकता है, यानी बजट की नाकामी मोदी सरकार के लिये चुनौती होगी. फिलहाल यह बजट कहता है कि अच्छे दिन अभी दूर हैं.

 

 

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